51002 || द्वितीय कहानी || विक्रर्मासह और कुमुविका बेश्या की कथा; चन्द्रश्री और शीलहर वैश्य की कथा; दुःशीला और देवदास की कथा; बज्रसार और उसकी स्त्री की कथा; राजा सिहबल और रानी कल्याणवती की कथा

51002 || द्वितीय कहानी || विक्रर्मासह और कुमुविका बेश्या की कथा; चन्द्रश्री और शीलहर वैश्य की कथा; दुःशीला और देवदास की कथा; बज्रसार और उसकी स्त्री की कथा; राजा सिहबल और रानी कल्याणवती की कथा

द्वितीय तरंग

विक्रर्मासह और कुमुदिका वेश्या की कथा

इस प्रकार, मरुभूति द्वारा वेश्याओं के कृत्रिम प्रेम की कथा सुनाये जाने पर बुद्धिमान् गोमुख ने राजा विक्रमसिंह और कुमुदिका वेश्या की कथा इस प्रकार कही-॥१॥

प्रतिष्ठान नगर में विक्रमिह नाम का राजा था, जिसे विधाता ने नाम के अनुसार पराक्रम में भी सिह के समान बनाया था ॥२॥

उस राजा की अशिलेखा नाम की रानी थी, जो उच्च वंश में उत्पन्न और सर्वांग-सुन्दरी थी ॥३॥

एक बार अपने नगर में रहते हुए उसके पाँच-छह भाई-बन्धुओं ने मिलकर उसे घेर लिया। उन पांचों के नाम इम प्रकार थे महाभट, वीरबाहु, सुबाहु, सुभट और राजा प्रतापादित्य । (छठा स्वयं विक्रमसिंह था।) ये सभी महा बलवान् ये ।।४-५।।

जब राजा के मन्त्री, उनके साथ सन्धि आदि करके उन्हें शान्त करने का यत्न कर रहे थे, तभी राजा विक्रमसिह मन्त्री के परामर्श का अनादर कर युद्ध के लिए बाहर निकल पड़ा ।।६।।

दोनों सेनाओं के बीच शस्त्रों की वर्षा गुरू होने पर, वीरता के घमण्ड के साथ राजा स्वयं हाथी पर चढ़कर सेना में जा घुसा। केवल धनुष लेकर शत्रु की सेना को कुचलते देख विक्रमसिंह के ऊपर पाँचों महाभट आदि राजा एक साथ ही टूट पड़े ॥७-८।।

शत्रुओं की भारी सेना के युद्ध में उतर जाने पर, उनसे छोटी विक्रमसिंह की सेना वहाँ से भाग निकली ॥९॥

तब उसके पास बैठे हुए अनन्तगुण नामक मन्त्री ने उससे कहा-'हमारी सेना में भगदड़ मच गई। इस समय विजय नहीं होगी, ॥१०॥

हमारी बात न मान कर तुमने बलबानों से युद्ध ठान लिया, इसलिए जब भी अवसर है कि बात मान जाओ। आओ, इस हाथी से उतरकर और घोड़े पर बैठकर हम दोनों दूसरे देश को निकल चलें। जीते रहोगे, तो शत्रुओं को फिर जीत लोगे ॥११-१२॥

मन्त्री के इस प्रकार कहने पर राजा धीरे से हाथी से उतरकर और घोड़े पर चढ़कर मन्त्री के साथ अपनी सेना से निकल गया और अपना वेश बदलकर उस मन्त्री के साथ वह उज्जयिनी नगरी को गया ।॥१३-१४।।

उस नगरी में धन-सम्पत्तिवाली प्रसिद्ध वेश्या कुमुदिका के घर पर बह मन्त्री के साथ जाकर ठहर गया ।।१५।।

अकस्मात् ही राजा को अपने घर आया जानकर वेश्या ने भी समझा कि यह कोई आसाधारण पुरुष है ।।१६।।

प्रताप से और लक्षणों से तो यह महाराजा-सा प्रतीत होता है। तब तो मेरा मनोरथ अवश्य ही सिद्ध होगा यदि इसने मेरा कार्य स्वीकार कर लिया ॥१७॥

इस प्रकार सोचकर, उठकर और स्वागत के साथ अगवानी करके कुमुदिका ने उस राजा का बहुत तरह से आतिथ्य सत्कार किया ।॥१८॥

