5706. || षष्ठ कहानी || मरुभूति और गोमुख का पारस्परिक वास्कलह; सिकता-सेतु की कथा; विरूपशर्मा ब्राह्मण की कथा;
5706. || षष्ठ कहानी || मरुभूति और गोमुख का पारस्परिक वास्कलह; सिकता-सेतु की कथा; विरूपशर्मा ब्राह्मण की कथा;
षष्ठ तरंग
मरुभूति और गोमुख का पारस्परिक वास्कलह
तदनन्तर प्रातः काल रत्नप्रभा के महल में बैठे हुए नरवाहनदत्त के पास गोमुख आदि मन्त्री पुनः आये ॥१॥
किन्तु, मरुभूति मन्त्री मद्य के नशे में कुछ अलसाता हुआ फूलों का गजरा डाले और इत्र आदि लगाये हुए लड़बड़ाती हुई गति और जबान से अन्य मित्रों को हँसाता हुआ कुछ देर से नाया, उसकी इस दशा से मुस्कराते हुए गोमुख ने मजाक करते हुए कहा ॥२-३॥
'तुम यौगन्धरायण के पुत्र होकर भी नीति नहीं जानते। प्रातःकाल शराब पीते हो और नशे की बेहोशी में राजा के पास आते हो ?'
यह सुनकर क्रोध से बेहोश मरुभूति गोमुत्र से बोला- 'यह बात तो ये मेरे स्वामी (राजा) या मेरे पिता कह सकते हैं' ।।५।।
अरे 'इत्यक' ('द्वारपाल) 'के बेटे ! बोलो तो सही। तुम मुझे शिक्षा देते हो?' ऐसा कहते हुए मरुभूति से गोमुख ने फिर कहा- 'क्या प्रभुजन अविनीत (उद्दण्ड) को अपनी बातों से फटकारते हैं। ऐसी बातें तो राजा के पारर्ववत्र्ती व्यक्ति ही कह देते हैं। यह सच है कि मैं इत्यक (द्वारपाल) का पुत्र हूँ और तुम मन्त्रिवृषम (बैल और श्रेष्ठ) हो। तुम्हारी यह स्थिति ही तुम्हारी मूर्खता (बैलपन) बता रही है। केवल दो सींग ही तो नहीं हैं।' ॥६-८॥
गोमुख से ऐसा कहा गया मरुभूति बोला- 'बैलपन तो तुम्हें हैं। अधिक सजता है, तुम्हारा नाम ही गो-मुख है। फिर भी, जो तुम्हारी उद्दण्डता है, उसका कारण तुम्हारी वर्णसंकरता ही है' यह सुनकर सब लोगों के हँस देने पर गोमुख फिर बोला- ॥९-१०॥
'यह मरुभूति, वह रत्न है, जिसमें मैकड़ों यत्न करने पर भी इस अवेध्य रत्न में गुण (सूत) का प्रवेश कौन ककारा मकता है।॥ ११॥
दूसरा कोई पुरुष-रत्न हो, तो उसका बेधन विना प्रयत्न से ही हो जाता है। इस प्रसंग में सिकता-सेतु का उदाहरण मुनाता हूँ। - ॥१२॥
सिकता-सेतु की कथा
प्रतिष्ठान नामक नगर में तरोदत्त नाम का कोई ब्राह्मण था, वह पिता के अनेक कष्ट देने पर भी बाल्यावस्था में अध्ययन नहीं कर सका ।॥१३॥
पिता के मरने पर सभी लोगों से तिरस्कृत किया जाता हुआ वह अत्यन्त विरक्त होकर विद्या की सिद्धि के लिए गंगातट पर तप करने गया ।॥१४।।
वहाँ पर अत्यन्त उम्र तपस्या में लगे हुए उसे देखकर आश्चर्य चकित इन्द्र, ब्राह्मण के कपट-वेश में वहाँ गया ।।१५।।
वहाँ पर बैठकर इन्द्र लहरोंवाले गंगा के जल में बालू उठा-उठाकर फेंकने लगा और वह ब्राह्मण उसे देखता रहा ।।१६।॥
उसके इस खेल को देलकर वह ब्राह्मण अपना मौन अंग करके बोला- हे ब्राह्मण ! विना थकावट के यह तुम क्या कर रहे हो ? ' ॥१७॥
