51006 || षष्ठ कहानी || नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत); नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत); कौओं और उल्लुओं की कथा¹; चतुर्वन्त नाम के हाथी और खरगोशों की कथा; शश और कपिंजल को कथा; ब्राह्मण और धूर्तों की कथा; कौए और उल्लुओं की कथा का शेषांश; वृद्ध बनिया और चोर की कथा; बाह्मण, चोर और राक्षस की कथा; रथकार और उसकी पत्नी की कथा; मेढकों के वाहन सर्प को कथा; मूर्ख सेवकों की कथा; अपूपमुग्ध की कथा; एक मूर्ख नौकर की कथा; महिषीमुग्ध की कथा।

51006 || षष्ठ कहानी || नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत); नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत); कौओं और उल्लुओं की कथा¹; चतुर्वन्त नाम के हाथी और खरगोशों की कथा; शश और कपिंजल को कथा; ब्राह्मण और धूर्तों की कथा; कौए और उल्लुओं की कथा का शेषांश; वृद्ध बनिया और चोर की कथा; बाह्मण, चोर और राक्षस की कथा; रथकार और उसकी पत्नी की कथा; मेढकों के वाहन सर्प को कथा; मूर्ख सेवकों की कथा; अपूपमुग्ध की कथा; एक मूर्ख नौकर की कथा; महिषीमुग्ध की कथा।

षष्ठ तरंग

नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत)

रात बीतने पर प्रातःकाल नरवाहनदत्त उठकर पिता बत्सराज (उदयन) के दर्शन के लिए उनके पास गया ।॥१॥

वहाँ महारानी पद्मावती के भाई और मगधराज (प्रद्योत) के पुत्र सिहह्वर्मा के आने पर उसके स्वागत, कुशल-प्रश्न तथा अन्यान्य वार्तालाप में दिन व्यतीत होने पर नरवाहनदत्त भोजन करके अपने भवन में आया ॥२-३॥

तब शक्तियशा के लिए उत्सुक नरवाहनदत्त का मनोरंजन करने के लिए बुद्धिमान् मन्त्री गोमुख ने यह कथा कही ॥४॥

कौओं और उल्लुओं की कथा¹

किसी जंगल में बहुत बड़ा वटवृक्ष था। जो पक्षियों के कलरव से मानों पक्षियों के विश्राम के लिए सदा उन्हें बुलाता रहता था ।।५।।

उस बरगद पर मेघवर्ण नाम का कौओं का राजा घोंसला बनाकर रहता था। अवमर्द नाम का उल्लुओं का राजा उसका शत्रु था ॥६॥

वह उलू। राज, एकबार रात में आकर, बहुत-से कौओं को मारकर काकराज का अपमान करके चला गया ।

प्रातःकाल ही, काकराज ने, मन्त्रियों को बुलाकर उन्हें सत्कृत करके कहा। उसके मन्त्री थे-उड्डीवी, आडीवी, संडीवी प्रडीवी और चिरजीवी ॥८॥

काकराज ने कहा- वह हमारा शत्रु उलूकराज, हमारा स्थान जानता है और बलवान् भी है। वह इस प्रकार आक्रमण करता ही रहेगा। उसका प्रतीकार सोचो ॥९॥

यह सुनकर उड्डीवी मन्त्री बोला- 'स्वामिन् शत्रु यदि बलवान् है, तो दूसरे देश में आश्रय लेना चाहिए या उससे ही अनुनय-विनय करनी चाहिए कि वह आक्रमण न करें ॥१०॥

यह सुनकर आडीवी बोला- 'अभी तत्काल उसका इतना भय नहीं है। व शत्रु का आशय (अभिप्राय) और अपनी शक्ति को समझकर यथासम्भव यत्न करना चाहिए' ॥११॥

यह सुनकर संडीवी बोला- 'स्वामिन्, मरना अच्छा है या विदेश में जाकर जीवन बिताना अच्छ है। किन्तु, शत्रु के सामने झुकना अच्छा नहीं ॥१२॥

हमें हानि पहुँचानेवाले शत्रु के साथ युद्ध करना चाहिए। सहायकोंवाला, शूर और उत्साही राजा शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है' ॥१३॥

उसके पश्चात् प्रडीवी ने कहा- 'वह शत्रु बलवान् है, युद्ध में उसे जीता नहीं जा सकता। इस समय उससे सन्धि करके फिर अवसर मिलने पर उसे मारना चाहिए' ॥१४॥

तब चिरजीवी ने कहा- 'सन्धि का दूत कौन होगा और सन्धि ही क्या होगी। कौओं और उल्लुओं की शत्रुता सृष्टि के प्रारम्भ से ही चली आ रही है। उसके बीच कौन पड़ेगा? ॥१५॥

यह काम मन्त्र से सिद्ध होनेवाला है; क्योंकि राज्य का मूल मन्त्र ही है।' यह सुनकर काकराज चिरजीवी से बोला- ॥१६॥

'तुम वृद्ध हो, सब जानते हो, यह बताओ कि कौए और उल्लुओं में बैर किस कारण हुआ । उसके पश्चात् मन्त्र (सम्मति) बताना ॥१७॥

यह सुनकर चिरजीवी, काकराज से बोला- इस सारी शत्रुता का मूल कारण वाणी का दोष है। क्या तुमने गधे की कथा नहीं सुनी² ? ॥१८॥

किसी धोबी ने, अपने दुर्बल गधे को पुष्ट करने के लिए बाघ के चमड़े से ढककर दूसरे के खेत में छोड़ दिया ॥१९॥

वह खेतों में फसलों को खाता था, किन्तु 'यह बाघ है,' इस भय से खेत के रखवाले उसे रोक नहीं सकते थे। कुछ समय बाद एक धनुर्धारी किसान ने उसे देखा ॥२०॥

वह भय से नम्र और कुबड़ा होकर शरीर को कम्बल से लपेटकर उधर से जाने लगा ॥२१॥

काला कम्बल ओढ़कर और कुबड़ा होकर जाते हुए उसे देखकर गधे ने उसे दूसरा गधा समझ और फसल खाये हुए गधे ने मस्ती में अपनी चिल्ल-पों आवाज लगाकर उसे बुलाना शुरू किया ॥२२॥

उसकी आवाज सुनने से उस किसान ने, अपनी ही आवाज से अपना नाश करनेवाला गधा समझकर उसे बाण से मार डाला ॥२३॥

इसी प्रकार, वाणी-दोष के कारण ही हमारी उल्लुओं से शत्रुता है। पहले किसी समय पक्षी राजा से हीन थे ॥२४॥

