5501. || प्रथम कहानी || वत्सराज की सभा में शक्तिवेग का आगमन; शिव और माधव नामक घूर्त्तों की कथा; हरस्वामी की कया;
5.501. || प्रथम कहानी || वत्सराज की सभा में शक्तिवेग का आगमन; शिव और माधव नामक घूर्त्तों की कथा; हरस्वामी की कया;
चतुर्दारिका नामक पंचम लम्बक
प्रथम तरंग
वत्सराज की सभा में शक्तिवेग का आगमन
मद-घूर्णित मुख से छिटकते हुए सिन्दूर से सुशोभित मानों अपने तेज से विघ्नों को नष्ट, करते हुए और सिन्दूरी आभा से पृथ्वी को रजित करते हुए गजानन आपकी रक्षा करें ।॥१॥
इस प्रकार उस एकमात्र कुमार नरवाहनदत्त का पालन-पोषण करता हुआ वत्सराज उदयन महारानी वासवदत्ता के साथ सुखपूर्वक रहने लगा ।।२।।
एकबार पुत्र की रक्षा के लिए व्याकुल राजा को देखकर मन्त्री यौगन्धरायण ने एकान्त में राजा से कहा ॥३॥
'राजन् ! तुम्हें राजकुमार नरवाहनदत्त के लिए अब किसी प्रकार की चिन्ता नहीं करनी चाहिए ।।४।।
इस राजकुमार को भगवान् शिव ने होनेवाले विद्याधरों के चक्रवर्ती के रूप में तुम्हारे घर में उत्पन्न किया है ।।५।।
विद्याघरों के राजा, अपनी विद्याओ के प्रभाव से इस बात को जानकर ईर्ष्या (जलन) के कारण अत्यन्त क्षुब्ध हो गये है ।।६।।
इस बात को जानकर शिवजी ने उसकी रक्षा के लिए अपने स्तम्भक नामक गणों के सरदार को नियुक्त किया है।॥७७॥
वह गणेश, इस तुम्हारे बालक की रक्षा करता हुआ अप्रत्यक्ष रूप से यहाँ निवास करता है। यह बात नारदमुनि ने शीघ्र ही आकर मुझसे कही है' ।।८।।
जब मन्त्री यौगन्धरायण यह बात राजा से कह रहा था कि इसी समय किरीट और कुंडल धारण कर और हाथ में खड्ग लिये हुए एक दिव्य पुरुष आकाश से उत्तरा ।॥९१॥
प्रणाम करके आतिथ्य सत्कार किये गये उस पुरुष को वत्सराज उदयन ने उत्सुकता से पूछा कि 'तुम कौन हो ?' और 'तुम्हारा यहाँ क्या कार्य है। अर्थात् किसलिए आये हो' ।।१०।।
उसने कहा, 'मैं मनुष्य होकर भी शक्तिवेग नाम से विद्याधरो का राजा बन गया। अतः मेरे बहुत शत्रु हैं ।।११।।
इसलिए हे राजन् ! मैं अपनी विद्या के प्रभाव से यह जानकर कि तुम्हारा पुत्र भविष्य में हम विद्याधरों का चक्रवर्ती होगा, इसलिए उसे देखने के लिए आया हूँ ॥१२॥
ऐसा कहकर भावी विद्यावर-चक्रवर्ती का दर्शन कर प्रसन्न गक्तिवेग से राजा ने आश्चर्य के साथ पूछा- ॥१३॥
'मित्र ! विद्याधरत्व कैसे प्राप्त होता है। वह कैसा होता है और तुमने विद्याधरत्व को कैसे प्राप्त किया'। यह सब मुझसे कहो ॥१४॥
राजा की बातें सुनकर विनय से नम्र शक्तिवेग नामक विद्यावर बोला ।।१५।।
'राजन् ! इस जन्म में या अगले जन्म में शिवजी की आराधना करने पर धैर्यशाली व्यक्ति, उनकी कृपा से विद्याधर पद को प्राप्त होता है ।।१६।।
वह विद्याधर-पद, अनेक प्रकार का होता है, जो विद्या, खड्ग या भाला आदि की सिद्धि द्वारा प्राप्त होता है। मैंने उसे जिस प्रकार पाया, कहता हूँ, सुनो ॥१७॥
ऐसा कहकर शक्तिवेग ने महारानी वासवदत्ता के समक्ष राजा से अपनी कथा कहनी प्रारम्भ की ॥ १८॥
कनकपुरी और शक्तिवेग की कथा
प्राचीन काल में वर्धमान¹ नाम का नगर था; जो भूतल का भूषण था। उस नगर में परोपकारी नामक बीर राजा हुआ ।।१९।।
उस उन्नतिशील राजा की महारानी मेघ की रानी विद्युत् के समान 'कनकप्रभा' नाम की थी। वह चचलता से रहित, अर्थात् अति गभीर थी ।।२०।।
कुछ समय के पश्चात् उस राजा को रानी कनकप्रभा के गर्भ से एक कन्या उत्पन्न हुई, जो विधाता ने मानों लक्ष्मी के रूप का अभिमान नष्ट करने के लिए निर्मित की थो ।॥२१॥
लोकों को आँखों के लिए चाँदनी के समान वह राजकुमारी घोरे-धीरे बढ़ने लगी। पिता ने माता के हो नाम पर उसका नाम कनकरेखा रख दिया ॥२२॥
कन्या के युवती होने पर एक बार राजा ने एकान्त में आई हुई महारानी कनकप्रभा से कहा- ।।२३।।
"यह कन्या कनकरेखा, विवाह की चिन्ता के साथ समान रूप से बढ़ती हुई मेरे हृदय को व्यथित कर रही है ।॥२४।।
समुचित स्थान से भ्रष्ट गीति (गान) के समान कन्या पराये व्यक्ति के भी कानों में उद्वेग उत्पन्न करती है।॥ २५।।
