5704. || चतुर्थ कहानी || राजा विक्रमादित्य और मवनमाला बेश्या की कया; प्रपञ्चबुद्धि नामक भिक्षुक की कथा

5704. || चतुर्थ कहानी || राजा विक्रमादित्य और मवनमाला बेश्या की कया; प्रपञ्चबुद्धि नामक भिक्षुक की कथा

चतुर्थ तरङ्ग

राजा विक्रमादित्य और मवनमाला बेश्या की कया

गोमुख से कही गई कथा को सुनकर प्रसन्न हुए नरवाहनदत्त को देखकर उससे मरुभूति बोला-

स्त्रियाँ अधिकांशतः अवश्य ही चंचल (दुराचारिणी) होती हैं' यह कोई निश्चित बात नहीं है। ऐसी वेश्याएँ भी देखी जाती हैं, जो सत्त्वगुणवाली (सदाचारिणी) होती हैं। दूसरी स्त्रियों की तो बात ही क्या ? ॥१-२॥

महाराज ! मैं इस विषय में एक प्रसिद्ध कथा सुनाता हूँ, सुनिए । पाटलिपुत्र नगर में विक्रमादित्य नामक राजा था। उसके दो परम प्रिय मित्र राजा थे। एक का नाम हयपति और दूसरे का गजपति था। इन दोनों राजाओं को मेना में हाथी और घोड़े प्रचुर मात्रा में थे ॥३-४।।

उस राजा विक्रम का एकमात्र शत्रु प्रतिष्ठानपुर का बलवान्-राजा नरसिंह था, जो उसके वश में नही आया था ॥५१॥

राजा विक्रम उस शत्रु के प्रति क्रोध करके और मित्र राजाओं के घोड़ों और हाथियों की शक्ति पर विश्वास करके आवेश में यह प्रतिज्ञा कर बैठा कि मुझे प्रतिष्ठान-नरेश पर ऐसी विजय प्राप्त करनी है कि वह मेरे द्वार पर भाटों और भृत्यो द्वारा सेवकों के समान सूचना दिये जाने पर प्रवेदा गा मके ।॥६-७।।

ऐमी प्रतिज्ञा करके द्वापति और गजपति नामक दोनों मित्रो से सम्मति करके उनके साथ ही हाथी-घोडों से पृथ्वी को टोदना हुआ अपनी समस्त सेना के माथ प्रतिष्ठान-नरेश पर आवेश के साथ बढ़ गया ।। ८-९॥

विक्रम की चढ़ाई का समाचार सुनकर राजा नरसिंह भी अपने पैदल सैनिकों के साथ युद्ध के लिए समरभूमि में निकल आया ॥१०॥

वहाँ उन दोनों का आश्चर्यजनक घमासान युद्ध हुआ, जिसमें पैदल सैनिक घोड़ो और हाथियों के साथ लड़े ॥११॥

क्रमशः नरसिंह के एक करोड़ पैदल सैनिकों से, विक्रम की सेना हार गई और भाग गई, विक्रमादित्य भी भागकर पाटलिपुत्र में चला आया और उसके मित्र अश्वपति (ह्यपति) तथा गजपति भी अब अपनी-अपनी राजधानियों को चले गये ।।१२-१३॥

शत्रु पर विजय प्राप्त किया हुआ राजा नरसिंह भी, विजयलक्ष्मी के साथ बन्दी-चारणों से स्तुति किया जाता हुआ अपने प्रतिष्ठान नगर में गया ।॥१४॥

तब पराजित राजा विक्रमादित्य ने सोचा कि शत्रु शस्त्रों से अजेय है। अतः, नच्छा हो कि इसपर बुद्धि से विजय प्राप्त करूँ ।॥१५॥

भले ही कुछ लोग निन्दा करे, किन्तु मेरी प्रतिज्ञा झूठी न होनी चाहिए ऐमा सोचकर और राज्यकार्य का भार, मन्त्रियों पर डालकर एक सौ राजपूतों तथा पाँच विशेष अंगरक्षकों के साथ गुप्त रूप से साधु का वेश बनाकर राजा विक्रमादित्य प्रतिष्ठानपुर पहुंचा ।।१६-१८।।