उन्होंने एकत्र होकर पक्षिराज का अभिषेक प्रारम्भ किया और सभी ने छत्र-चामर लगे उल्लू को राजा बनाने की तैयारी की। इतने में ही आकाश से आये हुए कौए ने यह देखकर कहा-'अरे मूर्खों ! क्या हंस, कोयल आदि और पक्षी नहीं हैं कि इस क्रूर, पापी, अमंगल और देखने में भद्दे उल्लू को राजा बना रहे हो? धिक्कार है ॥२५--२७॥

किसी प्रभावशाली व्यक्ति को राजा बनाना चाहिए, जिसका नाम ही सिद्धिदायक हो। इस विषय में एक कथा सुनो। मैं तुम लोगों से कहता हूँ' ॥२८॥

चतुर्वन्त नाम के हाथी और खरगोशों की कथा'

कहीं पर अथाह पानी से भरा चन्द्रसर नाम का एक तालाब था। उसके किनारे शिलीमुख नाम का खरहों (खरगोश) का राजा रहता था ।॥२९॥

उस वन में, अनावृष्टि के कारण, अन्य सभी जलाशयों के सूखने पर हाथियों के झुंड का एक चतुर्वन्त नामक सरदार किसी समय पानी पीने के लिए वहाँ आया ॥३०॥

उसके झुंड के वहाँ आने पर शिलीमुख के बहुत-से अनुचर खरहे, उसके पैरों से रोदे जाकर चूर्ण विचूर्ण हो गए ।।। ३१॥

हाथी-सरदार के चले जाने पर, दुःखित शिलीमुख ने, सभी खरहों की सभा में विजय नामक खरहे से कहा- ॥३२॥

'यह गजराज, यहाँ जल का आनन्द पाकर बार-बार आयगा और हमलोगों को निःशेष कर डालेगा। इसलिए, इस विषय में कोई उपाय सोचो ॥३३॥

उसके पास जाओ। देखो, कोई युक्ति लगती है या नहीं। तुम कार्य और उपाय सब जानते हो और बोलने में भी कुशल हो ॥३४॥

तुम जहाँ-जहाँ गये, वहाँ-वहाँ शुभ ही हुआ। 'इस प्रकार कहकर शिलीमुख से भेजा हुआ विजय, प्रसन्न होकर वहाँ गया ॥३५॥

मार्ग के अनुसार जाते हुए उसने गजराज को देखा और सोचने लगा कि जैसे-तैसे इस बलवान् का समागम हो। तब वह विजय नामक खरहा, पहाड़ की चोटी पर चढ़कर उस हाथी से बोला- 'मैं राजा चन्द्रमा का दूत हूँ। उसने मुझे यह सन्देश दिया है ॥३६-३७॥

चन्द्रसर नभ का शीतल सरोवर मेरा निवास स्थान है। वहाँ शश (खरगोश या खरहा) रहते हैं, वे मेरे प्यारे हैं। इसीलिए, मेरा नाम शीतांशु और शशी है। तूने उस सर को गंदला कर दिया और मेरे प्यारे शशों को मार डाला है ॥ ३८-३९॥

यदि तुम फिर ऐसा करोगे, तो उसका फल (दंड) पाओगे।' दूत के मुंह से यह सन्देश मुनकर वह गजराज भय से बोला- ॥४०॥

'अब फिर मैं ऐसा न करूँगा। भगवान् चन्द्रमा मेरे पूज्य हैं। आओ, मुझे चन्द्रमा का दर्शन कराओ। मैं उनसे प्रार्थना करूं ॥४१॥

ऐसा कहते हुए उसे विजय ने, ले जाकर रात्रि के जल में चन्द्रमा की परछाई दिखा दी। ॥४२॥

उसे देखकर और भय से काँपते हुए गजराज ने प्रणाम किया। फिर, वह जंगल को लौट गया और उसके बाद वह कभी उधर न आया ॥४३॥

इस घटना को आँखों से देखकर शशों के राजा शिलीमुख ने, विजय नामक दूत का बहुत सम्मान किया और वहाँ निडर होकर रहने लगा ॥४४॥

ऐसा कहकर वह कौआ, उन पक्षियों से फिर बोला-'राजा ऐसा होना चाहिए, जिसके नाम से ही कोई कष्ट न दे ॥४५॥

तब दिन का अन्वा और क्षुद्र उल्लू कैसे राजा बन सकता है।। सभी क्षुद्र व्यक्ति अविश्वासी होते हैं। इस विषय में एक कथा सुनो' ॥४६॥

शश और कपिंजल को कथा

किसी समय किसी वृक्ष पर में (कौआ) रहता था और उसी वृक्ष के नीचे अपना घर बनाकर कपिजल नाम का पक्षी भी रहता था ॥४७॥

वह कपिंजल, किसी समय, दूर देश को जाकर, जब बहुत दिनों तक नहीं लौटा, तब उसके घोंसले में एक शश आकर रहने लगा ॥४८॥

कुछ दिनों बाद कपिजल लौट आया, तब उसे घोंसले के विषय में, 'यह मेरा है, तेरा नहीं', दोनों में इस प्रकार का झगड़ा हो गया। तब वे दोनों इसका निर्णय करने के लिए किसी निर्णायक को ढूंढ़ने निकले। कौतुकवश में भी छिपे-छिपे उन दोनों के पीछे-पीछे गया ।॥४९-५०॥

कुछ दूर जाकर, उन्होंने किसी तालाब के किनारे झूठा अहिंसा-व्रत धारण किये हुए और ध्यान में बाधी आँखें बन्द किये हुए एक बिलाव को देखा ।॥५१॥

इसी धार्मिक व्यक्ति से न्याय क्यों न पूछें, ऐसा कहकर वे दोनों उसके पास जाकर बोले-॥५२॥

'भगवन्, तुभ धार्मिक और तपस्वी हो, हमारे न्याय को सुनो।' यह सुनकर वह बिलाव बहुत थोड़े शब्दों में उन दोनों से बोला- ॥५३॥

'मैं तपस्या से दुर्बल होने के कारण ऊँचा सुनता हूँ। इसलिए, तुम दोनों दूर से, मेरे समीप आ जाओ। भली भांति न दिया गया न्याय दोनों लोकों का नाश करता है' ।॥५४॥

ऐसा कहकर और उन दोनों को पास बैठाकर, उस क्षुद्र बिलाव ने शश तथा कपिजल दोनों को साथ ही मार डाला ॥५५॥

इसलिए, नीच कर्म करनेवाले दुर्जन का विश्वास न करना चाहिए। और इसीलिए, अत्यन्त दुर्जन (दुष्ट) उल्लू को राजा नहीं बनाना चाहिए ॥५६ः।

कौए से इस प्रकार कहे गये पक्षी, उसकी बात मानकर उल्लू का राज्याभिषेक रोककर इधर-उधर उड़ गये ।।५७৷৷