अज्ञान से कुपात्र में दी हुई विद्या के समान कुपात्र को दी हुई कन्या न यश के लिए होती है, न धर्म के लिए ही, प्रत्युत पश्चात्ताप के लिए होती है।॥२६।।
अतः मैं इस कन्या को किस राजा के लिए दूं। इसके योग्य वर कौन होगा, यह मेरे हृदय में भारी चिन्ता हो रही है" ।॥ २७॥
यह सुनकर महारानी कनकप्रभा हँसकर राजा से बोली कि 'आप तो इस प्रकार चिन्तित हैं; किन्तु वह कनकरेखा तो विवाह ही नहीं करना चाहती' ।॥२८॥
आज ही खेल में गुड़िया बनाती हुई उससे मैंने कहा कि 'मैं तुम्हारा विवाह कब देखूंगी' ।॥२९॥
मेरे ऐसा प्रश्न करते ही उसने रोष के साथ मुझसे कहा, 'माँ ऐसा मत कहो; ऐसा मत कहो, मुझे किसी के लिए भी न दो ।॥ ३०॥
तुम्हारे साथ मेरा वियोग न होगा। मैं अविवाहित ही ठीक हूँ। यदि तुमने मेरा विवाह किया तो मुझे मरी ही समझो। इसमें कुछ कारण हैं' ।॥३१॥
यह सुनकर व्याकुल मैं तुम्हारे पास आई हूँ। विवाह न करनेवाली कन्या के लिए वर का सोचना ही व्यर्थ है ।॥ ३२॥
रानी के मुख से ऐसा सुनकर घबराया हुआ राजा कन्या के भवन में जाकर उससे बोला- 'बेटी, जिस पति की प्राप्ति के लिए देवताओं और दैत्यों की कन्याएँ तपस्या करके भगवान् से प्रार्थना करती हैं, उसे तू ने मना कर दिया' ।।३३-३४।।
पिता की बातें सुनकर भूमि पर दृष्टि गड़ाई हुई राजकुमारी कनकरेखा बोली- ॥३५॥
'पिताजी मुझे विवाह की चाह नहीं है, तो इसमें आपको इतना आग्रह क्यों है ? ' ।॥३६॥
पुत्री के इस प्रकार कहने पर बुद्धिमान् और परोपकारी राजा इस तरह कहने लगा- 'बेटी कन्यादान के विना पुरुष की पापशान्ति के लिए दूसरा कौन-सा उपाय है?' ॥३७॥
माता, पिता और बन्ध (भाई) से पराधीन कन्या स्वतन्त्र नहीं रह सकती ।। ३८।।
कन्या उत्पन्न होते ही दूसरे के लिए पालित, पोषित और रक्षित की जाती है। बाल्या वस्था के अनन्तर पति के बिना, पिता के घर पर कन्या का जीवन क्या है? अर्थात्, कुछ नही ॥३९।।
पितृगृह में कन्या के ऋतुमती होने पर उसके बन्धु-बान्धव अधोगति को प्राप्त होते हैं। वह कन्या वृषली² हो जाती है और उसके पति को वृषलीपति कहा जाता है' ।॥४०॥
राजा के इस प्रकार कहने पर वह कनकरेखा अपने मन की बात राजा से कही- ।।४१।।
'पिता, यदि ऐसी बान है, तो जिस वीर ब्राह्मण या क्षत्रिय ने कनकपुरी नाम की नगरी देखी हो, उसे आप मुझे दे दीजिए और वही मेरा पति होगा। अन्यथा व्यर्थ में आप मेरी दुर्दशा न करें' ।।४२-४३।।
कन्या के ऐसा कहने पर राजा ने सांचा, भला, भाग्य से इस कन्या ने विवाह करना तो स्वीकार किया ।॥४४॥
अवश्य हो किसी कारण से मेरे घर में यह कोई देवी उत्पन्न हुई है। अन्यथा यह छोटी कन्या होकर भी यह सब कैसे जानती है ।॥४५॥
उस समय ऐसा सोचकर और उनकी बात स्वीकार करके राजा उठकर चला गया और अपने दैनिक कार्य में व्यस्त हो गया ।। ४६।।
दूसरे ही दिन दरवार में बैठकर राजा ने दरबारियों से कहा- 'क्या आप लोगों में से किसी ने कनकपुरी नाम की नगरी देखी है ? ॥४७७॥
जिसने देखी हो, वह ब्राह्मण हो या क्षत्रिय, उसे अपनी कन्या कनकरेखा और उसके साथ युवराज-पद प्रदान करूंगा' ।।४८।।
परस्पर एक दूसरे का मुख देखते हुए सभामदो ने कहा- 'महाराज, उसे देखने की बात कौन कहे, हमलोगों ने यह नाम तक सुना नहीं' ।॥४९।।
तब राजा ने प्रतिहार को यह आज्ञा दी कि 'जाओ, इस नगर में डुग्गी के साथ घोषणा कर दो कि किसी ने कनकपुरी देखी है या नहीं ? और तुम इस बात का पत लगाओ ' ॥५०।।
राजा से आज्ञा पाकर प्रतिहार 'जो आज्ञा' कहकर चला गया ।।५१।।
और लौटकर उसने राजकर्मचारियों को आदेश दिया कि वे नगर में सुनने के लिए आश्चर्यजनक इस घोषणा को डिडिम-घोष के साथ कर दें ।॥५२॥
'कोई भी ब्राह्मण या क्षत्रिययुवक, जिसने कनकपुरी नाम की नगरी देखी हो; वह राज-दरबार में उपस्थित हो जाय, राजा उसे अपनी कन्या और युवराज-पद दोनों ही देगे' ।।५३।।
सारे नगर में व्यापक रूप से आश्चर्यजनक यह घोषणा होने लगी ।।५४।॥
'आज कनकपुरी की यह क्या घोषणा की जा रही है, जो हम बूढ़ों ने भी कभी न देखी और सुनी '।।५५।।