आग्रहपूर्वक पूछने पर बाह्मण बना हुआ इन्द्र बोला- जीवों को गंगा पार जाने के लिए पुल बाँध रहा हूँ' ।॥ १८॥
यह सुनकर तपोदत्त बोला- हे मूलं! लहरों से इधर-उधर बिखरनेवाली बालू से भला कहीं पुल बँघता है?' ॥१९॥
यह सुनकर ब्राह्मण-रूपी इन्द्र बोला- 'यदि तुम यह समझते हो, तो तुम बिना पड़े-सुने विद्या कैसे प्राप्त करोगे ? ॥२०॥
व्रत और उपवास आदि से तुम विद्या प्राप्त करने के लिए क्यों उत्सुक हो रहे हो। यह तो खरगोश के सींग के समान या आकाश में चित्र-रचना के समान व्यर्थ बात है ॥२१॥
विना अक्षर जाने लिखना और विना अध्ययन के विद्या-प्राप्ति हो जाये, तो कोई भी कभी अध्ययन न करें' ।॥ २२॥
ब्राह्मण-रूपी इन्द्र में इस प्रकार कहा गया तपोदत्त ब्राह्मण उसकी बात पर विचार कर और उसे ठीक मानकर तप करना छोड़कर घर चल गया ॥२३॥
इन प्रकार, बुद्धिमान् व्यक्ति को सरलता से ज्ञान कराया जा सकता है, किन्तु मरुभूति तो दुष्टबुद्धि है। इसे जनाया नहीं जा सकता। कुछ बताने या ज्ञान देने पर क्रुद्ध हो जाता है ॥२४॥
गोमुख के ऐसा कहने पर हरिशिख ने बीच में ही कहा- 'राजन् ! यह सच है, बुद्धिमान् व्यक्ति की मरलता से ही समझाया जा सकता है' ।॥२५॥
इम प्रसंग में कया सुनें-
विरूपशर्मा ब्राह्मण की कथा
पूर्वकाल में वाराणमी नगरी में विरूपरार्मा नाम का एक दरिद्र ब्राह्मण था ॥२६॥
वह अपनी कुरूपता और दरिद्रता से अत्यन्त विरक्त होकर जंगल में जाकर रूप और घन की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या करने लगा ॥ २७।।
तब देवराज इन्द्र, बिगड़े और बीमार सियार का रूप धारण करके उसके आश्रम में आकर उसके समीप खड़े हुए। सड़े-गले और मक्खियों से भरे शरीरवाले उस सियार को देखकर विरूपशर्मा अपने मन में सोचने लगा ॥२८-२९।।
संसार में, अपने पूर्व कर्मों के कारण ऐसे प्राणी भी होते हैं। इस दृष्टि से दैव ने मुझे बहुत अल्प मात्रा में कुरूप और घृणित बनाया है। दैव के लिखे हुए भोगों का कौन उल्लंघन कर सकता है ? ऐसा समझकर विरुपशर्मा तपस्या के स्थान से अपने घर वापस आ गवा ॥३०-३१॥
हे राजन् ! इस प्रकार अच्छी बुद्धिवाले व्यक्ति साधारण प्रयत्न से ही समझाये जा सकते हैं। अविवेकी गौर कुबुद्धि व्यक्ति अत्यन्त कठिनाई से भी नहीं समझाये जा सकते ॥३२॥
हरिशिख के ऐसा कहने पर और गोमुख के समर्थन करने पर अनात्मज्ञ मरुभूति अत्यन्त क्रोय करके बोला' हे गोमुख! तुम्हारे ऐसे व्यक्तियों की वाणी में ही बल होता है, भुजाओं में नहीं। इसलिए बकवादी नगुंसकों के साथ झगड़ा करना भुजबलशाली वं.रों के लिए उचित नहीं है' ऐसा कहते हुए और युद्ध के लिए उद्यत मरुभूति को मुस्कराते हुए स्वामी नरवाहनदत्त ने स्वयं शान्त किया ॥३३-३५॥