वह उल्लू, 'आज से हम और तुम दोनों परस्पर शत्रु हुए। याद रखना, अब मैं जाता हूँ', क्रोध पूर्वक इस प्रकार मुझसे कहकर चला गया ।॥५८॥

इस कारण कौआ भी 'कहा तो ठीक', ऐसा सोचकर व्याकुल हुआ। केवल वाणी से उत्पन्न हुए असह्य वैर से किसे पश्चात्ताप नहीं होता ॥५९॥

इस प्रकार वाणी के अपराध से हमारे और उल्लुओं के बीच वैर हो गया। काकराज से इस प्रकार कहकर चिरजीवी फिर बोला- ॥६०॥

'महाराज, वे उल्लू संख्या में बहुत है और हमसे बलवान् भी हैं। इसलिए, युद्ध के द्वारा जीते नहीं जा सकते। अधिक संख्यावाले ही विजय प्राप्त करते हैं। इस सम्बन्ध में एक उदाहरण सुनो' ।॥६१।।

ब्राह्मण और धूर्तों की कथा

एक कोई ब्राह्मण एक बकरा खरीदकर और उसे कन्धे पर रखकर जा रहा था। उसे मार्ग में बकरा ठग लेने की इच्छा रखनेवाले कई धूर्तों ने देखा ॥६२॥

उनमें से एक ने उसके पास आकर घबराहट के साथ कहा- 'ब्राह्मण देवता, तुमने इस कुत्ते को कन्धे पर क्यों रख लिया ? इसे छोड़ो' ॥६३॥

यह सुनकर उसकी परवाह न करके ब्राह्मण आगे चला। तब उसे दूसरे दो घूर्त्त आगे मिले और बोले-'अरे, तुम जनेऊ और कुत्ता, दोनों को एक साथ कन्धे पर रखे हुए हो, कैसे। ब्राह्मण हो?' तब वह बकरे को भली भाँति देखता हुआ कुछ आगे गया, तो तीन और धूर्त उसे मिले और बोले-'तुभ अवश्य बहेलिये हो, ब्राह्मण नहीं। इस कुत्ते के द्वारा मृगों को मारते हो' ।॥६४-६६॥

यह सुनकर ब्राह्मण ने सोचा कि अवश्य ही किसी भूत ने मेरी आँखों का हरण कर मुझे धोखा दिया है, अन्यथा क्या ये सभी व्यक्ति, इसे झूठ देख रहे हैं? ॥६७॥

यह सोचकर बकरे को वहीं छोड़कर और स्नान करके वह घर गया और उधर वे धूर्त उस बकरे को लेकर आनन्दपूर्वक खा गये ॥६८॥

कौए और उल्लुओं की कथा का शेषांश

ऐसा कहकर चिरजीवी काकराज से बोला- 'अतः, महाराज, बहुत और बलवान्, दुर्जेय होते हैं। इसलिए, मैं इस बलवान् के साथ विरोध में जो कहता हूँ, वह करो। तुम लोग मेरे पंखों को कुछ काटकर इसी पेड़ के नीचे फेंककर उस पहाड़ पर चले जाओ। तबतक मैं कार्य करके (सफल होकर) आता हूँ ॥६९-७०।।

यह सुनकर काकराज, क्रोध से कुछ पंखों को नोचकर और चिरजीवी को नीचे फेंककर मनों अपने अनुयायियों के साथ पहाड़ की ओर चला गया, और चिरजीवी, स्वयं उस वृक्ष के नीचे पड़ा रह गया ।॥७१-७२॥

तब रात में, उलूकराज अवमर्द, अपने सह‌योगियों के साथ वहाँ आया और उसने वहाँ एक भी कौए को न देखा ॥७३॥

तब चिरजीवी नीचे पड़ा हुआ धीरे-धीरे कराहने लगा। उसका कराहना सुनकर उलूकराज ने नीचे आकर उसे देखा ॥७४।।

और आश्चर्य के साथ उससे पूछा- 'तू कौन है और तेरी ऐसी दशा क्यों है ?' तब वह चिरजीवी वेदना से लड़खड़ाती हुई वाणी में धीरे से बोला ।॥७५॥

"मैं चिरजीवी नाम का, काकराज का सचिव हूँ। वह अन्य मन्त्रियों की सम्मति से तुम पर आक्रमण करना चाहता था ॥७६।।

तब मैंने उसे और उसके अन्य मन्त्रियों को डाँटते-फटकारते हुए कहा- 'यदि तुम मुझसे सम्मति पूछते हो और मुझे मानते हो, और यदि नीति को मानते हो. तो उसके अनुसार उस बलवान् उलूकराज से विरोध न करना चाहिए, प्रत्युत उससे अनुनय-विनय करनी चाहिए १७७-७८।।

यह सुनकर 'यह शत्रु का पक्षपाती है' ऐसा कहकर और क्रोध से मुझपर प्रहार करके उस मूर्ख कौए ने, अपने साथियों के साथ मेरी यह दुर्दशा कर डाली ॥७९॥

तदनन्तर, मुझे वृक्ष के नीचे फेंककर अपने अनुयायियों के साथ वह कहीं भाग गया।" कहकर चिरजीवी ने, लम्बी सांस लेकर अपना मुँह लटका दिया ॥८०॥

यह सुनकर उलूकराज ने अपने मन्त्रियों से पूछा कि 'अब हमें इस चिरजीवी का क्या करना चाहिए' ।॥८१॥

उलूकराज का यह प्रश्न सुनकर उसका दीप्तनयन नाम का मन्त्री उससे बोला- अरक्षणीय चोर भी उपकारी समझकर 'सज्जनों द्वारा रक्षा करने योग्य है ।॥८२॥

वृद्ध बनिया और चोर की कथा

प्राचीन समय में कहीं एक बनिया था। वृद्ध होने पर भी उसने धन के प्रभाव से किसी बनिये की कन्या से विवाह कर लिया ॥८३॥

वह वैश्य-कन्या, रात में बिस्तर पर उस बनिये से इस प्रकार मुँह फेरकर सोती थी, जैसे, वन में वसन्त-काल के बीतने पर भ्रमरी वृक्ष से विमुख हो जाती है ।॥८४॥

एक बार, रात में, जब वे दोनों शय्या पर सो रहे थे, तब घर में चोर घुस आया। यह देखकर उस कन्या ने, भय से (पति की ओर) करवट बदलकर उस वृद्ध पति का आलिंगन किया ॥८५॥

इस आश्चर्यजनक अपने सौभाग्य को देखकर उस वृद्ध बनिये ने चारों ओर देखा, तो एक कोने में उसे चोर दिखलाई दिया ॥८६॥

