51005 || पंचम कहानी || अगर जलानेवाले वैश्य की कथा; तिल बोनेवाले मूर्ख कृषक की कथा; पानी में आग फेंकनेवाले की कथा; नासिकारोपण की कथा; मूर्ख गढ़रिये की कथा; अलंकारलम्बक की कथा; मूर्ख रूईवाले (रूई-शोधक) की कथा; खजूर काटनेवाले की कथा; मूर्ख मन्त्री की कथा; नमक खानेवाले (लवणाशी) की कथा; गाय दुहनेवाले को कथा; मूर्ख गंजे की कथा; कौवा, कछुआ, मृग और चूहे की कथा¹; हिरण्यक चूहा और संन्यासी की कथा; ईर्ष्यालु पुरुष और उसकी दुष्टा स्त्री को कथा; नाग और गरुड की कथा; केशमूर्ख की कथा; तैलमूर्ख की कथा; अस्थिमूर्ख की कथा; मूर्ख चण्डालकन्या की कथा; कृपण राजा की कथा; दो मित्रों की कथा; जलभीत मूर्ख की कथा; पुत्रवाती मूर्ख की कथा; भ्रातृमूर्ख की कथा; ब्रह्मचारी पुत्र की कथा; मूर्ख ज्योतिषी की कथा; क्रोधी मूर्ख की कथा; एक मूर्ख राजा की कथा; अधेले के लिए दस पैसे खर्च करनेवाले मूलं कंजूस की कथा; समुद्र की लहरों में निशान लगानेवाले की कथा; मांस के बदले में मांस देनेवाले राजा की कथा; एक को मारकर दूसरा पुत्र चाहनेवाली स्त्री की कथा; एक मूर्खसेवक की कथा; दो बन्धुओं की कथा; एक मूर्ख योद्धा की कथा; 'कुछ न' माँगनेवाले मूर्ख की कथा;

51005 || पंचम कहानी || अगर जलानेवाले वैश्य की कथा; तिल बोनेवाले मूर्ख कृषक की कथा; पानी में आग फेंकनेवाले की कथा; नासिकारोपण की कथा; मूर्ख गढ़रिये की कथा; अलंकारलम्बक की कथा; मूर्ख रूईवाले (रूई-शोधक) की कथा; खजूर काटनेवाले की कथा; मूर्ख मन्त्री की कथा; नमक खानेवाले (लवणाशी) की कथा; गाय दुहनेवाले को कथा; मूर्ख गंजे की कथा; कौवा, कछुआ, मृग और चूहे की कथा¹; हिरण्यक चूहा और संन्यासी की कथा; ईर्ष्यालु पुरुष और उसकी दुष्टा स्त्री को कथा; नाग और गरुड की कथा; केशमूर्ख की कथा; तैलमूर्ख की कथा; अस्थिमूर्ख की कथा; मूर्ख चण्डालकन्या की कथा; कृपण राजा की कथा; दो मित्रों की कथा; जलभीत मूर्ख की कथा; पुत्रवाती मूर्ख की कथा; भ्रातृमूर्ख की कथा; ब्रह्मचारी पुत्र की कथा; मूर्ख ज्योतिषी की कथा; क्रोधी मूर्ख की कथा; एक मूर्ख राजा की कथा; अधेले के लिए दस पैसे खर्च करनेवाले मूलं कंजूस की कथा; समुद्र की लहरों में निशान लगानेवाले की कथा; मांस के बदले में मांस देनेवाले राजा की कथा; एक को मारकर दूसरा पुत्र चाहनेवाली स्त्री की कथा; एक मूर्खसेवक की कथा; दो बन्धुओं की कथा; एक मूर्ख योद्धा की कथा; 'कुछ न' माँगनेवाले मूर्ख की कथा; 

पंचम तरंग

तदनन्तर, शक्तियशा के लिए उत्कंठित नरवाहनदत्त का विनोद करता हुवा गोमुख मन्त्री बोला ॥१॥

अगर जलानेवाले वैश्य की कथा

तुमने बुद्धिमानों की कथाएँ सुनीं, अब मूर्खों की कथा सुनो। किसी धनी बनिये का मुग्धबुद्धि नाम का एक बालक था ॥२॥

वह वैश्यपुत्र व्यापार के लिए एक बार कटाह द्वीप में गया। उसके व्यापारिक सामान में, अगर की लकड़ी सबसे अधिक थी ॥३॥

अन्य माल को बेचकर धन कमाये हुए उस वैश्यपुत्र के अगर को वहाँ किसी ने नहीं खरीदा, क्योंकि वहाँ के लोग अगर के महत्त्व को जानते ही न थे ॥४॥

तब उस वैश्यपुत्र ने, लकड़हारों से कोयला खरीदते हुए वहाँ के निवासियों को देखकर सारी अगर की लकड़ी जलाकर उसका कोयला बना डाला। और, उसे कोयले के भाव में बेचकर घर आकर मित्रों में अपनी डींग हांकने लगा, तो सुनकर लोग उसकी हंसी करने लगे ।॥५-६।।

तिल बोनेवाले मूर्ख कृषक की कथा

अगुरुदाही की कथा तुमने सुनी, अब तिवलकार्षिक की कथा सुनो। एक स्थान पर भूत के समान एक मूर्ख किसान था ।।७।।

उसने एक बार तिलों को भूनकर खाया और उन्हें स्वाविष्ट जानकर उन भूने हुए तिलों को ही, वैसा ही मीठा तेल पैदा करने की दृष्टि से खेतों में बो दिया। भुने हुए उन तिलों के न उगने से, अपने माल को नष्ट करनेवाले उस किसान की सभी लोग हँसी करने लगे ॥८॥

पानी में आग फेंकनेवाले की कथा

तिलकार्षिक की कथा सुनी। अब पानी में आग फेंकनेवाले की कथा सुनो ॥९॥

एक मूर्ख मनुष्य था। उसने प्रातःकाल देवता की पूजा करने की इच्छा से सोचा कि कल मुझे स्नान, धूप आदि के लिए जल और अग्नि की आवश्यकता पड़ेगी। अतः, उन्हें एक साथ ही रख देता हूँ, जिससे प्रातः उठते ही दोनों एक ही स्थान में मिल जाये ॥१०-११॥

ऐसा सोचकर वह पानी के घड़े में आग डालकर सो गया। प्रातःकाल जब उसने उठकर देखा, तो आग समाप्त हो गई थी और पानी भी गंदला होकर नष्ट हो गया था ॥१२॥

कोयले से पानी के काले हो जाने के कारण उससे मुंह धोने पर उसका मुंह भी वैसा ही (काला) हो गया। उसे देखकर सभी लोग मुस्कराने लगे ॥१३॥

नासिकारोपण की कथा

अग्निकुम्भ की कथा तुमने सुनी, अब नासिकारोपण की कथा सुनो। कहीं कोई जड़बुद्धि पुरुष रहता था ।।१४।।

उसने अपनी स्त्री को चिपटी नाकवाली और गुरु को उठी हुई लम्बी नाकवाला देखकर सोये हुए गुरु की नाक काटकर स्त्री के नाक में लगा देने की सोची। तदनन्तर, उसने स्त्री की नाक काटकर उसके स्थान पर गुरु की नाक काटकर रोप दी। किन्तु, गुरु की नाक उस पर जमी नहीं। इस प्रकार उसने गुरु और स्त्री दोनों को नकटा कर दिया। फलस्वरूप, जनता से तिरस्कार और हँसी उसने प्राप्त की ॥ १५-१६॥

मूर्ख गढ़रिये की कथा

अब एक पशुपाल (गड़ेरिये) की कथा सुनो। एक जंगल में महामूर्ख, किन्तु घनी एक गड़ेरिया रहता था। अनेक धूर्त, मित्रता करके उससे मिल गये ॥ १७-१८॥

और, वे उससे बोले कि हमलोगों ने नगरनिवासी धनी की एक कन्या, तुम्हारे लिए मांगी है, उसके पिता ने उसे देना स्वीकार भी कर लिया है ॥१९॥

यह सुनकर उस मूर्ख ने, प्रसन्न होकर उन्हें बहुत घन दिया। तब कुछ दिन बीतने पर उन धूर्तों ने उससे कहा कि तुम्हारा विवाह हो गया। यह सुनकर वह मूर्ख अत्यन्त प्रसन्न हुआ और जो कुछ उसके पास था, सब उन्हें देकर, अब मैं पुत्र के लिए उत्सुक हूँ, ऐसा कहकर दूसरे ही दिन रोने लगा ॥ २०-२२॥

पशुओं का पालन करने से जिसमें पशुता आ गई थी, ऐसा वह गड़ेरिया धूत्तों से ठगा जाकर लोगों के लिए हँसी का आधार बना ॥२३॥

अलंकारलम्बक की कथा 

महाराज, पशुपाल की कथा सुनी, अब अलंकारलम्बक की कथा सुनो। किसी मूर्ख गवांर ने, भूमि खोदते-खोदते उसमें बहुत-से आभूषण पाये, जिन्हे चोरों ने रात को राजभवन से चुराकर वहाँ गाड़ दिया था। उसे पाते ही उसने अपनी स्त्री को वहीं ले जाकर सजाना प्रारम्भ किया। कमर की करधनी को उसने स्त्री के सिर पर बाँधा और हार को कमर में। पैरों की पायजेब हाथों में पहनाई और हाथों के कड़े उसके कानों में लटका दिये। यह देखकर हँसते हुए लोगों ने चारों ओर कोलाहल किया। राजा ने यह जानकर उसे पकड़वा लिया और उससे आभूषण ले लिये। अन्त में उसे महामूर्ख जानकर छोड़ दिया ॥२४-२७॥

