51004 || चतुर्थ कहानी || राजाकुलधर के सेवक की कथा; संजीवक बैल और पिंगलक सिह की कथा; कील उखाडने वाले बन्दर की कथा; दमनक और करटक का संबाद; नगाड़ा और सियार की कथा; बगुला और केकड़े की कथा; सिह और शश की कथा; मन्दविसर्पिणी जूं और खटमल की कथा; मदोत्कट सिह की कथा; टिट्टिभ-दम्पती को कथा; कछुए और हंस को कथा; तीन मच्छों की कथा; टिट्टिभ-दम्पती की कथा (क्रमागत); सूचीमुख पक्षी और बन्दर की कथा; धर्मबुद्धि और दुष्टबुद्धि वैश्यों की कथा; साँप और बगुले की कथा; लोहे का तराजू और वैश्यपुत्र की कथा।
51004 || चतुर्थ कहानी || राजाकुलधर के सेवक की कथा; संजीवक बैल और पिंगलक सिह की कथा; कील उखाडने वाले बन्दर की कथा; दमनक और करटक का संबाद; नगाड़ा और सियार की कथा; बगुला और केकड़े की कथा; सिह और शश की कथा; मन्दविसर्पिणी जूं और खटमल की कथा; मदोत्कट सिह की कथा; टिट्टिभ-दम्पती को कथा; कछुए और हंस को कथा; तीन मच्छों की कथा; टिट्टिभ-दम्पती की कथा (क्रमागत); सूचीमुख पक्षी और बन्दर की कथा; धर्मबुद्धि और दुष्टबुद्धि वैश्यों की कथा; साँप और बगुले की कथा; लोहे का तराजू और वैश्यपुत्र की कथा।
चतुर्थ तरंग
मन्त्रियों में श्रेष्ठ गोमुख ने इस प्रकार दो विद्याधर्धारियों (मकरन्दिका और मनोरथ प्रभा) की कथा सुनाकर नरवाहनदत से कहा ॥१॥
'स्वामी, इस लोक और परलोक दोनों लोकों का हित चाहनेवाले कुछ ही ऐसे विद्वान् व्यक्ति होते हैं, जो साधारण होकर भी काम, क्रोध, लोभ आदि की उत्तेजना का सहन करते हैं ।॥२॥
राजाकुलधर के सेवक की कथा
इस प्रसंग में एक कथा सुनो राजा कुलघर का प्रसिद्ध पराक्रमी शूरवर्मा नाम का एक सेवक था ।।३।।
वह किसी समय, अपने गाँव से लौटकर सहसा अपने घर में घुसा, तो उसने अपनी स्त्री को अपने एक मित्र के साथ एकान्त में स्वच्छन्दता पूर्वक विहार करते देखा ॥४॥
यह देखकर और क्रोध को रोककर वह धैर्यपूर्वक सोचने लगा कि इस मित्रद्रोही पशु को मारने से क्या लाभ ? और, इस दुष्टा स्त्री को मारकर भी क्या होगा ? मैं भी इन्हें मारकर पाप का भागी क्यों बनूं ॥५-६॥
इस प्रकार सोचकर और उन दोनों को छोड़कर वह बोला- 'मैं तुम दोनों में से उसे मार डालूंगा, जिसे बार-बार देखूंगा। अब यहाँ मेरी आँखों के आगे कभी न आना'। इस प्रकार, कहकर उसके द्वारा छोड़े गये वे दोनों कहीं दूर चले गये ॥७-८।।
तदनन्तर, दूसरी स्त्री से विवाह करके वह शूरवर्मा निश्चिन्त हो गया हे महाराज, सन्तुलित बुद्धिवाला व्यक्ति, विपत्तियों से कभी बाधित नहीं होता। पशुओं की भी बुद्धि ही कल्याणकारिणी होती है, पराक्रम नहीं ।॥९-१०।।
संजीवक बैल और पिंगलक सिह की कथा¹
सिंह, बैल आदि की कथा इस सम्बन्ध में सुनो। किसी नगर में एक धनी वैश्यपुत्र था ॥११॥
एक बार व्यापार के लिए मथुरा को जाते हुए उसके रथ का भार ढोनेवाला संजीवक नाम का एक बैल, पहाड़ के टपकते जल से कीचड़वाले मार्ग में जाते हुए, गाड़ी का जुबा टूट जाने से, दलदल में गिरकर फंस गया और उसके अंग क्षत-विक्षत हो गये ।।१२-१३॥
उसे गिरकर बेहोश हुए देखकर और उसके उठाने के सभी प्रयत्नों को विफल जानकर निराश वैश्य ने, बहुत समय के पश्चात् उसे वहीं छोड़ दिया और आगे की यात्रा की ।।१४।।।
दैवयोग से, वह अनाथ और असहाय संजीवक बैल, धीरे-धीरे कुछ स्वस्थ होकर नई कोमल घासों को खाता हुआ दलदल से निकलकर पहले के समान स्वस्य हो गया और यमुना के तट पर जाकर, वहाँ भी हरी-हरी घासों को खाता हुआ स्वच्छन्दतापूर्वक विचरण करने लगा और महा बलवान् होगया ।।१५-१६।।
उठी हुई और मोटी डीलवाला शिव के वाहन नन्दी के समान मस्त संजीवक, सींगों से मिट्टी के दूहों को उखाड़ता हुआ बार-बार रंभाया करता था ॥ १७।।
उस स्थान के समीप ही अपने पराक्रम से सारे जंगल पर छाया हुआ पिगलक नाम का एक सिह रहता था। दो शृगाल उस मृगराज के मन्त्री थे, जिनमें एक का नाम करटक और दूसरे का नाम दमनक था ॥१८-१९॥
उस सिह ने एकबार पानी पीने के लिए यमुना के किनारे की ओर आते हुए उस बड़ी डील-बाले बैल की गर्जना सुनी ॥२०॥
चारों दिशाओं में फैलनेवाले और इस प्रकार कभी उसे न सुनाई पड़नेवाले शब्द को सुनकर वह सिंह सोचने लगा कि 'यह किसका शब्द है। मालूम होता है कि यहाँ कोई बलवान् प्राणी रहता है! वह मुझे देखते ही मार डालेगा या इस वन से निकाल देगा" ॥२१-२२॥
ऐसा सोचकर सिह, विना पानी पिये ही, वन को लौटा और अपने अनुचरों में, अपने को छिपाकर बैठ गया ॥२३॥
उसकी यह दशा देखकर उसका बुद्धिमान् शृगाल मन्त्री दमनक दूसरे मन्त्री करटक से एकान्त में बोला-॥२४।।
'हमारा स्वामी, सिह पानी पीने के लिए गया था; किन्तु वह बिना पानी पिये ही क्यो लौट आया, इसका कारण पूछना चाहिए ।॥२५॥
तब करटक ने कहा- 'यह हमारा व्यापार (काम) नहीं है, क्या तू ने खूंटा उखाड़नेवाले बन्दर की कहानी नहीं सुनी ? ॥२६॥
कील उखाडने वाले बन्दर की कथा²
कहीं किसी नगर में एक बनिया ने देवता का मन्दिर बनाने के लिए बहुत-सी लकड़ियाँ एकत्र कर रखीं थी ॥२७॥