'तू मेरा उपकारी है, इसलिए मैं तुझे अपने सेवकों से पिटवाऊंगा नहीं', उस चोर से ऐसा कह‌कर उस बनिये ने उसे सुरक्षित रूप से बाहर निकाल दिया ।॥८७॥

इसी प्रकार, अपने उपकारी इस चिरजीवी की हमें रक्षा करनी चाहिए। यह कहकर दीप्तनयन नाम का मन्त्री चुप हो गया ।।८८।।

तब उलूकराज ने वक्रनास नामक अपने दूसरे मन्त्री से पूछा कि 'इसका क्या करना चाहिए, आप अच्छी तरह बताइए' ।॥८९॥

तब वक्रनास ने कहा- 'शत्रुओं के मर्म (गुप्त भेद) को जाननेवाले इस चिरजीवी की रक्षा करनी चाहिए। शत्रु राजा और उसके मन्त्री का बैर, हमारे कल्याण के लिए होगा, मैं कहता हूँ ॥९०॥

बाह्मण, चोर और राक्षस की कथा

इस विषय में उदाहरण के लिए एक कथा सुनो। किसी ब्राह्मण ने दान में दो गौएँ पाई। यह देखकर चोर ने उसकी गायें चुराने की इच्छा की और उसी समय एक राक्षस ने उस ब्राह्मण को खाने की बात सोची ॥९१-९२॥

अपने-अपने कार्य के लिए, रात में बाहर जाते हुए दोनों (चोर और राक्षस) मिले और अपना-अपना प्रयोजन बताकर एक साथ हो लिये ॥९३॥

पहले मैं गाएँ चुरा लेता हूँ; क्योंकि तुमसे पकड़ा हुआ ब्राह्मण यदि जग उठा तो मैं कैसे गौएं चुराऊंगा? ऐसा नहीं, पहले मैं ब्राह्मण को खा लेता हूँ। यदि गायों के खुरों की खट-पटाहट से ब्राह्मण जग उठा, तो मेरा परिश्रम व्यर्थ हो जायगा ।।९४-९५।।

उस ब्राह्मण के घर में घुसकर चोर और राक्षस इस प्रकार बोल-बोलकर लड़ने लगे, तो उनके शब्दों से वह ब्राह्मण जग उठा ॥९६॥

उसने, उठकर, राक्षसों के नाश करने का मन्त्र जपते हुए, हाथ में तलबार उठाई, तो वे दोनों, चोर और राक्षस, भाग गये ॥९७।।

जिस प्रकार चोर और राक्षस का आपसी झगड़ा ब्राह्मण के लिए हितकर हुआ, वैसे ही काकराज और चिरजीवी का झगड़ा हमारे लिए हितकर होगा ॥९८॥

वक्रनास के ऐसा कहने पर उलूकराज ने प्राकारकर्ण नाम के मन्त्री से पूछा और मन्त्री ने उससे कहा- ॥९९॥

'आपकी शरण में आया हुआ आपत्तिग्रस्त यह चिरजीवी, दया करने के योग्य है। राजा शिबि ने शरणागत की रक्षा के लिए अपना मांस भी दे दिया था ॥१००।।

प्राकारकर्ण से यह सुनकर उलूकराज ने, अपने क्रूरलोचन नाम के मंत्री से चिरजीवी के सम्बन्ध में पूछा कि इसका क्या करना चाहिए? क्रूरलोचन ने भी प्राकारवर्ण की ही बात दुहराई। तब उलूकराज ने रक्ताक्ष नाम के अपने मन्त्री से, उसी प्रकार पूछा। वह बुद्धिमान् मन्त्री इस प्रकार बोला-॥१०१-१०२॥

'राजन्, इन मन्त्रियों ने उल्टी नीति से तुझे नष्ट कर दिया। ये नीतिज्ञ नहीं प्रतीत होते ॥१०३

रथकार और उसकी पत्नी की कथा

मूर्ख व्यक्ति अपराध को देखकर भी झूठी सान्त्वना देने पर प्रसन्न हो जाता है। (इस विषय में एक कथा सुनो) कही एक बढ़ई रहता था, उसकी पत्नी उसे बहुत प्रिय थी ॥१०४।॥

उसकी स्त्री, पर-पुरुष का संग करती है, दूसरे लोगों से यह जानकर वह उसका भेद लेने के लिए एक बार अपनी पत्नी से बोला- ॥१०५॥

'प्रिये, मैं राजा की आज्ञा से व्यापार के लिए कहीं दूर देश को जाता हूं। इसलिए, तू पाथेय (मार्ग का भोजन) के लिए मुझे सत्तू आदि दे दे' ॥१०६।॥

'अच्छा, ठीक है' कहकर दिये हुए उसके पाथेय को लेकर और अपने एक शिष्य के साथ घर से बाहर निकलकर वह चुपके से फिर घर में ही आ घुसा ॥१०७॥

घर में अपनी पत्नी के परोक्ष में वह शिष्य के साथ चारपाई के नीचे जा छिपा। पति चला गया, यह जानकर उसकी स्त्री ने भी अपने जार को बुलाया और उस जार के साथ उसी चारपाई पर रमण करती हुई उसकी स्त्री ने, अपने पति के अंग का स्पर्श करके यह जान लिया कि पति यहीं है। कुछ समय बाद उसके जार ने व्याकुलता के साथ उससे पूछा- 'प्रिये, यह बताओ कि मैं तुम्हें अधिक प्यारा हूँ या तुम्हारा पति ?' ॥१०८-११०॥

यह सुनकर अत्यन्त चतुर उस स्त्री ने, अपने यार से कहा- 'मुझे अपना पति इतना प्यारा है कि मैं उसके लिए अपने प्राणों को भी छोड़ दूँ' ॥१११॥

पर पुरूष का संग कर लेना तो स्त्रियों का स्वाभाविक धर्म है। इसमें क्या किया जा सकता है। यदि स्त्रियों को नाक न हो, तो उनके लिए विष्ठा खा लेना भी असम्भव नहीं ।॥११२॥ १०९

इस प्रकार, उस दुष्टा पत्नी की बनावटी बात सुनकर प्रसन्न वह बढ़ई खाट के नीचे से निकलकर अपने शिष्य से बोला- 'आज तुमने देख लिया, इसलिए तुम साक्षी हो कि यह स्त्री मेरी कैसी भक्त है। यह मुझको ही अपना पति समझती है। इसने इसे तो अपने स्वभावानुसार अपना यार बनाया है। अतः, मैं इसे अपने शिर पर उठा लेना चाहता हूँ' १११३-११४॥

ऐसा कहकर शिष्य के साथ उसने, जार-सहित अपनी स्त्री की चारपाई को शिर पर उठा लिया ॥११५।।