वहाँ जाकर वह राजा राजभवन के समान महान् और सुन्दर मदनमाला नाम की वेश्या के भवन में जा पहुंचा ॥१९॥

यह विशाल भवन, (वायु से कम्पित कपडों की झंडियों के) हिलते हुए वस्त्रों से मानों अतिथियों को हाथ में आमन्त्रित करता था। उस भवन के पूर्वी द्वार पर बीस हजार सैनिक सिपाही, दिन-रात रक्षा करते थे और अन्य तोनों दिशाओं के द्वारों पर दस-दस हजार शूर-बीर मैनिक पहरा देते थे ।।२०-२२॥

वह भवन कहीं, घोड़ों की फैली हुई पंक्तियों से शोभित हो रहा था। कही हाथियों की घन-घटा से भरा हुआ था। कहीं विविध अन्त्र-शस्त्रों की सुन्दर सजावट थी। कहीं बमचमाते रत्नों और खजानों से उज्ज्वल था। कहीं संगीत और मृदंग की मधुर स्वर-लहरी लहरा रही थी। सात प्राकारों (घेरों) में बंटे हुए उस भवन को देखता हुआ राजा मदनमाला के ऊँचे भवन पर पहुंचा ।।२३-२७॥

मदनमाला ने उन प्राकारों में अभिप्राय के साथ हाथी, घोड़े आदि को देखते हुए उस राजा के गुप्तचरों द्वारा समाचार जानकर उसे गुप्त बने हुए उच्च कोटि का व्यक्ति समझ लिया और उसके आने पर उसकी अगवानी करती हुई उसे नमस्कार करके बड़ी अभिलाषा और आदर के साथ लाकर राजाओं के योग्य आसन पर बिठाया ॥ २८-२९॥ 

राजा ने भी उसके सौन्दर्य, लुनाई एवं विनय से आकृष्ट होकर अपने को छिपाये हुए ही उसका समुचित अभिनन्दन किया ॥३०।।

तब मदनमाला ने स्नान, बहुमूल्य फूल, इत्र, वस्त्र, भूषण आदि से राजा का सत्कार किया ॥३१॥

राजा के अनुयायियों का भी समुचित भोजन आदि विविध प्रकार से आतिथ्य-सत्कार किया ॥३२॥

उसके दर्शन से वशीभूत मदनमाला ने पान (मद्यपान), संगीत आदि से दिन-भर उसका मनोरंजन किया और अपने को राजा के लिए अर्पित कर दिया ॥ ३३॥

उत्स वेश्याद्वारा प्राप्त, चक्रवर्ती राजा के योग्य सेवा-सत्कार का इसी प्रकार सेवन करता हुआ राजा कुछ दिनों के लिए वहीं गुप्त रूप से रहने लगा ।। ३४।॥

याचकों को प्रतिदिन वह जितना जो कुछ भी देता था, मदनमाला वह सब लाकर स्वयं रख देती थी ॥३५॥

मदनमाला राजा पर इस प्रकार आसक्त थी कि अन्य लोगों के संपर्क से दूर रहकर, राजा विक्रम में उपभोग किये जाने धन और गरीर को मफल और धन्य समझती थी। यहाँ तक कि प्रतिष्ठान नगर के राजा नरसिंह को भी विक्रमादित्य के प्रेम के कारण किसी बुक्ति में उसने आने से रोक दिया ॥३६-३

इस प्रकार, मदनमाला से सेवित राजा विक्रम ने, अपने माथ रहनेवाले मन्त्री बुद्धिवर से एकान्त में कहा- 'वेश्या अवको होनी है। अर्थ के बिना वह कामदेव पर भी प्रसन्न नहीं होती। ब्रह्मा ने मिभुकों का निर्माण करके और उनमे लोभ को लेकर वेश्याओं को दे दिया ॥३८-३९॥

किन्तु, यह मदनमाला धन का अत्यन्त स्वतन्त्र उपभोग करते हुए भी मुझ पर अत्यन्त म्नेह के कारण विरक्त नहीं है, बल्कि प्रसन्न है ।॥४०॥