आनंदपूर्वक विश्राम करते हुए राजा से कुमुदिका ने कहा-'आज मैं सौभाग्यशालिनी हूँ और पूर्वजन्म के मेरे पुण्य आज सफल हुए, जो महाराज ने स्वयं पधारकर मेरा घर पवित्र किया है। आपकी इस कृपा से मैं अब आपकी क्रीतदासी हो गई ॥१९-२०।।

मेरे सौ हाथी, बीस हजार घोड़े और रत्नों से भरा हुआ यह भवन सभी अब आपके ही अधीन हैं ॥२१॥

इस प्रकार, कहकर वह कुमुदिका राजा की सेवा में लग गई और मन्त्री के साथ राजा को बहुमूल्य स्नान, भोजन आदि कराया ॥२२॥

तब आत्मसमर्पण किये हुए उस कुमुदिका के साथ राजा, खिन्न होने पर भी सुख से रहने लगा ॥२३॥

वह उसकी सम्पत्ति का उपभोग करता था और भिक्षुओं को भी दान देता था। फिर भी, वेश्या ने तनिक विकार नहीं दिखाया। बल्कि इसरे लिए वह सन्तुष्ट थी ॥२४।।

तब 'ओह ! यह तो मेरे प्रति अत्यन्त आसक्त है', इस प्रकार कहते हुए राजा से साथ बैठे हुए मन्त्री अनन्तगुण ने, एकान्त में कहा- ॥२५॥

महाराज, वेश्याओं में तो सच्चा प्रेम होता ही नहीं है, फिर भी यह कुमुदिका तुम्हारे प्रति जो स‌द्भाव प्रकट कर रही है, पता नहीं, इसमें क्या रहस्य है ?'।॥२६॥

मन्त्री की बातें सुनकर राजा ने उससे कहा-'ऐसी बात नहीं है। कुमुदिका मेरे लिए प्राण भी दे सकती है। यदि तुम विश्वास नहीं करते, तो मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ।' मन्त्री को इस प्रकार कहकर राजा ने कपट-माया रखी। राजा ने, अपना भोजन-पान नियमित करके अपने को दुर्बल बना दिया और धीरे-धीरे अपने हाथ-पैर ढोले करके अपने को मुर्दा बना लिया। तब दिखावटी दुःख प्रकट करते हुए मन्त्री अनन्तगुण की आज्ञा से, सेवक राजा के शव को, पालकी में डालकर, श्मशान ले गये ॥ २७-३०।।

और, राजा के शोक से वह कुमुदिका, बन्धुओं, से रोके जाने पर भी श्मशान में आकर राजा के साथ चिता पर चढ़ गई ॥३१॥

चिता फूंकने की तैयारी हो ही रही थी कि राजा कुमुदिका को सती होते जानकर जंभाई लेकर उठ गया ॥३२॥

तब ओह ! हमलोगों के भाग्य से यह (राजा) जी उठा, इस प्रकार कहते हुए श्मशान में उपस्थित व्यक्ति कुमुदिका के साथ राजा को घर ले गये ॥३३॥

तदनन्तर, प्रसन्नता से उत्सव मनाये जाने पर राजा धीरे-धीरे स्वस्थ हो गया और उसने एकान्त में मन्त्रघ अनन्तगुण से कहा-'देखा तुमने कुमदिका का प्रेम !' ॥३४।।

तब मन्त्री ने राजा से कहा-'राजन्, मैं तो अब भी नहीं विश्वास करता। इसमें कुछ कारण अवश्य है। अब आगे और निश्चय करते हैं।॥३५॥

और जिसने इतना दिया, उसके सामने अपने को प्रकट कर देना चाहिए, जिससे कि इसकी सेना और अन्य मित्रों की सेना लेकर युद्ध में शत्रुओं पर विजय की जाय ॥३६॥

मन्त्री अनन्तगुण ऐसा कह ही रहा था कि इतने में गुप्त रूप से भेजा हुआ एक गुप्तचर वहाँ आया। उससे पूछने पर उसने कहा- 'शत्रुओं ने देश को आक्रान्त कर लिया और रानी शशिलेखा ने झूठे ही राजा के मरने का समाचार सुनकर अग्नि-प्रवेश कर लिया। गुप्तचर के ये वचन सुनकर वज्र से आहत के समान वह राजा विह्वल होकर 'हाय रानी! हाय सती ! -इस प्रकार कहकर विलाप करने लगा ॥३७-३९॥

