5.302. || द्वितीय कहानी || राजा उदयन और पद्मावती के विवाह; वासवदत्ता के जलना; कुन्ती और दुर्वासा की कथा
5.302. || द्वितीय कहानी || राजा उदयन और पद्मावती के विवाह; वासवदत्ता के जलना; कुन्ती और दुर्वासा की कथा
द्वितीय तरंग
राजा उदयन और पद्मावती के विवाह की कथा
नारद मुनि के प्रस्थान करने पर यौगन्धरायण आदि मन्त्री, पूर्व-निर्धारित राजा को रानी के साथ लावाणक ग्राम ले गये ।।१।।
राजा उदयन, चारों ओर फैलते हुए सेना के शब्दों के साथ लावाणक पहुँचा। सेना की कलकल ध्वनि से वह स्थान मानों मन्त्रियों की सफलता की घोषणा कर रहा था ।।२।।
सीमा पर सेना के साथ आये हुए उदयन का पता पाकर मगध का राजा आक्रमण के भय से काँप उठा ।। ३-४।।
वत्सराज भी वहाँ रहते हुए शिकार के लिए प्रतिदिन गहरे वनों में घूमता था ।।५।।
मगध-नरेश ने, सद्भावना-प्रदर्शन के लिए यौगन्धरायण के पास अपना । दूत भेजा। उस चतुर मन्त्री ने भी दूत का समुचित रूप से अभिनन्दन किया ।।६।।
वासवदत्ता के जलने की कथा
एक दिन राजा उदयन के शिकार के लिए चले जाने पर यौगन्धरायण गोपालक, रुमण्वान् और वसन्तक के साथ समिति करके एकान्त में वासवदत्ता के समीप गया। भाई द्वारा पहले ही तैयार की गई रानी से उसने राजकार्य में सहायता के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की बाते समझाई ॥७-८।।
वासवदत्ता ने, उस अत्यन्त विरह-क्लेश देनेवाली योजना को भी, राजा के अभ्युदय के लिए स्वीकार कर लिया। पतिभक्त कुल रमणियाँ पति के लिए कौन-सा कष्ट सहन नही करती ॥ ९।।
तब राजनीति-कुशल यौगन्धरायण ने, वेश बदलने का सामान देकर वासवदत्ता को ब्राह्मणी का रूप धारण कराया ।।१०।।
वसन्तक को काने ब्रह्मचारी शिष्य का रूप धारण कराया और स्वय बूढे ब्राह्मण का रूप धारण किया ।।११।।
इस प्रकार कृत्रिम वेष से यौगन्धरायण उन दोनो को साथ लेकर धीरे-धीरे मगध देश की ओर चला ।।१२।।
उस रूप में घर से निकली हुई वासवदत्ता, मन से पति की ओर और शरीर से मगध-मार्ग की ओर चली ।।१३।।
उन लोगों के चले जाने पर दूसरे मन्त्री रुमण्वान् ने लावाणक के राजगृह में आग लगा दी और यह घोषणा कर दी कि वसन्तक के साथ महारानी जल गई। समूचे लावाणक में आग और क्रन्दन की ध्वनि, एक साथ ही उठी। आग धीरे-धीरे दब गई, किन्तु क्रन्दन-ध्वनि बन्द न हुई ।।१४-१५।।
इधर यौगन्धरायण उन दोनों को साथ लिये हुए मगध नरेश की राजधानी में प्रविष्ट हुमा ॥१६॥
वहाँ राजकुमारी को उद्यान में घूमते देखकर सिपाहियों के रोकने पर भी यौगन्धरायण उन दोनों के साथ अन्दर घुस गया ।।१७-१८॥