वहाँ पर काम करनेवाले मिस्त्रियों ने, एक लकड़ी को आरे से, ऊपरकी ओर से आधा चीर कर, उसके बीच में एक खूंटा लगाकर उसे छोड़ दिया और वे सायंकाल काम बन्द करके अपने घरों को चले गये ॥२८॥
इतने में ही एक बन्दर वहाँ आकर अपनी चंचलता के कारण आधी चीरी हुई उस लकड़ी के बीच में उछलकर बैठ गया ॥ २९॥
उसमें बैठे हुए उसने व्यर्थ ही बीच में लगे हुए उस खूंटे को हाथ से खींचना प्रारम्भकिया ।।३०।।
खूंटे के सहसा उखड़ जाने के कारण लकड़ी के दोनों चीरे हुए हिस्से आपस में मिल गये और उन दोनों के बीच बैठा हुआ बन्दर दबकर मर गया ॥ ३१।।।
इस प्रकार, जो जिसका काम नहीं है, उसे करनेवाला विनाश को प्राप्त होता है। इसलिए, राजा का आशय जानकर हमें क्या लाभ है ?'॥३२॥
करटक से यह सुनकर धीर दमनक उसमे बोला- 'बुद्धिमान् सेवकों को स्वामी का अन्तरंग बनकर उसके विशेष भावों को सदा जानना चाहिए ॥३३॥
दमनक और करटक का संबाद
केवल पेट भरना कौन नहीं जानता ? दमनक के ऐसा कहने पर सरलहृदय करटक बोला--॥३४॥
'अपनी इच्छा से राजा की अंतरंग बातों में अधिक घुसना सेवक का धर्म नहीं है।' करटक के इस प्रकार कहने पर दमनक बोला 'ऐसा नहीं! सभी अपने योग्य फल पाना चाहते हैं। कुत्ता, हड्डी का एक टुकड़ा पाकर सन्तुष्ट हो जाता है; किन्तु सिंह हाथी पर दौड़ता है' ।।३५-३६॥
यह सुनकर करटक बोला- 'ऐसा सुनकर स्वामी उल्टे ही क्रोध करने लगे, तो उसका विशेष फल कैसे मिल सकता है ॥ ३७॥
क्योंकि, स्वामी जन, पर्वतों के समान अत्यन्त कठिन, हिंस्रक प्राणियों से घिरे होने के कारण कठिनाई से वश में आते हैं ॥३८॥
तब दमनक ने कहा- 'यह सच है, किन्तु जो समझदार है, वह मालिक के स्वभाव के अनुसार चलकर उसे धीरे-धीरे वश में कर लेते हैं ।॥३९॥
'तब ऐसा ही करो', इस प्रकार करटक ने उससे कहा। तदनन्तर दमनक, अपने राजा सिह के पास गया ।॥४۰۱۱
प्रणाम करके पास में बैठे हुए दमनक ने, अपने स्वामी पिगलक सिह द्वारा 'आओ, बैठो', कहकर स्वागत किये जाने पर, इस प्रकार निवेदन किया- ॥४१॥
'स्वामी, मैं आपका कुल-परम्परागत सेवक हूँ। दूसरा व्यक्ति भी, यदि आपका हितैषी हो, तो उसे स्वीकार करना चाहिए। और, आपका आत्मीय व्यक्ति भी यदि अ-हितचिन्तक हो, तो उसे छोड़ देना चाहिए ॥४२॥
अपना हित चाहनेवाले बिलाव को भी मूल्य देकर घर में लाकर रखा जाता है और हानि पहुंचानेवाले चूहे को अपने घर में ही उत्पन्न होने पर भी मार दिया जाता है ॥४३॥
अपना कल्याण चाहनेवाले राजा को अपने हितैषी सेवकों की बात सुननी चाहिए। और सेवकों को भी चाहिए कि वे बिना पूछे भी, अपने स्वामी का हित-चिन्तन करें और उसे हित बात कहें ॥४४॥
इसलिए स्वामिन्, यदि आप विश्वास करते हैं, साथ ही क्रोध न करें और छिपावें नहीं, तो मैं कुछ पूछना चाहता हूँ ॥४५॥
दमनक के इस प्रकार पूछने पर पिगलक सिंह उससे बोला- 'तुम विश्वास करने योग्य और हमारे भक्त सेवक हो, इसलिए जो भी कहना हो, निशंक होकर कहो' ।॥४६॥
पिंगलक के इस प्रकार कहने के पश्चात् दमनक बोला- 'देव, तुम प्यासे होकर पानी पीने के लिए गये थे ॥४७॥
किन्तु, आप बिना पानी पिये ही, कुछ उदास से होकर क्यों लौट आये? दमनक की यह बात सुनकर पिंगलक सिंह सोचने लगा ॥४८॥
इसने मुझे ताड़ लिया है, अब तो इस अपने भक्त से क्या छिपाया जाय ? ऐसा सोचकर वह बोला- 'सुन, तेरे लिए कुछ छिपाने की बात नहीं है।॥४९॥
जल के पास गये हुए मैंने एक अपूर्व शब्द सुना, जो पहले कभी नहीं सुना था। वह शब्द मुझसे भी अधिक उम्र किसी प्राणी का था ।॥५०॥
क्योंकि, वह प्राणी भी शब्द के ही अनुरूप होगा। ब्रह्मा की सुष्टि विचित्र है। उसमें एक-से-एक बढ़कर प्राणी हैं ।॥५१॥
ऐसे प्राणी के मेरे इस वन में घुस आने पर यह शरीर और वन अब मेरे नहीं रहे। इसलिए, अब मुझे यहाँ से किसी दूसरे वन में चला जाना बाहिए' ॥५२॥
ऐसा कहते हुए सिंह से दमनक ने कहा- 'स्वामिन् ! आप शूर हैं और अच्छे नेता (राजा) हैं, तो वन को क्यों छोड़ना चाहते हैं? ॥५३॥
पानी के प्रवाह से पुल टूटता है और कानाफूसी से प्रेम टूटता है! बिना रक्षा किये मन्त्र (नीति) फूट पड़ता है और कायर व्यक्ति केवल शब्द से ही टूट जाता है ।॥५४॥
और, यंत्र आदि के शब्द भी भयंकर होते हैं। इसलिए, वास्तविक बात को बिना जाने डरना नहीं चाहिए ।।५५।।
नगाड़ा और सियार की कथा
इस प्रसंग में आप 'नगाड़ा और एक सियार की कथा सुनें। प्राचीन समय में किसी जंगल में एक सियार रहता था ॥५६।।
उसने भोजन की खोज में घूमते हुए पहले की पुरानी युद्ध-भूमि में पहुंचकर और उसके एक ओर से गम्भीर शब्द सुनकर डरते हुए उधर देता। वहाँ उसने पहले कभी न देखे हुए और गिर-कर भूमि में पड़े हुए एक नगाड़े को देखा। तब उसे देखकर उसने सोचा, क्या यह इस प्रकार का शब्द करनेवाला कोई प्राणी है ? ॥५७-५८॥
ऐसा सोचता हुआ वह एकदम स्थिर पड़े हुए उस नगाड़े के पास गया और जब उसे भली भांति देखा, तब उसे मालूम हुआ कि यह कोई प्राणवाली वस्तु नहीं है।॥५९॥