तब क्रमशः सब बात जानकर कुमुदिका राजा के पास आकर और उसे धीरज देकर बोली-॥४०॥

'महाराज! मुझे पहले ही आज्ञा क्यों नहीं दी। अब भी आप मेरी सेना और मेरे घन की सहायता से शत्रुओं का नाश करें' ।॥४१॥

कुमुदिका से इस प्रकार कहे गये राजा ने कुमुदिका के घन से उसकी सेना को बढ़ाया और अपने एक बलवान् मित्र के पास वह गया। उससे भी सेना की सहायता ली ॥४२॥

इस प्रकार, उनकी सेना और अपनी सेना को साथ लेकर राजा ने उन पाँचों शत्रु-राजाओं को युद्ध में जीतकर अपना राज्य प्राप्त किया ॥४३॥

तब राजा ने, साथ में बैठी हुई कुमुदिका से कहा-'यह सच है कि मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। बताओ कौन, सा तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध करू?' ॥४४॥

यह सुनकर कुमुदिका ने कहा- 'हे देव, यदि सचमुच आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो चिरकाल मे मेरे हृदय में धंसा हुआ एक काँटा निकाल दें ॥४५॥

उज्जैन में श्रीधर नाम का ब्राद्याग-पुत्र मेरा प्रेमी है। उसे राजा ने. एक छोटे-से अपराध के कारण कारागार का दंड दिया है। उसे छुड़ा दीजिए। मैंने आपके शुभ लक्षणों मे पहले ही आपको असाधारण और इस कार्य के योग्य व्यक्ति मानकर ही अपने भविष्य की कल्याण-कामना की थी और इसीलिए आपकी सेवा भी की थी ॥४६-

अपनी इष्टसिद्धि के प्रति निराश होकर और उस युवक के बगना अपने जीवन को निष्फल समझकर ही मैं आपकी चिता पर चढ़ी थी ॥४८॥

इस प्रकार कहती हुई उस वेश्या से राजा ने कहा- हे सुमुखि, धैर्य रख। मैं तेरा कार्य सिद्ध करूंगा।' इतना उससे कहकर और मन्त्री को बात का स्मरण करके राजा ने सोचा-'अनन्तगुण ने वेश्याओं में सद्भावना न होने की जो बात कही थी, वह सत्य थी ॥४०-५०१

अब तो इस बेचारी की इच्छा पूरी करनी ही होगी। ऐसा सोचकर वह सेना के साथ उज्जयिनी पर चढ़ गया और वहाँ से श्रीधर को छुड़ाकार, कुमुदिका को बहुत-सा धन देकर उसे प्रिय-समागम से सुखी बना दिया ॥५१-५२।।

तदनन्तर, अपने नगर में आकर मन्त्रियों की मन्त्रणा का उल्लंघन किए बिना पृथ्वी का उपभोग करने लगा ।।५३।।

इस प्रकार वेश्याओं का हृदय अगम और अथाह होता है, ॥५४॥

इस कथा के कह लेने के पश्चात् गोमुख के मौन हो जाने पर नरवाहनदत्त के सम्मुख तपन्तक बोला ॥५५॥

महाराज, इन सभी स्त्रियों का ही विश्वास नहीं, प्रत्युत पतिवाली स्त्रियों का भी वेश्याओं के समान विश्वास नहीं करना चाहिए ॥५६॥

चन्द्रश्री और शीलहर वैश्य की कथा

इस सम्बन्ध में मैंने इसी नगर में जो आश्चर्य देखा, उसे सुनाता हूँ, सुनो। इसी नगरी में बलवर्मा नाम का एक वैश्य था। उगको भार्या का नाम चन्द्रश्री था। एकबार उस स्त्री ने अपने झरोखे (खिड़की) से शीलहर नाम के एक सुन्दर वैश्यपुत्र को देखा ॥५७-५८॥

तब सहेली के द्वारा उसे सहेलों के घर पर ही बुलवाकर कामोन्मत्त उस स्त्री ने छिपकर उसके साथ समागम किया ॥५९॥

जब वह प्रतिदिन उनके साथ चोरी-चोरी रमण करने लगी, तब घर के सेवकों और उसके भाई-बन्धुओं ने उसे जान लिया ॥६०॥

केवल उसका पति, बलवर्मा ही, उसके दुराचार को नहीं जान सका। सच है, प्रेमान्ध व्यक्ति पत्नी के भी दुराचार को नहीं जान सकता ॥६१॥