तो मैं अब इसका प्रत्युपकार कैसे करूं? जिससे क्रमशः मेरी प्रतिज्ञा भी सिद्ध हो सकें ॥४१॥

यह सुनकर मन्त्री बुद्धिबर राजा विक्रम से बोला- 'यदि ऐसा ही है, तो प्रपंचबुद्धि नाम के भिक्षु (तपस्वी) ने जो तुम्हें रत्न दिये थे, उन बहुमूल्य रत्नों को इसे भेंट कर दो ॥४२॥

तब राजा ने कहा- उन सब रत्नों के देने पर भी इसका कुछ भी बदला नहीं चुकाया जा सकता। उसके वृत्तान्त से सम्बद्ध उसका प्रत्युपकार करने का और ही उपाय है ॥४३-४४॥

यह सुनकर मन्त्री ने कहा- 'महाराज! उस भिक्षु ने आपका कौन-सा उपकार किया, उसे बताइए।' राजा ने कहा सुनो, उसकी कथा मैं तुम्हें सुनाता हूँ- ॥४५-४६।।

प्रपञ्चबुद्धि नामक भिक्षुक की कथा

प्राचीन समय में, पाटलिपुत्र (पटना) में प्रपंचबुद्धि नाम का भिक्षु (तपस्वी) प्रतिदिन दरबार में आकर मुझे एक बन्द डिब्बा देता था। एक वर्ष तक प्रतिदिन वह डिब्बा देता रहा और मैं उसे उसी प्रकार (विना खोले हो) भाण्डार के अधिकारी को दे देता था ॥४७-४८॥

एक बार उस भिक्षु में दिया गया रत्न का डिब्बा दैवयोग से मेरे हाथमे गिरकर दो टुकड़े हो गया। उसके अन्दर से आग के समान जलता हुआ चमकीला रत्न निकला, मानों उस डिब्बे ने पहले मेरे द्वारा न जाने हुए अपने हृदय का प्रदर्शन किया ॥ ४९-५०।।

उसे देखकर मैंने सभी पुराने डिब्बे मँगाये और उनके बोलने पर सबमें ऐमे चमकीले अमूल्य रत्न निकले ॥५१॥

तब मैंने प्ररंचबुद्धि से पूछा आश्चर्य है कि तुम ऐगे अमूल्यरत्नों में मेरी सेवा क्यों कर रहे हो ? ॥५२॥

तब वहाँ मे मब लोगों को हटाकर वह भिक्षु बोला- 'इसी आनेवाली कृष्ण चतुर्दशी को मैं रात के समय एक विद्या की सिद्धि करूंगा। उसमें बाहरी सहायता के लिए तुम्हारे ऐसे वीर की आवश्यकता है। वोर की सहायता में विघ्न दूर होने पर सहज में ही सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं' भिक्षु के ऐसा कहने पर मैंने उसकी सहायता करना स्वीकार कर लिया ।।५३-५५।।

उसके प्रसन्न होकर चले जाने पर और कुछ दिनो के व्यतीत होने पर कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि आई। मैंने उस भिक्षु की बात का स्मरण किया ।॥५६ ।।

तब प्रातःकाल उठकर अपना नित्यकर्म करके सायंकाल की प्रतीक्षा करने लगा। सायंकाल की सन्ध्या-विधि करके में रात्रि में जल्दी ही सो गया ।॥५७॥

निद्रा आते ही, स्वप्न में, गरुड़ पर बैठे हुए लक्ष्मी को गोद में लिये भक्तवत्सल भग-वान् ने आदेश दिया-॥५८।।

'यह प्रपंचबुद्धि नाम के अनुसार प्रपंचबुद्धि ही है। हे पुत्र वह मण्डल की पूजा में तुम्हें श्मशान में से आकर तुम्हारा बलिदान करेगा ।।५९॥

इसलिए, तुम्हें मारने के लिए जो कुछ कहे, वह न करना। उससे कह‌ना कि पहले तुम क्रिया करके हमको सिखाओ, तो मैं करूँगा ।॥ ६०॥