नगर-निवासी, वृद्धजन इस घोषणा को सुनकर परस्पर इस प्रकार वार्तालाप करने लगे। नगर में एक भी व्यक्ति यह नहीं कह सका कि मैंने वह कनकपुरी देखी है ।।५६।।
इतने में ही उम नगर-निवासी बलदेव के पुत्र शक्तिदेव ने भी यह घोषणा सुनी ।।५७।।
वह व्यमनी युवक उस समय जुए में दरिद्र हो चुका था। वह राजकुमारी की प्राप्ति के समाचार से उत्माहित होकर मांचने लगा ।।५८।।
मैं जुए में सब कुछ हार चुका हूँ, अतः अब मै पिता के घर में प्रवेश नहीं पा सकता और न वेश्या के घर में ही जाकर रह सकता हूं ॥५९॥
इसलिए अब मैं कहीं का भी न रहा, अत. अब अवसर है कि मैं झूठ बोलूं कि मैने वह नगरी देखी है ।।६०।।
मुझे झूठा कौन समझेगा। वह नगरी किसने देखी है। अतः सम्भव है, राजकुमारी से मेरा समागम होजाय ।। ६१।।
ऐसा सोचकर उसने राजपुरुषो के समीप जाकर झूठ कह दिया कि मैंने कनकपुरी नगरी देखी है ।। ६२।।
तब उन्होंने कहा- 'आओ द्वारपाल उनके पास चलें। उनके ऐसा कहने पर उनके साथ वह द्वारपाल के पास गया ।॥ ६३।।
घोषणा करनेवाले ने कहा कि 'इसने कनकपुरी देखी है'। यह सुनकर द्वारपाल, उसे स्वागत-सत्कार के साथ राजा के पास ले गया ।।६४।।
राजा के सम्मुख उपस्थित होकर भी उस धूत्तं जुआरी ने ऐसे ही मिथ्या भाषण किया । सच है, जूए में हारे हुए धूर्त जुआरी के लिए कौन-सा कार्य दुष्कर है।॥ ६५।।
राजा ने भी उसकी सत्यता जाँचने के लिए उसे राजकुमारी के पास भेज दिया ॥६६॥
राजकन्या ने द्वारपाल से समाचार सुनकर पास आये हुए उस ब्राह्मण से पूछा, 'क्या तुमने कनकपुरी देखी है?'।॥६७॥
उसने स्वीकार करते हुए कहा कि विद्यार्थी-अवस्था में घूमते हुए उस नगरी को मैंने देखा था ।।६८।।
'किस प्रकार तुम वहाँ गये थे और वह कैसी नगरी है?' राजकुमारी के पुनः इम प्रकार पूछने पर उस ब्राह्मण ने इस प्रकार कहा ॥६९।।
'यहाँ से मैं ह्रपुर नामक नगर में गया और वहाँ से चलकर क्रमशः वाराणसी पहुंचा ।।७०।।
वाराणसी से चलकर मैं पौड्रवर्धन नामक नगर में पहुंचा और उसके पश्चात् मैं उस कनकपुरी नगरी में पहुँचा ॥७१।।
पुण्यात्माओं के लिए इन्द्रपुरी के समान वह भोगभूमि है। उसकी शोभा अपलक नेत्रों से देखने योग्य है।॥७२॥
वहां विद्या प्राप्त कर कुछ समय पश्चात् मैं यहाँ आ गया! इस प्रकार इस मार्ग से मैं गया और वह ऐसी नगरी है' ।॥७३।।
उस धूर्त ब्राह्मण शक्तिदेव की इस प्रकार की बनावटी बातो को सुनकर राजकन्या मुस्कराती हुई बोली- 'हे ब्राह्मण ! यह सत्य है कि तुमने वह नगरी देखी। किन्तु यह तो बप्त्ताओ कि तुम उस नगरी में किस मार्ग से गये थे, फिर से एक बार बताओ' ।।७४-७५।।
राजकुमारी के इस प्रकार पूछने पर जब शक्तिदेव पुनः धृष्टता करने पर उतारू हुआ, एव राजकुमारी ने दासियों से कहकर उसे बाहर निकलवा दिया ।। ७६।।
उसके निकल जाने पर राजपुत्री पिता के पास गई। पिता ने उसमे पूछा कि 'वह ब्राह्मण सत्य कहता था अथवा नहीं' ।।७७।।
तब वह राजपुत्री कहने लगी- 'पिताजी आप राजा होकर भी ऐसी अविवेकपूर्ण बातें क्यों करते हैं? क्या आप नहीं जानते कि धूर्त जन सरल व्यक्तियों को ठग लेते हैं। यह ब्राह्मण झूठ बोलकर मुझे ठग लेना चाहता था। इस झूठे ने कनकपुरी नहीं देखी है। धूर्त लोग अनेक प्रकार की ठगियाँ किया करते हैं ।॥ ७८-८०॥
सुनो, मैं इस प्रसंग में तुम्हें शिव और माधव दो धूत्तों की कथा सुनाती हूँ।' ऐसा कहकर उसने यह कथा सुनानी प्रारम्भ की ॥८१॥
शिव और माधव नामक घूर्त्तों की कथा
सब नगरों में श्रेष्ठ रत्नपुर नाम का यथार्थ नामवाला एक नगर है। उसमें शिव और माधव नाम के दो धूर्त रहते थे ॥८२॥
उन्होंने अनेक ठगों का एक दल बनाकर अपनी ठगी के हथकंडों से नगर के सभी धनी व्यक्तियो को ठग लिया था ।।८३।।
एक बार उन दोनों ने आपम में यह विचार किया कि 'हमलोगों द्वारा यह सारा नगर ठग लिया गया है। अब इसे छोड़ कर चले ओर उज्जैन में डेरा डालें। सुनते हैं कि वहाँ के राजा का पुरोहित बहुत बडा धनी है। उसका नाम गकरस्वामी है। उमसे धन लेकर मालवा देश की रमणियो के विलास का आनन्द लेंगे। वह आधी दक्षिणा का हिस्सेदार, अर्थात् आधी घूस पर काम करनेवाला, चढ़ी हुई भौंहोंवाला है। उनके पास सात घडे स्वर्ण का खजाना है। किन्तु वह स्वयं बड़ा ही कृपण या अर्थपिशाच है ऐसा ब्राह्मण लोग कहा करते हैं। उस ब्राह्मण की एक रत्नस्वरूपा कन्या भी है। इसी प्रमग में हमलोग उसे भी अवश्य प्राप्त कर देंगे' ।।८४-८८11