कुछ दिनों के उपरान्त उस बलवर्मा को दाहज्वर हुआ और वह वैश्य धीरे-धीरे अन्तिम अवस्था में पहुँच गया ।॥६२॥

उसकी उस अवस्था में भी उसकी पत्नी सहेली के घर पर उस प्रेमी के पास जाती रही ॥६३।।

एक दिन उसके वहीं रहते हुए उसका पति मर गया। यह जानकर उसकी स्त्री अपने प्रेमी (जार) से पूछकर तुरन्त आई और पति के शोक में उसकी चिता पर, उसके चरित्र को जानने-वाले भाई-बन्धुओं द्वारा रोके जाने पर भी, जलकर मर गई ।।६४-६५।।

इस प्रकार, स्त्रियों के चित्त की गति नहीं जानी जा सकती। वह दूसरों से व्यभिचार भी कराती हैं और पति के मरने पर उसके साथ सती भी हो जाती हैं ।॥६६॥

तपन्तक के इस प्रकार कहने पर क्रमशः हरिशिख बोला- 'इसी सम्बन्ध में देवदास का जो वृत्तान्त हुआ, उसे सुनो- ' ॥६७॥

दुःशीला और देवदास की कथा

प्राचीन समय में, किसी गाँव में देवदास नाम का कुटुम्बवाला एक व्यक्ति था। दुःशीला यथार्थ नामवाली उसकी स्त्री थी ॥६८॥

'वह स्त्री, दूसरे पुरुष के साथ फंसी थी' यह बात उसके सभी पड़ोसी जानते थे। एक बार देवदास किसी कार्यवश राजकुल में गया। उसी समय उसका वध चाहनेवाली स्त्री ने अपने जार को लाकर अपने घर की छत पर उसे छिपा दिया ॥६९-७०।।

तब वहाँ से आये हुए और भोजन करके सोये हुए अपने पति देवदास को आधी रात में उसने अपने जार से मरवा डाला ॥७१।।

और अपने जार को घर से निकालकर शान्त बैठी रही। प्रातः काल होते ही, घर से बाहर निकलकर चिल्लाने लगी कि मेरे पति को चोरों ने रात में मार डाला ॥७२॥

तब उसके सम्बन्धी बन्धु-बान्धव वहां आकर मारी स्थिति देखकर बोले- 'यदि तेरे पति को चोरों ने मारा, तो वे यहाँ से तुम्हारी कुछ भी सम्पत्ति क्यों नही चुरा ले गये ? ॥७३॥

इस प्रकार कहकर उन्होंने वहाँ बड़े उसके बालक से पूछा कि 'तुम्हारे पिता को किसने मारा?' तब वह स्पष्ट बोला- ॥७४।।

'घर की छत पर कोई जवान पुरुष, चढ़कर दिन में छिपा था। उसी ने रात में उतरकर मेरे देखते-देखते पिता को मार डाला ॥७५।।

मेरी माँ मुझे पिता के पास से पहले हो उठाकर ले गई।' बालक के इस प्रकार कहने पर उनलोगों ने जान लिया कि इसी दुष्टा के यार ने यह हत्या की है ॥७६॥

तब उसके बन्धु-बान्धवों से यार को ढूंढ़वाकर उसी समय मरवा डाला और उस बालक को अपने संरक्षण में लेकर दुःशीला को गाँव मे बाहर निकाल दिया ॥७७॥

इस प्रकार दूसरे पुरुष से प्रेम करनेवाली नागिन औरत अवश्य पति का पात करती है। हरिशिख के इस प्रकार कहने पर गोमुख ने फिर कहा--॥७८।।

'दूसरों की बात छोड़िए, यहीं के बत्सराज के ही सेवक वज्ञमार की हास्योत्पादक कहानी सुनिए-॥७९।।

बज्रसार और उसकी स्त्री की कथा

उस सुन्दर और शूरवीर वज्रसार की स्त्री मालव देश की थी और वह रूपवती भी थी। वह वज्रसार को अपने शरीर से भी अधिक प्यारी थी ॥८०॥

एक बार उसकी पत्नी का पिता (श्वशुर) अपने पुत्र (उसके साले) के साथ मालव देश से, उसे निमन्त्रण देने के लिए बड़ी ही उत्सुकता के साथ आया ॥८१॥