पद्मावती ने उधर देखा और वासवदत्ता की ओर उसकी आँखे बरबस उलझ गई तथा उसके प्रति प्रेम उत्पन्न हो गया। उसने सिपाहियों को मना करके उन ब्राह्मणी के रूप मे स्थित राजकन्या को अपने समीप बुलाया। और बूढ़े ब्राह्मण से पूछा कि हे ब्रह्मदेव ! यह बालिका कौन है? तथा यहाँ मेरे पास किस लिए आये हो? यौगन्धरायण ने उत्तर दिया। है राजकुमारी। यह अवन्तिका नाम की मेरी बेटी है। इसका व्यसनी पति, इसे छोड कर कही चला गया। इसलिए इसे मैं तुम्हारे हाथ मौपता हूँ। तब तक उस जामाता को शीघ्र ही ढूंढ़ कर लाता हैं, ॥१९-२२॥
इसका भाई यह काणवटू भी जब तक उसके पास ही रहेगा जिससे इसे अकेलापन का कप्ट-अनुभव न हो ॥२३॥
ऐसा सुनकर पद्मावती ने बूढे ब्राह्मण की प्रार्थना स्वीकार कर ली और वह बूढा यौगन्धरायण पद्मावती से आज्ञा लेकर लावणक लौट आया ॥२४।।
उसके जाने पर स्नेहशीला पद्मावती, अवन्तिका का उदार हृदय से स्वागत करके काने के साथ काण्वटु और वासवदत्ता को अपने आश्चर्यमय भवन में ले गई ।। २५-२६।।
राज-भवन में जाकर दीवालों पर लिखे हुए रामचरित के चित्रों को देखकर विरह-वेदना को सीता के समान सहन करने लगी ।।२७।।
स्वरूप से, सुकुमारता से, उठने-बैठने, सोने आदि के सुन्दर ढंग से नील कमल के समान शरीर की सुगन्धि से, उसे उच्च श्रेणी की महिला समझकर पद्मावती उसके साथ अपने ऐसे राजोचित व्यवहार करने लगी और मन में सोचती थी कि यह कोई (छिपाई हुई) रमणी है, जैसे विराट् के राजभवन में द्रौपदी छिपी थी ॥२८-३०॥
वासवदत्ता भी, वत्सराज से मीखी हुई एव कभी न मुरझाने बाली माला और तिलक-रचना से पद्मावती को प्रसन्न करती थी। उसकी माला और तिलक रचना को देखकर पद्मावती की माता ने एकान्त में उससे पूछा कि यह माला और तिलक की रचना किसने की है ।।३१-३२।।
पद्मावती ने कहा कि मेरे भवन में अवन्तिका नाम की एक महिला ठहरी है। उसी ने यह मेरी तिलक रचना की है। यह सुनकर माता ने पद्मावती से कहा- बेटी! यदि ऐसा है तो वह मानुषी नही है वरन् देवी है, जो ऐसा विज्ञान जानती है। देवता और मुनि भी कभी-कभी ठगने के लिए लोगो के घरो मे आ जाते है। इम प्रमग में यह एक कथा सुनो ।। ३३-३५।।
कुन्ती और दुर्वासा की कथा
प्राचीन समय मे कुन्ती भोज नाम का एक राजा था। उसके घर मे ठगने के लिए दुर्वासा ऋषि आकर ठहरे ।।३६।।
राजा ने ऋषि की सेवा के लिए अपनी कन्या कुन्ती को नियुक्त किया। वह भी बडी ही सावधानी से ऋषि की सेवा करती थी ।॥ ३७।।
एक बार उम मुनि ने कुन्ती की परीक्षा के लिए कहा- 'तू खीर पका, मैं स्नान करके आता हूँ। ऐसा कहकर और शीघ्र ही स्नान करके ऋषि आ गये। कुन्ती ने खीर से भरी कड़ाही उनके सम्मुख उपस्थित की। अत्यन्न जलती हुई (गरम-गरम) खीर को हाथ मे खाने योग्य न समझकर ऋषि नें कुन्ती की पीठ पर दृष्टि डाली। कुन्ती ने भी ऋषि का मनोभाव समझकर उस कड़ाही को पीठ पर धारण कर लिया। तब ऋपि तो खीर