मूर्ख रूईवाले (रूई-शोधक) की कथा

महाराज, अलंकारलम्बक की कथा तुमने सुनी। अब रूई बेचनेवाले की कथा सुनो । एक मूर्ख रूई बेचने के लिए बाजार में गया। यह रूई साफ नहीं है' ऐसा कहकर किसी ने भी उसे नहीं खरीदा। तब रूईवाले ने एक सोनार की दूकान में देखा कि सुनार ने अशुद्ध सोने को तपाकर उसे शुद्ध करके बेच दिया और ग्राहक ने उसे खरीद लिया। यह देखकर उसने भी 'इसी प्रकार रूई को आग में शुद्ध करके बेचूं, तो इसके अच्छे दाम मिलेंगे', ऐसा सोचकर उसने सारी रुई आग में झोंक दी। फलतः, रूई के जल जाने पर उसकी मूर्खता पर सभी हँसने लगे ॥२८-३०॥

खजूर काटनेवाले की कथा

यह तो रूई-शोधक की कथा हुई, जब खजूर काटनेवाले की कथा सुनो ॥३१॥

राजा के आज्ञानुसार उसके कुछ अधिकारियों ने कुछ गंवारों को बुलाकर खजूर तोड़ लाने के लिए नियुक्त किया ॥३२॥

उन लोगों ने खजूर के एक पेड़ को गिरा देखकर और उसके खजूरों को बिना कष्ट के पाने के योग्य समझकर, अपने गाँव के सभी खजूर के पेड़ काटकर गिरा दिये ॥३३॥

उन गिरे हुए वृक्षों के सारे खजूर एकत्र कर लेने पर वे उन वृक्षों को उठाकर फिर से रोपने लगे, किन्तु ऐसा न कर सके। तब राजा के पास खजूर लाने पर उनकी मूर्खता को सुनकर राजा ने सभी को दंड दिया ॥ ३४-३५।।

मूर्ख मन्त्री की कथा

खजूर लानेवालों का हास्य सुना। अब भूमि में गड़े धन को देखनेवाले की कथा सुनो। किसी राजा ने गड़ा हुआ धन बताने के लिए किसी ज्ञानी को कहीं से बुलवाया। किन्तु, राजा के मूर्ख मन्त्री ने सोचा कि यह कहीं भाग न जाय, इ-लिए उसकी दोनों आंखे निकलवा लीं ॥ ३६-३७।।

तब वह ज्ञानी, भूमि के लक्षण देखने और चलने-फिरने में भी असमर्थ हो गया। उसे अन्त्रा देखकर सभी लोग हँसी करने लगे ॥३८॥

नमक खानेवाले (लवणाशी) की कथा

अब एक नमक खानेवाले की कथा मुनो। किसी गाँव का रहनेवाला गह्वर नाम का एक वज्रमूर्ख पुरुष था। उसको किसी नागरिक मित्र ने, अपने घर लेजाकर खूब स्वादिष्ठ भोजन कराया ॥३९-४०।।

उस गह्वर ने, अपने मित्र से पूछा कि 'भोजन में इतना स्वाद किस कारण हुआ ?' तब उसने कहा- 'इसमें प्रधानता नमक की है' ॥४१॥

तब उस गंवार ने सोचा कि जब लवण से ही इतना स्वाद है, तो क्यों न केवल नमक ही खाया जाय। ऐसा सोचकर उसने मुट्ठी-भर नमक का चूर्ण मुंह में डाल लिया और खाने लगा ॥४२॥

उस नमक के चूर्ण से उस मूर्ख के ओठ, दाढ़ी और मूंछ सब भर गये और उसके श्वेत मुँह को देखकर लोगों के मुँह भी हँसी से श्वेत हो गये ॥४३॥

गाय दुहनेवाले को कथा

हे प्रभो, लवणाशी की कथा तुमने सुनी। अब गौ दुहनेवाले की कथा सुनो। एक गंवार ग्वाला था। उसके पास एक गाय थी ॥४।।

उसकी वह गाय प्रतिदिन पाँच सेर दूध देती थी। किसी समय उसके घर, एक उत्सव का समय निकट आया ॥४५॥

अब उत्सव के समय ही उसका रोककर इकट्ठा किया हुआ दूब एक साथ दुह लूंगा, यह सोचकर उसने एक महीना पहले से ही दूध दुहुना छोड़ दिया ॥४६॥

उत्सव के दिन, जब वह दूध दुहने के लिए गया, तब उसकी गाय का दूध सूख चुका था। उसकी यह बात लोगों के लिए चिरकाल तक हँसी का कारण बन गई ॥४७॥

मूर्ख गंजे की कथा

मूर्ख ग्वाले की कथा सुनी, अब दूसरे दो मूर्खों की कथा सुनो। एक गंजा, ताँबे के समान लाल और चिकनी खोपड़ीवाला था। एक वृक्ष के नीचे बैठे हुए उसे किसी जवान ने देखा जो भूखा होने के कारण कुछ कैथ लिये हुए उस मार्ग से जा रहा था ।॥४८-४९।।

उसने यों ही हंसी में कैथ से उसके सिर पर प्रहार किया। गंजा उसे सहन कर गया और कुछ न बोला ॥५०॥

तब उस युवक ने, अपने पास के सभी कैथ उसके सिर पर खेल-खेल में दे मारे, खोपड़ी से रक्त बह जाने पर भी, गंजा चुप ही रहा ॥५१॥

वह युवक जवानी के मद में आकर और इस प्रकार के खेल में पड़कर सभी कैथों से हाथ घो बैठा और भूखा ही रह गया और वहाँ से चला गया ॥५२॥

उधर 'मीठे कैथों की चोट भी क्यों न सही जाय', 'इस प्रकार कहता हुआ वह गंजा भी सभी कैथों को लेकर अपने घर चला आया ॥५३॥

घर आकर उसने अपने सिर पर इस प्रकार पट्टी बाँधी, मानों मूर्खता के साम्राज्य की दीक्षा में उसे राजपट्ट बाँधा गया हो। बात खुलने पर वह लोगों के लिए हँसी का पात्र बन गया ।।५४।।

'हे महाराज, मूर्खजन इस प्रकार हँसी के पात्र बनते हैं और अपना कार्य भी सिद्ध नहीं कर पाते। तीक्ष्ण बुद्धिवाले अपनी बुद्धि के प्रभाव से संसार में पूजे जाते हैं' ।॥५५॥

इस प्रकार मूर्खों की हास्य-कथाओं को गोमुख से सुनकर, नरवाहनदत्त ने उठकर दैनिक कृत्य (शौच, स्नान, सन्ध्या आदि) किया ।।५६।।

रात आने पर उत्सुक नरवाहनदत्त से पुनः प्रेरित होकर गोमुख ने, बुद्धिमानी की यह कहानी कही ।॥५७॥

कौवा, कछुआ, मृग और चूहे की कथा¹

किसी वन में एक ओर विशाल सेमल का वृक्ष था। उसमें लघुपाती' नाम का एक कौवा घोंसला बनाकर रहता था ॥५८॥

किसी समय अपने घोंसले में बैठ हुए उसने वृक्ष के नीचे, हाथ में जाल और लाठी लिये हुए एक भयानक पुरुष (बहेलिये) को जाते देखा ॥५९॥

जबतक वह देख ही रहा था कि इतने में वह बहेलिया जाल बिछाकर और वहाँ दाने छींट-कर वहीं छिप गया ॥६०॥

इतने में ही चित्रग्रीव नाम का कबूतरों का सरदार, सैकड़ों कबूतरों के साथ, आकाश में भ्रमण करता हुआ, उधर आ निकला ।।६१।।

जाल में फैले हुए पर्याप्त अन्न-बीजों को देखकर वह अपने साथियों के सहित उस जाल पर उतर आया और अपने साथियों के साथ ही उसमें फंस गया ।॥६२॥

सब कबूतरों को फंसा हुआा देखकर उनका राजा चित्रग्रीव उनसे बोला तुम लोग अपनी-अपनी चोंचों से जाल को पकड़कर वेग में आकाश में उड़ चलो' ॥६३॥

उसकी आज्ञा को स्वीकार करके सभी कबूतर जाल को लेकर कुछ डरते हुए आकाश में उड़ने लगे ॥६४॥

यह देखकर घबराया हुआ वह बहेलिया, ऊपर की ओर आँखें किया हुआ उठा और वहाँ से निराश लौट गया ।॥६५॥

तब निर्भय होकर चित्रग्रीव ने अपने साथी कबूतरों से कहा- 'चलो, अपने मित्र हिरण्यक² चूहे के पास चलें। वह हमारे इन जालों को काटकर हमें मुक्त कर देगा ॥६६॥

ऐसा कहकर और जाल को लेकर उडते हुए वे चित्रग्रीव के मित्र चूहे के बिल के पास पहुंचकर आकाश से उतरे ॥६७॥

'ऐ हिरण्यक, निकल आओ। मैं चित्रग्रीव आया हूँ।' ऐसा कहकर कपोतराज ने उस चूहे को आवाज दी ॥६८॥

चूहा यह सुनकर सौ द्वार के मार्ग से अपने मित्र को आया हुआ देखकर, सौ मुँहवाले अपने उस बिल से बाहर निकल आया ॥६९॥

