5.206. || षष्ठ कहानी || वत्सराज; बाल-विनष्टक; रुरु और प्रमद्वरा की कथा
5.206. || षष्ठ कहानी || वत्सराज; बाल-विनष्टक; रुरु और प्रमद्वरा की कथा
षष्ठ तरंग
वत्सराज की कथा
कुछ दिनो बाद उसी विन्ध्य-शिविर में रहते हुए वत्सराज के पास चंडमहासेन का प्रति-हार (दूत) आया ॥ १।।
आकर और राजा को प्रणाम करके उसने कहा- 'महाराज ! चंडमहासेन ने सन्देश देकर मुझे आपके पास भेजा है और कहलाया है- "तुमने जो वासवदत्ता का हरण किया है; यह उचित ही किया है। इसीलिए तुम मेरे द्वारा अपहरण कराकर उज्जैन ले जाये गये थे ॥२-३।।
कैद में बंधे हुए मैने तुम्हे कन्या स्वयं इस शंका से नहीं दी कि तुम सम्भवत. इस प्रकार प्रसन्न न होगे। इसलिए 'हे राजन् ! मेरी कन्या का विवाह अवैधानिक न हो, इसलिए कुछ प्रतीक्षा करो, शीघ्र ही मेरा पुत्र गोपालक वहाँ आवेगा और विधिपूर्वक अपनी बहिन का विवाह तुमसे करेगा" ।।४-६।।
इस प्रकार प्रतिहार ने वत्सराज को यह सन्देश सुनाकर वासवदत्ता को भी सुनाया। तब प्रसन्न वासवदत्ता के साथ प्रसन्नचित्त राजा ने कौशाम्बी जाने की इच्छा प्रकट की ।।७।।
तुम दोनो यहाँ रहकर गोपालक के आगमन की प्रतीक्षा करो, उसके आने पर साथ ही आ जाना- उदयन ने ससुराल के प्रतिहार और अपने मित्र पुलिन्दक को ऐमा कहकर वहीं ठहरा दिया ।।८-१०।।
तब दूसरे दिन, प्रातःकाल ही राजा ने धूमधाम के साथ कौशाम्बी की ओर प्रस्थान किया। राजा की सवारी के पीछे मदों का अरना बहाते हुए मदोन्मत्त हाथी झूम रहे थे, जो प्रेम से राजा का अनुगमन करती हुई विन्ध्य की घाटी मे प्रतीत हो रहे थे। पीछे चलते हुए घोडों के पदाघातों से मानो पृथ्वी, राजा के बन्दियो का काम कर रही थी। सेना के पैरी से उडी हुई और आकाश में पहुंची हुई धूल के बडे-बड़े गुब्बारों से इन्द्र के लिए विपक्षी पर्वतों को भ्रम उत्पन्न करते हुए, राजा ने प्रस्थान किया ॥११- १३।।
निग्न्तर यात्रा करके दूसरे दिन प्रात काल राजा अपनी राजधानी में पहुंचा और पहली गत को सेनापति रुमण्वान् के घर विश्राम किया। दूसरे दिन चिरकालीन विरह से उत्सुक प्रजा के लिए महोत्सव के समान वह राजा अपनी प्रिया वासवदत्ता के साथ अपने भवन में पहुँचा। उस समय मार्ग के दोनों ओर से उत्सुक जनता राजा का दर्शन कर रही थी ।।१४-१६।।
गजा के आगमन की प्रसन्नता में नगर की स्त्रियों ने मंगलगान प्रारंभ किया, जिसमे मालूम होता था कि मानों नगरी, अपने स्वामी के आगमन की प्रसन्नता में मंगलगान कर रही है ॥ १७७॥
महारानी वासवदत्ता के साथ उदयन को देखकर नगर की जनता गोक और क्षोभ से रहित होकर इस प्रकार प्रसन्न होकर नाचने लगी, जैसे बिजली-सहित मेघों को देखकर मयूर नाच उठते है॥१८॥
