5801. || प्रथम कहानी || नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत); बचप्रन से वर्णित आत्मवृत्तान्त; सूर्यप्रभ का चरित

5801. || प्रथम कहानी || नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत); बचप्रन से वर्णित आत्मवृत्तान्त; सूर्यप्रभ का चरित

सूर्यप्रभ नामक अष्टम लम्बक

नगेन्द्र-नन्दिनी पार्वती के प्रबल प्रणय-मन्दराचल के मन्थन द्वारा शिवजी के मुख-रूपी समुद्र से निकले हुए इस कया-रूपी अमृत का जो लोग आदर और आग्रह-पूर्वक पान करते हैं, वे शिवजी की कृपा से निर्विघ्न सिद्धियों को प्राप्त कर, दिव्य पद लाभ करते हैं।

प्रथम तरंग

मंगलाचरण

हिलते हुए कानों की वायु द्वारा उड़े हुए सिन्दूर से, आकाश को लाल करते हुए, अतएव मानों असमय में ही सन्ध्या की सृष्टि करते हुए गजानन की जय हो ।॥१॥

नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत)

तदनन्तर, वत्सेश्वर (उदयन) का पुत्र नरवाहनदत्त, कौशाम्बी नगरी में पिता के घर पर उन पत्नियों को पाकर आनन्दपूर्वक रहने लगा ॥२॥

एक बार पिता के दरबार में बैठे हुए उसने (नरवाहनदत्त ने) आकाश से उतरे हुए किसी दिव्य पुरुष को देखा ॥३॥

प्रणाम करते हुए उस पुरुष को पिता के साथ सत्कार करके 'आप कौन है? कैसे आये है?' नरवाहनवत्त के ऐसा प्रश्न करने पर उसने कहा-॥४॥

बचप्रन से वर्णित आत्मवृत्तान्त

इस धरातल में हिमालय के शिखर पर वज्रकूट नाम का नगर है, जो बज्य के सार से निमित्त होने के कारण नाम के समान ही गुणवाला भी है।॥५॥

मैं उस नगर में बजत्रम नाम का विद्याधरों का राजा था बौर मेरा शरीर बञ्ज-निमित होने के कारण मेरा नाम सार्थक था ।।६।।

'ययासमय मेरे बनाये हुए विद्याधर-चक्रवर्ती का तू मक्त बनकर मेरी कृपा से शत्रुओं के लिए अजेय होगा', मेरी तपस्या से सन्तुष्ट शिवजी के इस आदेशानुसार, हे स्वामिन् ! इस समय मैं आपको प्रणाम करने आया हूँ ॥७-८॥

कामदेव के अंश से उत्पत्र वत्सराज का पुत्र नरवाहनदत्त ही मनुष्य होने पर भी विद्याधरों की दोनों वेदियों¹ का एक दिव्य कल्प तक शिवजी के द्वारा आधा चक्रवर्ती बनाया गया है। मैंने अपनी विद्या के प्रभाव से यह जाना और इसीलिए अभी आपके समीप आया हूँ ॥९-१०॥

शिवजी की कृपा से पहले भी मनुष्य होकर एक दिव्य कल्प तक दक्षिण ओर की आधी बेदी का स्वामी सूर्यत्रभ हुजा था, और उत्तर में श्रुतशर्मा नामका चक्रवर्ती हुना था, किन्तु दोनों वेदियों के आकाशचारियों के एक चक्रवर्ती होनेवाले आप अत्यन्त पुण्यवान् हैं ।॥११- १३॥

वज्रप्रभ के इस प्रकार कहने पर वत्सराज और नरवाहनदत्त दोनों ने अत्यन्त कौतूहल के साथ उस विद्याधर से फिर कहा- ॥१४।।

'मनुष्य होकर भी, सूर्यप्रभ ने, विद्याधरों के वक्रवत्ती का पद पहले समय में कैसे प्राप्त किया, यह तुम हमें बताओ' ।॥१५॥

तब एकान्त में महारानियों और मन्त्रियों की उपस्थिति में राजा वज्रप्रभ ने उनसे कहना प्रारम्भ किया-॥१६।।

सूर्यप्रभ का चरित

'प्राचीन समय में मद्र देश में शाकल² नाम का एक नगर था। वहाँ अग्नि के समान तेजस्वी अंगारप्रभ का पुत्र चन्द्रप्रभ नाम का राजा था ॥१७॥