वायु से हिलते हुए सरकंडों के आघात से बोलते हुए नगाड़े के चमड़े के उस शब्द को सुनकर उस सियार ने भय छोड़ दिया ।।।६०॥
उसके भीतर कुछ खाने योग्य वस्तु मिलेगी, इस प्रकार सोचकर, उसके बमड़े को उधेड़-कर जब उसने देखा, तब तो उसे केवल लकड़ी और चमड़ा ही उसे दीखा ॥६१॥
अतः, हे स्वामी, आप-जैसे व्यक्ति भी, क्या केवल शब्द से डरते हैं? यदि आप वहां भय का कारण समझते हैं, तो मैं उसे जानने के लिए जाता हूँ ॥६२॥
दमनक के इस प्रकार कहने पर सिंह ने कहा कि 'तुम समर्थ हो तो जाबो।' स्वामी से यह सुनकर वह यमुना-तट पर गया ।॥६३॥
वहाँ पर जब वह शब्द के अनुसार चुपचाप जा रहा था, तब उसने घास चरते हुए एक बैल को देखा ॥६४।।
तब वह उस बैल के पास जाकर और उससे बातचीत करके सिंह के पास लौट आया और उसे उसने वास्तविक समाचार दिया ॥६५॥
'यदि तूने बड़े साँड़ को देखा है और उससे बातचीत की है, तो उसे युक्तिपूर्वक समझा-बुझाकर यहाँ ले आ। 'मैं भी देखूं वह कैसा है ? ॥६६॥
इस प्रकार कहकर उस प्रसन्न पिंगलक ने दमनक को फिर उस बैल के पास भेजा ॥६७॥
'आओ, आओ, हमारा प्रसन्न स्वामी मृगराज, तुम्हें बुलाता है।' दमनक ने जाकर बैल से इस प्रकार कहा, किन्तु उसने भय के कारण विश्वास नहीं किया। तब, दमनक ने फिर से वन में जाकर अपने स्वामी सिंह द्वारा उस बैल को अभयदान दिलवाया ॥६८-६९।।
और फिर, बैल के पास आकर उसे अभयदान द्वारा विश्वास दिलाकर और उसे धीरज बंधाकर दमनक बैल को सिंह के पास ले आया ॥७०॥
सिंह ने आये हुए और प्रणाम करते हुए बैल से आदर के साथ कहा- 'तुम अब यहाँ मेरे पास निडर होकर रहो ॥७१॥
'ठीक है, ऐसा कहकर उसके पास आदर से रहते हुए बैल ने, धीरे-धीरे सिंह को इस प्रकार वश में कर लिया कि वह दूसरों से उदासीन हो गया ॥७२॥
तब उपेक्षा के कारण दुःखी दमनक ने एकान्त में करटक से कहा- 'देखो, संजीवक की ओर खिचा हुआ स्वामी, अब हम दोनों की उपेक्षा करता है।॥७३॥
शिकार मारकर सब मांस अकेले ही खा जाता है, हम लोगों को नहीं देता। आज यह मूर्ख सिंह, इस बैल से सिखाया जा रहा है ॥७४॥
यह दोष मेरा ही है कि मैं इस बैल को यहाँ लाया। अब मैं ऐसा करूंगा कि यह बैल नष्ट हो जायगा ॥७५॥
और हमारा स्वामी भी इस अनुचित व्यसन से दूर हो जायगा। दमनक के ये वचन सुनकर करटक बोला- 'मित्र अब यह कार्य तुम भी नहीं कर सकते।' उसके ऐसा कहने पर दमनक ने कहा- बुद्धि द्वारा अवश्य कर सकता हूँ' ॥७६-७७।।
आपत्ति के समय जिसकी बुद्धि नष्ट नहीं होती, वह क्या नहीं कर सकता। इस सम्बन्ध में बगुले को मारनेवाले मगर' की कथा सुनो ॥७८॥
बगुला और केकड़े की कथा
किसी समय मछलियों से भरे हुए तालाब में एक बगुला रहता था। उसके चंगुल में न फंसे, इसलिए मछलियाँ उसकी आँखों से ओझल रहती थीं ॥७९॥
इस प्रकार, उन मछलियों को न पाकर बगुले ते, मछलियों से झूठ कहा कि 'यहाँ पर जाल लेकर कोई मछली मारनेवाला पुरुष आया है। वह शीघ्र ही तुमलोगों को जाल से पकड़कर मार डालेगा। इसलिए, यदि तुम लोगों को मुझपर विश्वास है, तो मेरी बात मानो ॥८०-८१॥
यहाँ पर एकान्त में एक तालाब है, जिसे बीवर नहीं जानते। तुमलोग रहने के लिए वहाँ चलो। मैं तुमलोगों को एक-एक करके वहाँ पहुंचा दूंगा ।॥८२॥
यह सुनकर उन मूर्ख मछलियों ने डरते हुए उससे कहा- 'ऐसा ही करो। हम सब तुम्हारे प्रति विश्वाम करने हैं' ।॥८३॥
तब वह ठग बगुला, उन मछलियों को एक-एक करके ले जाकर एक चट्टान पर पटककर खाने लगा। इस प्रकार, धीरे-धीरे वह बहुत-सी मछलियों को खा गया ।॥८४॥
मछलियों को इस प्रकार ले जाते हुए बगुले को देखकर उम तालाब में रहनेवाले एक मगर (केकड़े) ने उस बगुले से पूछा कि 'तुम इन मछलियों को कहाँ ले जाते हो ?'।॥८५॥
यह सुनकर बगुले ने उसे भी वही उत्तर दिया, जो मछलियों को दिया था। तब उस डरे हुए मगरमच्छ (केकड़े) ने भी कहा कि 'मुझे भी ले बलों ॥ ८६॥
उसके मांस के लालच में अन्धी बुद्धिवाला बगुला, उसे भी लेकर अब मछलियों का वर्ष करनेवाली चट्टान पर पहुंचा, तो उन खाई हुई मछलियों के बची और बिखरी हुई हड्डियों के टुकड़ों को देखकर वह मगरमच्छ (केकड़ा)³ वगुले को विश्वासवाती भक्षक समझ गया ।।८७-८८॥
तब उस बुद्धिमान मगर (केकड़े) ने उस बगुले द्वारा चट्टान पर रखते ही, बगुले का गला काट लिया ॥८९॥
और, जाकर बची हुई मछलियों को सब समाचार सुनाया। उन सब ने भी प्राणदान देने-वाले उसका अभिवादन करके कृतज्ञता स्वीकार की ।॥९०।।
इसलिए बुद्धि ही वास्तविक बल है। बुद्धिहीन व्यक्ति के पास बल होने पर भी उससे क्या लाभ ? इस सम्बन्ध में भी सिह और शश (खरगोश) की एक कथा सुनो ॥९१॥
सिह और शश की कथा
किसी जंगल में एकमात्र वीर और अपराजित सिह रहता था। वह जंगल में जिस-जिस जीव को देखता था, उसे मार डालता था ॥९२॥
तब एक बार जंगल के सभी मूग आदि पशुओं ने, एकत्र होकर, उससे प्रार्थना की कि हमलोग तुम्हारे भोजन के लिए प्रतिदिन एक-एक जीव को भेजेंगे। एक साथ ही हम सब को मारकर तुम अपने ही स्वार्य की हानि क्यों करते हो?' उन लोगों के इस प्रस्ताव को सिंह ने 'ठीक है' कहकर मान लिया ॥९३-९४।।