नगरी के ऊँचे भवनों पर राजदर्शनार्थ खडी हुई रमणियों ने, आकाश-गंगा में बिले हुए कमलों के समान अपने मुख-कमलों से सारे आकाश को घेर लिया ।।१९।।
इस प्रकार नगर-यात्रा करता हुआ राजा उदयन, दूसरी राजलक्ष्मी के समान वासवदत्ता के साथ राजप्रासाद में आया ।॥ २०॥
सेवा मे आये हुए सामन्त राजाओं से भग हुआ, वन्दियो और गायकों के गीत-स्वर से गूंजता हुआ राजप्रासाद, ऐसा प्रतीत हो रहा था; मानों अभी वह सोकर जगा हो ।।२१।।
राजा के राजभवन में पहुँच जाने के बाद शीघ्र ही चंडमहासेन का बडा पुत्र गोपालक प्रतिहार और पुलिन्दक के साथ कौशाम्बी आ पहुँचा ॥२२॥
राजा ने आगे जाकर उसका स्वागत किया और उसके आ जाने पर आनन्द से खिले हुए लोचनोंवाली वासवदत्ता दूसरे आनन्द के समान भाई से मिली। भागी हुई वासवदत्ता को भाई के साथ लज्जा का अनुभव न करना पड़े, मानो इसीलिए उसकी आँखें प्रेमाश्रुओं से डबडबा आई। पिता के सन्देश वचनों से प्रोत्साहित वासवदत्ता ने अपने भाई से मिलकर अपने को कृतकृत्य समझा ।।२३-२५॥
दूसरे दिन, दोनों का विवाह-मस्कार सम्पन्न हुआ। गोपालक मारे दिन विवाह-महोत्सव के प्रबन्ध में व्यस्त रहा। रतिरूपी लता से नवीन निकले हुए पल्लव के समान कोमल वासवदत्ता के हाथ को वत्मेश्वर ने ग्रहण किया। उदयन का स्पर्श होने पर वासवदत्ता उस स्पर्श के गम्भीर आनन्द में निमग्न हो गई। उसके सारे शरीर में कम्प और पसीना होने लगा। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो कामदेव ने, सम्मोहन करनेवाले वायव्य और वारुण अस्त्रों की निरन्तर वर्षा में उमे वेध डाला हो (वायव्यास्त्र के प्रभाव से कम्प और वारुणास्त्र के प्रभाव से ग्वेद वह रहा था।) ।।२६-२९।।
अग्नि की प्रदक्षिणा करते समय धुएँ से कुछ लाल हुई आँखों में मानों मदिरा के मधुर नशे ने सूत्रपात कर दिया हो, ऐसा प्रतीत हो रहा था ॥ ३०।।
इस अवसर पर गोपालक द्वारा दिये गये रत्नों तथा अन्य मित्र-राजाओं के बहुमूल्य उपहारी से वत्सराज राजराज कुबेर-सा लग रहा था ।। ३१।।
विवाहित वे दोनों वर और वध पहले तो दर्शकों की आँखो में प्रविष्ट हुए, पश्चात् अपने गयनागार में ।॥ ३२॥
तदनन्तर अपने विवाह महोत्सव में राजा ने गोपालक और पुलिन्दक को भेंट देकर पट्टवन्ध आदि से सम्मानित किया ॥ ३३।।
राजाओ तथा प्रतिष्ठित नागरिकों के सम्मान का कार्य यौगन्धरायण और रुमण्वान् को सौपा गया था ।।३11
इस अवसर पर यौगन्धरायण ने रुमण्वान् से कहा कि 'राजा ने, हमलोगों को बड़े ही कठिन कार्य पर नियुक्त किया है, क्योकि सभी लोगो के चित्तो को प्रसन्न करना दुष्कर है।॥ ३५॥