उनके पास आकर सब वृत्तान्त पूछकर उस सहृदय चूहे ने, चित्रग्रीव और उसके साथियों के जाल काट दिये ॥७०॥

जाल कट जाने पर, अपने स्नेहपूर्ण मीठे शब्दों से, चित्रग्रीव ने, उस चूहे को धन्यवाद दिया और अपने अनुचरों के साथ आकाश में उड़ गया ।॥७१॥

जाल में फंसे कबूतरों के पीछे आया हुआ लघुपाती नाम का कौआ, यह सब देख रहा था। वह बिल में गये हुए चूहे के पास आकर कहने लगा- 'मैं लघुपाती नाम का कौआ हूँ। तुम्हें मित्रस्नेही देलकर, विपत्ति से मित्रों का उद्धार करनेवाले तुमसे मित्रता करना चाहता हूँ' ।॥७२-७३।।

यह सुनकर बिल के बन्दर से ही कौए को देखकर चूहा बोला 'जा। तू मेरा भक्षक है और मैं तेरा भक्ष्य हूँ। मेरी-तेरी मित्रता कैसी?' ॥७४॥

तब वह कौआ बोला- 'ऐसा न कहो। तुम्हें खा लेने पर तो क्षण-भर की तृप्ति होगी और तुम्हारी मित्रता में सदा के लिए रक्षा होगी' ॥७५॥

इस प्रकार की बातें कहकर और शपथपूर्वक विश्वास दिलाकर कहा गया। चूहा बिल से बाहर निकला और उस कौए ने उसके साथ मित्रता कर ली ॥७६॥

तब वह चूहा उसके लिए मांस के टुकड़े लाया और चावल के दाने भी। तब दोनों ने मिलकर वहाँ भोजन किया और सुखपूर्वक बैठकर वार्तालाप किया ॥७७॥

एक बार वह कौआ मित्र चूहे से बोला- 'मित्र, यहाँ समीप ही वन के मध्य में एक नदी है। उस नदी में मेरा मित्र मन्थर नाम का कछुआ है। उसके लिए मैं वहाँ जा रहा हूँ। वहाँ मेरे लिए आमिष-भोजन सुलभ है ।।७८-७९॥

यहाँ रहने से मांस का आहार पाकर भी, मुझे बहेलियों का भय सदा ही बना रहता है।' ऐसा कहते हुए कौए से चूहा बोला ॥८०॥

'यदि ऐसा है, तो हम लोग साथ ही रहेंगे। मुझे भी यहां से कुछ वैराग्य हो गया है। इसका कारण बहीं चलकर रहूँगा ॥८१॥

वह लघुपाती कौबा, इस प्रकार कहते हुए हिरण्यक को अपनी चोंच में लेकर आकाश में उड़ गया और उसे उस वन-नदी के तीर पर ले गया ॥८२॥

वहाँ अपने मित्र मन्थर से मिलकर, और उसका आतिथ्य स्वीकार करके चूहे के साथ वह वहीं रहने लगा ॥८३॥

बातचीत के प्रसंग में कौए ने, अपने आने का कारण उसे बताया और हिरण्यक चूहे की मित्रता का कारण भी उस कछुए से कहा ॥८४॥

तब मन्थर ने भी कौए से प्रशंसित चूहे से मित्रता करके उससे अपने स्थान से वैराग्य होने का कारण पूछा ॥८५॥

तब उन दोनों के सुनते रहने पर हिरण्यक चूहे ने अपना वृत्तान्त इस प्रकार उनसे कहा ।।८६।।

हिरण्यक चूहा और संन्यासी की कथा

एक बार मैं नगर के समीप बड़े बिल में रहता था। वहाँ रहता हुआ मैं राजा के भवन से एक हार ले आया और उसे अपने बिल में रख दिया ॥८७॥

उस हार को देख-देखकर बढ़े हुए बलवाले मुझे अन्न लाने में असमर्थ जानकर दूसरे चूहों ने घेर लिया ॥८८॥

इसी बीच, मेरे बिल के पास एक संन्यासी मठ बनाकर रहने लगा। वह विभिन्न प्रकार के भोजन भिक्षा करके लाता था ।॥८९॥

वह भिक्षु, भोजन से बचे हुए अन्न को प्रातःकाल खाने के लिए एक झोली में डालकर एक खूंटी में लटका देता था ॥९०॥

उसके सोये रहने पर मैं बिल के मार्ग से उसके अन्दर घुसकर और ऊँचे उछल-उछल-कर प्रत्येक रात में उसका भोजन समाप्त कर देता था ॥९१।।

एक दिन उसके यहाँ उसका एक मित्र संन्यासी आ गया। वह संन्यासी अपने मित्र से बातचीत करने लगा ॥९२॥

तब तक अन्न खाने के लिए मेरे वहाँ पहुँचने पर वह संन्यासी फटे हुए बाँस का एक टुकड़ा लेकर और कान लगाकर उस भिक्षा के पात्र को वह बार-बार बजाने लगा ॥९३॥

बीच में बात को काटकर 'यह तुम क्या करते हो', इस प्रकार आये हुए मित्र द्वारा पूछे जाने पर वह संन्यासी उससे बोला- ॥९४॥

'यहाँ एक चूहा मेरा शत्रु हो गया है, जो दूर ऊपर लटकाये हुए अन्न को भी उछल-उछलकर यहाँ से ले जाता है ॥९५॥

इस फटे बाँस से अन्न के बरतन को बार-बार बजाकर मैं उसे डराता हूँ।' इस प्रकार, कहते हुए उस साधु से दूसरा साधु बोला- 'लोभ, प्राणियों के लिए महान् हानिकारक है। इस विषय में कथा सुनो।' मैं एक बार तीर्थो का भ्रमण करता हुआ एक नगर में गया ।।९६-९७।। १०३

वहाँ निवास के लिए एक ब्राह्मण के घर पहुंचा। मेरे बैठने पर वह ब्राह्मण अपनी पत्नी से बोला- ॥९८॥

'आज पर्व का दिन है, इसलिए ब्राह्मण के लिए खिचड़ी पकाओ।' तब उसकी पत्नी ने कहा 'तुम दरिद्र के यहाँ यह कहाँ?' यह सुनने पर उस ब्राह्मण ने पत्नी से फिर कहा- 'प्रिये, संग्रह करने पर भी, अत्यन्त संग्रह करने की बुद्धि नहीं करनी चाहिए। इस विषय में कथा सुनो' ॥९९-१००॥

कहीं जंगल में एक बहेलिया, शिकार करके मांस लिये हुए धनुष-बाण चढ़ाकर एक सूअर की ओर झपट पड़ा ॥१०१॥

और, वाण से आहत सूअर के दाढ़े के अधात से वह स्वयं भी मर गया। दूर से एक सियार यह सब देख रहा था ॥१०२॥

वह वहाँ आया और भूखा होने पर भी, भोजन का संग्रह करने की दृष्टि से उसने सूअर, बहेलिया आदि के प्रचुर परिमाणवाले मांसों को उसने नहीं चखा। उसने पहले धनुष में लगी चमड़े की डोरी को ही खाना प्रारम्भ किया। उसी समय धनुष के हिलने से उससे छूटे हुए बाण से, वह स्वयं विधकर मर गया। इसलिए, अत्ति संग्रह न करना चाहिए। ब्राह्मण के इस प्रकार कहने पर, उसकी पत्नी ने, तिलों को सूखने के लिए धूप में रख दिया। तब उसके घर के भीतर चले जाने पर कुत्ते ने, उसमें मुंह डालकर उन तिलों को भ्रष्ट कर दिया। तब उन तिलों को मूल्य देकर भी किसी ने नहीं खरीदा ॥१०३-१०६॥

'इसलिए, लोभ मे भोग नहीं किया जा सकता। वह तो केवल कष्ट देने के लिए ही होता है।' ऐसा कहकर आये हुए साधु ने उस साधु से कहा- 'तुम्हारे पास कुदाल हो, तो मुझे दो। मैं आज ही तुम्हारे चूहे के इस उपद्रव को दूर कहता हूँ। यह सुनकर मठ-निवासी साधु ने उसे कुदाल लाकर दी और छिपा हुआ मैं अपने बिल में घुस गया ।॥१०७ -१०९॥

तब उस कुदाल को लेकर उस दुष्ट आगन्तुक साधु ने, मेरे आने-जाने के बिल को खोदना प्रारम्भ किया। मेरे भाग जाने पर उस दुष्ट ने क्रमशः वहाँतक खोद डाला, जहाँतक वह हार और अन्य धन-संग्रह उसे मिला। 'देखो मित्र, इसी धन के तेज से उस चूहे को इतना बल था कि उछलकर वह तुम्हारा भोजन खाता था।' ऐसा उसने मठवासी साधु से कहा और मैं सुन रहा था ॥११०-११२॥

इस प्रकार, वह साधु मेरा सर्वस्व लेकर और हार को सिर पर रख लिया। तदनन्तर, दोनों साधु निश्चिन्त होकर सो गये ॥११३॥

उन दोनों के प्रसन्न होकर सो जाने पर भोजन चुराने के लिए पुनः आये हुए मुझे स्थायी साधु ने, जगकर छड़ी से मेरे सिर पर मारा ॥११४॥

उस प्रहार से आहत में बिल में भाग गया, किन्तु भाग्यवश मरा नहीं। उसके पश्चात्, मुझमें उछलकर उसके भोजन लेने की शक्ति नहीं रह गई ॥११५॥