खाने लगे, किन्तु कुन्ती की पीठ जलने लगी। जलती हुई भी कुन्ती विना हिले-डुले अविचल भाव से बंडी रहो, उसके धैर्य से प्रसन्न होकर दुर्वासा ने उसे वरदान दिया। उसी दुर्वासा के समान यह अवन्तिका भी तेरे समीप देवता-रूप में है, तू इसकी भली-भाँति सेवा कर। माता के मुँह से ऐसा मुनकर पद्मावती, वासवदत्ता से बहुत अधिक स्नेह करने लगी और अधिक सम्मान करने लगी। पतिविरहिता वासवदत्ता, अर्धरात्रि की कमलिनी के समान दीन और मलिन रहती थी। कभी-कभी विदूषक वसन्तक की बालकों के समान विविध चेष्टाएँ, उस वियोगिनी के मुख पर मुस्कान का अवसर प्रदान करती थीं।। ३८-४५।।
उधर शिकार के लिए दूर-दूर जंगलों का चक्कर लगाकर उदयन, बहुत विलम्ब से लावाणक को लौटा। लौटने पर उसने रानी के महल को आग से जला हुआ देखा और मन्त्रियों से महारानी का वमन्तक के साथ जल जाना भी सुना। सुनते ही राजा मूच्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा। कुछ समय बाद होश में आने पर शोक से हृदय में जलने लगा और महारानी को जलानेवाली अग्नि मे जलकर प्राण त्याग के लिए उद्यत हुआ ।।४६-४९।।
कुछ समय के अनन्तर कुछ स्मरण करके सोचने लगा कि 'इस रानी से मेरा पुत्र उत्पन्न होगा, जो विद्याधरों का राजा होगा- ऐसा नारद मुनि ने कहा था वह झूठ नही हो सकता' ।।५०-५२।।
मुनि ने यह भी कहा था कि कुछ समय तक कष्ट झेलना पड़ेगा। और रानी के भाई इस गोपालक का भी अधिक शांक नही मालूम देता ।।५३।।
यौगन्धरायण आदि मन्त्री भी अत्यन्त दुःखी नही दीखते। इससे यह कल्पना होती है कि रानी जीवित हो जाय यह सम्भव है।॥५४।।
मेरे मन्त्रियो ने, यह किसी नीति का प्रयोग किया हो यह भी सम्भव है। अतः कभी-न-कभी देवी के साथ समागम हो सकता है।। ५५।।
तो अब मै इस घटना का अन्न देखता हूँ ऐसा मोचकर मन्त्रियों द्वारा आश्वासित राजा हृदय में धैर्य धरकर कुछ गान्न हुआ ।।५६।।
लावाणक में यह दुर्घटना होने पर लावाणक स्थित गुप्तचरों ने यह समाचार मगध-नरेश के समीप पहुँचाया। ममय-ज्ञ मगधराज ने भी इम अवसर को उपयुक्त समझकर अपनी कन्या पद्मावती देने की इच्छा की, जिसे वत्सराज के मन्त्री यौगन्धरायण ने, पहले ही माँगा था। मगधेश ने अपने गुप्त दूतो द्वारा अपने धैर्य के लिए यौगन्धरायण को भी सदेश भेजा ।।५७-६०।।
वत्सराज ने यह सोचकर कि 'यौगन्धरायण ने कदाचित् वासवदत्ता को छिपा रखा हो' इसलिए यौगन्धरायण का प्रस्ताव स्वीकार करके पद्मावती से विवाह करना स्वीकार कर लिया ॥६१।।
यौगन्धरायण ने तुरन्त लग्न निकलवाकर मगधराज के पास अपना दूत भेजा कि 'हम-लोगों ने आपका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। अतः आज के सातवें दिन वत्सराज, विवाह के लिए आपके यहाँ बरात लेकर आवेगा' ।। ६२-६३।।