अप्रसन्न बालक भी, मन में क्रोथ और क्षोभ उत्पन्न कर देना है। इस सम्बन्ध में बाल-विनष्टक की कथा कहता हूँ, मुनो ॥ ३६॥
बाल-विनष्टक की कथा
प्राचीन समय में रुद्रशर्मा नामक एक ब्राह्मण था। उस गृहस्थ की दो स्त्रियाँ थी। उनमें से एक पुत्र प्रसव करके मर गई, अतः रुद्रशर्मा ने उसके बालक को दूसरी माता के हाथ सौंप दिया ।।३७-३८।।
जब वह बालक कुछ बड़ा हुआ तब उसकी माता उसे रूखा-सूखा भोजन देने लगी। इसी कारण वह बालक धूमिल शरीरवाला और बड़े पेट (तोद) वाला हो गया ॥ ३९॥
बालक की शारीरिक स्थिति देखकर रुद्रशर्मा ने उस पत्नी से कहा कि 'तूने इस मातृहीन बच्चे की उपेक्षा की है। उत्तर में उसने पति से कहा कि 'स्नेह से लालन-पालन करने पर भी यह ऐसा ही रहता है। इसके लिए मैं क्या करूँ ?' उसके ऐसा कहने पर रुद्रशर्मा ने समझा कि यह इस बालक की प्रकृति ही है। स्त्रियो के झूठे और मोहकारी वचनो को कौन नहीं मान जाता ? वह बालक ही विनष्ट है- वह बालक पिता के घर में बढ़ने लगा, इसलिए उसका नाम ही वाल-विनष्टक पड गया। एक बार बालक ने सोचा कि यह मेरी माता मेरी दुर्दशा करती है और अपने पुत्र का भलीभांति लालन-पालन करती है, अतः मैं इसका बदला लूंगा। बाल-विनष्टक की अवस्था यद्यपि पांच वर्ष की ही थी, किन्तु बहुत बुद्धिमान् था ।।४०-४५।।
एक बार राजगृह से आये हुए अपने पिता को एकान्त मे उसने अस्पष्ट स्वर में कहा-'पिता ! मेरे दो पिता है।' उसके कहने पर रुद्रशर्मा ने अपनी पत्नी को उपपनिवाला समझकर उसमे स्पर्श करना भी छोड़ दिया। वह भी चिन्ता करने लगी कि 'मेरा पति महमा कुपित क्यों है ? अवश्य ही इस बाल-विनष्टक ने कुछ किया होगा' ।।४६-४८।।
एक बार उसने बड़े ही प्रेम से बाल-विनष्टक को स्नान करा और सुन्दर तथा स्निग्ध आहार खिलाकर, उसे गोद में बैठाकर प्यार के साथ कहा- 'बेटा ! तुमने अपने पिता रुद्रशर्मा को मुझपर कुपित क्यों करा दिया है?' यह सुनते ही बालक विमाता से कहने लगा। अभी मैं उससे भी अधिक कुछ करूंगा; क्योंकि तुम अपने लड़के के ही पालन-पोषण में घ्यान देती हो और मुझे सदा कष्ट देती हो ॥४९-५१।।
उसका यह उत्तर सुनकर ब्राह्मणी, सौगन्ध खाकर नम्रतापूर्वक उससे बोली- 'अब मैं ऐसा न करूँगी। तुम मेरे पति को प्रसन्न करा दो।' तब वह बालक बोला- 'जब मेरे पिता आवें तब तुम्हारी दासी उसे एक शीशा दिखावे, उसके बाद मैं सब कर लूंगा' ।॥५२-५३।।
उसकी विमाता ने दासी को इसके लिए तैयार किया। फलतः उसने रुद्रशर्मा के आते ही उसे शीशा दिखलाया ।।५४।।
उसी समय शीशे में अपने पिता के प्रतिबिम्ब को दिखाते हुए बालक ने कहा- 'यही मेरा दूसरा पिता है' ।।५५।।