इस निश्चय के पश्चात् एक-एक जीव को प्रतिदिन जब वह खा रहा था, तब एक दिन उसके लिए एक शश (खरगोश) की बारी आई ॥९५॥
सब जानवरों से भेजे गये उस शश ने जाते हुए सोचा कि ⁴धीर व्यक्ति वही है, जो आपत्ति-काल में भी नहीं घबराता ॥९६॥
इसलिए, अब मृत्यु के सिर पर मंडराते हुए भी एक युक्ति करता हूँ। ऐसा सोचकर वह शश देर करके सिह के पास पहुंचा ॥९७॥
विलम्ब से आए हुये उसे देखकर सिह बोला- 'क्यों रे, तूने आज मेरे भोजन का समय क्यों बिता दिया ? अरे दुष्ट, वध करने के सिवा और मैं तेरा अब कर ही क्या सकता हूँ।' इस प्रकार कहते हुए उस सिंह ने वह विनम्र शश (खरगोश) - बोला ॥९८-९९॥
'हे स्वामी, मेरा दोष नहीं है। आज मैं अपने वश में नहीं रह गया था। आते हुए मार्ग में मुझे दूसरे सिंह ने देर तक रोकने के बाद छोड़ा ॥१००॥
यह सुनकर पूंछ को उठाकर हिलाता हुआ और क्रोध से आँखें लाल करके गुर्राता हुआ वह सिह बोला- 'वह कौन दूसरा सिंह है? तू उसे मुझे दिखा' ।॥१०१॥
'स्वामी, आकर देखिए ।' यह कहकर पीछे आते हुए सिह को वह शश उसे एक कुएं के पास ले गया ॥१०२॥
और बोला- इस कुएं के अन्दर बैठे हुए उसे देखो'। शश के ऐसा कहने पर सिंह ने कुएं के भीतर देखा और स्वच्छ जल में अपनी परछाई को देखकर, अपनी गर्जना की प्रति-ध्वनि को ही, दूसरे सिंह की अपने से भी तेज गर्जना समझ ली ॥१०३-१०४॥
यह मूर्ख सिंह उस दूसरे सिंह पर आक्रमण करने की दृष्टि से उस कुएं में कूद पड़ा और मर गया ।॥१०५॥
इस प्रकार, उस शश ने अपनी मृत्यु को पार कर और अन्यान्य पशुओं को भी मृत्यु से बचाकर और उस जंगल के सभी पशुओं को यह शुभ समाचार सुनाकर उन्हें आनन्दित किया ॥१०६॥
'इस प्रकार, बुद्धि ही वास्तविक बल है। शारीरिक बल, उसके आगे कुछ नहीं है। जिस बुद्धि के प्रभाव से शश ने सिंह को भी मार डाला ॥१०७॥
इसलिए, मैं अपने इस कार्य को बुद्धि के बल से सिद्ध करता हूँ।', दमनक के इस प्रकार कहने पर करटक चुप हो गया ।॥१०८॥
तदनन्तर, दमनक अपने स्वामी सिह के पास जाकर उदास होकर बैठ गया। जब सिह ने उसकी उदासीनता का कारण उससे पूछा, तब उसने एकान्त में उससे कहा- 'स्वामी, किसी बात को जानकर चुप नहीं बैठा जा सकता। इसलिए कहता हूँ कि सेवक का धर्म है स्वामी के हित को बिना अधिकार के भी कहे। इसलिए, आप इसे अन्यथा न समझकर मेरे निवेदन को सुनें ॥१०९-१११।।
यह संजीवक बैल, तुम्हें मारकर इस वन का राज्य चाहता है। इसके मन्त्री हो जाने पर इसने निश्चय कर लिया है कि 'तुम डरपोक हो' ॥११२॥
बह तुम्हें मारने की इच्छा से अपने शस्त्र-रूपी सींगों को पैना करता रहता है और जंगल के जीवों को घूम-घूमकर धीरज दिलाकर यह समझाता रहता है कि 'घास खानेवाले मेरे जीते रहते तुम निर्भय रहो और मेरे साथ आबो और इस मांसभोजी सिंह को किसी प्रकार मार डालो।' दमनक से इस प्रकार कहा गया पिगलक बोला 'घास खानेवाला बेचारा यह बैल, मेरा क्या कर सकता है? किन्तु यही एक बात है कि अभय दिये हुए और शरण में आये हुए इसे कैसे मारें ? ॥११३-११६।।
यह सुनकर दमनक बोला-'ऐसा न करना चाहिए। जिसे राजा अपने समान बनाता है, उसे राजा के समान ही राजलक्ष्मी नहीं प्राप्त होती। जब वे दोनों ही राजमद से उच्छृंखल हो जाते हैं, तब चंचल लक्ष्मी, दोनों ओर पैर रखकर अधिक समय तक नहीं ठहरती। और, उनमें से एक को अवश्य ही छोड़ देती है'।।११७-११८ ॥
जो स्वामी हितैषियों से भी द्वेष करता है और अहितचिन्तकों को ही सदा चाहता है, वह बुद्धि-मानों के लिए उसी प्रकार छोड़ देने के योग्य हो जाता है, जिस प्रकार वैद्य के लिए दुष्ट रोगी ।॥ ११९॥
प्रारम्भ में कड़वी और अन्त (परिणाम) में मधुर बातों का कहने और सुननेवाला जहाँ होता है, वहां लक्ष्मी निवास करती है।॥१२०॥
जो राजा, सज्जनों की बात नहीं सुनता और दुर्जनों की बातों पर ध्यान देता है, वह शीघ्र ही, विपत्ति में पड़कर पश्चात्ताप और सन्ताप करता है ॥ १२१॥
हे ग्वामी, उम बैल पर आपका स्नेह व्यर्थ है। इस द्रोही के लिए अभय-दान क्या और इस शरणागत की रक्षा कैसी ! ॥१२२॥
और भी बात है। सदा आपके पास रहनेवाले इस बैल के गोबर और गोमूत्र में कीड़े उत्पन्न होते हैं। वे कीड़े हाथियों के दांतों से हुए आपके घावों में प्रविष्ट होकर आपके शरीर को हानि पहुँचाते हैं। अतः, उपाय द्वारा ऐसे व्यक्ति का वध करना ही उचित है।॥ १२३-१२४॥
विद्वान् व्यक्ति यदि स्वयं कोई अपराध नहीं करता, तो भी दुष्ट के संसर्ग से उसमें भी दोष उत्पन्न हो ही जाते हैं। इस प्रसंग में एक कथा सुनो' ।॥ १२५॥
मन्दविसर्पिणी जूं और खटमल की कथा
किसी राजा के पलंग में मन्दविसर्पिणी नाम की एक यूका (जूं) कहीं से आकर छिपी रहती थी। एक बार सहसा वायु के वेग से उड़ाया गया टिट्टिभ नाम का एक खटमल उस पलंग में आकर घुस गया ।॥१२६-१२७ ॥