ऐमा सोचकर और उसे ठगने की योजना बनाकर शिव और माधव दोनों धूर्त उस रत्नपुर नगर से उज्जैन को चले ।।८९।।
धीरे-धीरे उज्जैन पहुँचकर माधव तो नगर के बाहर किसी ग्राम मे अपने को राजकुमार घोषित कर अपने साथियों के साथ ठहर गया ।।९०।।
और अत्यन्त मायावी शिव, भली-भाँति ब्रह्मचारी का वेष बनाकर उस उज्जयिनी नगरी में जा पहुंचा ।॥९१॥
वह वहाँ जाकर क्षिप्रा नदी के तट के समीप किसी मठ में ठहर गया और अपने आसपास पूर्ण आडम्बर के लिए मिट्टी, कुश, भिक्षापात्र, मृगचर्म आदि रख लिये ॥९२॥
वह प्रातःकाल ही घनी और चिकनी मिट्टी से शरीर पर लेप करता था, मानों विना तरंगों के कीचड़ के लेप का सूत्रपात कर रहा हो ॥९३॥
वह नदी के तट पर स्नान करके बहुत देर तक नीचे की ओर मुँह किये खड़ा रहता था, मानों अपने कुकर्मों से होनेवाली अधोगति का अभ्यास कर रहा हो ॥९४॥
स्नान करके उठा हुआ वह चिरकाल तक मूयं की ओर मुँह करके खड़ा रहता था, मानो अपने को शूली पर चढाने के योग्य बता रहा हो ।॥९५।।
स्नान करके हाथ में कुश की मुट्ठी लेकर जप करता हुआ वह पद्मासन लगाकर बैठा हुआ दम्भी ब्राह्मण के समान मालूम होता था ।।९६।।
बीच-बीच में वह माधु पुरुषों के हृदयों के समान सुन्दर पुष्पों का हरण करके शिवजी की पूजा किया करता था ।। ९७।।
पूजन करने के पश्चात् भी वह जप करने की बनावटी मुद्रा बनाये रहता था, मानो अपने कुकर्मों के फलस्वरूप प्राप्त होनेवाले नरको का ध्यान करता हो ॥९८॥
अपराह्न के समय वह मौन धारण करके द्विजो (ब्राह्मणो) के घरो से भिक्षा प्राप्त करने के लिए दड लेकर और कृष्णाजिन³ पहनकर जाता था और तीन भिक्षाएँ लेता था ।।९९।।
और तीन सत्य के ममान वह भिक्षा के तीन भाग करता था ।।१००।।
एक भाग कौवो को, एक भाग अतिथि को और दम्भ के बीज के समान एक भाग से वह अपना पेट भरता था ।। १०१॥
भोजन के बाद मानो अपने पापों को गिनता हुआ वह फिर जप-माला लेकर जप करने का झूठा ढोंग रचा करता था ।॥१०२॥
वह रात में उस मठ के अन्दर नगरनिवासियो के सूक्ष्म तर्कस्थानों को सोचता हुआ अकेला ही रहता था ।।१०३।।
इस प्रकार प्रतिदिन वंचनापूर्ण कठोर तप करते हुए उसने नागरिकों के मन को अपनी ओर आकृष्ट कर लिया ॥१०४।॥
'ओह यह तो बड़ा ही शान्त तपस्वी है' इस प्रकार चारों ओर उसकी प्रसिद्धि हो गई और सभी नागरिक उसके सामने भक्ति से प्रणाम करने लगे ॥१०५॥
शिव के इस प्रकार अपना प्रभाव जमा लेने पर उसके दूसरे साथी माधव ने अपने गुप्तचरों से जानकार नगरी में प्रवेश किया ॥१०६।।
और शिव के स्थान से दूर एक मन्दिर में अपना निवास स्थिर किया। एक बार माधव, राजपुत्र के नकली वेष में स्नान करने के लिए शिप्रा नदी के तट पर गया ।।१०७।।
स्नान करने के पश्चात् वह देव-मन्दिर में जप करते हुए शिव को देखकर अत्यन्त भक्ति-भाव से नम्र होकर उसके चरणों में गिर पड़ा ॥१०८।।
और जनता के सामने कहने लगा कि ऐसा दूसरा तपस्वी इस समय नहीं है। मैंने तीर्थों में भ्रमण करते हुए इस बात का वार-वार अनुभव किया है।॥१०९।।
शिव भी दम्भ से गर्दन टेढ़ी करके उसे देखता हुआ मौन ही रहा और माधव प्रणाम करके घर चला गया ।।११०।।
फिर रात में मिलकर और खा-पीकर उन दोनों ने अपने आगे के कर्त्तव्य की योजना बनाई। कुछ रात्रि शेष रहते ही शिव अपने मठ में लौट आया और माधव ने भी प्रातःकाल अपने नाथियों में से एक धूर्त को आदेश दिया ।। १११-११२।।
कि ये दो वस्त्र (धोनी और दुपट्टा) लेकर राजपुरोहित शकरस्वामी के घर जाओ और उससे कहो कि 'अपने बन्धु-बान्धवों के द्वारा सताया गया माधव नामक राजकुमार दक्षिण देश से कुछ राजपुत्रों के साथ बहुत-सा धन लेकर यहाँ आया है। वह आपके राजा की सेवा करेगा ।।११३-११५।।