धन ही पुरुषों का यौवन है और धन का अभाव ही बुढ़ापा है। धन के अभाव से मनुष्य का ओज, तेज, बल और रूप नष्ट हो जाता है ॥११६॥

तदनन्तर, केवल अपने पेट भरने का यत्न करने में ही किसी प्रकार समर्थ देखकर मेरे सभी साथी मुझे छोड़कर चले गये ॥११७॥

जीवन-निर्वाह न कर सकनेवाले स्वामी को सेवक, पुष्पहीन वृक्ष को भ्रमर, जल-रहित सरोवर को हंस, चिरकाल तक उसका आश्रय पाकर भी छोड़ देते हैं ॥११८॥

इस प्रकार, वहाँ बहुत समय से ऊबा हुआ मैं, इस लघुपाती कौए की मित्रता पाकर, हे कच्छपश्रेष्ठ, यहां तुम्हारे पास आ पहुँचा ॥११९॥

हिरण्यक के ऐसा कहने पर मन्थरक कछुआ बोला 'मित्र, यह तुम्हारा अपना ही स्थान है। अतः, तुम अधीर न होना ॥१२०॥

गुणी के लिए कोई विदेश नहीं है। सन्तोषी के लिए कोई दुःख नहीं। धैर्यशाली के लिए कोई विपत्ति नहीं और उद्योगी के लिए कोई कार्य असाध्य नहीं ।॥ १२१॥

कछुआ जब इस प्रकार कह ही रहा था कि बहेलिये से डरा हुआ। चित्रांगद नाम का एक हिरण दूर से उस वन में आ पहुँचा ॥१२२॥

उसे देखकर और उसके पीछे बहेलिये को न आते देखकर उसे धीरज बंधाकर कौए, कछुए आदि मित्रों ने उसके साथ भी मित्रता कर ली ॥ १२३॥

परस्पर एक दूसरे की सहायता करते हुए, वे चारों सु-हृदय मित्र, सुखपूर्वक उस वन में साथ ही रहने लगे ॥१२४३॥

एक बार बहुत देर तक चित्रांगद को न आते हुए देखकर, उसे देखने के लिए बह लघुपाती कौआ ऊँचे वृक्ष पर चढ़कर चारों ओर उस वन को देखने लगा ॥१२५॥

और, उसने नदी के एक किनारे पर कील और जाल में बँधे हुए चित्रांगद को देखा। आकर यह समाचार उसने चूहे तथा कछुए से कहा ॥ १२६॥

तब आपस में विचार कर कौआ उस हिरण्यक चूहे को चोंच से पकड़कर बंधे हुए चित्रांगद के पास ले गया ।॥१२७।।

तब हिरण्यक ने, जाल को दाँतों से काटकर क्षण-भर में जाल से बँधे हुए चित्रांगद को मुक्त कर दिया ॥१२८॥

तबतक नदी के मार्ग से आकर मन्धरक कछुख भी उनके पास किनारे पर आकर मिल गया ॥१२९॥

उसी समय जाल बाँधनेवाले बहेलिये ने, आकर मूग, चूहे और कौए के भाग जाने पर उस कछुए को ही पकड़ लिया ॥१३०॥

हिरन के भागने से व्याकुल बहेलिये ने कछुए को जाल में रखकर, उसी से सन्तोष किया और घर की ओर चल पड़ा। उसके चलने पर दूरदर्शी हिरण्यक के परामर्शानुसार वह मृग, कुछ दूर जाकर और गिरकर मुर्दे के समान पड़ गया और कौजा उसके शिर पर बैठकर मानों उसकी आँखें निकालने लगा ॥१३१-१३२ ॥

बहेलिये ने, दूर से हिरन को मरा समझकर और कछुए को जाल-सहित नदी के किनारे रखकर मृग को लेने का प्रयत्न किया ॥१३३॥

उसे दूसरी ओर जाते हुए देखकर चूहे ने जाल काटकर कछुए को मुक्त कर दिया और बह नदी में कूद पड़ा ॥१३४।।

हिरन भी कच्छप को रखकर आते हुए बहेलिये को देखकर छलांग मारकर भागा और कौआ उड़कर वृक्ष पर बैठ गया ॥१३५॥

उधर से निराश लौटकर आये हुए बहेलिये ने, जाल काटकर भागे हुए कछुए को भी न पाकर, दोनों ओर से हताश होकर अपने भाग्य को कोसा और अन्त में वह अपने घर चला गया ।।१३६॥

तब वे चारों मित्र, फिर आपस में मिले और प्रेमी मृग उनसे बोला- ॥१३७।।

मैं भाग्यवान् हूँ कि आपलोग जैसे सच्चे और सहृदय मित्र मुझे मिले, जिन्होंने अपने प्राणों की भी परवाह न करके मुझे मौत के पंजे से उबार लिया ॥ १३८॥

'इस प्रकार, उस हिरन से प्रशंसित वे चारों मित्र कौआ, कछुआ, चूहा और हिरण उस वन में परस्पर प्रेम के साथ सुखी होकर रहने लगे ।।१३९॥

इस प्रकार पशु भी, बुद्धि से अपना कार्य सिद्ध कर लेते हैं। वे भी अपने प्राणों की चिन्ता न करके आपत्ति के समय मित्र को नहीं छोड़ते ॥१४०॥

मित्रों मे परस्पर ऐसी आसक्ति, कल्याणकारी होती है; किन्तु यह ईर्ष्या के कारण स्त्रियों में प्रशंसनीय नहीं होती। इस सम्बन्ध में कथा सुनो, ।॥१४१॥

ईर्ष्यालु पुरुष और उसकी दुष्टा स्त्री को कथा

किसी नगर में कोई ईर्ष्यालु पुरुष था। उसकी स्त्री बहुत रूपवती थी और उसे बहुत प्यारी थी ॥ १४२॥

वह अविश्वासी पति उसे कभी अकेला नहीं छोड़ता था। वह चित्रस्थ पुरुषों से भी उसके चरित्र के पतन की आशंका करता या ॥ १४३॥

एकबार किसी आवश्यक कार्य से वह पुरुष, पत्नी को साथ ही लेकर दूसरे देश को गया।। १४४।।

आगे के जंगली मार्ग में वह भीलों को देखकर भय से अपनी पत्नी को एक गाँव के बूढ़े ब्राह्मण के घर में रखकर उस जंगल में गया ।॥ १४५।।

उस ब्राह्मण के घर रहती हुई उस स्त्री ने उस मार्ग से भीलों को जाते हुए देखा और एक युवा भील के साथ वह निर्लज्ज स्त्री, ईर्ष्यालु पति को छोड़कर इस प्रकार निकल भागी, जैसे वेगवती नदी बाँध तोड़कर निकल जाती है ।। १४६-१४७।।

जब उसका पति, अपना कार्य समाप्त करके वहाँ आया, तब उसने उस ग्रामीण वृद्ध से अपनी स्त्री की माँग की ॥१४८॥

'मैं नहीं जानता कि वह कहाँ गई, इतना अवश्य है कि यहाँ कुछ भील आये थे, सम्भवतः वे ही उसे ले गये हों। भीलों का वह गाँव भी यहीं पास में है। शीघ्र जाओ। तुम्हें स्त्री मिलेगी। मेरे प्रति कुछ विपरीत बुद्धि न करो' ।॥१४९-१५०।।

ब्राह्मण से इस प्रकार कहा गया वह रोता-कलपता और अपनी बुद्धि की निन्दा करता हुआ भीलों के गाँव में गया और वहाँ जाकर उसने अपनी पत्नी को भी देखा ॥१५१॥

वह पापिन स्त्री भी, उसे देखकर डरी हुई-सी उसके पास आकर बोली-'मेरा अपराध नहीं है। मुझे भील बलपूर्वक ले आया ॥१५२॥

'चलो जबतक कोई देखता नहीं, वहाँ गांव में चले। इस प्रकार कहते हुए उस प्रेमान्ध पति से वह बोली-॥१५३॥

'शिकार पर गये हुए उस भील के आने का समय हो गया है। आने पर वह पीछे दौड़कर मुझे और तुझे दोनों को मार डालेगा ॥१५४।।

इसलिए, इस गुफा में घुस कर बैठो। रात में सोये हुए उसे मारकर निडर होकर चलेंगे' ॥१५५॥

उस दुष्टा स्त्री से इस प्रकार कहा गया वह मूर्ख उसी गुफा में घुसकर बैठ गया; क्योंकि काम से अन्धे व्यक्ति के हृदय में विवेक के लिए स्थान नहीं होता ।।१५६।।

उस दुष्टा स्त्री ने, सायंकाल घर पर आये हुए उस भील को, दुर्व्यसन के कारण, आया हुआ अपना पति दिखा दिया ॥१५७।।

उस क्रूर और पराक्रमी भील ने उसे गुफा के बाहर निकालकर, प्रात. काल देवी की बलि देने के लिए, एक पेड़ में कसकर बाँध दिया ॥१५८॥

और, भोजन करके रात में उसके देखते-ही-देखते उसकी स्त्री के साथ व्यभिचार किया। तदुपरान्त, उसे साथ लेकर आनन्द से सो गया ।।१५९।।

पेड़ से बंधे हुए उस ईर्ष्यालु पुरुष ने, उस भील को सोये हुए देखकर चंडी की स्तुति करके अत्यन्त दीन भाव से शरण की प्रार्थना की ॥१६०॥