उसे देखकर मन्दविसर्पिणी ने कहा-'तू मेरे रहने के स्थान में क्यों घुस आया ? कहीं दूसरे स्थान पर जा ।।१२८॥
मैंने पहले कभी नहीं पिया हुआा राजा का रक्त-पान करूंगा, इसलिए कृपा कर, और मुझे यहाँ रहने दे।' इस प्रकार, उस खटमल ने जूं से कहा ॥१२९।।
तब खटमल के अनुरोध से वह जूं कहने लगी 'यदि ऐसा है, तो रहो। लेकिन मित्र, राजा को अनवसर (बे-मौके) न काटना। जब वह सोया हो या आनन्द-विलास में तन्मय हो, तो धीरे से काटना। यह सुनकर वह टिट्टिभ खटमल, ऐसा ही करूंगा, कहकर वहीं रहने लगा ।।१३०-१३१॥
एक बार टिट्टिम ने, रात में सोये हुए राजा को, शीघ्रता में जोर से काट लिया। तब राजा 'हाय ! काट लिया!' इस प्रकार कहकर उठ गया। इतने में उस दृष्ट खटमल के भागने पर और राजा के सेवकों के ढूँढ़ने पर उसे तो नहीं पाया, किन्तु उस जूं को पा लिया और उसे मसल डाला ।। १३२-१३३॥
इस प्रकार, टिट्टिभ नामक खटमल के सम्पर्क से, बेचारी मन्दविसर्पिणी नामक जूं मारी गई। अतः, इस संजीवक का साथ तुम्हारे लिए कल्याणकारी नहीं होगा ॥१३४।।
यदि आप मेरा विश्वास नहीं करते हैं, तो उसे स्वयं आये हुए देखेंगे कि वह शूल के समान तीजे सींगों को घुमाता हुआ तुम्हारे सामने आयेगा ॥१३५॥
इस प्रकार, दमनक द्वारा उभाड़े गये सिह ने मन ही-मन संजीवक को मारने की सोच ली ॥१३६॥
सिंह के मन के भाव को समझकर दमनक वहाँ से चुपचाप खिन्न-सा होकर संजीवक के पास गया ॥१३७।।
'कहो मित्र, कैसे हो ? तुम्हारा शरीर तो ठीक है?' बैल संजीवक के इस प्रकार पूछने पर दमनक उससे बोला-॥१३८॥
'सेवक का क्या कुशल ? राजा का सदा प्यारा कौन रहा? कौन याचक (माँगनेवाला) लघुता को प्राप्त नहीं होता और कौन मौत का शिकार नहीं होता ? ॥१३९॥
इस प्रकार कहते हुए दमनक से संजीवक ने फिर पूछा-'आज तुम इस प्रकार की विरक्ति की बातें क्यों कर रहे हो ?' ॥१४०॥
तब दमनक ने कहा-'सुनो। प्रेम के कारण तुमसे कहता हूँ। आज बह मृगराज (सिंह) पिंगलक तुम्हारे विरुद्ध हो गया है। वह निरपेक्ष, चंचल प्रेमवाला तुम्हें मारकर खाना चाहता है और मैं उसके हिस्रक वृत्तिवाले सेवक साथियों को सिवा तुम्हारे विरुद्ध प्रेरणा देते हुए देखता हूँ ॥१४१-१४२॥
पहले के विश्वास के कारण सरल और उदासीन संजीवक बैल, दमनक की बात सुनकर बऔर उसे सत्य मानकर बोला- ॥१४३॥
'खेद है कि नीच परिजनों से घिरा हुआ नीच स्वामी, सदा शत्रु ही बनता है। इस सम्बन्ध में यह कथा सुनों ॥१४४॥
मदोत्कट सिह की कथा
किसी बन में मदोत्कट नाम का सिंह था और उसके तीन अनुचर वे बाध, कौआ और सियार ॥१४५।।
उस सिह ने, एक बार वन में पहले कभी न देखे हुए, अपने झुंड से अलग हुए और हँसने योग्य स्वरूपवाले ऊबड़-खाबड़ ऊँट के एक बच्चे को देखा ।।१४६।।
'यह कौन जीव है!', मृगराज के आश्चर्य के साथ ऐसा पूछने पर, अनेक देशों में भ्रमण किया हुआ कौआ बोला, 'यह ऊँट है'।। १४७७॥
तब सिह ने, उस विचित्र प्राणी को, अभयदान देकर अपने पास रख लिया ॥१४८॥
एक बार हाथी के साथ युद्ध करने में सिंह आहत होकर अस्वस्थ हो गया और उसने उन स्वस्थ अनुचरों के साथ अनेक उपवास किये ॥१४९॥
तब भूख से व्याकुल सिंह ने, घूमते हुए, कुछ न पाया, तब ऊँट को छोड़कर अन्य तीन अनुचरों से एकान्त में उसने पूछा कि अब क्या करना चाहिए ? ॥१५०॥
वे सब बोले-'स्वामिन् ! हमलोगों को आपत्ति के समय उचित ही कहना चाहिए। ऊँट के साथ हमलोगों की क्या मित्रता ? तो क्यों न उसे ही खाया जाय ।। १५१॥
यह घास खानेवाला, हम मास खानेवालों का भक्ष्य तो है ही। बहुतों को मांस खाने के लिए एक का ही बलिदान क्यों न किया जाय ॥१५२॥
यदि स्वामी यह कहें कि अभय दिये गये प्राणी को कैसे मारा जाय, तो हम लोग उपाय करके उसकी ही वाणी द्वारा उसका शरीर आपको अर्पण करा दें। इस प्रकार कहने पर सिंह द्वारा स्वीकृति पाकर कौवा, अपने साथियों से ऊँट के वध का विचार करके, उस ऊँट के बच्चे से बोला- ॥१५३-१५४।।
कि हमारा यह स्वामी भूख से व्याकुल होने पर भी, हम लोगों से कुछ नहीं कह रहा है। अतः, अपने को प्रदान करने की बात कहकर हमलोगों को उसका प्रिय करना चाहिए ॥१५५॥
हमलोग तो ऐसा करेंगे ही, पर तुम्हें भी ऐसा ही करना चाहिए, जिससे स्वामी हम पर प्रसन्न हों। कौए के इस प्रकार कहने पर ऊँट के उस सरल बच्चे ने, उसकी इस बात को स्वीकार कर लिया ॥१५६॥
और, वह कौए के साथ ही सिंह के पास गया। अब कौए ने सिंह से कहा-'स्वामी, मैं आपके अधीन हूँ, मुझे खाओ' ॥१५७॥
'छोटे-से शरीरबाले तुझे मारकर ही क्या होगा ?' - सिंह के ऐसा कहने पर सियार बोला, 'मैं भी आपके अधीन हूँ, अतः मुझे मारकर खा लें।' तब सिंह ने उसे भी छोटे शरीरवाला बता कर दूर कर दिया ।।१५८॥
तब बाघ ने कहा, 'मुझे मारकर खालो।' किन्तु सिंह ने, उसे भी नहीं मारा। तब ऊँट ने कहा- 'मुझे खाओ' ॥१५९।।
इस प्रकार, वाणी के कपट से बाघ ने ही, उसे मारकर टुकड़े-टुकड़े कर दिया और उन सिंह, बाघ, सियार तथा कौओं ने मिलकर उसे खा डाला ॥ १६०॥