जब वह तुम्हें सिखाने के लिए उस प्रकार करे, तब तुम उसकी युक्ति से उसी क्षण उसे मार देना। इस प्रकार वह जिन सिद्धि को चाहता है, वह तुम्हें मिलेगी ॥६१॥

विष्णु भगवान् के ऐमा कहकर अन्तर्वान होने पर मैंने उठकर सोचा- मैंने मावावी को भगवान् की कृपा से जाना और मुझ ने वह मारा जायगा ।॥६२॥

ऐसा मोचकर एक पहर रात बीतने पर नंगी तलवार लिये हुए मैं अकेला श्मशान पहुँचा ॥६३॥

वहाँ मण्डल की पूजा किये हुए उम भिक्षु को देखकर मैं उसके समीप गया। वह भी धूर्त मुझे देखकर प्रसन्नता प्रकट करते हुए बोला- ॥६४॥

'आँखे बन्द करके अंगों को फैलाकर नीचे मुंह किये हुए पृथ्वी पर प्रणाम करी। राजन् ! इस प्रकार हम दोनों को एक गमान मिद्धि प्राप्त होगी' ॥६५॥

नब मेने उसमें कहा- 'पहले तुम इग प्रकार प्रणाम करो। पहले मुझे करके दिखाओ, तव में भी इसी प्रकार कम्गा ॥६६॥

ऐसा सुनकर वह मूर्ख श्रमण उसी प्रकार करने लगा। मैंने तहबार से उसका सिर काट डाला ।।६।।

इसके बाद ही आकाश में वाणी हुई 'राजन् ! बहुत अच्छा किया, जो इस पापी भिक्षु का बलिदान कर डाला ॥६८॥

इसलिए में धनाधिप कुबेर, तुम्हारे पैयं से प्रसन्न हूँ। इसलिए, मुझसे और जो कुछ चाहता है, वह और वर माँग।' ऐसा कहकर प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होकर सामने आये कुबेर को प्रणाम करके मैंने कहा- 'भगवन्! आवश्यकता पड़ने पर मैं जब भी तुमसे प्रार्थना करूँ, तब तुम स्मरण-मात्र से उपस्थित होकर मुझे वर प्रदान करना ॥६९-७१।।

'ऐसा ही होगा', मुझे ऐसा कहकर कुबेर अन्तर्धान हो गया और में सिद्धि प्राप्त करके शीघ्र अपने भवन में आया ॥७२॥

यह मैंने तुझे अपना बुसान्त सुना दिया। अब उसी कुबेर देवता के वर से मदनमाला का प्रत्युपकार करता हूँ ।।७३।

इसलिए, बुद्धिवर ! तुम बेश से छिपे हुए राजपूतों की सेना लेकर पाटलिपुत्र जाजो। मैं अपनी प्यारी की तुरन्त प्रतिक्रिया (प्रत्युपकार) करके पुनः यहाँ बाने के लिए वही नाता हूँ' ।।७४-७५।।

विक्रमादित्य ने मन्त्री को ऐसा कहकर और दिन-भर के कार्य करके नौकरों और सिपाहियों के साथ मंत्री को भेज दिया ॥७६॥

इस प्रकार मन्त्री के चले जाने पर, राजा ने भावी वियोग की उत्कष्ठा से वह रात मदनमाला के साथ व्यतीत की ।।७७।।

वह मदनमाला दूर होने वाले राजा के वियोग की मानों सूचना देते हुए हृदय से अतृप्त होकर आलिंगन करती हुई उस रात में मोई नहीं ॥७८॥

प्रातःकाल राजा नित्य कृत्य करके जप करने के बहाने अकेला ही देवता के पूजा-घर में गया ।॥७९।।

वहाँ उसने स्मरण करने से ही उपस्थित कुबेर देवता को बुलाकर और प्रणाम करके इस प्रकार प्रार्थना की-॥८०॥

'हे देव ! पहले स्वीकार किये हुए वर के अनुसार तुम मुझे मोने के ऐसे पाँच अक्षय पुरुष प्रदान करो, जिन्हें प्रतिदिन बार-बार काटकर दान कर देने पर उनके कटे अंग पुनः पूर्ववत् हो जायें ॥८१-८२॥