चंडी ने प्रकट होकर उसे वरदान दिया, जिससे वह बंधनों से मुक्त हो गया। तदनन्तर, उसी की तलवार से ईर्ष्यालु ने भील का शिर काट दिया और अपनी स्त्री को जगाकर चलने के लिए कहने लगा। वह भी उठी और दुःख से उसके साथ जाने को तैयार हुई ॥१६१-१६२॥

वह दुष्टा, उस भील के कटे शिर को चुपके से अपने संग लेकर पति के साथ चल पड़ी। रात के अंधेरे में वह ईष्र्यालु अपनी दुष्ट स्त्रों की यह चाल देख नहीं सका ॥१६३॥

प्रातःकाल किसी नगर में पहुँचकर वहाँ वह भील का शिर दिखाकर और पति को हत्यारा बताकर रोने-चिल्लाने लगी ।।१६४।।

तब नगर के रक्षक (सिपाही) इस स्त्री को उसके पति के साथ राजा के सामने ले गये । वहाँ पूछे जाने पर उसने सच्चा समाचार राजा को सुना दिया ॥ १६५॥

तदनन्तर, उस देश के राजा ने, यथार्थ बात का पता लगाकर उस दुष्टा स्त्री के नाक-कान कटवा दिये और उसके पति को छोड़ दिया ॥१६६॥

बह उसका पति भी, उस दुष्ट स्त्री के स्नेह-रूपी ग्रह से छूटकर किसी प्रकार अपने घर आया। 'महाराज, ईर्ष्या से पागल स्त्री इस प्रकार के कांड कर डालती है ।। १६७।।

पुरुष की यह ईर्ष्या ही स्त्री को पर पुरुष का संग कराना सिखाती है। इसलिए, ईर्ष्या को छिपाकर ही बुद्धिमान् पुरुष को नारी की रक्षा करनी चाहिए ॥१६८॥

और अपना भला चाहनेवाले पुरुष को अपनी गुप्त बात कदापि स्त्री से प्रकट नहीं करनी चाहिए।' इस विषय पर एक कथा सुनो ॥१६९॥

नाग और गरुड की कथा

कहीं पर एक नाग, मनुष्य का रूप धारण करके, गरुड के भय से भागकर भूमि पर आकर किसी वेश्या के घर में रहता था ॥ १७०।।

वेश्या ने उससे प्रतिदिन का मूल्य पाँच सौ हाथी माँगा। वह नाग भी, अपने प्रभाव से उसे प्रति दिन पाँच सौ हाथी देता या ॥१७१॥

एकबार उस वेश्या ने नाग से बड़े ही आग्रह के साथ पूछा कि 'तुम्हें प्रति दिन इतने हाथी 'कहाँ से मिलते हैं, सच बताओ और यह भी कहो कि तुम कौन हो ?' ॥१७२।।

किसी से कहना नहीं, गरुड़ के भय से यहाँ ठहरा हुआ में नाग हूँ।' काम-मोहित उस नाग ने इस प्रकार अपना रहस्य उसे बता दिया ॥१७३॥

तब उस वेश्या ने, यह बात एकान्त में अपनी माँ (कुट्टनी) से कह दी। कुछ दिनों के पश्चात् दैवयोग से पुरुष के वेश में, नागों को ढूंढ़ता हुआ गरुड भी वहाँ आ पहुंचा और कुट्टनी के पास जाकर बोला कि आज मैं तुम्हारी बेटी के पास रहना चाहता हूँ, मुझसे मूल्य ले लो ॥१७४-१७५॥

कुट्टनी ने उससे कहा-'यहाँ एक नाग रहता है, जो प्रतिदिन पाँच सौ हाथी देता है। तो एक दिन के मूल्य का क्या होता है'।।१७६।।

तब गरुड ने, वहाँ पर ठहरे हुए उस नाग को जानकर अतिथि के रूप में वेश्या के घर में प्रवेश किया ॥१७७।।

वहाँ भवन के ऊपर बैठे हुए नाग को उसने देखा और अपने को प्रकट कर वह उछला और उस नाग को मारकर खा गया ।॥ १७८॥

'इसलिए, बुद्धिमान् व्यक्ति निरंकुश होकर स्त्रियों को कोई भी अपना गुप्त भेद न बतावे' ऐसा कहकर गोमुख ने फिर मूर्खों की कथा कहनी प्रारम्भ की। ॥१७९॥

केशमूर्ख की कथा

एक गंजा ताम्रघट (तांबे के घड़े) के पेदे के समान सपाट शिरवाला था। किन्तु वह मूर्ख धनी था और शिर पर केश न होने के कारण समाज में लज्जित होता था ।॥१८०॥

कुछ दिनों के पश्चात् उसका एक धूर्त अनुजीवी आकर उससे बोला- 'एक वैद्य हैं, जो केशों को उत्पन्न करने की ओषधि जानता है' ॥१८१॥

यह सुनकर वह गंजा धनी बोला- 'यदि तुम उस ओषधि को मुझे ला दो, तो मैं तुम्हें और वैद्य को भी धन दूंगा' ॥१८२॥

यह सुनकर चिरकाल तक उसका धन खाकर वह धूर्त्त उसके लिए एक धूर्त्त वैद्य को ले आया ॥१८३॥

बहुत दिनों तक उस मूर्ख का धन खाकर उस धूर्त्त वैद्य ने, किसी युक्ति से अपनी पगड़ी हटाकर उस मूर्ख को अपना भी गंजा शिर दिखलाया ॥१८४।।

वैद्य को गंजा देखकर भी उस मूर्ख ने उससे केश उगाने की ओपधि मांगी। तब वैद्य ने उस मूर्ख से कहा-'मैं स्वयं गंजा, दूसरों के शिर पर केश कैसे उगा सकता हूँ। हे मूर्ख, इसीलिए तुझे मैंने अपना गंजा शिर दिखाया था ।।१८५-१८६।।

तब भी तुम नहीं समझ रहे हो, धिक्कार है तुम्हें।' इस प्रकार कहकर वह वैद्य चला गया। 'हे स्वामिन्, धूर्त लोग इसी प्रकार मूखों से खेला करते हैं ।॥१८७॥

तैलमूर्ख की कथा

यह तो केशमूर्ख की कथा हुई अब तैलमूर्ख की कथा सुनो। किसी सज्जन के यहाँ एक मूर्ख सेवक थः ॥१८८॥

उसे मालिक ने बनिये के पास तेल लाने के लिए भेजा। वह एक पात्र में बनिये से तेल लेकर चला ॥१८९।।

जब वह तैल का पात्र लेकर इधर आ रहा था, तब उसके किसी मित्र ने उससे कहा-'देखो, ध्यान दो। तेल का पात्र नीचे से चू रहा है' ।। १९०।।

यह मुनकर उसने नीचे का भाग देखने के लिए उस पात्र को उलटा दिया और सारा तेल भूमि पर गिर पड़ा ॥१९१॥

यह देखकर लोग उसे हँसने लगे और स्वामी ने भी उसे नौकरी से निकाल दिया। इसलिए, मूर्ख की अपनी बुद्धि ही अच्छी, उसे उपदेश न देना चाहिए ।॥ १९२॥

अस्थिमूर्ख की कथा 

तैलमूर्ख की कथा सुनी, अब अस्थिमूर्ख की कथा सुनो। एक मूर्ख पुरुष था और उसकी स्त्री व्यभिचारिणी थी ॥ १९३॥

एक बार वह मूर्ख किसी कार्यवश दूसरे देश को गया। तब उसकी दुष्टा स्त्री ने, अपने घर में काम करनेवाली सेविका को सिखा-पढ़ाकर अपना विश्वासी बना लिया और उसे सदा के लिए अपनी सेविका बनाकर अपने जार के साथ वह निश्चिन्तता पूर्वक रमण करने लगी और उसके (दासी के) घर पर जा बैठी ॥१९४-१९५॥

कुछ समय पश्चात् पर आये हुए उसके पति को पहले से ही सिखाई-पढ़ाई हुई दासी ने आँसुओ के साथ गद्गद स्वर में कहा- 'तुम्हारी पत्नी मर गई और फूंक भी दी गई।' ऐसा कहकर उसने उसे श्मशान में ले जाकर उसके दाहस्थान को दिखा दिया और दूसरे की एकत्र की हुई अस्थियां भी उसकी पत्नी की बताकर दिखा दीं। वह मूर्ख, उन हड्डियों को लेकर रोने लगा ।।१९६-१९७।।

तदनन्तर., उसका पिड आदि कर्म करके और उसकी हड्डियों को किसी तीर्थ में प्रवाहित करके वह मूर्ख उसकी श्राद्ध-क्रिया में लग गया ।॥१९८॥

उसी दासी से अच्छा सदाचारी ब्राह्मण कहकर लाये हुए पत्नी के जार को ही उसने श्राद्ध का ब्राह्मण बनाया और खिलाने लगा ॥ १९९॥

उसकी स्त्री भी प्रतिमास अपने यार के साथ आकर अपने पति के यहाँ बने सुन्दर पदार्थों का भोजन करती थी ॥ २००॥

और वह दासी उस अस्थिमूर्ख से कहती थी- 'स्वामिन्, आपकी पत्नी, सती-धर्म के प्रभाव से, परलोक से आकर ब्राह्मण के साथ बैठकर स्वयं तुम्हारे यहाँ भोजन करती है' ॥२०१॥