इस प्रकार, अपनी आँखों के सामने अपराध देखकर भी झूठी सान्त्वना से, मूर्ख व्यक्ति प्रसन्न हो जाता है। और वह विचारहीन व्यक्ति, संसार में हँसी का पात्र बन जाता है ।॥११६॥

इसलिए, शत्रु के व्यक्ति इस चिरजीवी की तुम्हें रक्षा न करनी चाहिए। यह उपेक्षित व्यक्ति है, रोग के समान शीघ्र नष्ट कर देना चाहिए ॥११७॥

रक्ताक्ष से इस प्रकार सुनकर, उलूकराज इस प्रकार उससे बोला 'यह सज्जन चिरजीवी, हमारा हित करता हुआ भी इस स्थिति को पहुंचा है ॥११८॥

तब इसकी रक्षा क्यों न की जाय, फिर यह अकेला हमारा विगाड़ ही क्या सकता है?' इस प्रकार बोलकर उलूकराज ने मंत्री का वचन काट दिया ॥ ११९॥

उसके बाद उलूकराज ने चिरजीवी कौए को आश्वासन दिया। तब चिरजीवी ने उलूकराज से निवेदन किया ॥१२०॥

'इस अवस्था में मेरे जीने से क्या लाभ है? इसलिए मुझे लकड़ियाँ दिलाओ, जिससे मैं आग में जल मरूं ॥१२११॥

और, मैं भगवान् से भी यही प्रार्थना करूं कि काकराज का बदला लेने के लिए वह मुझे उलूक-योनि में जन्म दे ॥१२२॥

ऐसा कहनेवाले चिरजीवी से रताक्क्ष हँसकर बोला- 'हमारे स्वामी की कृपा से तू पूर्ण स्वस्थ है, आग से क्या लाभ ? ॥१२३॥

जबतक तू कौआ है, तबतक उल्लू न बनेगा। विधाता ने जिसे जैसा बनाया है, वह वैसा ही रहेगा' (इस प्रसंग में एक कथा सुनो।)' ॥१२४॥

प्राचीन काल में किसी मुनि ने, बाज के हाथ से छूटी हुई किसी चुहिया को पाकर दया करके अपने तपोबल से उसे कन्या बना दिया। अपने आश्रम में पालन-पोषण करके बढ़ाई गई और युवावस्या को प्राप्त उस कन्या को बलवान् पुरुष को देने के लिए मुनि ने, सूर्य को बुलाया और कहा कि सबसे अधिक बलवान् को ही मैं यह कन्या देना चाहता हूँ। इसलिए, तुम मेरी कन्या से विवाह करो। तब सूर्य ने ऋषि से कहा ॥१२५-१२७॥

'मुझसे भी बलवान् मेघ है, जो क्षण-भर में मुझे ढक देता है' यह सुनकर मुनि ने सूर्य को छोड़कर मेघ को बुलाया ॥१२८॥

उसे भी उसी प्रकार ऋषि ने कहा तो मेघ ने कहा- 'मुझसे भी बलवान् वायु है, जो क्षण-भर में ही मुझे चारों दिशाओं में बिखेर देता है ॥१२९॥

उसके इस प्रकार कहने पर मुनि ने वायु को बुलाया। मुनि के उनसे भी उसी प्रकार कहने पर वायु ने कहा- ॥१३०॥

'पर्वत मुझसे भी बलवान् हैं, जो मुझसे भी हिलाये नहीं जा सकते।' यह सुनकर मुनि ने एक पर्वतराज को बुलाया ॥१३१॥

उसी प्रकार जब मुनि ने पर्वतराज से कहा, तब उसने कहा- 'मुझसे भी बलवान् चूहे हैं, जो मुझमें भी छेद कर देते हैं' ।॥१३२॥

इस प्रकार क्रमशः ज्ञानी देवताओं से कहे गये मुनि ने, एक जंगली चूहे को बुलाया और उससे कहा- 'इस कन्या से विवाह करो। ऋषि के इस प्रकार कहने पर चूहे ने कहा- 'यह मेरे बिल में प्रवेश कैसे करेगी, यह देख लीजिए ॥१३३-१३४॥

'अच्छा तो ठीक है, यह कन्या पहले के ही समान चुहिया बन जाय', इस प्रकार मुनि ने उसे चुहिया बनाकर उस चूहे को दे दिया ॥१३५॥

'इस प्रकार बहुत दूर जाकर भी जो जैसा है, वैसा ही है। इसलिए, हे चिरजीविन्, तू कभी उलूक नहीं बन सकेगा' ॥१३६॥

रक्ताक्ष से इस प्रकार कहे गये चिरजीवी ने सोचा कि उलूकरराज ने, इस नीतिज्ञ रक्ताक्ष की बात नहीं मानी ॥१३७॥

शेष सभी मन्त्री मूर्ख हैं, इसलिए मेरा काम सिद्ध ही है। इस प्रकार सोचते हुए चिरजीवी को लेकर, बल से गर्वित उलूकराज, अवमर्द रक्ताक्ष की बात न मानकर अपने निवासस्थान पर गया ।॥१३८-१३९॥

उलूकराज से दिये गये मांस आदि पौष्टिक आहारों से पुष्ट होकर उसके पास रहते हुए चिरजीवी, मोर के समान सुन्दर पंखोंबाला हो गया ।॥१४०॥

एक बार वह चिरजीवी उलूकराज से बोला- 'स्वामिन्, मैं जाता हूँ और काकराज को विश्वास दिलाकर अपने स्थान पर ले आता हूँ ॥१४१॥

जिससे कि आप लोग रात में आक्रमण करके उसका नाश कर सकें। मैं, आपकी (मुझ पर की गई) इस कृपा का प्रत्युपकार करना बाहता हूँ ॥१४२॥

आप सब लोग दिन में उसके आक्रमण के भय से बचने के लिए अपने घोंसलों को घास, फूस आदि से ढककर उसके अन्दर सुरक्षित रहें ॥१४३॥

ऐसा कहकर, उल्लुओं को बास तथा सूखे पत्तों से ढके हुए द्वारवाली गुफा के भीतर करके, चिरजीवी अपने स्वामी काकराज मेघवर्ण के पास गया ।॥१४४।॥

और जलती हुई चिता से एक-एक जलती हुई लकड़ी चोंच में लटकाए हुए कौओं को साथ लेकर वह वहाँ आया ॥१४५॥

और आकर दिन में अन्धे उन उल्लुओं के घास-फूस से ढके हुए गुफा के द्वार पर आग लगा दी ॥१४६॥

वह आग लगाकर, एक-एक लकड़ी चोंच से उठाकर आग में छोड़ता जाता था। इस प्रकार उसने राजा के सहित सभी उल्लुओं को जलाकर भस्म कर डाला ॥१४७।।