तब वज्रसार ने, उसका सत्कार करके और उसके द्वारा निमन्त्रित होकर राजा से प्रार्थना करके (अवकाश लेकर) उसके साथ मालव देश को प्रस्थान किया ॥८२॥

और, वह एक मास तक श्वशुरालय में विश्राम करके, राजसेवा के लिए कौशाम्बी लौट आया; किन्तु उसकी स्त्री वहीं रह गई ।॥८३॥

कुछ दिन बीतने पर वज्रसार का मित्र क्रोधन अकस्मात् आकर उससे बोला-'तूने अपनी स्त्री को उसके बाप के घर पर छोड़कर अपने घर का नाश क्यों कर दिया ! वहाँ उस पापिन ने दूसरे पुरुष का साथ कर लिया है।॥८४-८५॥

आज ही उधर से आये हुए एक विश्वस्त व्यक्ति ने मुझसे कहा है। इसे झूठ न समझना। इसलिए, उसे दंड देकर दूसरी स्त्री से विवाह कर लो' ॥८६॥

इस प्रकार कहकर क्रोधन के चले जाने पर कुछ समय तक किंकर्त्तव्य विमूढ़ होकर वज्रसार सोचता रहा- मैं समझता हूँ, यह बात सत्य है।॥८७॥

नहीं तो बुलाने के लिए आदमी भेजने पर भी वह क्यों नहीं आई? इसलिए, उसे लाने के लिए स्वयं जाता हूँ। देखता हूँ, क्या होता है।॥८८॥

इन प्रकार निश्चय करके, मालव देश को जाकर और सास-ससुर से आज्ञा लेकर अपनी स्त्री के साथ वह वहाँ से घर की ओर चला ॥८९॥

दूर मार्ग निकल जाने पर अपने साथी सेवक से बहाना करके विपरीत पथ से स्त्री को लेकर वह एक घने जंगल में पहुंचा ॥९०॥

उस बियावान (भीषण) सूने जंगल में स्त्री को बैठाकर उसने पूछा 'तू पर-पुरुष पर आसक्त है. ऐसा मैंने किसी विश्वासी मित्र से सुना है।॥९१॥

मैंने कौशाम्बी में रहते हुए तुझे लाने के लिए वहाँ से एक दूत भेजा, तो भी तू न आई। इसलिए अब सत्य बता। अन्यथा तेरा नाश कर दूंगा' ।॥९२॥

यह सुनकर वह बोली-'यदि तुम्हें मेरे चरित्र नष्ट होने का विश्वास ही है, तो फिर मुझसे क्या पूछते हो, जो तुम्हें उचित प्रतीत हो, वह करो' ॥९३॥

इस प्रकार, उसके उपेक्षायुक्त बचन सुनकर वज्रसार ने उसे एक वृक्ष से बाँधकर लताओं से मारना आरम्भ किया ।॥९४।।

क्रोध में आकर जब उसने उसकी साड़ी खींच ली, तब उसे नंगी देखकर बज्रसार का मन विचलित हो उठा और उस मूर्ख कामी को उससे समागम करने की इच्छा जग उठी ।॥९५॥

जब वह बंधी हुई उसे बैठाकर आलिगन करने की इच्छा प्रकट करने लगा, तब उस स्त्री ने उसका विरोध करके उसे रोक दिया। उसके बहुत प्रार्थना करने पर वह बोली-'जिस प्रकार तूने लताओं से बाँधकर मुझे मारा है, उसी प्रकार मैं भी तुझे बाँधकर मारूंगी, तब तेरी इच्छा पूरी करूंगी, अन्यथा नहीं' ॥९६-९७७॥

व्यसन से मोहित उस मूर्ख ने उसकी बात मान ली। आश्चर्य तो यह कि कामदेव ने उस वज्रसार को तृणसार बना डाला ॥९८।।

तब उस स्त्री ने अपने कामुक पति के हाथ-पैर उस वृक्ष से बाँध दिये और उसी के शस्त्र से उसके नाक-कान भी काट लिये ॥९९॥

तदनन्तर, उसका शस्त्र और वस्त्र लेकर, पुरुष का वेश बनाकर वह पापिन, स्वेच्छा-पूर्वक चली गई ।॥१००।।

कटे हुए नाक-कानवाला वज्रसार टपकते हुए रक्त से नहाया हुआ, मुँह लटकाये उसी तरह वही बंधा रह गया ॥१०१॥