इसी प्रकार किसी चुगलखोर ने, बिना किसी कारण ही, मेरे विरुद्ध राजा पिंगलक को उभाड़ा है। अब जो भाग्य में होगा, वह होगा ॥१६१।।
यदि हंसों के परिवारवाला गीध भी राजा हो, तो उसकी सेवा करनी चाहिए, किन्तु गीघों से सेवित हंसराज की भी सेवा नहीं करनी चाहिए। दूसरों की तो बात ही क्या है ।॥ १६२॥
संजीवक से यह सुनकर कुटिल दमनक बोला 'धीरज से सब काम सिद्ध होते हैं। इस विषय में कथा कहता हूँ, सुनो' - ॥ १६३॥
टिट्टिभ-दम्पती को कथा
समुद्र के किनारे एक टिटिहरा अपनी टिटिहरी के साथ रहता था। टिटिहरी गर्भवती होने पर अपने टिटिहरे से बोली--॥१६४।॥
'चलो, कहीं दूसरी जगह चलें; क्योंकि यहाँ पर मेरे प्रसव होने पर कभी समुद्र अपनी लहरों से मेरे अंडों का हरण न कर लें ।॥ १६५॥
टिटिही की यह बात सुनकर टिटिहा उससे बोला कि समुद्र मेरे साथ विरोध नहीं कर सकता ।।१६६।।
यह सुनकर टिटिहरी बोली, ऐसा न कहो। समुद्र के साथ तेरी क्या बराबरी ! इसलिए, हितकारी उपदेश को मानना चाहिए। नहीं तो बिनाश होगा ।।१६७।।
कछुए और हंस को कथा
किसी तालाब में कम्बुग्रीव नाम का एक कछुआ था। उसी तालाब में रहनेवाले चिकट और संकट नाम के दो हंस उसके मित्र थे ॥ १६८॥
एक बार सूखा पड़ने के कारण तालाब के सूख जाने पर वे दोनों हंस किसी दूसरे तालाब में जाने को तैयार हुए। तब कछुए ने उनसे कहा ॥१६९॥
तुम लोग जहाँ जाने को तैयार हो, वहाँ मुझे भी ले चलो। यह सुनकर वे दोनों हंस उस मित्र कछुए से बोले-॥१७०॥
'वह तालाब दूर है, जहाँ हमलोग, जाने को उद्यत हैं। यदि तुम्हारी इच्छा वहाँ चलने की है, तो हमारी बात मानो ॥१७१॥
हम दोनों से पकड़ी गई लकड़ी को तुम बीच में दाँतों से पकड़कर लटक जाओ। किन्तु, उड़ते समय आकाश में चुप रहना, नहीं तो गिरकर मर जाओगे' ।॥१७२।
उनकी इस बात को स्वीकार कर दाँतों से लकड़ी को दोनों ओर से पकड़े हुए दोनों हंस आकाश में उड़ चले ॥१७३।।
क्रमशः उस तालाब के पास पहुंचने पर, कछुए को ले जाते हुए हंसों को देखकर नगर-निवासी लोगों ने शोर मचाना शुरू किया कि देखो, 'यह कैसा आश्चर्य है! हंस यह क्या ले जा रहे हैं! इस प्रकार के कोलाहल को चंचल कछुए ने सुना ॥१७४-१७५॥
'नीचे यह कोलाहल क्यों हो रहा है?', कछुए ने दाँतों से लकड़ी को छोड़कर हंसों से पूछा और लकड़ी से छूटने पर नीचे आ गिरा और लोगों ने उसे मार डाला ॥१७६॥
बुद्धिहीन व्यक्ति इसी प्रकार नष्ट होते हैं, जैसे लकड़ी से गिरा कछुवा मारा गया। टिटिही के ऐसा कहने पर टिटिहरा उससे बोला-॥१७७।।
तीन मच्छों की कथा
'प्रिये, यह तो सत्य है; किन्तु तुम भी इस कथा को सुनो। किसी स्थान पर एक नदी के गड्ढे में तीन मच्छ रहते थे ॥१७८॥
एक का नाम अनागतविधाता, दूसरे का नाम प्रत्युत्पन्नमति और तीसरे का नाम यद्भविष्य था। वे तीनों परस्पर सहयोगी और सहचारी थे ॥ १७९ ॥
उन तीनों ने, उस जलाशय के मार्ग से जाते हुए कुछ धीवरों (मछुओं) को यह कहते सुना कि इस जलाशय में मच्छ हैं।॥१८०॥
मछलीमारों की यह बात सुनकर उसके द्वारा मारे जाने के भय से बुद्धिमान् अनागत-विधाता नाम का मच्छ नदी के प्रवाह में घुसकर दूसरे स्थान पर चला गया ॥१८१॥
प्रतिभासम्पन्न प्रत्युत्पश्नमति नाम का मच्छ, निडर होकर वहीं रह गया। उसने सोचा कि जब भय शिर पर आ जायगा, तब उसी समय उसका प्रतीकार किया जायगा ॥१८२॥
और, तीसरा यद्भविष्य, यही सोचता रहा कि जैसा मेरा भविष्य होगा, देखा जायगा। कुछ समय के पश्चात् धीवरों ने वहाँ आकर जाल लगाया ॥१८३॥
उन धीवरों ने जाल में फंसे हुए प्रत्युत्पन्नमति को मुर्दे के समान निश्चेष्ट देखकर मरा हुआ-सा समझा और अपने-आप मरा जानकर उसे मारा नहीं, बल्कि किनारे पर रख दिया; किन्तु वह उछलकर फिर नदी के प्रवाह में गिरकर दूसरी ओर भाग गया ॥ १८४-१८५।।
और, मन्दबुद्धि यद्मविष्य, जाल में फंसकर इधर-उधर तड़फ़ता हुआ धीवरों द्वारा मार डाला गया ।।१८६।।
इसलिए, मैं भी समय आने पर प्रतीकार करूँगा, किन्तु समुद्र के भय से यहाँ से भागूंगा नहीं ॥१८७७॥
टिट्टिभ-दम्पती की कथा (क्रमागत)
ऐसा कहकर और पत्नी को धीरज बँधाकर टिटिहा अपने घोंसले में ही डटा रहा ॥१८८॥
वहाँ पर महासमुद्र, उस टिटिहरे की अभिमानपूर्ण बातें सुनता रहा। कुछ दिनों में, समय आने पर टिटिहरी ने अण्डे दिये ॥१८८।।
तब समुद्र ने, टिटिहरी का तमाशा देखने की इच्छा से कि यह मेरा क्या बिगाड़ सकता है, अपनी लहरों से उसके अण्डों को बहा लिया ॥१८९॥
तब टिटिहरी, अपने पति से रोती हुई बोली कि मैं जो पहले से कह रही थी, वही विपत्ति, सिर पर आ गई ॥१९०।।
तब वह धैर्यशाली टिटिहरा अपनी टिटहरी से बोला 'देख, मैं इस समुद्र का क्या करता हूँ' ।।१९१॥
ऐसा कहकर उसने सभी पक्षियों को एकत्र करके, अपनी दुर्दशा बताई और उनके साथ जाकर अपने राजा गरुड़ की शरण ली ॥१९२॥
उस गरुड़ से सब पक्षियों ने निवेदन किया कि 'महाराज, आपके स्वामी रहते हुए हम लोग अनाथों के समान तिरस्कृत हो रहे हैं ।॥ १९३॥