चन्द्रप्रभ नाम का वह राजा विश्व को बलाद देनेवाला अतएव समुचित नामवाला होने पर भी शत्रुनों के लिए अग्नि के समान सन्तापदायक था ।।१८।।

उस राजा की कीत्तिमती नाम की महारानी से अत्यन्त शुभ लक्षणों से मूचित उत्कर्षवाला प्रभावशाली पुत्र उत्पन्न हुआ ।।१९।।

'यह सूर्यप्रभ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ है, जिसे शंकर भगवान् ने पहले में ही विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती बनाया है' ॥२०॥

उसके उत्पन्न होने पर राजा चन्द्रप्रभ के कानों के लिए अमृत वर्षा के समान इस प्रकार स्पष्ट आकाशवाणी हुई ॥२१॥

तदनन्तर, शिवजी की कृपा में अत्यन्त उत्मव-पुक्त चन्द्रप्रभ के राजगृह में, वह सूर्यप्रभ, क्रमणः बड़ा होने लगा ॥२२॥

तीत्रवृद्धि वह सूर्यप्रभ, बालकपन में ही क्रमणः गुरुओं की उपासना से सभी विद्याओं और कलाओं में पारंगत होगया ॥२३॥

अपने गुणों ने प्रजा को आकृष्ट करनेवाले सोलह वर्ष के उम कुमार सूर्यप्रभ को पिता चन्द्रप्रभ ने युवराज-पद पर अभिषिक्त कर दिया ॥२४॥

और, अपने मन्त्रियों के पुत्र भास. प्रभाम, सिद्धार्थ, प्रहस्त आदि को कुमार के लिए मन्त्री नियुक्त कर दिया ॥२५॥

जब सूर्यत्रभ, उन मन्त्रिपुषा के साथ, युवराज का कार्य कर रहा था, इसी बीच एक बार मय नामक अमूर वहां आया ॥२६॥

आतिष्य-सत्कार कर लेने के उपरान्त, मयामुर ने सूर्वप्रभ के माय दरबार में बैठे हुए बन्द्रप्रभ से कहा-॥२७॥

'राजन्, शिवजी ने तुम्हारे इम पुत्र सूर्वप्रभ को विद्याधर-राजाओं का भावी चक्रवर्ती नियुक्त किया है।॥२८॥

तो यह सूर्यप्रभ, उस विद्याधर-चक्रवर्ती के पद को प्राप्त करानेवाली विद्याओं को क्यों नहीं सिद्ध करता, इसीलिए शिवजी ने मुझे भेजा है ॥ २९॥

आर आज्ञा दीजिए कि मैं उसे ले जाकर विद्याधर-चक्रवर्ती के पद की माधक विद्याओं को सिद्ध करने की किया उसे सिना देता हूँ ॥३०॥

इस सूर्यत्रभ का विरोधी विद्याबरों का सम्राट् श्रुतशर्मा है, जिसे इन्द्र ने बनाया है।॥ ३१।

यह सूर्यप्रभ, विश्चाओं की सिद्धि से प्रभावशाली होकर, हम लोगों के साथ उसे जीत कर, विद्याधर-वक्रवर्ती का पद प्राप्त करेगा' ॥३२॥

मय के ऐसा कहने पर राजा चन्द्रप्रभ ने कहा- 'मैं बन्य हूँ और यह सूर्यप्रभ भी पुण्यवान् है, आप अपनी इच्छानुसार इसे ले जायें ।॥३३॥

तदनन्तर चन्द्रप्रभ से परामर्श कर और उससे आज्ञा प्राप्त सूर्यप्रभ को उसके मित्र मन्त्रियों के साथ मवासुर पाताल ले गया ।॥३४॥

पाताल ले जाकर मयासुर ने, सूयंप्रभ को जैसे-जैसे उपदेश किया, उसने भी मन्त्रियों के माय वैसे ही वैसे तपस्याओं द्वारा विद्याओं की सिद्धि प्राप्त की ।॥ ३५।।

अन्य विद्याओं के अतिरिक्त मय ने उसे विमान की साधना का भी उपदेश दिया, जिससे उसने भूतासन नाम के विमान का निर्माण किया ॥३६॥

तदनन्तर मय, उसी विमान पर आरूढ़ विद्याओं को सिद्ध किये हुए सूर्यप्रभ को उसके मित्र मन्त्रियो के साथ उसके पिता राजा चन्द्रप्रभ के समीप ले आया ॥ ३७॥