महामन्त्री ने यह भी कहलाया कि 'यदि राजा का विवाह शीघ्र ही हो जाय तो वह वासवदत्ता को भूल जायगा।' मगधराज ने सन्देश सुनकर उसका अभिनन्दन किया और कन्या के स्नेह, अपने उदार हृदय, वैभव एवं मर्यादा आदि के अनुरूप विवाह की तैयारी में लग गया ।।६४-६६।।
पद्मावती, मनचाहे अनुरूप पति के मिलने की आशा से प्रसन्न हुई और इस वृत्तान्त को सुनकर वासवदत्ता का हृदय शोक से सन्तप्त हो गया ।।६७।।।
वासवदत्ता को मलिन कर देनेवाला यह समाचार, उसके गुप्तनिवास और विकृत परिस्थिति के लिए सहायक हुआ ।।६८।।
'इस प्रकार यौगन्धरायण ने शत्रु को मित्र बना लिया, पति का प्रेम तो तुमपर उसी प्रकार है' इत्यादि बाते समझाकर वसन्तक ने रानी को धैर्य बंधाया ।।६९।।
पद्मावती का विवाह
कुछ समय के अनन्तर विवाह का समय समीप आने पर वासवदत्ता ने अम्लान माला और तिलक-रचना से पद्मावती को पुनः सजा दिया ॥७०।।
सात दिन व्यतीत होने पर वत्सराज उदयन, अपने मन्त्रियों और सेनाओं के साथ विवाह के लिए मगध की राजधानी में धूमधाम से आ पहुंचा ।।७१॥
वत्मराज उदयन के मन में यदि यह आशा न होती कि वासवदत्ता प्राप्त हो जायगी तो वह इस विवाह-प्रपच में मन से भी उत्साहित न होता ॥ ७२-७३।।
इधर राजा ने मगध की राजधानी में प्रवेश किया और उधर नागरिकों के हृदय में महान् आनन्द ने प्रवेश किया ।।७४।।
नागरिक-स्त्रियों ने, विरह से दुर्बल शरीरवाले तथापि मन को मोहन करनेवाले राजा को, रति-हीन कामदेव के समान देखा। पुर-प्रवेश के अनन्तर राजा, राजमहल में जाकर सौभाग्यवती स्त्रियों से भरे हुए विवाहगृह (कौतुकागार) में पहुंचा ॥७५-७६।।
वहाँ जाकर राजा ने अपने पूर्णचन्द्र के समान मुख से पूर्णिमा के चन्द्र को लजानेवाली पद्मावती को देखा। उसके गरीर पर, अपनी दिव्य माला और तिलक देखकर उसे यह चिन्ता हुई कि ये वस्तुएँ इसे कैसे प्राप्त हुई ।।७७-७८।।
तदनन्तर विवाह-वेदी पर बैठकर उमने जो पद्मावती का हाथ पकडा वही मानो समस्त पृथ्वी के कर-ग्रहण का प्रारम्भ था ।।७९।।
यह वासवदत्ता के अतिरिक्त दूसरी पत्नी को देखना भी नहीं चाहता, मानो इसीलिए बुए ने उसकी आँखे बन्द कर दी ।॥८०॥
अग्नि की प्रदक्षिणा के समय धुएँ से लाल पद्मावती का मुख मानो इसीलिए क्रोध से तमतमाने लगा था ।।८१।।
विवाह-विधि सम्पन्न हो जाने पर, वत्सराज ने, वबू के साथ को त्याग दिया। किन्तु हृदय से वासवदत्ता को नहीं छोडा। विवाह के दहेज में मगध नरेश ने, राजा को इतने रत्न भेंट किये कि मालूम होता था कि ममची पृथ्वी के रत्न दुह लिये गये ।।८२-८३।।
उसी अवसर पर यौगन्धरायण ने अग्नि को साक्षी करके मगधेश्वर से यह विश्वास प्राप्त किया कि वह जामाता वत्सराज मे कभी भी विरोध न करेगा ।।८४।।