उसने आपके दर्शन के लिए (समय माँगने के लिए) मुझे आपके पास भेजा है', इस प्रकार नम्रता के साथ राजपुरोहितजी से कहना ।। ११६।।
माधव द्वारा इस प्रकार कहा गया वह धूर्त्त हाथ में भेंट लिये उसने माधव का सन्देश उसे सुनाया ।।११७-११८।।
राजपुरोहित ने भी भविष्य में लाभ की कल्पना और वर्त्तमान में भेंट के लोभ में फंसकर उसकी बात मान ली। सच है, लोभियों के लिए भेंट, उपहार आदि एकमात्र आकर्षणकारी औषधि है ॥११९॥
उस सूत्र्त के लौट आने पर दूसरे दिन वह माधव, मौका देखकर स्वयं पुरोहित से मिलने के लिए गया ॥ १२०।।
नकली राजपुत्र बना हुआ पथिक का वेश धारण किये हुए और अपने सभी धूत्तों के साथ लाठी आदि लिये हुए सेवकों से युक्त वह माधव, पहले से ही अपने आगमन की सूचना देकर, राजपुरोहित से मिला ॥ १२१।।
पुरोहित ने भी अगवानी के लिए आगे जाकर प्रसन्नता प्रकट करते हुए उसका स्वागत और अभिनन्दन किया ॥ १२२॥
माधव, कुछ समय तक उसके साथ बैठकर और इधर-उधर की बातें करके तत्पश्चात् राजपुरोहित से आज्ञा लेकर अपने घर लौट आया ।। १२३।।
दूसरे दिन फिर से एक भेट (उपहार) भेजकर माधव पुरोहित के पास गया और बोला कि 'हम अपने कुटुम्ब के भरण-पोषण के लिए मेवावृत्ति (नोकरी) करना चाहते है, इसीलिए आपकी मेवा मे उपस्थित हुए है। वैसे तो हमारे पास धन की कुछ मात्रा है' ।॥१२४-१२५।।
यह सुनकर उस पुरोहित ने उससे कुछ (घूस) प्राप्ति की आशा से माधव की इच्छा-पूत्ति करना, अर्थात नौकरी दिलाना स्वीकार किया ।। १२६।।
और तुरन्त राजा के पास माधव को ले जाकर, उसके प्रशंसनीय परिचय का बखान करते हुए गौरव के साथ उसे राजा से मिला दिया ।। १२७-१२८।।
राजा ने भी राजकुमार के समान आकृतिवाले माधव को देखकर आदर के साथ उस पर कृपा की और उसे नौकरी पर नियुक्त करा दिया ॥ १२९।।
इस प्रकार माधव, दिन में, राजसेवा में लगा रहता था और रात में शिव से मिलकर ठगी की योजना बनाया करता था ।। १३०।।
कुछ दिनों के उपरान्त लोभी पुरोहित ने माधव से कहा कि 'तुम यहाँ मेरे घर पर ही रहा करो' ।।१३१।।
पुरोहित के आग्रह करने पर उसके ही नाश का कारण माधव, अपने धूर्त मित्रों के साथ, उसके घर पर उसी प्रकार रहने लगा, जैसे 'मद्गु' नामक जन्तु (पक्षी) वृक्ष पर रहा करता है। माधव ने, नकली माणिक के कुछ गहने बनवाकर एक पेटी में बन्द किये और उस पेटी को उसने पुरोहित के खजाने में रखवा दिया ॥ १३२-१३३।।
बीच-बीच में उस पेटी को खोलकर माधव पुरोहित के मन को इस प्रकार ललचाता रहा; जैसे घास दिखा-दिखाकर पशु को ललचाया जाता है।॥१३४।।
कुछ दिनों पश्चात् पुरोहित के विश्वस्त होजाने पर माधव ने भोजन कम करके अपने को जान-बूझकर अत्यन्त दुर्बल बना लिया ।। १३५।।
कुछ दिन व्यतीत होने पर एक बार उसकी शय्या के पास बैठे हुए पुरोहित को धूर्त्तराज माधव ने क्षीण स्वर में कहा- ।।१३६।।
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मेरे शरीर की दशा दिनानुदिन बिगड़ती जा रही है। इसलिए तुम किसी अच्छे सत्पात्र ब्राह्मण को लाओ ।।१३७।।
जिसे मैं इहलोक और परलोक के कल्याणार्थ अपना सब कुछ दान कर दूं। महान् व्यक्ति, इस अस्थिर जीवन में धन के प्रति श्रद्धा या प्रेम नही रखते ॥ १३८ ॥
दान से जीवित रहनेवाला लालची पुरोहित माघव के इस प्रकार कहने पर उससे बोला कि 'ऐसा ही करूँगा'। - पुरोहित के ऐसा कहने पर वह धूर्त माधव उसके पैरो पर गिर पड़ा ।।१३९।।
तदनन्तर पुरोहित जिस-जिस ब्राह्मण को उसके पास लाता, उसे माधव किसी विशेष कारण से अयोग्य बता देता ।।१४०।।
यह देखकर माधव के पास बैठा हुआ उसका साथी एक धूर्त उस पुरोहित से बोला -'इनको साधारण ब्राह्मण पसन्द नही आते। इसलिए शिप्रा नदी के किनारे शिव नाम का एक ब्राह्मण आजकल रहता है। वह इन्हें भाता है या नहीं, देखो।' यह सुनकर दुःखी मुँह बनाकर माधव पुरोहित से बोला- 'हाँ, हाँ कृपा करके उसी ब्राह्मण को ले आओ। उसके समान ब्राह्मण दूसरा नहीं है' ।।१४१-१४३।।
माधव से इस प्रकार कहा गया राजपुरोहित शिव के पास गया और वहाँ उसने शिव को कपट ध्यान-मुद्रा में निश्चल बैठा देखा ॥१४४॥