उमे माता-पिता के समीप पहुंचाकर मय ने कहा- मैं जाता हूँ, तुम अपनी सिद्धि से मांसारिक भांगों को भांगो, तबतक मैं फिर आऊंगा' ।॥३८॥

ऐसा कहकर और सूर्वप्रभ से सत्कृत मयामुर चला गया और राजा चन्द्रप्रभ पुत्र की विद्या-गिद्धि से बहुत प्रसन्न हुआ ॥३९॥

तदनन्तर सूर्यप्रभ, विद्याओं की सिद्धि के प्रभाव से. अपने मन्त्रियों के साथ, विमान के द्वारा भिन्न-भिन्न देशों में सरलतापूर्वक घूमने लगा ॥४०॥

जहाँ-जहाँ जो-जो राजकुमारी उसे देखती थी, वह-वह उन पर मोहित होकर उसका बरण कर लेती थी ॥४१॥

उनमें तालिप्ती के राजा बीरभट की अद्वितीय सुन्दरी पुत्री मदनसेना पहली राजकुमारी थी ॥४२॥

दूसरी, अपरांत (कोंकण³) के राजा सुभट की चन्द्रिकावती कन्या⁴ थी। जिसे सिद्ध लोग कहीं से लाकर सुभट के पास छोड़ गये थे ॥४३॥

तीसरी अत्यन्त सुन्दरी कन्या फांची नगरी के राजा कुम्भीर की, वरुणसेना नाम की थी ॥४४॥

चौथी, लावाणक के राजा पौरव की सुनयनी सुलोचना नाम की कन्या थी ॥४५॥

पाँचवीं, चीन के राजा सुरोह की सोने के रंगवाली विद्युग्माला नाम की सुन्दरी कन्या थी ॥४६।।

छठी श्रीकंठ देश के राजा कान्तिसेन की कुमारी कान्तिमती थी, जो अपने गौन्दर्य से अप्सराओं को जीतती थी ॥४७॥

कौशाम्बी नगरी के राजा जनमेजय, की मधुरभाषिणी परपुष्टा नाम की कन्या गालवी थी ॥४८॥

अनजान में अपहरण की गई उन कन्याओं के बन्धुगण, सूर्यप्रभ को जान लेने पर भी, उनकी विद्याओं के प्रभाव से बेत के समान काँपते थे ॥४९॥

सूर्यप्रभ ने, उन कन्याओं को भी विद्याओं का उपदेश कर दिया था और स्वयं विद्या के प्रभाव से अनेक देह धारण करके एक साथ ही सबके साथ रमण करता था ॥५०॥

राजा सूर्यप्रभ, आकाश-विहार, संगीत, पान-गोष्ठी आदि से उनके तया प्रहस्त आदि मन्त्रियों के साय, आनन्द-भांग में समय व्यतीत करता था ॥५१॥

ओर, दिव्य चित्रकला का जानकार वह सूर्यप्रभ, दिव्य विद्यावरियों के चित्र बनाकर अपनी प्रियतमात्रओं को प्रणय-कुद्ध करता था ।॥५२॥

टेडी भौहों और कोच से लाल नेत्रांवाली तथा क्रांव से कांपते हुए ओठां में लड़खड़ा-कार अस्फुट बोलती हुई उन पत्नियों के साथ हास्य-विनोद करता हुआ वह आनन्द का अनुभव करता था ॥५३॥

वह राजपुत्र, आकान-मार्ग में ताम्रलिप्ती नगरी में जाकर उसके उद्यानों में, मदनसेना के साथ बिहार करता या ॥५४॥

एक बार वह, अपनी सभी पत्नियों को भूतासन नामक विमान में बैठाकर, प्रहस्त नामक मन्त्री को साथ लेकर, वज्रसार नामक नगरी में गया ।॥५५॥

वहां राजा रम्भ के देखते-देखते कामाग्नि से सन्तप्त उसकी तारावली नाम की कन्या को उठा लाया ॥५६।।

यह वहाँ से फिर ताम्रलिप्ती आया और वहाँ से विलासिनी नाम की दूसरी राजकन्या का भी अपहरण कर लिया ॥५७७॥

इस बात से क्रूध और युद्ध के लिए आये हुए सहस्रायुध नामक उसके भाई को सूर्यप्रभने, अपनी विद्या के प्रभाव से बाँधकर स्तब्ध और विवश कर दिया ॥५८॥

सेना के साथ आये हुए उसके मामा को भी बाँधकर उसका सिर मुंडवा दिया। दर्षभंग और विलक्ष नाम के सालों का उसने क्रुद्ध होकर भी वब नहीं किया, प्रत्युत हँसकर उन्हें छोड़ दिया ।।५९-६०।।