तब क्रुद्ध गरुड़ के निवेदन करने पर भगवान् विष्णु ने आग्नेय अस्त्र से समुद्र को सुखाकर उसके अंडे दिलवा दिये ॥१९४॥
'इसलिए, बुद्धिमान् व्यक्ति को आपत्ति के समय, धैर्य न छोड़कर, दृढ़ रहना चाहिए। अब तो इसी समय पिंगलक सिह के साथ तेरा युद्ध होनेवाला है ।।१९५॥
तभी वह पूँछ को ऊपर करके चारों पैरों को एक साथ ही उठायेगा, तब तुम उसे अपने ऊपर प्रहार करनेवाला समझना ॥१९६॥
तुम भी तैयार रहकर नीचे सिर करके अपने दोनों सींगों से उसके पेट में आघात करके गिराये हुये शत्रु की अंतड़ियों को निकाल लेना' ।॥१९७॥
दमनक, इस प्रकार संजीवक बैल से कहकर करटक के पास गया और दोनों का विरोध उसे सुनाया ॥१९८॥
तब संजीवक, धीरे से, पिगलक की भाव-भंगियों से उसके चित्त को समझने के लिए उसके पास गया और उसे पूंछ उठाकर चारों पैरों को एक साथ उठाये हुए देखा। सिह ने भी शंका से अपने सिर को हिलाते हुए उसे देखा ॥१९९-२०० ॥
तब सिह ने उठकर बैल को नखों से मारा और बैल ने सींगों से उस पर प्रहार किया। इस प्रकार दोनों का युद्ध आरम्भ हुआ ॥२०१॥
यह देखकर साधु करटक दमनक से बोला 'तूने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए स्वामी पर नई विपत्ति खड़ी कर दी ॥२०२॥
प्रजा को सताकर प्राप्त की गई सम्पत्ति, अधूर्तता से की गई मित्रता और कठोरता से हरण की गई कामिनी चिरकाल तक नहीं रहती ।॥ २०३॥
हितकारी बातों का अपमान करनेवाले से जो बहुत कहता है, वह उससे बुराई ही पाता है। जैसे सूचीमुख ने बन्दर से बुराई प्राप्त की ॥२०४।।
सूचीमुख पक्षी और बन्दर की कथा
पहले समय किसी वन में झुंड के साथ विचरनेवाले बन्दर रहते थे। उन्होंने कभी शीतकाल में चमकते हुए जुगनू को देखकर उसे आग की चिनगारी समझा और उस पर घास और सूखे पत्ते डालकर शरीर को सेंकने लगे ॥२०५-२०६॥
उनमें से एक बन्दर ने, मुख से फूंक लगाकर उस जुगनू को जलाने की चेष्टा की ॥२०६।।
यह देखकर सूचीमुख नाम का पक्षी, उस बन्दर से बोला, 'यह आग नहीं, जुगनू है। इसे फूंकने का व्यर्थ प्रयत्न न करो। यह सुनकर भी न माननेवाले और बार-बार फूंकते हुए बन्दर के पास पेड़ से नीचे आकर उस पक्षी ने आग्रहपूर्वक उसे रोका, किन्तु उससे बन्दर क्रुद्ध हो गया ।।२०७-२०८॥
और, उसने पत्थर से मारकर, उस सूचीमुक्त के टुकड़े-टुकड़े कर दिये। इसलिए, उससे हित की बात कभी न कहनी चाहिए, जो न माने ॥२०९॥
'जब में क्या कहूँ, तूने इन दोनों में भेद कराकर अहित किया है। दुष्ट बुद्धि से जो भी किया जाता है, वह शुभ (अच्छा) नहीं होता ॥२१०॥
धर्मबुद्धि और दुष्टबुद्धि वैश्यों की कथा
प्राचीन समय में, किसी नगर में धर्मवृद्धि और दुष्टबुद्धि नाम के दो वणिक्पुत्र थे। वे दोनों धन कमाने के लिए अपने पिता के घर से दूसरे देश में गये और दैवयोग से उन्होंने दो सहस्र दीनार कमाये ॥२११-२१२॥
उन्हें लेकर वे अपने घर लौट आये और उन्होंने एक वृक्ष के नीचे उन दीनारों को गाढ़ दिया ॥२१३॥
और, एक सौ दीनार लेकर तथा पिता की सम्पत्ति का बराबर बँटवारा करके वे पिता के घर में रहने लगे ॥२१४।।
एक बार, व्यर्थ व्यय करनेवाला दुष्टबुद्धि वन में जाकर उस वृक्ष के नीचे गड़े सारे धन को अकेले ही निकाल लाया ।।२१५॥
एक महीना बीत जाने पर दुष्टबद्धि ने धर्मबुद्धि से कहा 'चलो, उन दीनारों का भी बंटवारा कर लें। इस समय मुझे कुछ व्यय की आवश्यकता है' ।॥२१६॥
यह सुनकर धर्मबुद्धि ने उसी दुष्टबुद्धि के साथ जाकर उस स्थान को खोदा, जहाँ दीनार गाड़े थे ॥२१७॥
जब उस गड़े से दीनार न मिले, तब दुष्टवृद्धि धर्मबुद्धि से बोला-'तू ही सारे दीनार निकाल ले गया। उनमें से आधा मुझे दे। धर्मबुद्धि बोला- 'उन्हें मैं नहीं ले गया, तू ही ले गया हैं ।॥२१८-२१९॥
इस प्रकार, कलह होने पर दुष्टबुद्धि ने, पत्थर से अपना सिर फोड़ लिया और धर्मबुद्धि को न्यायालय में ले जाकर उस पर अभियोग (मुकदमा) कर दिया ॥२२०।।
न्यायालय में अपने-अपने पक्ष की बात कहते हुए उन दोनों को अधिकारियों ने दिन-भर वहीं बैठाये रखा ॥२२१॥
तब दुष्टबुद्धि ने कहा-'जिस वृक्ष के नीचे दीनार गड़े थे, वह वृक्ष साक्षी है और बह कहता है कि दीनार धर्मबुद्धि ने लिये'॥ २२२॥
तब वे अत्यन्त चकित राजकर्मचारी बोले कि 'प्रातःकाल ही चलकर उस वृक्ष का साक्ष्य (गवाही) लेंगे। तब उन्होंने दुष्टबुद्धि और धर्मबुद्धि दोनों को जमानत लेकर छोड़ दिया और वे अपने-अपने घर चले गये ॥ २२३-२२४।॥
दुष्टवृद्धि ने, घर जाकर अपने पिता से सब सच्चा-सच्चा समाचार सुनाया और कहा कि 'तुम उस वृक्ष के अन्दर बैठकर मेरा साक्षी (गवाह) बनो' ।॥२२५॥
'अच्छा', इस प्रकार कहे हुए अपने पिता को ले जाकर दुष्टबुद्धि ने, उस वृक्ष के खोखले में, रात को ही उसे बैठा दिया और अपने घर चला आया ॥२२६।।
प्रातःकाल न्यायाधीशों के साथ वे दोनों भाई उस वृक्ष से जाकर पूछने लगे कि 'यहाँ से उन दीनारों को कौन ले गया? ॥२२७।।