'ऐसा ही होगा; जैसे पुरुष तुम चाहते हो, तुम्हें मिलेगे' ऐसा कहकर कुबेर देवता अन्तर्द्धन हो गये ॥८३॥

राजा ने भी उनी समय उस देवमन्दिर में अकस्मात् रखे हुए सोने के पांच पुरुष देखें। तब राजा भी अपनी प्रतिज्ञा को बिना भुलाये देवगृह से निकलकर और आकाश में उड़कर पाटलिपुत्र नगर को चला गया ।।८४-८५।।

वहाँ रानियों, मन्त्रियों एवं जनता के द्वारा अभिनन्दन किया गया राजा प्रतिष्ठान की ओर बुद्धि लगाये हुए रहने लगा ॥८६॥

इधर प्रतिष्ठान में उसकी प्यारी प्रेयसी मदनमाला, अत्यन्त बिलम्ब देखकर राजा को देखने के लिए उस देवगृह में गई ॥८७॥

उसमें जाकर उसने कहीं भी राजा को नहीं देखा, प्रत्युत वहाँ बड़े ऊँने पाँच सोने के पुरुषों को देखा ।। ८८॥

उन्हें देखकर और राजा को न देखकर वह (मदनमाला) सोचने लगी कि वह मेरा प्यारा अवश्य कोई विद्याधर है या गन्धर्व है।॥८९॥

जो मेरे हिस्से में ये पाँच सोने के पुरुष देकर आकाश में उड़ गया, तो उससे वियुक्त होकर इन व्यर्थ भार-स्वरूप पुरुषों को क्या करूंगी ॥९०॥

ऐगा सोचकर पूजागृह से बाहर निकलकर अपने सेवकों से उसका समाचार बार-बार पूछती हुई मदनमाला, पागलों की भाँति इधर-उधर घूमने लगी ॥९१॥

भवन, उद्यान आदि कहीं भी उमे शान्ति न मिली। वह राजा के वियोग से पीड़ित होकर अपना गरीर-त्याग करने का प्रयत्न करने लगी ॥९२॥

'हे देवि ! दुःख न करो। वह अकस्मात् आया हुआ देवता, पुनः तुम्हारे पास आयेगा' ।॥९३॥

इस प्रकार, आशा और आश्वासन देनेवाले परिजनों के वाक्यों से आश्वासित मदनमाला ने प्रतिज्ञा यह कर ली कि यदि वह मेरा प्यारा छह महीनों के अन्दर दर्शन न देगा, तो में अपना सर्वस्व-दान करके अग में जलकर मर जाऊँगी ॥९४-९५।।

ऐसी प्रतिज्ञा करक और अपने को किसी प्रकार रोककर प्रतिदिन दान देनी और अपने त्रिय का प्यान करती हुई वह किसी तरह जीवित रहने लगी ।॥९६॥

एक बार परम दानी उसने सोने के पुरुषों में से एक के हाथों को कटवाकर ब्राह्मणों को दान दे दिया ।।९७৷৷

दूसरे दिन, उसने देखा कि उसके हाथ उसी तरह रात-भर में फिर से पैदा हो गये हैं! इसने उसे आश्चर्य हुआ ॥९८॥

इसी प्रकार, उसने क्रमशः सभी पुरुषों के हाथ कटवाकर दान कर दिये; किन्तु रात-भर में वे हाथ उसी प्रकार उग गये ॥९९॥

तदनन्तर, उसने उन पुरुषों को अक्षय देखकर ब्राह्मणों को वेद की संख्या से दान करना प्रारम्भ किया। अर्थात्, जो ब्राह्मण, जितने वेद जानता था, उतने हाथ उसे दान में देने लगी ॥१००॥

कुछ दिनों में उस के दान की प्रसिद्धि चारों ओर फैल गई। उसकी इस प्रसिद्धि को सुनकर संग्रामदत्त नामक ब्राह्मण पटलिपुत्र से आया ॥१०१॥
वह दरिद्र और गुणी चतुर्वेदी ब्राह्मण, दान लेने के लिए द्वारपालों से निवेदन किये जाने पर उसके समीप गया ।॥१०२॥