तदनन्तर पिता के बुलाने पर वह सूर्यप्रभ, अपनी उन नव पत्नियों के माथ अपने घर शाकलपुर (स्यालकोट) चला गया ॥६१॥

तब उसके पिता चन्द्रप्रभ के समीप ताश्चलिप्ती से राजा बीरभट ने दूत नेजा और मन्देश दिया कि तुम्हारे पुत्र ने मेरी दो कन्याओं का अपहरण किया है, वह विद्याओं की मिद्धिवाला योग्य पति है, इसलिए ठीक है।।६२-६३॥

यदि आपको हम पर स्नेह है, तो आप यहाँ आये, जिससे विवाह-संरकार द्वारा हम मित्रता म्यापित कर सके ।॥६४॥

दूत का यह वाक्य सुनकर राजा चन्द्रप्रभ ने, उसका सत्कार करके, दूसरे ही दिन, ताम्रलिप्ती जाने का निश्चय किया ॥६५॥

राजा चन्द्रप्रभ ने राजा वीरभट की सचाई परखने के लिए दून का आना-जाना दूर होने से कठिन समझकर प्रहस्त को पहले वहाँ भेज दिया ।।६६।।

प्रहस्त शीघ्र ही जाकर वीरभट से मिला और वीरभट द्वारा उसका श्रद्धापूर्वक स्वागत-मत्कार किया गया ।॥६७॥

प्रहस्त ने आश्चर्य चकित वीरभट को प्रातःकाल ही स्वामी के आने की मूबना दी और पड़ी-भर में ही आकाश-मार्ग में वह चन्द्रप्रभ के समीप लौट आया ॥६८॥

और कहा कि राजा वीरभट कन्यादान के लिए तैयार बैठे हैं। चन्द्रप्रभ ने भी प्रमन होकर मन्त्री प्रहस्त का ममुचित स्वागत-सम्मान किया ॥६९॥

तदनन्तर. प्रातःकाल ही राजा बन्द्रप्रभ, महारानी कीत्तिमती के साथ या तथा सूर्यप्रभ, विलासिनी और मदनमेना के साथ अपने मेवक आदि को संग लेकर भूतासन नामक विमान में बैठकर मन्त्रियों सहित बरात लेकर चल दिये ॥७०-७१॥

प्रातःकाल दिन के पहले प्रहर में में लोग ताम्रलिप्ती नगरी जा पहुँचे, जब कि नागरिक जन कौतुक के साथ आँखें ऊपर करके उन्हें देख रहे थे ॥७२॥

आकाश-मार्ग से उतरे हुए उन लोगों की बीरमट द्वारा अगवानी किये जाने पर, उसी के साथ वे लोग नगरी में प्रविष्ट हुए ॥७३॥

इस अवसर पर, सारी नगरी की गलियों और सड़कें, चन्दन के जल से सींची गई थीं और नागरिक रमणियों के सकटाक्ष नयन मानों उनपर फैले हुए थे।॥७४॥

राजभवन में जाकर वीरभट ने, अपने समधी और जामाता का विधिवत् स्वागत-सत्कार करके शास्त्रानुसार कन्यादान की विधि सम्पन्न की। दहेज में विशुद्ध स्वर्ण के दस भार⁵, रत्न और आभूषणों से लदे हुए एक सौ ऊंट और विविध प्रकार के वस्त्रादि से लदे हुए पाँच सौ ऊँट, सात हजार घोड़े, पाँच हजार हायी तथा सुन्दर आभूषणों से लदी हुई एक हजार रूपवती स्त्रियाँ (दासियाँ) उन दोनों कन्यायों के विवाहोत्सव पर दीं ।॥७५-७८।।

इसके अतिरिक्त समधी और जामाता का अच्छे-अच्छे रत्नों बऔर वस्त्राभरणों से तथा भूमिदान से विशेष सत्कार किया ॥७९॥

उसी प्रकार अति प्रसन्न नागरिक जनों के साथ, राजा के प्रहस्त आदि मन्त्रियों का भी विधिपूर्वक सत्कार किया ॥८०॥

इस अवसर पर माता-पिता के साथ सूर्यप्रभ मी, विविध प्रकार के मोजन, पान, गान, वाद्य आदि का आनन्द लेने लगा ॥८१॥