तदनन्तर, कौओं का राजा, शत्रुओं का नाश करके, अपने काक-परिवार के साथ, पुनः उसी वटवृक्ष पर सुखपूर्वक निवास करने लगा ॥१४८॥

इसके बाद चिरजीवी ने काकराज मेघवर्ण को, शत्रुओं के बीच रहने का अपना सारा समाचार सुनाकर यह कहा-॥१४९॥

'स्वामिन्, वहाँ तुम्हारे शत्रु का एक ही मन्त्री या, उसी की बात न मानकर उस मदान्ध उलूकराज ने मेरी उपेक्षा की। उस मूर्ख ने, रक्ताक्ष मन्त्री की बात नहीं मानी, इसीलिए नीतिहीन उस मूर्ख को मैंने विश्वास दिलाकर ठग लिया ॥१५०-१५१॥

मेढकों के वाहन सर्प को कथा

जैसे कपट-वृत्ति से विश्वास दिलाकर साँप ने मेढकों को ठग लिया था।

एक वृद्ध सांप अपना चारा प्राप्त करने में असमर्थ होकर एक तालाब के किनारे निश्चल होकर पड़ा था। इस प्रकार, दीन सांप को देखकर दूर खड़े हुए मेढकों ने पूछा- 'अब तुम पहले के समान हम लोगों को क्यों नहीं खाते हो। मेढकों के इस प्रकार पूछने पर साँप ने उनसे कहा- 'एक बार एक मेढक की ओर दौड़ते हुए मैंने भ्रम से एक ब्राह्मण के बालक को काट लिया और वह मर गया। तब उसके पिता ने शाप से मुझे मेढकों का वाहन बना दिया। तब मैं तुम लोगों को कैसे खाऊँ ? बल्कि आओ, तुम लोगों को ढोने का काम करें ॥१५२-१५६।।

यह सुनकर उस पर सवारी करने के लिए उत्सुक मेढकों का राजा पानी से निकलकर उसकी पीठ पर निर्भय होकर चढ़ बैठा ॥ १५७।।

तब साँप ने, मन्त्रियों के साथ उस राजा को, विविध प्रकार की चालों से प्रसन्न करके कपट से, अपने को थका-हारा-सा प्रकट किया और मेढकराज से बोला-॥१५८॥

'स्वामी, भोजन के विना अब मैं नहीं चल सकता। इसलिए, मुझे भोजन दो। सेवक, विना भोजन के कैसे रह सकता है ? ॥१५९॥

यह सुनकर सवारी का शौकीन मेढकराज ने उस सांप से कहा- 'तो कुछ थोड़े-से मेरे अनुचर मेढकों को खा लो' ।॥१६०॥

तब वह सर्प, अपने इच्छानुसार मेढकों को क्रमशः खाने लगा। सवारी के आनन्द से अंधा मेढकराज यह सब सहन करता था ॥१६१॥

'इस प्रकार, मूर्खो के भीतर घुसा हुआ बुद्धिमान् मूर्खो को ठग लेता है। इसी प्रकार, महाराज, मैंने भी शत्रुओं में घुसकर ही तुम्हारे शत्रुओं का नाश किया ॥ १६२॥

अतः, बुद्धिमान् राजा को नीतिज्ञ भी होना चाहिए। अन्यथा, सेवक मूर्ख राजा को मनमाना लूटते-खसोटते और नष्ट कर डालते हैं ॥ १६३॥

यह लक्ष्मी, जूए के खेल के समान छल से भरी, जल-तरंग के समान चचल और मंदिरा के समान नशीली होती है। इसलिए यह (लक्ष्मी) धैर्यशाली, नीतिज्ञ, व्यसनहीन और विशेषज्ञ राजा के पास जाल से बंधी हुई-सी स्थिर रहती है ॥१६४-१६५॥

अतः, अब तुम साववान होकर नीतिज्ञ विद्वानों की बात मानकर, शत्रु के नाश हो जाने से सुखी होकर निष्कंटक राज्य का पालन करों ॥ १६६॥

मन्त्री चिरजीवी से इस प्रकार कहा गया काकराज मेघवर्ण, उस मन्त्री का सम्मान करके उसी प्रकार राज्य करता रहा ॥१६७।।

ऐसा कहकर गोमुख ने, वत्मराज के पुत्र नरवाहनदत्त से कहा- 'स्वामिन्, इस प्रकार बुद्धिबल से पशुपक्षी भी राज्य करते हैं; किन्तु बुद्धिहीन व्यक्ति, लोगों से हंसे जाते हैं और कष्ट पाते हैं। इस प्रसंग में एक कथा सुनो ॥१६८-१६९॥

किसी धनी सेठ का एक मूर्ख सेवक था, जो शरीर में मालिश करना नहीं जानता था। किन्तु 'जानता हूँ', इस अभिमान से बलपूर्वक मालिश करते हुए उसने स्वामी के शरीर की चमड़ी उधेड़ दी ।।१७०।।

तब स्वामी ने उसे निकाल दिया और वह दुःखी हुआ। इस प्रकार न जानते हुए भी हठ-पूर्वक जो जानकारी का ढोंग रचता है, वह नष्ट हो जाता है ॥१७१।।

और भी सुनो। मालव देश में दो ब्राह्मण-बन्धु रहते थे। उनके पैतृक धन का बंटवारा नहीं हुआ था ।।१७२॥

जब वे बंटवारा करने लगे, तब आपस में कम और अधिक भाग का झगड़ा खड़ा हो गया। तब उन्होंने एक वेदपाठी अध्यापक को निर्णायक माना। उसने कहा, 'तुम दोनों प्रत्येक वस्तु को दो भागों में बराबर बाँटो। इससे तुम दोनों में कम और अधिक का झगड़ा न होगा ।।१७३-१७४।।

मध्यस्थ (निर्णायक) की आज्ञा से उन दोनों ने मकान, खाट, बरतन पशु आदि सबके दो-दो बराबर टुकड़े करके बाँट लिये। अब उनके पिता की एक दासी रह गई। उसको भी काटकर उन दोनों ने दो टुकड़े कर डाले इस हत्या के अपराध में, राजा, ने, उन दोनों का, सब माल हरण करके उन्हें सजा दे दी ॥१७५-१७६॥

इस प्रकार, मूर्खजन धूत्तों के उपदेश से दोनों लोकों का नाश करते हैं। इसलिए, समझदार व्यक्ति को चाहिए कि वह पूर्ती का नहीं, प्रत्युत विद्वानों की संगति करे ॥१७७॥