उस मदनमाला ने व्रत से कृश और विरह में पीले पड़ गये अंगों से, उस ब्राह्मण की विधिवत् पूजा करके सोने की चार भुजाएँ उसे प्रदान कीं ।॥१०३।।

उस ब्राह्मण ने उसके दुःखी परिवार से उसकी कष्ट-कया और अन्त में अग्नि-प्रवेश की प्रतिज्ञा सुनकर मन में खेद प्राप्त किया ॥१०४।।

तित्र, और गाथ ही ब्राह्मण मोने की भुजाओं को दो ऊँटों पर लादकर अपने घर पाटलिपुत्र को चला गया ।॥१०५।

घर पहुँचकर उनने सोचा कि यदि यह सोना राजा द्वारा रक्षित न किया गया, तो मेरा कल्याण नहीं है, ऐमा मोचकर वह बाह्मण दरवार में बैठे हुए राजा विक्रमादित्य के पास गया और निवेदन करने लगा- 'महाराज! मैं इसी नगर का रहनेवाला ब्राह्मण हूं। मैं दरिद्र, धन के लिए दक्षिण दिशा के महाराज नरसिंह के प्रतिष्ठान नगर में गया था। वहाँ दाताओं में प्रसिद्ध यशस्विनी मदनमाला के घर गया था। उसके पास एक दिव्य पुरुष कुछ दिनों तक रहकर और उसे मोने के पाँच अक्षय पुरुष देकर कही चला गया। उसके वियोग से पीड़ित मदनमाला, जीवन को विय-वेदना, देह को निष्फल और आहार को चोर-यातना समझकर जीवित है। उसने सेवकों के आश्वासन देने पर यह प्रतिज्ञा की है कि 'यदि वह मेरा प्यारा पति, छह महीने के अन्दर आकर मुझे नहीं संभालेगा, तो में अभागिन जाग में प्रवेश करूँगी ॥१०६-११३॥

इस प्रकार, प्रतिज्ञावद्ध मदनमाला मरने के लिए उद्यत होकर अत्यविक पुण्य-लाभ की इच्छा से प्रतिदिन बहुत दान देती है। ॥११४॥

महाराज ! मैंने उसे देखा है। उसके पैर लड़खड़ाते हैं, किन्तु अनाहार से दुर्बल होने पर भो उमका शरीर अति मनोहर है। दान के जल से उसके हाथ सदा गीले रहते हैं। घेरे हुए भौंरों से उसके केश व्याकुल रहते हैं। वह काम-रूपी हाथी की शरीरधारिणी मदावस्था के समान प्रतीत होती है ।॥११५-११६॥

मेरी समश्च से वह कामी निन्दनीय और प्रशंसनीय भी है। जिसने उसे छोड़ दिया है, वह इतना कमनीय भी है कि वह उसके बिना प्राण देने जा रही है।॥११७॥

उसने चार वेद जाननेवाले मुझे वेदों की संख्यानुसार चार सोने के पुरुष के हाथ दिये हैं ।॥११८॥

उन्हें सत्रगृह बना करके स्वधर्म-सेवा में लगाना चाहता हूँ और चाहता हूँ कि आप उसके संरक्षक बनें ॥११९॥

उस ब्राह्मण के मुख से यह प्रियवार्ता सुनकर राजा विक्रमादित्य का मन मदनमाला ओर खिंच गया ।१२०।।

और, ब्राह्मण का कार्य करने के लिए प्रतीहार को आज्ञा देकर मदनमाला को दूद्ध प्रेमवाली और अपने लिए जीवन को तृण समान समझनेवाली जानकर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने में उत्कण्ठित राजा ने मदनमान्ला के जीवन को स्वरूप दिनों का समझकर शीघ्र ही मन्त्रियों पर राज्य-भार डालकर आकाश-भागं में राजा प्रतिष्ठान नगर को प्रस्थान किया और अपनी प्रेयसी के घर पहुंचा ।।१२१-१२३॥

वहाँ उसने चाँदनी में स्वच्छ वस्त्र पहने हुई अपने वैभव को ब्राह्मणों के लिए अर्पित की हुई दुर्बल मदनमाला को अमावस्या की चन्द्र-कला के समान देखा ॥१२४।।