कुछ समय के पश्चात् उस जंगल में औषधि लेने के लिए एक वैद्य आया। वह सज्जन, दया करके उसे बन्धन  छुड़ाकर अपने घर ले गया ॥१०२॥

वहाँ उसके धीरज बंधाने पर वज्रसार धीरे-धीरे अपने घर आ गया और बहुत ढूंढ़ने पर भी अपनी उस दुष्ट स्त्री को न पा सका ॥१०३॥

उसने सारा समाचार अपने मित्र क्रोधन को सुनाया और क्रोधन ने वत्सराज उदयन से कह सुनाया। यह वज्रसार पौरुष और आत्माभिमान-रहित स्त्री के समान है। इसलिए इसकी स्त्री ने इसका वेश छीनकर इसे उचित दंड दिया ॥१०४-१०५।।

इस प्रकार, राजभवन के सभी व्यक्तियों द्वारा हंसा जाता हुआ वह वज्रसार बज्र के समान सुदृढ चित्त से आज भी यहीं रहता है।॥१०६।।

इसलिए, महाराज ! स्त्रियों में किसका विश्वास किया जाय ? गोमुख के इस प्रकार कहने पर मरुभूति ने फिर कहा- ॥१०७॥

राजा सिहबल और रानी कल्याणवती की कथा

स्त्रियों का मन चंचल होता है, इस सम्बन्ध में भी एक कथा सुनो। प्राचीन समय में दक्षिण दिशा में सिंहबल नाम का एक राजा था। उसकी रानी कल्याणवती सभी रानियों में उसे प्रिय थी, जो मालव देश के किसी सामन्त की पुत्री थी ॥१०८-१०९।।

रानी के साथ, राज्य के शासक उस राजा को, एकबार उसके प्रबल कुटुम्बी बन्धुओं ने मिलकर राज्य से निकाल दिया ॥ ११०॥

तब वह राजा रानी और कुछ सेवकों के साथ गुप्त रूप से वहाँ से चला और अपनी ससुराल आ गया ॥१११॥

मार्ग में जाते हुए जंगल में उसने, अपने ऊपर आक्रमण करते हुए एक सिंह को, अनायास तलवार के प्रहार से, दो टुकड़े करके मार डाला ॥११२॥

और, उसने पैंतरे के साथ घूमते हुए तथा आक्रमण करते एवं चिंघाड़ते हुए हाथी के पैर और सूंड़ काटकर उसे गिरा दिया ॥११३॥

आगे चलकर मिले हुए चोरों के दल को उसने इस प्रकार काटकर गिरा दिया, जैसे जंगली हाथी, कमल के जंगल को रौंद डालता है ।॥११४।।

इस प्रकार, रानी के द्वारा देखा गया पराक्रमवाला वह राजा, मार्ग तय करके मालव देश पहुंचा। तब बल का समुद्र वह राजा रानी से कहने लगा--।।११५।।

'मार्ग का यह समाचार तुम अपने पिता के घर में न कहना। यह तो एक लज्जा की बात है। पराक्रम करने में क्षत्रिय की क्या प्रशंसा ? ॥११६॥

ऐसा रानी से कहकर वह राजा उसके साथ उसके पिता के भवन में गया। और, घबराकर समाचार पूछने पर उसने अपना समाचार (बन्धुओं द्वारा राज्य छीने जाने का) सुना दिया ॥११७॥

तब श्वशुर द्वारा सत्कृत होकर और हाथी, घोड़े आदि सेना की सहायता प्राप्त कर वह अत्यन्त बलवान् राजा गजानीक के समीप गया ॥११८॥

और, शत्रुओं को जीतने में प्रयत्नशील राजा ने, रानी कल्याणवती को वहीं पिता के ही घर पर रख दिया ॥११९॥

उस राजा के चले जाने पर और कुछ दिन बीतने पर एक बार, भवन की खिड़की में बैठी हुई रानी ने, किसी पुरुष को देखा ॥१२०॥

उस पुरुष ने देखते ही रानी के मन को मोह लिया और काम-वासना से प्रेरित रानी उस समय सोचने लगी-॥१२१॥

'मैं भली भाँति यह जानती हूँ कि मेरे पतिदेव के समान सुन्दर और पराक्रमी दूसरा पुरुष नहीं है। फिर भी, इस पुरुष की ओर मेरा मन खिच रहा है। यह खेद है॥१२२॥