असन्तोष भी अच्छा नहीं होता। इस प्रसंग में एक कथा सुनो। कहीं पर कुछ साघु भिक्षा से सन्तोष कर हृष्ट-पुष्ट बने रहते थे। उन मोटे-ताजे साधुओं को देखकर कुछ मित्रों ने आपस में कहा- 'आश्चर्य है कि भीख मांगकर खानेवाले ये साधु भी इतने मोटे हुए हैं ।॥१७८-१७९॥

तब उनमें से एक ने कहा- 'देखो मैं तुम्हें तमाशा दिखाता हूँ। भोजन करते हुए भी इन्हें मैं पहले के समान ही दुर्बल कर देता हूँ' ॥१८०॥

ऐसा कहकर उसने उन साधुओं को क्रमशः अपने घर में निमन्त्रण देकर एक दिन बहुत-सुन्दर पट्टस भोजन कराया। वे मूर्ख साधु, उसके उत्तम और स्वादिष्ट भोजन का स्मरण करते हुए भिक्षा के भोजन से असन्तोष करने लगे और धीरे-धीरे दुर्बल हो गये ॥१८१-१८२॥

तव अपने मित्रों को दिखाकर उन साधुओं के सामने ही उस भोजन करानेवाले ने कहा--॥१८३॥

'मेरे यहाँ भोजन करने के पहले ये साधु भिक्षा के अन्न से ही हृष्ट-पुष्ट बने हुए थे। अब उस उत्तम भोजन का स्वाद पाकर इन्हें भिक्षा से असन्तोष हो गया, इसलिए दुर्बल होने लगे ॥ १८४॥

इसलिए, सुख चाहनेवाला वृद्धिमान् व्यक्ति, मन को सदा सन्तुष्ट रखे। असन्तोष दोनों लोकों में असह्य और निरंतर दुःखदायी होता है' ॥१८५॥

इस प्रकार, उस मित्र से शिक्षा पाये हुए उसके मित्रों ने, पापों के भांडार असन्तोष का त्याग कर दिया। सच है, सत्संग किसे कल्याणकारी नहीं होता ॥१८६॥

स्वामी, अब सुवर्णमुग्ध की कथा सुनो। एक युवा पुरुष जल पीने के लिए तालाब के किनारे गया ।।१८७७॥

वहाँ उसने एक वृक्ष पर बैठे हुए सोने की कलगीवाले पक्षी की परछाईं पानी में देखी ॥१८८॥

उसे सोना समझकर लेने के लिए वह मूर्ख तालाब में उतरकर गया, किन्तु चंचल पानी में दीखते और नष्ट होते सोने को वह न पा सका। वह जल से निकल-निकलकर बार-बार सोने को देखता और उसमें सोना पाने के लिए उतरता रहा, किन्तु अन्ततः उसने पाया कुछ नहीं ॥१८९-१९०।।

ऐसा करते हुए उसे, उसके पिता ने देखा और उससे पूछकर तथा पानी में पक्षी की छाया देखकर, वृक्ष से पक्षी को उड़ाकर उसने अपने मूर्ख पुत्र को असलियत समझा दी और उसे अपने साथ घर ले गया ॥ १९१॥

इस प्रकार, विचारहीन मूर्ख, झूठी तृष्णा में पड़कर अपने अज्ञान का प्रदर्शन करते हैं। वे दूसरी के लिए हँसने के योग्य और अपने लिए स्वयं शोचनीय हो जाते है ॥ १९२॥

मूर्ख सेवकों की कथा 

अब महामूखों की एक और कथा मुनो। किसी बनिये का ऊँट अधिक भार के कारण मार्ग में ही थककर बैठ गया। उसने अपने सेवकों से कहा-'मैं जाकर एक दूसरा ऊँट खरीद लाता हूँ, जो इसका आधा बोझ ले ले। तुमलोग यहां रुककर मेर। सामान देखना और पानी बरसने पर कपड़ों की इन पिटारियों के ऊपर बढ़े हुए चमड़े पर पानी न लगे, इसलिए इस पर भी ध्यान देना (अर्थात् पिटारियों के कपड़े न भीगें)। इस प्रकार, सेवकों को ऊँट के पास रखकर उसके चले जाने पर अकस्मात् बादल आकाश में घिरकर बरसने लगे ॥१९३-१९६॥

'ऐसा करना कि पानी पिटारियों के चमड़े का स्पर्श न करे' इस प्रकार विचार करके उन मूखौं ने पिटारियों से कपड़ों के थान निकालकर उनसे ही पिटारियों को लोट दिया। जिससे पिटारित्रों के ऊपर चढ़ा हुआ चमड़ा तो बच गया, किन्तु उस बनिये के कपड़े कीचड़-पानी से नष्ट हो गये। तदनन्तर, लौटकर आये हुए उस बनिये ने क्रुद्ध होकर उन सेवकों से कहा-'पापियो, तुमलोगों ने मेरे सारे कपड़े पानी से क्यों नष्ट कर दिये?' तब सेवकों ने उससे कहा-'तुम्हीं ने तो आशा दी थी कि पानी से पिटारियों के चमड़े की रक्षा करना, इसमें हमारा क्या दोष है?' ॥१९७-२००।।

चमड़े के गीला होने से उसके भीतर रखे वस्त्र नष्ट हो जायेंगे...... यह मैंने कपड़ों की रक्षा के लिए ही तो कहा था। चमड़े की रक्षा के लिए नहीं- ऐसा कहकर उस बनिये ने ऊंट के दूसरे बच्चे पर भार लादा और वहाँ से घर गया। घर जाकर उसने सेवकों का सर्वस्व हरण करके उन्हें दंड दिया ॥२०१-२०२॥

इस प्रकार मूर्ख व्यक्ति हृदय की सच्ची भावना न समझकर सीधी बात को भी उल्टी समझते है और अपनी तथा दूसरों की हानि कर डालते हैं और वैसा ही उत्तर भी देते हैं ॥ २०३॥

अपूपमुग्ध की कथा

इसी प्रकार मालपूए के मूर्ख की कथा संक्षेप में सुनो। किसी बटोही ने, एक पैसे के आठ पूए खरीदे। उनमें से छह पूए खा लेने तक उसका पेट न भरा, किन्तु सातवाँ पूआ खाते ही उसका पेट भर गया। यह देखकर वह चिल्लाने लगा कि 'हाय, मैं लुट गया! यदि मैं इस सातवें पूए को पहले खा जाता, तो बाकी पूए नष्ट न होते। इसी एक से ही पेट भर जाता ?' उसकी यह बात सुनकर वहां बैठे सभी व्यक्ति पेट पकड़-पकड़कर हँसने लगे ॥२०४-२०८॥