विवाहोत्सव मे कपडे और गहने बाँटे गये, चारणों ने सुन्दर गीत गाये और वेश्याओं ने नृत्य किये ॥८५॥
पति का अभ्युदय चाहनेवाली वासवदत्ता मोई हुई की तरह एकान्त मे स्थित होकर उस समय वैसी प्रतीत होती थी जैमी दिन में चन्द्रमा की कान्ति ॥८६॥
तब अन्त पुर में वत्सराज उदयन के आ जाने पर बुद्धिमान यौगन्धरायण को आशंका हुई कि कही राजा वासवदत्ता को न देख ले ॥८७।।
वासवदत्ता के छिपाने का मन्त्र भेद न हो जाय इस भय से यौगन्धरायण ने मगधेश से कहा कि राजा आज ही तुम्हारे यहाँ से विदा हो जायगा ।।८८।।
मगध-नरेश ने इसे स्वीकार कर लिया, उसी प्रकार वत्सराज ने भी इसे स्वीकार किया ॥८९॥
बरातियों के खाने-पीने के अनन्तर वत्सराज उदयन, मन्त्रियो के साथ पद्मावती को लेकर लौट आया ॥९०।।
पद्मावती के द्वारा दिये गये सुन्दर रथ पर उसी के नौकरों के साथ, वासवदत्ता भी सेना के पीछे रूप बदले हुए वसन्तक को आगे बैठाकर गुप्त रूप से चली ।।९१-९२।।
क्रमशः वत्सराज, अपने निवास स्थान लावाणक नामक गाँव मे पहुँचा और नवीन बधू पद्मावती के साथ, राज-भवन में प्रविष्ट हुआ, किन्तु वामषदत्ता के हृदय में अकेला ही प्रविष्ट हुआ ।॥९३॥
वासवदत्ता भी आधी रात के समय खवासों को ठहराकर अपने भाई गोपालक के निवास स्थान (डेरे) में चली गई ।।९४।।
सबसे पीछे आती हुई वामवदत्ता ने भी लावाणक में पहुँचकर भाई गोपालक को स्वागत करते हुए देखा और रोते हुए भाई के गले से लिपटकर रोने लगी ।।९५।।
उसी समय इम योजना का नेता यौगन्धरायण, रूमण्वान् के साथ आया और वासवदत्ता ने उमका स्वागत किया। इधर यौगन्धरायण, उबर वासवदत्ता के कष्ट के प्रति महानुभूति प्रकट कर रहा था और उधर वामवदत्ता के पहरेदार पद्मावती के पास पहुँचे। और उन्होंने कहा 'देवि ! अवन्तिका हमलोगों के माथ आई, किन्तु यहाँ आते ही हमलोगो को छोड़कर वह राजकुमार गोपालक के घर में चली गई' ।।९६-०८।।
वत्मराज के सामने ही पहरेदागे (खवासो) द्वारा इस प्रकार निवेदित पद्मावती सशक होकर उनमे बोली- 'जाओ, अवन्तिका से कहो कि तुम मेरे पास धरोहर के रूप में रखी गई हो, इसलिए वहाँ तुम्हारा क्या है? जहाँ में हैं वहीं तुम भी रहो। आओ' ।।९९-१००॥
यह सुनकर उनके चले जाने पर राजा ने एकान्त में पद्मावती से पूछा कि 'तुम्हे यह माला और तिलक किसने दिया ?' ।। १०१।।
पद्मावती बोली- 'किसी ब्राह्मण ने मेरे पास अवन्तिका नाम की एक कन्या धरोहर के रूप में रखी है, उसी की यह कारीगरी है' ।॥१०२॥
यह सुनकर उदयन, वहाँ से उठकर मीधे गोपालक के घर पर आया कि अवश्य ही वासवदत्ता उसके घर पर होगी ॥ १०३॥
राजा पहरा लगे हुए गोपालक के द्वार पर पहुँचा। अन्दर वासवदत्ता, गोपालक, यौगन्धरायण, रूमण्वान और वसन्तक बैठे हुए थे। वहाँ उसने ग्रहण से मुक्त चन्द्र-मूत्ति के समान प्रवास से लौटी हुई वासवदत्ता को देखा ।।१०४-१०५।।