जब जो भी हो, मैं इसे भोगती हूँ।' इस प्रकार सोचकर उसने अपना गुप्त भेद जाननेवाली सहेली से अपने मन का भाव प्रकट किया ॥ १२३॥

और उसी के द्वारा उसे रात्रि के समय खिड़की के मार्ग से रस्से के सहारे ऊपर चढ़ा कर अपने घर में बुला लिया ॥१२४॥

वह पुरुष उसके शयनागार में जाकर भी उसके तेज से प्रभावित होकर उसके पलंग पर न बैठकर भूमि पर बिछे हुए अलग आसन पर ही बैठ गया ।।१२५।।

यह देखकर, जब रानी यह सोच रही थी कि 'अरे, यह तो कायर है, तो मन में दुःख करने लगी। इतने में ही छत के ऊपर से घूमता हुआ एक सर्प वहाँ आ निकला ॥ १२६॥

उसे देखकर, भय से उठकर और धनुष लेकर उस पुरुष ने बाण से सर्प को मार डाला ॥१२७७।

मरने के बाद गिरे हुए उस सर्प को उसने झरोखे से बाहर फेंक दिया। फलतः, उस भय से छूट जाने पर वह कायर प्रसन्न होकर नाचने लगा ॥१२८॥

उसे नाचते हुए देखकर व्याकुल वह कल्याणवती गम्भीर चिन्ता करने लगी कि 'मुझे धिक्कार है! ऐसे बलहीन और नीच पुरुष से मैं क्या समागम करू ?' ॥१२९॥

उस पुरुष को देखते ही रानी को विरक्त जानकर, उसके मनोभाव को जाननेवाली सहेली ने उस कमरे में तुरन्त आकर घबराह‌ट के साथ कहा- हे देवि, तुम्हारे पति आये हैं, इसलिए यह युवा पुरुष, जिस मार्ग से आया था, उसी मार्ग से अपने घर चला जाय' ।।१३०-१३१॥

उस सहेली के ऐसा कहने पर खिड़‌की से बाहर लटकती हुई रस्सी के सहारे वह निकला, किन्तु भय के कारण गिर पड़ा, भाग्यवश मरा नहीं ॥१३२॥

उसके चले जाने पर कल्याणवती अपनी सहेली से कहने लगी- 'सखि, अच्छा किया तुमने, जो इस अधम और कायर को बाहर निकाला ॥१३३॥

तुमने, मेरे हृदय को जान लिया। मेरा चित्त दुःखी हो रहा है। मेरा पति तो सिंह, जंगली हाथी और डाकुओं के दल का नाश करके भी लज्जा से उसे छिपाता है। और, यह कायर तो साँप को मारकर नाचता है। इसलिए, ऐसे शूर-बीर पति को छोड़कर ऐसे पामर व्यक्ति से मैं क्या प्रेम करूं? ॥१३४-१३५।।

इस प्रकार चंचल बुद्धिवाली मुझे धिक्कार है। या उन सभी स्त्रियों को धिक्कार है, जो मक्खियों की भाँति सुगन्धित कपूर को छोड़कर गन्दगी की ओर दौड़ती हैं ।॥१३६॥

इस प्रकार पश्चात्ताप करती हुई रानी, उस रात्रि को व्यतीत करके, पति की प्रतीक्षा करती हुई पिता के घर में रहने लगी ॥१३७॥

उघर, राजा सिंहबल ने, राजा गजानीक से और भी सेना की सहायता लेकर, चढ़ाई करके अपने महाबली पाँचों कुटुम्बियों को पराजित किया ॥१३८॥

तदनन्तर, राजा सिंहबल ने, पुनः अपने राज्य को पाकर, अपनी रानी कल्याणवती को पिता के घर से लाकर और श्वसुर को पर्याप्त धन देकर अपने निष्कंटक राज्य का चिरकाल तक शासन किया ॥१३९॥

हे स्वामी, इस प्रकार बीर, सदाचारी और सुन्दर पति के रहने पर भी, विचारशील युवतियों का भी मन चंचल होकर जहाँ-तहाँ दौड़ता है। विशुद्ध मनवाली स्त्रियाँ विरळे ही होती हैं।॥ १४०॥

मरुभूति द्वारा इस प्रकार कही गई कथा को सुनकर वत्सराज-पुत्र नरवाहनदत्त ने, सुखपूर्वक सोकर रात बिताई ॥१४१॥

महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियश लम्बक का द्वितीय तरंग समाप्त

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