वह मूर्खराज, यह सब सच मानकर प्रसन्न हो गया। इसी प्रकार, सीधे-सादे हृदयवाले लोग दुष्ट स्त्रियों द्वारा खेल-खेल में ही ठगे जाते हैं। 'महाराज, तुमने अस्थिमूर्ख की कथा सुनी, अब एक मूर्खा चंडाली की कथा सुनो' ॥२०२-२०३॥

मूर्ख चण्डालकन्या की कथा

एक मूर्ख और सुन्दरी चंडालकन्या थी। उसने सबसे बड़े पति की प्राप्ति के लिए मन में संकल्प किया ॥२०४।।

उसने किसी समय नगर-भ्रमण के लिए निकले राजा को देखकर उसे पति बनाने के लिए उसके पीछे चलना प्रारम्भ किया ॥२०५॥

इतने में ही उस मार्ग से एक मुनि आया। राजा उतरकर उसके चरणों में प्रणाम करके फिर हाथी पर सवार हो गया और चला गया ॥ २०६॥

यह देखकर, उस मुनि को, राजा से भी, उत्तम समझकर, वह कन्या, उस मुनि के पीछे चल पड़ी ॥२०७॥

उस मुनि ने भी, मार्ग में आये हुए एक शिवालय को देखा, वहाँ भूमि पर घुटने टेककर शंकरजी को प्रणाम करके वह आगे की ओर चला ॥२०८॥

उस चंडालकन्या ने, उस मुनि से भी, शिवजी को उत्तम समझकर, मुनि को, छोड़ शिवलिंग को पकड़ लिया ॥ २०९॥

कुछ ही समय पश्चात् वहाँ पर एक कुत्ते ने आकर और देवता के चबूतरे पर चढ़कर, टाँगें उठाकर अपनी जाति के स्वभाव का काम किया। (अर्थात्, शिवलिंग पर मूत्र-त्याग कर दिया) ।॥२१०॥

यह देखकर उस चंडालिनी ने, कुत्ते को, शिवजी से भी उत्तम समझकर पति बनाने की इच्छा से उस कुत्ते का पीछा किया ॥२११॥

वह कुत्ता, अपने परिचित एक चंडाल के घर में घुसकर, एक युवा चंडाल के पैरों में प्रेम से लोटने लगा ॥२१२॥

यह देखकर वह चंडालकन्या, कुत्ते से भी अधिक अपनी जाति के चांडाल को बड़ा मान कर, अर्थात् उसे सब से बड़ा मानकर, पति बनाकर संतुष्ट हुई ।॥ २१३॥

गोमुख ने, नरवाहनदत्त से कहा- 'स्वामिन्, इस प्रकार बहुत ऊँचे चढ़ने की चेष्टा करनेवाले मूर्ख फिर अपने ही स्थान पर आकर गिरते हैं। इसी प्रसंग में, एक मूर्ख कृपण राजा की कथा सुनो' ।॥२१४।।

कृपण राजा की कथा

एक मूर्ख राजा था। वह धनवान् होते हुए भी अति कृपण था। एक बार उसके हितैषी मन्त्रियों ने उससे कहा- 'स्वामिन्, इस लोक में किया गया दान परलोक की दुर्दशा को दूर करता है। इसलिए, दान दो; क्योंकि जीवन और धन दोनों नाशवान् हैं ।॥२१५-२१६॥

यह सुनकर राजा कहने लगा कि 'मैं दान तब दूंगा, जब मरकर अपने को कष्ट में पड़ा हुआ देखूंगा' ।॥२१७॥

तब यह सुनकर मन ही मन हँसते हुए मन्त्री लोग चुप बैठ गए। इस प्रकार, मूर्ख तबतक धन को नहीं छोड़ता, जबतक घन उसे नहीं छोड़ता ॥२१८॥

दो मित्रों की कथा

'महाराज, मूर्ख राजा की कथा सुनी। अब बीच में दो मूर्ख मित्रों की कथा सुनिए। कान्यकुब्ज देश में चन्द्रापीड नाम का एक राजा या ॥२१९॥

उसका धवलमुख नाम का एक सेवक था। वह सदा बाहर से ही खा-पीकर घर में आता था। एक दिन उसकी स्त्री ने उससे पूछा कि तुम प्रतिदिन बाहर कहाँ से खा-पीकर आते हो ? तब धवलमुख ने कहा- हे सुन्दरी, मैं सदा अपने मित्र के यहाँ से खा-पीकर आता हूँ। मेरे दो मित्र हैं ॥ २२०-२२२॥

उनमें एक, कल्याणवर्मा नाम का मित्र सदा ही भोजन आदि से मेरा उपकार करता है। दूसरा, वीरबाहु नाम का मित्र है, जो अपने प्राणों से भी मेरा उपकार करता है ॥ २२३॥

उसके इस प्रकार कहने पर उसकी स्त्री ने उससे कहा- तुम उन दोनों मित्रों को मुझे दिखाओ' ॥२२४।।

तदनन्तर, वह धवलमुख, स्त्री के साथ कल्याणवर्मा के घर गया और उसने बहुमूल्य सामान में उनका स्वागत सत्कार किया ।।२२५॥

तब दूसरे दिन, धवलमुख, अपनी पत्नी के साथ वीरबाहु के पास गया। जूआ खेलते हुए उसने धवलमुख और उसकी स्त्री का साधारण स्वागत करके उसे विदा कर दिया ॥ २२६॥

तब धवलमुख की स्त्री ने उससे आश्चर्य के साथ कहा- 'कल्याणवर्मा ने तो तुम्हारा बहुत आतिथ्य-सत्कार किया ॥ २२७॥

किन्तु, वीरबाहु ने बहुत साधारण स्वागत किया। इसलिए, तुम वीरबाहु को कल्याणवर्मा से अधिक स्वागत-सत्कार करनेवाला (प्राण देनेवाला) क्यों मानते हो?' ॥२२८॥

यह सुनकर, धवलमुख अपनी पत्नी से बोला कि तू जाकर, योंही उनकी परीक्षा लेने की दृष्टि से उन दोनों से कह दे कि 'राजा अकस्मात् ही हमारे लिए क्रुद्ध हो गया है।' उसके बाद स्वयं ही तुझे सब मालूम हो जायगा ॥२२९॥

धवलमुख से इस प्रकार कही गई उसकी स्त्री ने जैसे ही जाकर उसके दोनों मित्रों से कह दिया ॥२३०।।

उसने पहले कल्याणवर्मा से कहा, तो वह सुनते ही कहने लगा- 'मैं बनिया का पुत्र हूँ। तुम्हीं बताओ, मैं राजा का क्या करूँ?' उससे इस प्रकार कही गई वह स्त्री उसके बाद वीरबाहु के पास गई ॥२३१॥

उससे भी उसने उसी प्रकार पति से राजा के अप्रसन्न होने की बात कही। यह सुनते ही वीरबाहु, ढाल-तलवार लेकर दौड़ता हुआ धवलमुख के पास आया ।। २३२॥

तब धवलमुख ने वीरबाहु को यह कहकर शान्त किया और घर को लौटाया कि 'मंत्रियों ने समझाकर राजा का क्रोध शान्त कर दिया' ।॥ २३३॥

तब धवलमुख ने अपनी स्त्री से कहा- 'प्यारी, तूने मेरे इन दोनों मित्रों का अन्तर देखा !' यह सुनकर उसकी स्त्री सन्तुष्ट हुई ॥२३४।॥

इस प्रकार बाहरी शिष्टाचार (दिखावा) करनेवाले मित्र दूसरे होते हैं और सच्चे मित्र दूसरे। चिकनाहट समान होने पर भी तेल, तेल है, और घी, घी ही है।॥ २३५॥

गोमुख मन्त्री इस प्रकार मूर्खो की कथा सुनाकर नरवाहनदत्त से फिर बोला ॥२३६॥

जलभीत मूर्ख की कथा

एक मूर्ख पथिक ने प्यास से व्याकुल हो, किसी प्रकार बीहड़ जंगल पार कर नदी के किनारे पहुंचकर भी पानी नहीं पिया और वह केवल जल की ओर ही देखता रहा ॥२३७॥

'प्यासे होकर भी पानी क्यों नहीं पी रहे हो?' किसी के इस प्रकार उससे पूछने पर वह मूर्ख बोला- 'इतना पानी मैं कैसे पिऊँ' ? ॥२३८॥

'यदि तू सब पानी न पियेगा, तो क्या राजा तुझे दंड देगा?' इस प्रकार उसके द्वारा मजाक करने पर भी उस मूर्ख ने पानी नही पिया ॥ २३९॥

इस प्रकार जिस कार्य को सम्पूर्ण रूप से किया जा सकता है, उसे मूर्ख अंश मात्र भी नही कर पाते ॥ २४०॥

पुत्रवाती मूर्ख की कथा

'इस प्रकार जलभीत मूर्ख की कथा सुनी, अब महाराज, पुत्रवती की कथा सुनो। बहुत पुत्रोंवाला एक दरिद्री पुरुष था। उसने एक पुत्र के मरने पर, दूसरे पुत्र को, स्वयं मार डाला लोगों के पूछने पर कि 'तूने इस पुत्र को क्यों मार डाला?' उसने उत्तर दिया कि 'यह वच्चा अकेले कैसे रहता ? इसलिए, उसे दूसरा साथी भी दे दिया ' ॥२४१-२४२॥

यह सुनकर उसकी निन्दा और हंसी करके लोगों ने उसे गाँव से निकाल दिया। इस प्रकार, विचारहीन पुरुष और पशु दोनों ही समान होते हैं।॥२४३॥