और, बालमित्रों पर प्रेम करनेवाले राजा नरवाहनदत्त ने उसे अपने घर वापस भेजकर दैनिक कार्यों में अपना दिन मुख में व्यतीत किया ॥३६॥
दूसरे दिन, प्रातःकाल पुनः मित्रों के आने पर और मरुभूति के सिर नीचा किये रहने पर रत्नप्रभा युवराज से बोली- हे आर्यपुत्र! तुम धन्य हो, तुम्हारे ये सभी मन्त्री बाल्यकाल से स्नेह-सूत्र में बंधे और शुद्धचित्त हैं ।॥३७-३८ ॥
और ये भी बन्य है, जिनके तुम ऐमे स्नेहमय स्वामी हो। तुम लोग पूर्वजन्म के संस्कारों से परस्पर मिले हां, इसमें मन्देह नहीं, ।॥३९॥
उस रानी रत्नप्रभा के ऐसा कहने पर वमन्तक का पुत्र एवं नरवाहनदत्त का नर्म-सचिव तपन्तक बोला- 'यह सत्य है कि हमारे स्वामी पूर्वजन्म के अजित हैं। यह सब कुछ पूर्वजन्म के संस्कार-वश ही होता है। इम प्रसंग में एक कथा सुनें-॥४०-४१॥
तरुणचन्द्र बैद्य और राजा अजर की कथा
पूर्वकाल, में हिमालय में, विलानपुर नामक नगर में यथार्थ नामवाला विनयशील नामक राजा था ॥४२॥
उसकी प्राणों के ममान प्यारी कमलप्रभा नाम की रानी थी। राजा उसके साथ सांसारिक सुखों के भोग में चिरकाल तक रहा ॥४३॥
कुछ समय के अनन्तर राजा अपने शरीर में सौन्दर्य का नाश करनेवाली वृद्धावस्या को आई देख अत्यन्त दुःखी हुआ ॥४४॥
हिम (बरफ) से जलाये हुए कमल के समान सफेदी से मलिन अपने मुख को देखकर -'हाय ! धिक्कार है! मैं ऐसा मुँह अपनी रानी को कैसे दिखाऊं? इससे तो मर जाना अच्छा है' ऐसा सोचते हुए राजा ने तरुणचन्द्र नामक वैद्य को दरबार में बुलाकर आदर के साथ कहा ॥४५-४६।।
'हे भले आदमी ! तू हमारा हितैषी हैं और कुशल वैद्य है, इसलिए पूछता हूँ कि क्या कोई ऐसी युक्ति भी है कि बुढ़ापे को रोका जा सके' ।॥४७॥
यह सुनकर केवल कलाबाजी जाननेवाला एवं यथार्थ नामवाला वह कुटिल तरुणचन्द्र सोचने लगा ॥४८॥
'यह राजा मूर्ख है और मेरा भोज्य भी। बीरे-धीरे समहूंगा', ऐसा सोचकर राजा से बोला- ॥४९॥
'महाराज ! यदि तुम भूमि के नीचे (तहखाने) में आठ महीनों तक रहकर मेरी ओरषि खाबो, तो मैं तुम्हारा बुढ़ापा दूर कर दूँ ॥५०॥
ऐसा सुनते हैं। गजा ने तुरन्त भू-गृह [तहलाना] बनवाया। विषय-लम्पट मूर्ख विचार करने की शक्ति नह। रचते ॥५१॥
'हे राजन् ! पूर्वजों के तप, दम और युग के प्रभाव से बड़े-बड़े रसायन सिद्ध हो चुके हैं। किन्तु, आजकल समय के प्रभाव से उनका नाम ही रह गया है। बल्कि, ये विपरीत फल देते हैं ।॥५२-५३॥
अतः, यह उचित नहीं है। धूर्त वैद्य मूत्रों के साथ ठगी करते हैं। महाराज! क्या गई अवस्था फिर लौटकर आती है?' ॥५४॥
इस प्रकार मन्त्रियों की बाते राजा के हृदय में पैठ न सकी; क्योंकि राजा का हृदय भोग को प्रबल तृष्णा से भरा हुआ या ॥५५॥
अतः, वह राजा, वैद्य के वचन पर विश्वास करके और राजसी ठाट-बाट छोड़ भू-गृह में अकेला घुसा ॥५६।।