'उन दीनारों को धर्मबुद्धि ले गया'- ऐसा उस वृक्ष के कोटर में बैठे हुए उसके पिता ने स्पष्ट कहा। न्यायाधिकारी इस बात को असम्भव जानकर समझ गये कि दुष्टबुद्धि ने, अवश्य ही इसके भीतर किसी को छिपा रखा है ॥ २२८-२२९॥
ऐसा सोचकर उन्होंने उस वृक्ष के कोटर में धुँआँ दिया, जिसके तीव्र होने पर उससे निकलता हुआ दुष्टबुद्धि का पिता पृथ्वी पर गिरकर मर गया ॥ २३०॥
यह देखकर न्यायाधिकारियों ने दुष्टबुद्धि से आधे दीनार धर्मबुद्धि को दिलवाये और उसका हाथ तथा जीभ काटकर वहाँ से निकाल दिया। साथ ही, उस धर्मबुद्धि का उन्होंने सम्मान किया ॥२३१-२३२॥
इस प्रकार अन्याय की बुद्धि से किया हुआ काम अशुभ और अकल्याण देनेवाला होता है। इसलिए, किसी भी काम को न्याय-बुद्धि से करना चाहिए। जैसा कि बगुले ने रूपं से किया ॥२३३।।
साँप और बगुले की कथा
पहले समय में कहीं पर एक साँप, बगुले के घोंसले में आकर उत्पन्न होनेवाले उसके बच्चे को खा जाता था। इस कारण बगुला बहुत दुःखी था ॥२३४।॥
एक मछली के कथनानुसार बगुले ने, नेवले के बिल से लेकर साँप के बिल तक मछली का मांस बिखेर दिया ॥२३५॥
नेवला, अपने बिल से निकलकर मछली का मांस खाते-खाते तदनुसार सांप के बिल तक चला आया और उसमें घुसकर उसने साँप के बच्चों के साथ साँप को भी मार डाला ॥२३६॥
लोहे का तराजू और वैश्यपुत्र की कथा
इस प्रकार उपाय से काम निकाले जाते हैं। और भी मुझसे सुनो। प्राचीन काल में किसी वैश्य के पास पिता की सम्पत्ति में से केवल एक लोहे का तराजू बच गया था ।।२३७।।
चार सौ तोले लोहे से बने उस तराजू को किसी बनिये के पास अमानत (धरोहर) रखकर वह वैश्य दूसरे देश को चला गया ॥ २३८॥
उसने लौटकर उस बनिये से जब अपना तराजू माँगा, तब उस बनिये ने कहा- 'उसे तो चूहे खा गये ॥ २३९॥
'सचमुच, वह लोहा बहुत मीठा था, इसी से उसे चूहे खा गये।' यह सुनकर मन-ही-मन हँसते हुए वैश्यपुत्र ने उस बनिये से कहा ॥२४०॥
और उसने भोजन की प्रार्थना की। उसने भी सन्तुष्ट होकर उसे भोजन देना स्वीकार कर लिया ॥२४११।
तब वह वैश्यपुत्र, उस बनिये के छोटे पुत्र को एक आंवला देकर स्नान के लिए उसे साथ लेकर चला गया। स्नान के बाद वह बनिया उस वैश्यपुत्र को किसी मित्र के यहाँ छिपाकर रख आया और अकेले ही बनिये के घर भोजन के लिए चला गया ।॥२४२-२४३।।
'बच्चा कहाँ गया? इस प्रकार पूछते हुए बनिये से वणिक्पुत्र ने कहा- 'उस बालक को आकाश से नीचे आकर एक बाज उठा ले गया' ॥२४४॥
उस बनिया द्वारा उसे न्यायालय में ले जाने पर भी उस वैश्यपुत्र ने यही कहा ।॥ २४५॥
'यह असम्भव है। बाज बच्चे को उठाकर कैसे ले जा सकता हैं?' सभा में उपस्थित व्यक्तियों द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वैश्यपुत्र बोला- जिस देश में लोहे का भारी तराजू चूहोंसे खाया जाता है, वहां तो बाज हाथी को भी ले जा सकता है। बच्चे की तो बात ही क्या' ॥२४६-२४७।।
यह सुनकर कौतुक से सब समाचार पूछकर न्यायाधिकारियों ने उसे तराजू दिला दिया और वैश्यपुत्र ने भी बच्चे को लाकर बनिये को दे दिया ॥२४८॥
इस प्रकार, बुद्धिमान् व्यक्ति उपाय से अपना काम बनाते हैं। तूने तो साहस करके स्वामी को संशय (खतरे) में डाल दिया है ॥२४९॥
करटक्र से यह सुनकर हँसता हुआ दमनक उससे बोला- 'ऐसा न समझो। बैल के साथ युद्ध करने में सिह की विजय में शंका ही क्या हो सकती है ।॥२५०॥
मदोन्मत्त हाथी के दाँतों से लगे व्रणों (घावों) से अलंकृत सिंह कहाँ और चाबुकों की मार से क्षत शरीरबाला तथा बोझा ढोनेवाला बैल कहाँ ! ॥२५१॥
जब दोनों सियार इस प्रकार की बातें कर ही रहे थे कि पिगलक सिंह ने, युद्ध में संजीवक बैल को मार डाला ॥२५२॥
उस संजीवक बैल के मारे जाने पर, करटक के साथ दमनक, मृगराज सिंह का फिर से स्वतन्त्र मन्त्रित्व पाकर प्रसन्नतापूर्वक रहने लगा ॥२५३॥
नरवाहनदत्त भी विज्ञ मन्त्री गोमुख से बुद्धि के चमत्कारों से भरी हुई इस विचित्र कथा को सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ ।।२५४।।
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियशो लम्बक का चतुर्थ तरंग समाप्त
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1. पंचतन्त्र के मित्रभेद नामक प्रथम तन्त्र की कथा, जिसका प्रारम्भ इस इस्रोक से होता है-
वर्षमानो महान् स्नेहः सिहगोबुवयोर्वने ।
विशुनेनातिलुब्धेन जम्बुकेन विनाशितः ॥
यही कथा, बगदाद के शाह हा रसीद के समय, कलीला विमना के नाम से अरबी में अनूदित हुई है। अनु०
2. पंचतन्त्र
में यह कथा इस प्रकार प्रारम्भ होती है-
व्यापारं यो नरः कर्तुमिच्छति । अव्यापारेषु
स एव निधनं याति कीलोत्पाटीव बानरः ।।
3. पंचतन्त्र में यहाँ केकड़ा लिखा है; जो उचित मालूम पड़ता है। अतः, आगे मगर के स्थान पर केकड़ा ही कोष्ठक में लिखा गया है। अनु०
4. पंचतन्त्र में इस कथा का प्रारम्भ इस प्रकार होता है-
बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् ।
पश्य सिंहो मदोमन्तः शशकेन निपातितः ।।
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