बालक की बात सुनकर ब्राह्मण शंका-रहित हो गया और निष्कारण दूषित अपनी पत्नी के प्रति प्रसन्न हो गया ।॥५६॥
इस प्रकार एक बच्चा भी विगड़कर दोष उत्पन्न कर सकता है'। अन हम लोगों को इन सभी आगतो को प्रसन्न रखना चाहिए ।। '५७।।
ऐसा कहकर हमण्वान् के साथ यौगन्धरायण ने वत्सराज के विवाहोत्सव में सम्मिलित समस्त जनो का मावधानी से ऐसा स्वागत किया कि प्रत्येक व्यक्ति यही समझता कि सारा प्रबन्ध मेरे ही लिए हो रहा है।॥५८॥
अन्त में राजा ने यौगन्धरायण, रुमण्वान् और वसन्तक को स्वय उत्तमोत्तम वस्त्र, आभूषण, इत्र, पान और ग्राम दान (जागीर) करके सादर पुरस्कृत किया (इनाम बांटे) ॥५९।।
विवाह हो जाने पर वासवदत्ता से युक्त वत्सराज ने इसे अपने मनोरथो का फल समझा ।।६०।1
चिरकाल की प्रतीक्षा के उपरान्त उमडा हुआ उनका प्रेम, प्रातःकाल के समय रात-भर के सन्तप्त चकवा-चकवी के समान सुखद हुआ ।। ६१।।
उस दम्पती का प्रेम जैसे-जैसे प्रौढ होता गया, वैसे-वैसे उसमें नवीनता आती गई ।॥६२॥ गोपालक भी विवाहकर्त्ता पिता का सन्देश पाकर वत्सराज से पुनः आने का निश्चय करके उज्जयिनी चला गया ।॥ ६४।।
चंचल वृत्तिवाला वत्सराज, रनिवास की विरचिता नाम की दासी से गुप्त प्रेम करता था। अतः कभी भ्रम में उसका नाम लेने के कारण कुपित वासवदत्ता के चरणो पर गिरकर उमे प्रसन्न करता हुआ और उसके आँसुओं से सीचा जाता हुआ अपने को सौभाग्य-साम्राज्य में अभिषिक्त समझता था ।।६५-६६।।
इसके अतिरिक्त, गोपालक द्वारा वासवदत्ता के लिए उपहार में भेजी हुई बन्धुमती नाम की राजकुमारी को वत्सराज ने गान्धर्व विधि से विवाहित किया। उसे मजुलिका के नाम से छिपाकर भेजा गया था। वह लावण्य-समुद्र से निकली हुई लक्ष्मी के समान मुन्दर थी। इस गुप्त विवाह को वासवदत्ता ने छिपकर देख लिया था। फलत उस कार्य के प्रधान आयोजक वसन्तक पर वह अत्यन्त क्रुद्ध हुई और उसे बंधवाकर ले गई ॥६७-७०।।
तब राजा ने, वासवदत्ता के पितृकुल से आई हुई माकृत्यायनी नाम की परिव्राजिका की शरण ली ॥७१॥
राजा ने परिव्राजिका को प्रसन्न करके महारानी को मनाया। परिब्राजिका की आजा में वासवदत्ता ने वन्धुमती को राजा के लिए दे दिया और वसन्तक को कैद में मुक्त कर दिया। सती स्त्रियो का हृदय कोमल होता है ॥७२॥
बन्धन से छूटने पर विदूषक वसन्तक ने हँसते हुए कहा कि अपराध तो बन्धुमती ने (विवाह कराकर) किया, मैने क्या किया (जो कैद किया गया) विषधर गोपो का क्रोध बेचारे डेडहों (पानी के निविप साँपो) पर निकालती हो ॥७३-७४।।
उसके यह कहने पर वासवदत्ता ने कौतुक से पूछा- इम उदाहरण को विस्तृत रूप से समझाओ ।।७५।।