यह देखकर पुरोहित उसकी प्रदक्षिणा करके उसके आगे नम्र होकर बैठ गया। उस धूत्तं शिव ने भी धीरे-धीरे आँखें खोलकर उसकी ओर देखा ।। १४५।।
तब पुरोहित ने झुककर प्रणाम किया और कहा- 'हे प्रभु, यदि आप क्रोध न करें, तो कुछ निवेदन करूँ' ।।१४६।।
पुरोहित से यह सुनकर शिव ने अपने ओठों को उठाकर संकेत करते हुए उसे कहने की आज्ञा दी। तदनन्तर पुरोहित इस प्रकार कहने लगा- ॥१४७।।
दक्षिण देश का एक महाधनी माधव नाम का राजकुमार यहाँ उज्जैन में ठहरा है। वह अस्वस्थ है और अपना सर्वस्व दान करना चाहता है। यदि आप स्वीकार करें, तो वह सब आपको ही देना चाहता है। उसके पास अनेक प्रकार के रत्न-जटित आभूषण है' ।।१४८-१४९।।
पुरोहित की यह बात सुनकर वह धूर्त शिव, धीरे-धीरे मौन छोड़कर बोला, 'महाराज! भिक्षामात्र से जीवित रहनेवाले मुझ ब्राह्मण को धन से क्या प्रयोजन?' ।॥१५०।।
तब वह पुरोहित फिर बोला- 'हे ब्राह्मण देवता ! ऐसा न कहो। क्या तुम आश्रमों का क्रम नहीं जानते ? अर्थात् अब तुम्हें गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना है, जिसमें धन की ही आवश्यकता पड़ेगी। १५१।।
विवाह के उपरान्त मनुष्य, देवता, पितर और अतिथियों की सेवा करके धर्म, अर्थ और काम इन तीन पुरुषार्थों को प्राप्त करता है; क्योकि गृहस्थी ही चारों आश्रमों में श्रेष्ठ है' ।। १५२॥
तब वह शिव बोला- 'मेरा विवाह कहाँ हो सकता है। मैं ऐसे-जैसे साधारण कुल से विवाह न करूँगा' ।। १५३।।
यह सुनकर और राजकुमार की ओर से दान दिये जानेवाले घन को जीवन-भर सुख भोगने के लिए पर्याप्त समझकर लालची पुरोहित, अवसर पाकर शिव से बोला- "यदि ऐसा आपका निश्चय है, तो मेरी विनयस्वामिनी नाम की अत्यन्त सुन्दरी कन्या है। उसे मैं दान करके तुम्हें दे दूंगा और माधव द्वारा दान से जो धन तुम्हे मिलेगा, उसे मै सुरक्षित रखूंगा। इसलिए तुम अब गृहस्थाश्रम में प्रवेश करो" ।॥१५४-१५६।।
यह सुनकर और अपनी योजना को पूर्ण रूप से सफल होते देखकर धूर्त शिव ने कहा- 'हे ब्राह्मणदेव ! यदि तुम्हारा यही आग्रह है, तो मैं तुम्हारी बात मान लेता हूँ। रत्न और सोना आदि धन के सम्बन्ध में तो मैं तपस्वी मूर्ख ही हूँ; किन्तु तुम्हारे आग्रह से मैं तैयार हो जाता हूँ, जैसा उचित समझो करो' ।॥ १५७-१५८।।
इस प्रकार शिव की बाते सुनकर प्रसन्न पुरोहित उस अशिव (अकल्याण) शिव को वैसे ही अपने घर ले गया ।। १५९।।
शिव को बैठाकर उसके साथ जो कुछ वार्तालाप हुआ था, वह सब पुरोहित ने माधव से कहा। माधव ने भी उसकी पर्याप्त प्रशसा की ।।१६०।।
उसी समय बड़े कष्ट से पाली हुई कन्या, पुरोहित ने लाकर शिव को समर्पित कर दी; मानों जीवन-भर की अपनी कमाई उसने अपनी मूर्खता से गंवा दी ।।१६१।।
विवाह होने के तीसरे दिन पुरोहित, शिव को कपट से बीमार बने हुए माधव के पास ले गया ।। १६२।।
'अद्भुत तप करनेवाले आपको प्रणाम करता हूँ' इन शब्दों से माधव ने शिव का अभिवादन करके और उठकर उसके चरणों का स्पर्श किया ।। १६३।।
और पुरोहित ने स्वयं खजाने से निकालकर नकली माणिक आदि रत्नों के आभूषणों और रत्नों से भरी हुई पेटी उसे दे दी ।॥ १६४।।
णिव ने भी उसे लेकर पुनः पुरोहित को सौप दिया और पुरोहित ने भी यह कहकर उसे ले लिया कि 'यह तो मैंने पहले ही स्वीकार कर लिया है, तुम्हे इसकी क्या चिन्ता है' इस प्रकार आशीर्वाद देकर शिव के अपने शयनागार में चले जाने पर पुरोहित ने उस रत्नपेटी को तुरन्त अपने खजाने में रख दिया ॥१६५-१६७।।
दूसरे दिन, माधव भी अपनी दुर्बलता को छोड़कर महादान के प्रभाव से स्वस्थ होने का ढोंग रचने लगा ।।१६८।।
'तुमने मेरे धर्म-कार्य में सहायता देकर मेरा बहुत बड़ा उपकार किया'- इस प्रकार पास में आये हुये पुरोहित की प्रशसा करने लगा ।।१६९।।
'शिव जैसे तपस्त्री के प्रभाव से मेरा शरीर स्वस्थ हो गया। मैं बच गया', इस प्रकार कहकर उसने शिव के साथ प्रकट रूप से मित्रता कर ली ।।१७०।।