उसे देखते ही शोक के विष से व्याकुल राजा, भूमि पर अचेत होकर गिर गया और वासवदत्ता के हृदय में कम्पन होने लगा। विरह से पीले और निर्बल अंगोंवाली वासवदत्ता भी उसी समय अचेत होकर गिर गई और अपने किये हुए कार्य के लिए विलाप करने लगी ।।१०६-१०७।।
इस प्रकार दोनो दम्पती, शोक से विकल होकर रोने लगे। यौगन्धरायण का मुँह भी आँसुओं से मानो धुल गया ॥ १०८॥
इधर इस प्रकार गई ।।१०९।। का कोलाहल सुनकर व्याकुल पद्मावती भी वही पहुँच
राजा और वासवदत्ता की हालत देखकर पद्मावती भी उन्ही के समान शोकाकुल हो गई, क्योंकि अच्छी स्त्रियाँ, स्नेह-युक्त और मरल होती है ।।११०।।
पति को दुःख देनेवाले मेरे जीवन का क्या प्रयोजन! इस प्रकार वासवदत्ता रोती हुई बार-बार प्रलाप करती थी ।। १११।।
'मगध-नरेश की कन्या की प्राप्ति से तुम्हें साम्राज्य का लाभ हो'- यह सोचकर मैंने यह मब काड किया, इसमें महारानी का कोई भी दोष नही। इसके प्रवाम-काल में महारानी के चरित्र की माक्षी स्वय महारानी की सौत पद्मावती है- इस प्रकार धुरन्धर यौगन्धरायण ने कहा ।। ११२-११३।।
विशुद्ध-हृदया पद्मावती ने कहा कि 'वासवदत्ता की सच्चरित्रता को सिद्ध करने के लिए मै स्वय अग्नि में प्रवेश करने को उद्यत हूं' ।॥११४॥
राजा ने कहा- 'इम मारे अपराध का अपराधी एकमात्र में ही हूँ, जिसके लिए महारानी ने इतना कष्ट सहन किया' ।।११५।।
वासवदत्ता ने दृढतापूर्वक कहा कि महाराजा की हृदय-शुद्धि के लिए मुझे अग्नि-प्रवेश करना चाहिए ।।११६।।
यह सब सुनकर धीरो में श्रेष्ठ यौगन्धरायण पूर्व मुख बैठकर विशुद्ध मन से आचमन करके बोला- हे लोकपालो ! यदि मै राजा का हितकारी हूँ और महारानी भी सच्चरित्रा है तो आपलोग साक्षी दो, नहीं तो मैं शरीर-त्याग करता हूँ' ।।११७-११८।।
ऐसा कहकर यौगन्धरायण के मौन होने पर आकाशवाणी हुई 'वह राजा धन्य है, जिसके मन्त्री तुम्हारे ऐमे है और जिसकी स्त्री वासवदत्ता पूर्वजन्म की देवता है। इसमें कुछ भी दोष नहीं है' ।।११९-१२०।।
घने मेघों के गर्जन के समान चारों दिशाओं को गुंजित करनेवाली आकाशवाणी को, भोरों के समान ऊंची गर्दन किये हुए उन सब लोगों ने सुना ।।१२१॥
गोपालक के साथ राजा उदयन ने यौगन्धरायण के कार्य की प्रशंसा की और समस्त पृथ्वी को अपने अधीन माना ।। १२२।।
परमसुखी वत्सराज मूत्तिमान् रति और निर्वृत्ति (सुख) स्वरूप और निरन्तर सहवास के कारण परस्पर अनुरक्त उन दोनो पत्नियो के साथ अत्यन्त सुख का अनुभव करने लगा ।। १२३।।
महाकवि श्रीसोमदेव भट्ट-रचित कथासरित्सागर के लावाणक लम्बक का द्वितीय तरंग समाप्त
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