वह मदनमाला भी आँखों के लिए अमृत-तत्त्व के समान महसा आए हुये राजा को देखकर क्षण-भर के लिए स्तब्ध एवं चकित-मी हो गई ॥१२५॥

तदनन्तर, उनने उठकर राजा को मानों इसलिए बाहुपादा में बाँध लिया कि कहीं फिर भाग न जाय ।।१२६ ॥

और, हे क्रूर ! मुझ निरपराध ? को छोड़कर क्यों चले गये इस प्रकार आँसुओं से हँधे काण्ड से बोली--।। १२॥

'आओ, एकान्न में कहूंगा' ऐमा कहकर राजा उसे घर के भीतर एकान्त में ले गया। राजा के आ जाने पर मदनमाला के परिवार (सेवक आदि ने) प्रसन्नता भनाई और राजा का अभिनन्दन किया ॥१२८॥

एकान्त में जाकर राजा ने अपने को प्रकट करके उसे अपना वृत्तान्त सुनाया- जैसेकि वह राजा नरसिह को जीतने के लिए पहले आया था ।। १२९॥

और, जैसे प्रपंचबुद्धि भिक्षु को मारकर आकाश में उड़ने की शक्ति प्राप्त की थी और जैसे कुबेर से वर प्राप्त करके उसे सोने के पुरुष प्रदान किये और जैसे ब्राह्मण द्वारा उसका समाचार सुनकर पुनः वहां आया यह सारा वृत्तान्त राजा ने मदनमाला को विस्तार से सुना दिया ॥१३०-१३१॥

यह कहकर अपनी प्रतिज्ञा सुनाकर फिर बोला- 'प्रिये! यह राजा अत्यन्त बलवान् है, अतः अजेय है। यह मेरे साथ द्वन्द्व-युद्ध कर सकता था; क्योंकि मैं आकाशचारी होकर भूमि-बारी को मारना नहीं चाहता था। कौन व्यक्ति, क्षत्रिय होकर अधर्म-युद्ध से विजय प्राप्त करना चाहेगा? ।।१३२-१३३।।

इसलिए, मेरी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए द्वार पर आये हुए नरसिंह के आगमन की सूचना दिलाने में मेरी सहायता करो ॥१३४।।

यह सुनकर वेश्या बोली- 'मैं धन्य हूँ।' तदनन्तर गजा से आवश्यक परामर्श करके वेश्या ने अपने बन्दियों को बुलाकर कहा- "राजा नरसिंह जब मेरे घर पर आयेगा, तब तुम लोग उनपर दृष्टि रखते हुए द्वार के पास ही रहना और उसके द्वार में प्रवेश करने के समय कहना-'महाराज ! राजा नरसिंह आप पर भक्ति और अनुराग रखता है। यदि राजा नरसिह, उस समय यह कहे कि यहाँ कौन ठहरा है. तो कहना कि यहाँ राजा विक्रमादित्य है।" ऐसा कहकार और उन्हें विदाकर, मदनमाला ने द्वारपालिका से कहा- 'यहाँ बन्दर बाते हुए राजा नरसिंह को रोकना नहीं' ॥१३५-१३९॥

ऐमा प्रबन्ध करके प्राणनाथ को पुनः प्राप्त की हुई मदनमाला भिक्षुओ को असंख्य धन देती हुई राजा के साथ मुम्ब से रहने लगी ॥१४०॥

नदनन्तर, मोने के तुरुपी द्वारा असंख्य दान करती हुई मदनमाला का समाचार सुनकर चकित राजा नरसिंह उस वेश्या के घर का परित्याग कर देने पर भी, सोने के पुरुषों को देखने के लिए उसके यहाँ आया ।॥ १४१॥

द्वारपालों में न रोके हुए राजा नर्गमह के भीतर आते ही मदनमाला के बन्दीजन, बाहरी द्वार में ही जोर में चिल्लाकर बोले- महाराज राजा नरसिंह आपके प्रति भक्ति रखता है! और भक्त है।' यह सुनकर राजा नरसिह क्षण भर के लिए क्रोध और शंका से भर गया ।।१४२-१४३॥