भ्रातृमूर्ख की कथा

'हे राजन्, तुमने पुत्रघाती की कथा सुनी, अब भ्रातृमूर्ख की कथा सुनो।' एक मूर्ख कुछ लोगों की मंडली में बैठकर बात कर रहा था। इतने में किसी अच्छे पुरुष को दूर से ही आते देखकर वह बोला- 'यह मेरा भाई होता है।' इसका धन में हिस्सेदार के रूप में हरण करता हूँ। परन्तु इसके साथ मेरा कोई सम्बन्ध नहीं हैं। ऐसा कहते हुए उस मूर्ख ने पत्थरों को भी हँसा दिया ॥२४४--२४६।।

'हे स्वामिन्, इस प्रकार मूर्ख की मूर्खता और स्वार्थ से अन्धे व्यक्ति की अति विचित्रता होती है। इस प्रकार आपने भ्रातृमूर्ख की कथा सुनी। अब ब्रह्मचारी के पुत्र की कथा सुनो ॥२४७॥

ब्रह्मचारी पुत्र की कथा

अपने-अपने पिताओं का व्याख्यान करते हुए मित्रों के बीच, एक मूर्ख अपने पिता की प्रशंसा करते हुए बोला- 'मेरे पिता बालब्रह्मचारी हैं'। यह सुनकर उसके मित्र बोले-'तब तू किससे उत्पन्न हुआ?' 'मैं उनका मानसपुत्र हूँ'- ऐसा कहते हुए उस मूर्खराज ने, सबको खूब हंसाया ॥२४८-२५०।।

मूर्ख व्यक्ति इस प्रकार बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बोलते हैं। राजन्, तुमने ब्रह्मचारी के पुत्र को सुना, अब एक ज्योतिषी को भी सुनो ॥ २५१॥

मूर्ख ज्योतिषी की कथा

एक अनपढ़ ज्योतिषी था। जीविका के अभाव में वह अपनी स्त्री और पुत्र को साथ लेकर चल पड़ा। दूसरे देश में जाकर बनावटी विश्वास दिलाकर वह अपने धन और यश की डींग हांकने लगा ।। २५२-२५३॥

एक बार बहुत लोगों के सामने, अपने लड़के को गोद में लिटाकर वह रोने लगा। लोगों के पूछने पर उस पापी ने कहा- ॥ २५४।।

'मैं भूत, वर्तमान और भविष्य ये तीनों काल जानता हूँ। मेरा यह पुत्र आज से सातवें दिन मर जायगा। इसलिए रोता हूँ ॥ २५५॥

ऐसा कहकर और लोगों को आश्चर्य में डालकर, सातवाँ दिन आने पर, उसने प्रातः-काल ही सोये हुए अपने पुत्र को गला घोंटकर मार डाला ।। २५६।।

इस प्रकार बालक के मरने पर ज्योतिषी को त्रिकालदर्शी मानकर विश्वस्त जनता ने धन से उसकी पूजा की और वह इस प्रकार धन कमाकर, अपने घर आ गया ।॥२५७७॥

इस प्रकार धन के लोभ से झूठी पंडिताई का प्रचार करने के इच्छुक मूर्ख व्यक्ति, अपने पुत्र तक की हत्या कर डालते हैं। अतः, बुद्धिमान् पुरुष को उनसे स्नेह न करना चाहिए ॥२५८॥

क्रोधी मूर्ख की कथा

महाराज, एक और मूर्ख की कथा सुनो। एक पुरुष मूर्ख और अतिक्रोधी था। किसी पुरुष ने घर के भीतर में अपने एक व्यक्ति से बाहर से किसी के सुनते हुए उसके गुणों की प्रशंसा की। तब एक बोला- 'यह ठीक है, किन्तु उसमें दो दोष हैं; क्योंकि वह बड़ा साहसी और क्रोधी है।' बाहर खड़े हुए उस क्रोधी ने, यह सुनकर और एकाएक अन्दर घुसकर कहनेवाले उस पुरुष का गला उसके ही कपड़े से बाँधकर आक्षेप करते हुए कहा- 'अरे जालिम, मेरा क्या साहस है और मैंने क्या क्रोध किया' ? ॥२५९-२६३॥

तब हँसते हुए दूसरे लोगों ने कहा- 'तू तो साहस और क्रोध दोनों ही एक साथ सामने दिखा रहा है।' इस प्रकार प्रत्यक्ष कार्य करते हुए भी मूर्ख, उसको नहीं समझते ।।२६३-२६४।।

एक मूर्ख राजा की कथा

अब कन्या को बढ़ानेवाले पिता की कहानी सुनो। एक राजा था, उसके यहाँ एक सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई ।।२६५।।

वह अत्यन्त स्नेह के कारण, शीघ्र ही उस कन्या को बड़ा करने के लिए उत्सुक था। उसने वैद्यों को बुलाकर उनसे प्रेमपूर्वक कहा ।।२६६।।

आप लोग ऐसी अच्छी ओषधि का प्रयोग कीजिए कि जिससे यह कन्या, शीघ्र ही बढ़ जाय और किसी अच्छे पति को दे दी जाय ॥ २६७।।

यह सुनकर, वे वैद्य, उस मूर्ख राजा से धन ऐंठने के लिए बोले- 'महाराज, दवा तो है; किन्तु वह यहाँ से दूर देशों में मिलती है ॥ २६८॥

जबतक हमलोग उसे मंगाते हैं, तबतक यह कन्या अदृश्य (छिपाकर) रखी जाय। ओषधि का ऐसा ही विधान है' ।॥ २६९।।

ऐसा कहकर उन्होंने ओषधि-प्राप्ति की आशा में कन्या को अनेक वर्षों तक गुप्त रखा ।।२७०।।

जब कन्या यौवनावस्था में आ गई, तब उन्होंने उसे ओषधि से बढ़ी हुई बताकर राजा को दिखाया और उससे पर्याप्त धन ऐंठ लिया ॥२७१॥

राजा ने भी, उन वैद्यों को धन से भरपूर कर दिया। महाराज, ऐसे बहानों से, घूर्त्तजन, धनियों को लाते हैं।॥२७२॥

अधेले के लिए दस पैसे खर्च करनेवाले मूलं कंजूस की कथा

और भी, अधेले को प्राप्त करने में पंडित, एक मूर्ख की कथा सुनो। किसी नगर में अपने को बहुत चतुर माननेवाला एक मूर्ख था ।॥ २७३।।

उसके यहाँ गाँव के रहनेवाले एक पुरुष ने एक वर्ष तक नौकरी करके जीविका निर्वाह न होने के कारण (वेतन न मिलने से) नौकरी छोड़ दी और वह अपने घर चला गया ॥ २७४।॥

उसके चले जाने पर उसने अपनी स्त्री से कहा- 'वह तो गया, पर तुमसे कुछ ले तो नहीं गया ? उसने कहा- 'हाँ, एक अघेला ले गया है' ।॥२७५॥

तब वह दस पैसे मार्ग-व्यय में खर्च करके, नदी किनारे उसके घर पर जाकर, अधेला उससे वसूल करके ले आया ।।२७६॥

और, लोगों के सामने अपनी आर्थिक चतुरता का वर्णन करता हुआ हंसी का पात्र बन गया ।। २७७।।

समुद्र की लहरों में निशान लगानेवाले की कथा

जब एक चिह्नकर्ता की कथा सुनो। समुद्री नाव से यात्रा करते हुए किसी मूर्ख का एक सोने का बरतन समुद्र में गिर गया। उस मूर्ख ने, वहाँ पर लहरों और जल के भंवरों पर मन ही-मन निशान (चिह्न) लगा लिया और यह सोचा कि 'लौटते समय यहाँ से बरतन निकाल लूंग।' जब वह उघर से लौटा, तब पानी में अपने चिन्हों का स्मरण करके बरतन निकालने के लिए समुद्र में कूद पड़ा। लोगों के पूछने पर अपना अभिप्राय बताने पर उसकी हँसी हुई और लोगों ने उसे मूर्ख बनाकर धिक्कारा ॥२७८-२८१॥

मांस के बदले में मांस देनेवाले राजा की कथा 

अब बदले में मांस देनेवाले एक राजा की कथा सुनो। एक राजा ने महल से दो व्यक्तियों को देखा, उनमें एक ने रसोईघर से मांस चुरा लिया था। राजा ने आज्ञा देकर उसके शरीर से पाँच पल (२० तोला) मांस कटवा लिया। मांस काटने पर उसे रोते-बिलखते और भूमि पर लोटते देखकर राजा को दया आ गई और उसने द्वारपाल को आज्ञा दी कि पाँच पल मांस काट लेने से इसकी वेदना शान्त नहीं हो रही है, इसलिए इसे एक पाव से अधिक मांस दे दो ॥२८२-२८६॥

'महाराज, गला काट लेने पर सौ गले देने पर भी क्या पुरुष फिर जी सकता है' ऐसा कहकर बाहर जाकर और पेट पकड़कर द्वारपाल खूब हँसा ॥२८७आ

और, आश्वासन देकर उसे काटा हुआ मास लौटाकर वैद्यों को सौप दिया। सच है, मूर्ख राजा दंड देना और कृपा करना भी नहीं जानते ॥२८८॥