अपने एक भत्य के साथ वैद्य, उस राजा की ओवधि आदि से परिचर्या करने लगा। राजा उस अन्धकारमय भू-गृह में इस प्रकार रहने लगा, मानों उसका अत्यन्त बढ़ा हुआ अज्ञान, हृदय से बाहर निकल पड़ा हो ।॥५७-५८।।
इस प्रकार, छह महीने बीतने पर और राजा की वृद्धावस्या को बढ़ी देखकर वह दुष्ट वैद्य, राजा से मिलती-जुलती आकृतिवाले एक पुरुष को लाया और उस युवा से बोला कि 'मैं तुम्हें राजा बनाता हूँ।' उससे इस प्रकार सम्मति करके उसने दूर से ही भूगृह तक एक लम्बी सुरंग बनवाई और उसके द्वारा भू-गृह में जाकर राजा को मार डाला और रात को अँधेरे कुएँ में उसकी लाश फेंक दी ।।५९-६१١١
और, उसी सुरंग के रास्ते उस युवा पुरुष को मू-गृह में लेजाकर रख दिया और सुरंग को बन्द कर दिया ॥६२॥
बेरोक-टोक मौका पाकर दुष्ट बुद्धिवाले नीच पुरुष, मूर्ख व्यक्तियों पर कौन-सा साहसिक कुकर्म नहीं कर डालते ? ॥६३॥
ऐसा प्रबन्ध करके, दूसरे दिन, प्रातःकाल, वैद्य ने सभी राज-कर्मचारियों से कहा कि मैंने राजा का बुढ़ापा छह महीनों में दूर कर दिया। अब वह जवान हो गया है। शेष दो महीनों में उसका दूसरा ही रूप हो जायगा। इसलिए, आप लोग दूर से ही अब उसे अपने को दिम्बाओ ।॥६४-६५॥
ऐसा कहकर वह एक-एक राज-कर्मचारी को भू-गृह के दरवाजे पर ले जाकर उनका नाम और पद बतलाकर दिखाने लगा ।॥६६।।
इस प्रकार, दो महीनों तक उसने रानियों तक को ले जाकर उस युवा पुरुष का परिचय कराया ॥६७
आठ मास पूरे होनेपर खा-पीकर मुटाये हुए उस पुरुष को भू-गृह से निकालकर उसने घोषणा कर दी कि यह वही राजा ओषधि के प्रभाव से युवा और बुढ़ापे से रहित हो गया है इस घोषणा से प्रसन्न प्रजात्रों ने भी उस युवा को ही राजा मान लिया। तदनन्तर उस युवा पुरुष को स्नान कराके मन्त्रियों के साथ उसका राज्याभिषेक उत्सव किया ।।६८-७०।।
तब से वह युवा राजा अजर इस नाम से विख्यात होकर रानियों के साथ क्रीड़ा करता और राज्य का भोग करता हुआ सुख से रहने लगा ॥३१॥
राजभवन के सभी व्यक्ति, इस असम्भव कार्य करने वाले वैद्य की विद्या के चमत्कार पर विश्वास करके उसे ही पुराना राजा मानकर और अपना स्वामी समझकर उसकी सेवा करने लगे ॥७२॥
वह युवक भी अपने प्रेम से प्रजा और राज-कर्मचारियों को तथा महारानी कमलप्रभा को प्रसन्न करके राजोचित व्यवहार करता हुआ मन्त्रियों के साथ प्रसन्नता से राज-कार्य करने लगा ॥७३॥
और अपने अनन्य एवं प्राचीन मित्र भेवजचन्द्र और पद्मदर्शन को हाथी, घोड़े एवं ग्राम आदि प्रदान कर उनके साथ विशेष प्रीति रखने लगा ॥७४।।
किन्तु तरुणचन्द्र वैद्य को केवल व्यावहारिक दृष्टि से मानता था। किन्तु, सत्यधर्म से गिरी हुई आत्मावाले उस पर विश्वास नहीं करता था ।॥७५॥
एकबार उस वैद्य तरुणचन्द्र ने एकान्त में राजासे कहा कि तू मुझे कुछ न समझकर स्वतन्त्र रूप से काम क्यों करता है ? ॥७६॥