एक मूर्ख नौकर की कथा

अब एक और महामूर्ख की कथा सुनो। किसी बनिये का मूर्ख सेवक था। बनिये ने उससे कहा-'दूकान के दरवाजे की रक्षा करना, मैं थोडी देर के लिए घर जाता हूँ।' बनिये के इस प्रकार कहकर चले जाने पर वह दूकान के दरवाजे को अपने कन्धे पर लेकर कहीं नट का खेल देखने चला गया। बनिये ने आकर जब यह देखा, तब उसे खूब डांटा। तब सेवक ने उत्तर दिया कि तुमने द्वार की रखवाली के लिए कहा था, तब मैंने उसकी रक्षा कन्धे पर रखकर की ॥२०९-२११ ॥

इस प्रकार, किसी बात के भीतरी अर्थ को न समझकर मूर्ख, केवल शब्द को ही पकड़ते हैं। इसी प्रकार एक महिष मुग्ध की कथा सुनो ॥२१२॥

महिषीमुग्ध की कथा

कुछ गाँव के लोगों ने किसी गंवार का भैसा, गाँव के बाहर भीलों की बस्ती में ले जाकर वट-वृक्ष के नीचे मारकर खा लिया ॥२१३॥

उस भैंसाबाले ने, जाकर राजा से निवेदन किया। तदनन्तर, राजा ने भैसा खानेवाले उन सभी गाँववालों को बुलवाया ॥२१४।॥

उनके सामने भैसावाला गंवार बोला- 'इन लोगों ने मेरे देखते-देखते मेरे भैंसे को तालाब के पास वटवृक्ष के नीचे मारकर खा लिया।' यह सुनकर उनमें से एक वृद्ध मूर्ख ने कहा-'इस गाँव में न तो कोई तालाब है और न वट का ही वृक्ष, इसलिए यह झूठ बोलता है। हमने इसका भैसा कहाँ मारा और कहाँ खाया ?' ॥२१५-२१७॥

यह सुनकर भैसावाला बोला 'तुम्हारे गाँव की पूर्व दिशा में तालाब और वट का वृक्ष क्या नहीं है ? ॥२१८॥

'अष्टमी तिथि को तुमलोगों ने मेरे भैसे को खाया है।' उसके इस प्रकार कहने पर वह वृद्ध मूर्ख फिर बोला-'हमारे गाँव में पूर्व दिशा ही नहीं है और न अष्टमी तिथि ही है।' यह सुनकर हँसते हुए राजा ने, उस मूर्ख को उत्साहित करते हुए कहा-तू सब बोलनेवाला है, कुछ भी झूठ नहीं बोलता। अतः, मुझे सब बता 'तुमने भैसा खाया है या नहीं? ॥ २१९-२२१॥

यह सुनकर वह मूर्ख बोला- 'पिता के मरने के तीन वर्षों पश्चात् मैं उत्पन्न हुआ हूँ और उसी पिता ने मुझे यह चतुराई सिखाई है, इसलिए महाराज, मैं झूठ कभी नहीं बोलता। हम लोगों ने इसका भैसा खाया है, किन्तु और दूसरी बात जो यह कहता है, वह झूठी है।' ॥२२२-२२३॥

यह सुनकर अपने अनुचरों के साथ राजा हंसी को न रोक सका और उसने भैसावाले को मूल्य दिलाकर उन गँवारों को दंड दिया ॥२२४।।

मूर्खजन, अपनी मूर्खता के अभिमान से, अपने प्रति विश्वास कराने के लिए जो छिपाने योग्य नहीं है, उसे छिपाते हैं और जो छिपाने योग्य है, उसे प्रकट कर डालते हैं।॥ २२५॥

किसी एक दरिद्र से उसकी गुस्सैल स्त्री बोली, 'मैं एक उत्सव में अपने पिता के घर निर्मन्त्रित हूँ। अतः, कल प्रातः मैं वहाँ जाऊँगी ॥२२६॥

इसलिए, यदि तुम कहीं से भी मेरे लिए, नीले कमलों की माला न लाये, तो तुम मेरे पति नहीं और मैं तुम्हारी पत्नी नहीं ॥ २२७॥

अब वह पति बेचारा नीले कमल के पुष्पों के लिए राजा के तालाब में गया। उसमें जाने पर वहाँ के रक्षकों द्वारा 'कौन है,' इस प्रकार पूछे जाने पर उसने कहा, 'मैं चकवा हूँ।' तब वे यह सुनकर और उसे बाँधकर प्रातःकाल राजा के पास ले गये। वहाँ राजा के पूछने पर वह चकवे की बोली में बोला। तब भी राजा से बार-बार आग्रहपूर्वक पूछे जाने पर, उसके सच्चा वृत्तान्व सुना देने पर वह दयालु राजा द्वारा छोड़ दिया गया और घर आ गया ।।२२८-२३००॥

किसी ब्राह्मण ने, एक मूर्ख वैद्य से कहा-'मेरे कुबड़े पुत्र का कूबड़ अन्दर कर दे। यह सुनकर वैद्य ने उससे कहा-'मुझे दस पैसे दे। यदि यह काम न करूँ, तो उसके दसगुने (सौ पैसे) तुझे दूंगा ॥२३१-२३२ ॥

इस शर्त पर ब्राह्मण से दस पैसे लेकर उसके वैद्य ने, स्वेद आदि उपचार करके उस पुत्र की चिकित्सा की ॥२३३ ॥

लेकिन, अन्ततः वह नसे ठीक न कर सका और उसके दसगुने अधिक पैसे उसे उस कुबड़े के पिता को लौटाने पड़े। भला कौन व्यक्ति कुबड़े को सीधा कर सकता है। इस प्रकार, असंभव कार्य करने की प्रतिज्ञा की डींग हांकनेवाले मूखों के मार्ग में बुद्धिमान् व्यक्ति को नहीं पड़ना चाहिए ।॥२३४-२३५।।

भद्रमुख मन्त्री गोमुख से, रात्रि में, यह कथा सुनकर, युवराज नरवाहनदत्त, अच्छी शिक्षा से प्रसन्न होकर उस पर बहुत सन्तुष्ट हुआ ॥२३६॥

इस कथा से मनोरंजन होने के कारण शक्तियशा के लिए उत्सुक होने पर भी अपने समान वय के मित्रों के साथ नरवाहनदत्त, पलंग पर लेटकर नींद में सो गया ॥ २३७॥

महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियश लम्बक का षष्ठ तरंग समाप्त

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1. पंचतन्त्र के तीसरे काकोलूकीय तन्त्र की कथा मूल, यही कथा है। अनु०

2. पंचतन्त्र में इस कथा का प्रारम्भ इस प्रकार है-
व्यपदेशेन महतां सिद्धिः सब्जायते परा।
शशिनो व्यपदेशेन वसन्ति ग्राशकाः सुकम् ।।

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