रुरु और प्रमद्वरा की कथा
बसन्तक ने समझते हुए फिर कहा- प्राचीन समय मे रुरुकुमार नाम का एक मुनिकुमार था। उसने भ्रमण करते हुए एक अद्भुत सुन्दरी कन्या को देखा ॥७६।।
वह कन्या, किसी विद्याधर द्वारा स्वर्गीय अप्सरा मेनका में उत्पन्न की गई थी और स्थूलकेगा नाम के ऋषि ने अपने आश्रम में उसका पालन-पोषण किया था ।। ७७।।
उस रुरु नामक ऋषिकुमार ने, उस प्रमद्वरा नाम की कन्या को स्थूलकेशा ऋषि से माँगा ; क्योंकि उस कन्या ने, उसका मन हर लिया था ।॥७८॥
स्थूलकेश। ने भी उसे कन्या देना स्वीकार कर लिया था। किन्तु विवाह-गमय के निकट ही उस कन्या को सर्प ने काट लिया था ॥ ७९।।
तब दुखी ऋषिकुमार ने आकाशवाणी मुनी कि 'तुम अपनी आयुष्य का आधा भाग देकर इसे जीकि करो, अन्यथा इसकी आयु क्षीण हो चुकी है' ।॥८०॥
एसा सुनकर ऋषिपुत्र ने अपनी आयु का आधा भाग देकर उसे जीवित किया और उसके साथ विवाह कर लिया ॥८१॥
विवाह के अनन्तर रुरु मुनि सर्पों पर इतना क्रुद्ध हुआ कि वह जहा भी किसी सर्प को देखता था, उसे मार डालता था- यह समझकर कि इन सपों ने मेरी प्रियतमा के प्राणों का हरण किया ।।८२।।
एक बार अपने को मारते हुए ऋषि को देखकर हुड्भ (पानी का निर्विण सांग) मनुष्य की वाणी में बोला कि 'तुम सांपो पर क्रुद्ध हो तो हम डुडुभो को क्यों मारने हो? तुम्हारी प्रियतमा को सर्प ने काटा है, ।॥८३॥
मर्प और डड्भ दोनों पृथक् जातियों है। अहि (सर्प), सदा विषवाले और हुड्भ सदा विप-हीन होते है। यह दोनों में भेद है। तब रुरु ने उससे पूछा कि 'तुम कौन हो?' उत्तर में उमने कहा- मैं शाप के कारण पतित मुनि हूं। यह शाप तुमसे वात्र्तालाप करने तक ही था। ऐसा कहकर उसके अन्तर्धान हो जाने पर रुरु ने डंडुभो को मारना छोड़ दिया ।।८४-८६।।
महागनी। यही मैने उपमा के लिए आपसे कहा कि अहियो पर क्रुद्ध आप डुडुभो को व्यर्थ माग्नी है।।८७।।
इस प्रकार विनोद-मिश्रित हाम्य के माथ कहकर वसन्तक के चले जाने पर पति के साथ बैठी हुई वासवदत्ता उमके प्रति सन्तुष्ट हुई ।॥८८॥
इस प्रकार कामी उदयन, कुपिता वासवदत्ता के चरणो मे मधुर-मधुर याचना (प्रार्थना) करता हुआ विदूषक बसन्तक के हास्य-कौशलो से रजित होकर देवी वासवदत्ता के साथ समय व्यतीत करने लगा ॥८९॥
उस मुखी राजा की ग्सना, सदा मद्य में निग्न, कान, वीणा की मधुर झंकारो में तल्लीन और दृष्टि गदा वासवदत्ता के मुख पर निश्चल रहती थी ।॥९,०।।
महाकवि सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्मागर का कथामुख नामक दिनीय लम्बक समाप्त ।
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