उसने पूछा कि यहाँ कोन ठहरा है? राजा विक्रमादित्य को वहाँ ठहरा हुआ जानकर राजा नरसिंह ने एक क्षण के लिए सोचा- ॥ १४४॥

राजा विक्रम ने पहले ही द्वार पर मेरी सूचना दिलाने की प्रतिज्ञा की थी, उस प्रतिज्ञा को राजा ने हठात् मेरे घर में घुसकर ही पूरा किया ॥१४५।।

आश्चर्य है कि यह राजा बहुत तेजस्वी है, जिसने आज ही मुझे जीत लिया और एकाकी एवं मेरे घर पर आया हुआ यह मेरे लिए मारने योग्य भी नहीं है ॥१४६॥

अच्छा जो हो, मैं अन्दर जाता हूँ। देखा जायगा'। इस प्रकार सोचता और बन्दियों से सूचित किया जाता हुआ राजा अन्दर गया ।॥१४७॥

उसके अन्दर आते ही मुस्कराते हुए राजा विक्रमादित्य ने उठकर उसे गले से लगा लिया ॥१४८॥

तदनन्तर मदनमाला के समीप ही बैठे हुए दोनों ने आपस में कुशल-मंगल पूष्छा ।। १४९।। वार्तालाप के सिकमिले में राजा नरसिंह ने, विक्रमादित्य से पूछा कि 'ये सोने के अनुष्य कैसे आये ? ॥१५०।।

तब उसी प्रसंग में राजा विक्रम ने प्ररंचबुद्धि भिक्षु का मारना, धनपति कुबेर से आकाश-ति और अअयमुवर्ग के पांच महारुयों की प्राप्ति की वह आश्चर्यभरी समस्त कथा कह सुनाई ॥१५१-१५२।।

विक्रम का वृत्तान्न मुनकर उने आकाशचारी एवं महाशक्तिशाली जानकर नरसिह ने मित्रता के लिए प्रस्ताव किया और मित्रता प्राप्त की ।॥१५३॥

इस प्रकार, मित्रता प्राप्त करने पर राजा नरमिह ने विक्रम को अपनी राजधानी में ले जाकर राजोचित स्वागत-सत्कार से सम्मानित किया और उसके द्वारा सम्मानित राजा विक्रम फिर से मदनमाला के घर पर आ गया ।॥१५४-१५५।।

इस प्रकार, अपने बन्न और प्रतिमा-प्रकयं ने अपनी आमावारण प्रतिज्ञा को पूरी करके राजा विक्रमादित्य ने. अपने नगर पाटलिपुत्र में जाने का विचार किया ॥१५६॥

राजा के वियोग को सहन न करनी हुई मदनमाला भी अपने देश का त्याग कर और अपनी सम्पत्ति ब्राह्मणों को दान करके राजा के साथ पाटलिपुत्र जाने को उद्यत हुई ॥१५७७॥

तब राजाओं में बन्द्रमा के समान वह राजा विक्रमादित्य, अनन्य चित्तवाली प्राणप्रिया मदनमाला को उसके हाथी, घोड़े ओर नैनिकों के माय, अपने पाटलिपुत्र नगर में ले आया ॥१५८॥

राजा नरसिह के दृढ स्नेहयुक्त मौहार्द से मन्तुष्ट राजा विक्रम, प्रेम के कारण स्वदेश को छोड़कर आई हुई मनदभाला के साथ मुखपूर्वक रहने लगः ॥१५९॥

हे महाराज (तरवाहनदल), इस प्रकार वेश्याएँ भी उदारचरित और वैसी ही मदाचारिणी होती हैं- जैसी महः रानियाँ। अन्य कुलीन स्त्रियों की तो बात ही क्या ।।१६०।।

इसप्रकार, मरुभूति के मुख से उदार कथा को सुनकर राजा नरवाहनदत्त और उसकी उत्तम विद्याधर-कुल में उत्पन्न नववधू रत्नप्रभा ने अत्यधिक आनन्द प्राप्त किया ॥१६१॥

महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का चौया तरंग समाप्त

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