एक को मारकर दूसरा पुत्र चाहनेवाली स्त्री की कथा

अब दूसरा पुत्र चाहनेवाली मूर्ख स्त्री की कथा सुनो। एक पुत्र के रहने पर भी दूसरे पुत्र को चाहनेवाली और उसके लिए उपाय पूछनेवाली एक स्त्री को एक पाखंडिन नीच तपस्विनी ने कहा-'तुम्हारा जो जीवित बालक है, उसे मारकर यदि देवता की बलि दी जाय, तो निश्चित तुम्हारा दूसरा पुत्र होगा।' उसके इस प्रकार कहने पर जब वह स्त्री, वैसा ही करने को तैयार हुई, तब इस बात को जानकर उसकी हितैषीणी एक वृद्धा स्त्री ने एकान्त में उससे कहा-'अरी पापिन, जीवित पुत्र को तो मारना चाहती है और जो अभी हुआ नहीं, उसे जीवित रखना चाहती है! ॥२८९--२९२॥

यदि वह दूसरा पुत्र भी न हुआ, तो क्या करेगी (इस एकमात्र पुत्र से भी हाथ धो बैठेगी)।' इस प्रकार पुत्र का वध करती हुई उस मूर्ख स्त्री को, उस वृद्धा और भली स्त्री ने बचा दिया ॥२९३॥

इसी प्रकार शाकिनी (डाकिनी) आदि के चक्कर में पड़कर स्त्रियाँ नष्ट हो जाती हैं। और, वृद्धा स्त्रियों के नियन्त्रण और उपदेश से वे रक्षित होती हैं ।॥२९४।।

एक मूर्खसेवक की कथा

स्वामिन्, अब आंवले लानेवाले की कथा सुनो। किसी धनी गृहस्थ का एक मूर्ख सेवक था। आंवले के प्रेमी उस गृहस्थ ने सेवक से कहा- 'जाओ, उद्यान से मीठे-मीठे आँवले ले आओ।' वह मूर्ख, एक-एक आंवले को दाँतों से काट-काटकर और चख-चख कर ले आया और बोला-'स्वामी, मैं एक-एक आँवले को चख-चखकर और मीठे-मेठे देखकर लाया हूँ' ॥२९५- २९७।।

स्वामी ने भी उन जूठे आंवलों को उस मूर्ख सेवक के साथ ही छोड़ दिया। (अर्थात्, आँवले फेंक दिये और सेवक को निकाल दिया) ॥२९८॥

इस प्रकार मूर्ख व्यक्ति, अपनी और अपने स्वामी की भी हानि करता है। इसी प्रसंग में दो भाइयों की कथा सुनो ॥२९९॥

दो बन्धुओं की कथा

पाटलिपुत्र नगर में दो भाई रहते थे। बड़ा यज्ञसोम और छोटा कीर्तिसोम था। उन दोनों भाइयों के पास पिता का बहुत धन था। दोनों ने, आपस में, पिता के धन का बंटवारा कर लिया था और कीर्त्तिसोम अपने धन को ब्याज-बट्टे में लगाकर बढ़ाता था। यज्ञसोम ने खा-पीकर और ले-देकर अपने धन को समाप्त कर दिया। तब निर्धन होने पर यज्ञसोम अपनी पत्नी से बोला- ।।३००-३०२॥

'प्रिये, मैं निर्धन होकर भी इस समय अपने सगे-सम्बन्धियो में कैसे रहें। इसलिए चलो, कहीं दूसरे देश में चलें ॥३०३॥

उसकी पत्नी ने कहा- 'मार्ग में खाने-पीने आदि के व्यय के विना कैसे चलें।' उसके इस प्रकार कहने पर भी जब वह हठ करने लगा, तब उसकी पत्नी ने उससे कहा- 'यदि जाना ही अवश्यक है, तो जाकर अपने छोटे भाई कीर्त्तिस्रोम से कुछ आवश्यक व्यय के लिए घन माँगो' ।॥३०४-३०५।।

तब यज्ञसोम ने, जाकर कीर्ति सोम से मार्ग-व्यय के लिए कुछ धन माँगा, तो उसकी (कीर्ति सोम की) पत्नी ने उससे कहा- 'अपना सब धन नष्ट कर देनेवाले इसे हम कहाँ से और कितना धन देंगे ? जो भी निर्धन हो जायगा, वही हमसे इस प्रकार घन माँगने लगेगा ॥३०६-३०७।।

यह सुनकर उस कीर्ति सोम ने, भाई के स्नेह से देना चाहते हुए भी, स्त्री के भय से, उसे कुछ नहीं दिया। इस प्रकार, दुष्ट स्त्रियों के वश में होना भी कष्टप्रद ही होता है ॥३०८॥

तब यजसोम ने यह सब समाचार पत्नी से कहा और ईश्वर की शरण होकर वह घर से निकल पड़ा ॥३०९।।

वह जाते हुए मार्ग में एक जंगल में पहुंचा, तो दैववश वहाँ उसे एक अजगर निगल गया। यह देखकर उसकी पत्नी भूमि में लोटकर रोने लगी ॥३१०॥

उसका रोना-धोना सुनकर अजगर मनुष्य की वाणी में उससे बोला- हे भली स्त्री, तू इस प्रकार क्यों रो रही है?' तब उस ब्राह्मणी ने कहा ॥३११॥

'हे महाप्राणी, मैं क्यों न रोऊँ, जब कि तूने विदेश में मुझ दुखिया का भिक्षापात्र ही हरण कर लिया ॥३१२॥

मुझ स्त्री को अब कौन भीख देगा'। उस सदाचारिणी ब्राह्मणी के इस प्रकार कहने पर अजगर ने अपने मुँह से उगलकर एक बड़ा-सा सोने का पात्र उसके आगे रख दिया और कहा- 'यह ले भिक्षा-पात्र। माँगने पर जो भी व्यक्ति इस पात्र में दान नहीं देगा, उसके शिर के सैकड़ों टुकड़े हो जायेगे। यह मेरी सत्य वाणी है ॥३१३-३१५॥

तब वह सती ब्राह्मणी उस अजगर से बोली-'यदि ऐसा है, तो पहले तू ही इस पात्र में मुझे पति की भिक्षा दे' ॥३१६॥

उसके ऐसा कहते ही अजगर ने समूचे और जीवित यज्ञसोम को उगल दिया ॥३१७॥

उसे उगलते ही तुरन्त वह अजगर दिव्य पुरुष बन गया और प्रसन्न होकर उन दोनों (पति-पत्नी) से बोला- ॥३१८॥

'मैं कांचनवेग नाम का विद्याधरों का राजा हूँ। मेरे इस शाप की अवधि सती स्त्री के संवाद तक थी। वह आज समाप्त हो गई। (अतः अब मैं पुनः अपने रूप में आ गया), ऐसा कहकर और उस सोने के पात्र को रत्नों से भरकर प्रसन्न विद्याधरराज, आकाश में उड़कर अपने लोक को चला गया। और, वे दम्पती रत्नों का पात्र लेकर अपने घर आ गये ॥३१९--३२१॥

घर आकर अक्षय धन पाया हुआ यज्ञसोम सुख से रहने लगा। विधाता सभी को उसके मन और बल के अनुसार देता है ॥३२२॥

एक मूर्ख योद्धा की कथा

अब नापित के याचक की कथा सुनो। कर्णाट देश के एक वीर ने, युद्ध में शूरता दिखाकर अपने स्वामी राजा को प्रसन्न किया। उस राजा ने भी प्रसन्न होकर उससे इच्छित वर माँगने को कहा। उस नपुंसक योद्धा ने राजा से उसके नाई को वर में मांगा ॥३२३-३२४॥

प्रत्येक व्यक्ति अपने चित्त के प्रमाण से अपना भला या बुरा चाहता है। अब कुछ न मांगनेवाले मूर्ख की कथा सुनो ॥३२५॥

'कुछ न' माँगनेवाले मूर्ख की कथा

राह चलते हुए एक मूर्ख से गाड़ी पर बैठे हुए एक व्यक्ति ने कहा- 'मेरी गाड़ी को कुछ बराबर कर दो' ।।३२६॥

उस मूर्ख ने कहा-'यदि मैं बराबर कर दूंगा, तो क्या देगा?' तब गाड़ीवाले ने कहा-'कुछ नहीं दूंगा।' तब उस मूर्ख ने 'मुझे कुछ न दो', इस प्रकार कहकर गाड़ी को ठीक कर दिया और 'कुछ न दो' माँगा। तब गाड़ीवान हँसने लगा ॥३२७-३२८॥

'स्वामिन्, मूर्खजन इस प्रकार सदा हँसी के पात्र, तिरस्कृत, निन्दनीय और विपत्तियों के शिकार होते रहते हैं और बुद्धिमान् समाज में सम्मान पाते हैं' ॥३२९॥

इस प्रकार, गोमुख के मुँह से कही गई कथाओं के विनोद को मन्त्रियों के साथ सुनकर युवराज नरवाहनदत्त रात में समस्त संसार को विश्राम देनेवाली नींद में सो गया ।॥३३०॥

महाकवि सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियश लम्बक का पंचम तरंग समाप्त

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1. यहाँ से पंचतन्त्र का मित्रलाभ-प्रकरण प्रारम्भ होता है, जिसका प्रारम्भ इलोक इस प्रकार है-
असाधना वित्तहीना बुद्धिमन्तः सुहुत्तमाः।
साबयन्त्याशु कार्याण काककूर्माम्‌गाक्षुवत् ।।
2. पंचतन्त्र और हितोपदेश में इसका नाम लघुपतनक है।




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