कुछ दिनों के पश्चात् शिव ने भी पुरोहित से कहा- 'मैं इस प्रकार कितने दिनों तक तुम्हारे यहाँ भांजन करता रहूँगा, इसलिए तुम ही दान में दिये माल का मूल्य चुकाकर उन आभूषणो और रत्नों को क्यों नहीं ले लेते। यदि माल अधिक द्रव्य का हो, तो यथासंभव इस समय जो दे सकते हो, वही देदो' ।। १७१।।-।।१७२।।
यह सुनकर और उस माल को बहुमूल्य या अमूल्य समझकर पुरोहित ने उस माल का कुछ मूल्य दे दिया ।।१७३॥
और इसकी दृढ़ता के लिए शिव से हस्ताक्षर कराकर उसका प्रमाण-पत्र भी राज-पुरोहित ने ले लिया। इस प्रकार, पुरोहित ने उसके घन से अपने धन को बढ़ा लिया ॥ १७४।।
इसी प्रकार दोनों ने परस्पर लिखित रूप से धन ले-देकर प्रमाणपत्र लिख दिये और अलग-अलग हो गये। शिव ने भी अपना अलग घर बसा लिया ।। १७५।।
तदुपरान्त वह शिव और माधव परस्पर मिलकर पुरोहित का धन उड़ाते हुए स्वतन्त्र रूप से रहने लगे ।। १७६।।
कुछ समय के पश्चात् पुरोहित, रत्न और आभूषण बेचकर रुपये लेने के लिए जौहरी के बाजार में गया और उन आभूषणों में से एक कडा या हाथ का कगन बेचने लगा ।। १७७।।
वहाँ पर रत्नपरीक्षक जौहरियों ने उमको परीक्षा करके पुरोहित से कहा- 'यह कौन चतुर कारीगर है, जिसने इम नकली माल को बनाया है' ।॥१७८॥
भिन्न-भिन्न रंगों में रंगे हुए काँच और स्फटिक के टुकडो को पीतल में ऐसा जड़ दिया गया है कि वे सच्चे रत्न-से प्रतीत होते है। किन्तु ये सब नकली रत्न है, अमली एक भी नही ॥ १७९।।
यह सुनकर घबराया हुआ पुरोहित घर से सब आभूषणो को लेकर माधव को दिखाने के लिए उसके पास ले गया ।।१८०।।
यह देखकर माधव बोला कि 'यह तो तुम्हारे ही मब नकली गहने या आभूषण है। तुमने अमली आभूषण पहले ही निकाल लिये और नकली बनवाकर रख दिये' ।।१८१।।
यह सुनकर पुरोहित पर मानों वज्ज्रपात-मा हुआ और वह तुरन्त शिव के पास जाकर कहने लगा कि अपने आभूषण ले लो और मेरा धन मुझे दे दो ॥१८२॥
उत्तर में शिव ने कहा- 'अब मेरे पास तुम्हारा धन कहाँ रह गया, वह तो मैंने इतने समय तक खा डाला' ।॥१८३॥
इस प्रकार झगड़ते हुए वे दोनों शिव और पुरोहित माधव को माथ लेकर राजा के पास गये। राजा से पुरोहित ने प्रार्थना की- 'महाराज ! पीतल में विशेष प्रकार से जड़े हुए शीशे और स्फटिक के रगीन टुकड़ों से बने हुए नकली आभूषणों से मुझे ठगकर शिव ने मेरा सर्वस्व लूट लिया' ।।१८४-१८६।।
तब शिव ने राजा से कहा- 'राजन् ! मैं बाल्यावस्था से हो तपस्वी ब्रह्मचारी रहा। इसी ने आग्रह करके मुझे यह दान लेने के लिए बाध्य किया। मैंने इस सम्बन्ध में अपनी मूर्खता (अनभिज्ञता) बताते हुए इससे उसी समय कह दिया था कि मैं रत्न आदि के सम्बन्ध में सर्वथा अनभिज्ञ हूँ और मुझे इसका कुछ पता नहीं। इस सम्बन्ध में तुम जैसा समझो, करो ॥ १८७-१८८।।
'मैं तुम्हारे कहने से दान ले रहा हूँ' - इसने इस बात को स्वीकार किया था। इसीलिए मैंने दान लेकर उसे उसी समय इसे सौप दिया था ।। १८९।।
इसने अपने इच्छानुसार ही उसका मूल्य देकर वह मुझसे खरीद लिया। इस विषय में हम दोनों के क्रय-विक्रय-सम्बन्धी लिखित प्रमाण भी सुरक्षित हैं।॥ १९०॥
अब क्या करना चाहिए, यह आप स्वयं जानते हैं'। ऐसा कहकर शिव के चुप हो जाने पर पुरोहित से माघव कहने लगा- 'ऐसा न कहो। मेरा इसमें क्या अपराध है। न मैंने तुम्हारा कुछ लिया है और न शिव का ।।१९१-१९३।।
यह मेरा पैत्रिक धन यहीं अमानत में रखा था। मैंने उसे लाकर पुरोहित को दे दिया। और पुनः उसी के लाने पर मैंने ब्राह्मण को दान दे दिया। यदि यह असली आभूषण नही है, तो मुझे शीशा और पीतल के दान देने का क्या लाभ होगा ।।१९४।।
मैंने निष्कपट भाव से दान दिया और परिणामस्वरूप तत्काल ही भीषण रोग से छुटकारा भी पा गया। इसलिए मुझे तो अपने दान पर पूरा विश्वास है' ।।१९५॥
इस प्रकार, अपनी मुखमुद्रा को विना किसी रूप में विकृत किये स्वाभाविक रूप से माधव के कहने पर मत्रियों के साथ राजा हँसने लगा ॥ १९६॥
तब सभी सभासदों ने मन ही मन मुस्काते हुए कहा कि 'इसमें माधव या शिव का कोई अपराध नहीं है'। सच है, अत्यन्त लोभ से अन्धा हो जाना किसके लिए विपत्ति का कारण नहीं होता है ।। १९७।।