क्या तुम यह भूल गये कि उस समय मैंने ही तुझे राजा बनाया था। यह सुनकर वह राजा अजर उस वैद्य से बोला ॥७७॥
'अरे! तू बड़ा ही मूर्ख है। कौन किसका बनाने या देनेवाला है? पूर्वजन्म के कर्म ही देते और बनाते हैं। इसलिए तू घमण्ड न कर। यह राज्य तो मेरे तप से प्राप्त हुआ है। यह मैं शीघ्र ही तुझे प्रत्यक्ष विखलाऊँगा' ॥७८-७९।।
राजा से इस प्रकार फटकारा गया वैद्य तरुणचन्द्र सोचने लगा कि 'यह मेरे साथ बिठाई नहीं कर रहा है और धीरता के साथ ज्ञानी के समान बातें कर रहा है ।॥८०॥
रहस्य की बातों में अन्तरंग बनना और वह भी इसमें सम्भव नहीं है, तो भी मुझे इसके पोछे-पीछे ही चलना चाहिए। यह भी देखता हूँ कि यह मुझे प्रत्यक्ष क्या दिखलायेगा ?' ऐसा सोचकर वैद्य उसकी बात मानकर चुप हो गया ।।८१-८२॥
किमी दूसरे दिन राजा अजर, टहलने के लिए तरुणचन्द्र आदि मित्रों के साथ बाहर निकला ॥८३॥
टहलते-टहलते वह नदी के किनारे पहुंचा और उसने नदी के बीच धारा में बहते हुए सोने के पाँच कमल देले ॥८४॥
राजा ने नौकरों से उन कमलों को मंगवाकर हाथ में लेकर और देखकर पास में खड़े तरुणचन्द्र वैद्य से कहा 'तुम अभी नदी के किनारे-किनारे ऊपर की ओर जाओ और इन सोने के कमलों का उत्पत्ति-स्थान खोजो ॥८५-८६।।
उसे देखकर तुम मेरे पाम आओ मुझे उन सोने के कमलों के लिए बहुत उत्सुकता हो रही है। और, तुम मेरे चतुर मित्र हो' ।॥८७॥
ऐसा कहकर राजा से भेजा गया वह विवश वैद्य, 'जो आज्ञा', ऐसा कहकर राजा के बताये मार्ग से चला गया और राजा अपने महल में लौट आया। क्रमशः चलता हुआ वह वैद्य नदी के तट पर स्थित एक शिव-मंदिर में पहुँचा ॥८८-८९॥
वैद्य ने नदी के उद्गम स्थान पर सरोवर के किनारे एक घने बरगद के पेड़ को देखा और उसमें लटकते हुए एक नर कंकाल को भी देखा ॥९०॥
वैद्य, उस सरोवर में स्नान करके देवता का पूजन करके जैसे ही बैठा, इतने में एक मैच का टुकड़ा वहाँ बरस गया ।॥९१॥
बादल के बरसने के कारण उस वटवृक्ष के लटकते हुए नर कंकाल पर से जो बूँदें गिरीं, उनको उसने नदी के सरोवर में आकर सोने के कमल रूप में परिवर्तित होते देखा ॥९२-९३।।
वैद्य सोचने लगा 'ओह ! यह बया आश्चयं है! इस निर्जन वन में किससे पूछु ? विधाता की आश्चर्य-भरी सृष्टि का रहस्य कौन जानता है? ॥९४॥
मैंने सोने के कमलों का यह उत्पत्ति-स्थान तो देख लिया, अब इस नर कंकाल को काटकर इस तीर्थ-जल में फेंक देता हूँ। या तो मुझे इसकी सद्गति करने का पुष्य मिलेगा अथवा धर्म होगा'। ऐसा सोचकर उसने उसके बन्धन काटकर उसी सरोवर में फेंक दिया ।।९५-९६।।
इस प्रकार, उस दिन को वहीं व्यतीत कर कार्य सिद्ध करके वह वैद्य दूसरे दिन, अपने घर की ओर लौटा। और, कुछ ही दिनों में विलासपुर में उस राजा अजर के समीप आया। उस समय वह मार्ग की धूल से भरा हुआ था ॥९७-९८।।