तदन्तर वह पुरोहित, अपना बन गंवाकर राज-दरबार से भी हँसी का पात्र बनकर अत्यन्त लज्जित होकर अपने घर आगया ।॥१९८॥
वे दोनों धूर्त शिव और माधव प्रसन्न राजा की कृपा से आनन्द लेते हुए यहीं उज्जयिनी में आनन्दपूर्वक रहने लगे ।।१९९।।
इस प्रकार इस कथा को सुनाकर राजकुमारी ने अपने पिता से कहा कि "इसी प्रकार इस पृथ्वी पर जाल (फरेब) से जीनेवाले धूर्त, अपनी जिह्वा के जाल बुनते रहते हैं, जिनमें सरल-हृदय मनुष्य मछलियों के समान फँसते रहते है।॥ २००।।
इसी प्रकार 'मैंने कनकपुरी देखी है'- ऐसा कहकर यह धूत्तं ब्राह्मण, तुम्हें ठगकर मुझे और युवराज-पद को प्राप्त करना चाहता है ॥२०१॥
इसलिए मेरे विवाह के लिए तुम्हें शीघ्रता न करनी चाहिए। अभी मैं कुमारी अवस्था में ही हूँ। देखती हूँ, क्या होता है" ।॥ २०२॥
कन्या कनकरेखा के इस प्रकार कहने पर राजा परोपकारी कहने लगा- 'बेटी, युवावस्था में अधिक समय तक कन्या बना रहना उचित नहीं है। गुणों से डाह करनेवाले ईर्ष्यालु व्यक्ति मिथ्या कलंक लगा देते हैं ।॥२०३-२०४।।
विशेषकर उच्च व्यक्तियों को तो अधिकतर झूठे ही कलंकित कर देते हैं। इस प्रसंग में मैं तुम्हें हरस्वामी की एक कथा सुनाता हूँ, सुनो' ॥२०५।।
हरस्वामी की कया
गगा के तट पर कुसुमपुर⁴ नाम का जो नगर है, उसमें हरस्वामी नाम का एक तपस्वी तीर्थ-यात्री रहता था ।।२०६।।
वह भिक्षावृत्ति से जीवन-निर्वाह करता हुआ वहाँ पर्णकुटी बनाकर रहता था। वह अपनी कठोर तपस्या के प्रभाव से जनता के सम्मान एवं श्रद्धा का भाजन बन गया ।।२०७।।
एकबार भिक्षा के लिए निकले हुए उसे दूर से देखकर उससे ईर्ष्या करनेवाले एक दुष्ट ने लोगो के सम्मुख कहा-- ॥२०८।।
'क्या आप लोग जानते है कि यह कैसा कपटी तपस्वी है। इसी ने इस नगर के सभी बच्चों को खा डाला' ।॥ २०९।।
यह सुनकर उसी के समान एक दूसरा मनुष्य बांला 'सच है, मैंने भी लोगों को ऐसा कहते हुए सुना है' ।।२१०।।
'यह ठीक है' इन शब्दो से एक तीसरे ने भी उनका समर्थन किया। कारण यह है कि दुष्टो की चर्चा मज्जन व्यक्तियों की निन्दा की लड़ी बाँध देती है।॥२११॥
इसी क्रम से यह चर्चा (अफवाह) सारे नगर में फैल गई। फलतः उसने व्यापक रूप धारण कर लिया ।। २१२।।
नगरनिवासी अब अपने बच्चों को घरो से निकलने नहीं देते थे कि हरस्वामी बच्चो को ले जाकर खा जाता है।॥ २१३॥
तब नगर के ब्राह्मणो ने बच्चों के वध से डरकर एक गोष्ठी करके निश्चय किया कि जिससे हरस्वामी को नगर से निकाल दिया जाय ॥ २१४।।
यह निश्चय करके भी भयभीत ब्राह्मण उससे स्पष्ट रूप से यह कहने में डरने लगे कि कही वह हम लोगो को हो न खा जाय। इसलिए दूतो के द्वारा वे ब्राह्मण उसके पास सन्देश भेजने लगे। वे दूत, दूर से ही उस हरस्वामी से कहने लगे कि 'तुम इस नगर से बाहर चले जाओ। ऐसा तुम्हे ब्राह्मणों ने कहलाया है' ।॥ २१५-२१६।।
आश्चर्यचकित हरस्वामी के यह पूछने पर कि 'किस कारण मुझे निकाला जा रहा है,' दूतों ने उत्तर दिया कि 'तुम यहाँ छोटे बच्चों को खा जाते हो' ।॥ २१७॥
यह सुनकर वह स्वयं विश्वास दिलाने के लिए ब्राह्मणों के पास गया, जब कि उसके भय से वे लोग दूर भाग रहे थे ॥२१८॥
राजा ने पूर्वजन्म का स्मरण करनेवाली उस कन्या को अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ देखकर और उसके मनोनुकूल बर मिलने में कोई दूसरा उपाय न देखकर अपने देश में आये हुए यात्रियों के लिए प्रतिदिन इसी प्रकार का ढिंढोरा पीटने की आज्ञा दे दी ।। २३२।।
'जिस ब्राह्मण या क्षत्रिय-पुवक ने कनकपुरी देखी हो, वह बतावे, राजा उमे युवराज-पद के गाथ अपनी कन्या देंगे'। इस प्रकार नक्कारे से सभी जगह घोषणा होने लगी, किन्तु कनकपुरी देखा हुआ एक व्यक्ति भी नहीं मिल पाया ।। २३३।।
प्रथम तरंग समाप्
1. बंगाल का प्रसिद्ध वर्द्धमान (वर्ववान) नगर।
2. वृषली-शूद्र जाति की स्त्री शूद्रा।
3. कृष्णाजिन = काले मृग का चर्म ।
4. कुसुमपुर - फूलों का नगर, आधुनिक पटना नगर।
5. गोष्ठी-सभा, समिति (Meeting) ।
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