द्वारपाल से सूचित किये गये राजा के चरणों पर गिरे हुए राजा से कुशल पूछे जाने पर वैद्य ने, सारा समाचार जैसा-का-तैसा उसे मुना दिया ॥९९॥
तब राजा ने वहाँ से अन्य लोगों को टाकर एकान्त में स्वयं कहा-'मित्र! तुमने सोने के कमलों का वह उत्पत्ति-स्थान देखा ? ॥१००॥
वह अत्यन्त उत्तम क्षेत्र है। वहां पर बड़ के पेड़ में लटकता हुआ जो नरकंकाल तुमने देखा, वह मेरा पूर्व शरीर था। वहाँ पर पैर ऊपर करके लटकते हुए मैंने तपस्या से शरीर को सुखाकर प्राण त्याग किया था ।।१०१-१०२।।
उसी तप के माहात्म्य से मेरे मृत कंकाल से टपकती हुई वर्षा के जलं की बूँदें, सोने का कमल बन जाती थीं। तुमने जो उस मेरे कंकाल को उस तीर्थ में फेंक दिया, यह बहुत उचित किया; क्योंकि तुम मेरे पूर्वजन्म के मित्र हो। यह भेवजचन्द्र और पद्मदर्शन भी उसी जन्म के मेरे मित्र हैं। इसलिए, हे मित्र! उसी पूर्व जन्म के तपःप्रभाव से मैं जातिस्मर, शानी और राजा हुआ ।।१०३-१०६।।
यह सब मैंने युक्तिपूर्वक प्रत्यक्ष दिखा दिया। यह राज्य मैने तुम्हें दिया करना चाहिए और मन को भी दुःश्लीके बारे में भी बभिज्ञान के साथ वर्णन कर दिया। था, वही अब तुमने मुझे दिया। अतः, तुम्हें अहंकार न नहीं करना चाहिए ॥१०७-१०८।।
और तुम्हारे द्वारा फेंके गये नरकंकाल इसलिए, पूर्वजन्म के कर्मों के सिवा कोई किसी को कुछ देनेवाला नहीं है। प्रत्येक प्राणी गर्भ में प्रवेश के समय से पूर्वजन्म के कर्मों का भोग करता हैं ॥१०९॥
उस राजासे इस प्रकार कहा गया वैद्य तरुणचन्द्र, असन्तोष छोड़कर आनन्द से राजा की सेवा में तत्पर होगया ॥ ११०॥
उस जातिस्मर राजा अजर ने भी उस वैद्य को समुचित धन, मान आदि देकर अनुगृहीत किया ॥१११॥
और, स्वयं मित्रों एवं रानियों के साथ पृथ्वी का भोग करता हुआ निष्कण्टक राज्य करने लगा ॥११२॥
इतनी कथा सुनकर तपन्तक ने युवराज नरवाहनदत्त से कहा-'स्वामी! इसी प्रकार इस लोक में सभी प्राणियों का शुभ और अशुभ फल अपने-अपने पूर्वजन्म के कर्मों के अनुमार होता है। मैं समझता हूँ कि आप हमारे पूर्व जन्म के स्वामी हैं। नहीं तो अन्य बहुतेरों के होते हुए भी आप हम पर इतने प्रसन्न कैसे होते ? ॥११३-११४
इस प्रकार, अपूर्व रोचक एवं विचित्र कया को अपनी नवीन पत्नी रत्नप्रभा के साथ तपन्तक के मुंह से सुनकर, नरवाहनदत्त स्नान करने के लिए चला गया ।।११५।।
स्नान करके पिता और माता की आंखों में अमृत की वर्षा करते हुए नरवाहनदत्त ने, पत्नी और मित्रों के साथ मद्यपान आदि में वह दिन और रात व्यतीत की ॥११६।।
महाकवि श्रीसोमदेवमट्ट-विरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का षष्ठ तरंग समाप्त
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