इसी बीच रम्भ के राजा वखत्रभ की ओर से दूत आया और दरबार में बैठे हुए सूर्यप्रभसे अपने स्वामी का सन्देश कहा-'हे महाराज, विद्याओं के बल से मदोन्मत्त सूर्यप्रभ ने मेरा कन्या-हरण-रूपी (अपमान) किया है ॥८२-८३॥

ज्ञात हुआ है कि मेरे ही समान विपत्ति (कन्या-हरण) बाले राजा बीरभट से आज आपने मित्रता स्वीकार की है। इसी प्रकार, आप मेरे साथ सन्धि करें और यहाँ पधारे, अन्यया अपने प्राण-त्याग द्वारा ही में अपने अपमान का प्रायश्चित्त करूंगा' ।॥८४-८५॥

यह सन्देश सुनकर तथा दूत का सत्कार करके राजा चन्द्रप्रभ ने प्रहस्त से कहा- 'तुम जाओ और हमारी ओर से राजा रम्भ को कहो कि वह व्यर्थ सन्ताप न करें। सूर्यप्रभ को शिवजी ने, विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती नियुक्त किया है। तुम्हारी तथा अन्य राजाओं की कन्याएँ इसी की पत्नियाँ हैं, इस प्रकार सिद्धों ने आदेश दिया है।।८६-८७।।

अतः, तुम्हारी कन्या उचित स्थान पर पहुँच गई है। तुम कठोर प्रकृति के व्यक्ति हो, अतः तुमसे कन्या की याचना नहीं की गई। अब तुम प्रसन्न हो जाओ, तुम हमारे मित्र हो, हम लोग भी आ रहे हैं ।॥८८-८९॥

चन्द्रप्रभ का यह सन्देश लेकर प्रहस्त आकाश मार्ग से एक ही प्रहर में वखरात्र जा पहुंचा। वहाँ राजा रम्भ को सन्देश देकर और उसकी स्वीकृति के साथ लौटकर उसका सन्देश राजा चन्द्रप्रभ को सुनाया ॥९०-९१॥

चन्द्रप्रभ ने दूसरे मन्त्री प्रभास को भेजकर शाकल नगर से रम्भ की पुत्री तारावली को रम्भ के पास पहुंचवा दिया ॥९२॥

तदनन्तर, राजा चन्द्रप्रभ, सभी बरातियों, ताम्रलिप्ती के राजा बीरभट तथा साथ आये हुए अन्य सभी व्यक्तियों के साथ चला और सबके साथ वखरात्र देश में जा पहुंचा। तदनन्तर, वहां राजा रम्भ द्वारा उनकी अगवानी किये जाने के पश्चात् उसकी राजधानी में गया ।॥९३-९४।।

वहाँ विवाह की तैयारी किये हुए राजा रम्भ ने उत्सव किया और सोना, रत्न, वस्त्र, आभूषण आदि कन्या के माथ दिये और जामाता सूर्यप्रभ का भी विशेष रूप से सेवा-सत्कार किया, जिससे वह अपने मोगे हुए उत्तमोत्तम सुलों को भी भूल गया ।।९५-९६।।

विवाहोत्सव का आनन्द लेते हुए जब वे वहाँ निवास कर रहे थे, उसी समय कांची नगरो के राजा कुम्भीर का दूत राजा रम्भ के समीप आया ॥९७॥

उस दूत का सन्देश सुनकर राजा रम्भ ने, महाराज चन्द्रप्रभ से कहा कि कांची के राजा मेरे बड़े भाई कुम्भीर है। उन्होंने मेरे पास अपने विश्वस्त दूत को भेजकर यह सन्देश दिया है कि सूर्यप्रभ ने पहले मेरी कन्या का अपहरण किया, तब तुम्हारी कन्या का। मैंने अभी सुना है कि तुमने उसके साथ मित्रता कर ली है। बतः, अपने ही समान उसके साथ मेरी भी मित्रता करा दी ।।९८-१००।।

वे लोग मेरे घर पर आवें, तो मैं भी अपनी कन्या वरुणसेना को अपने हाथ से उसके लिये अर्पण करूँ उसकी यह प्रार्थना स्वीकार करें।' ऐसा कहते हुए राजा रम्भ की बात को। बन्द्रप्रम ने स्वीकार किया और प्रहस्त को शाकल नगर भेजकर वरुणसेना को उसके पित कुम्भीर के पास कांची पहुंचवा दिया ॥१०१-१०३॥

दूसरे दिन वह राजा चन्द्रप्रभ सूर्यप्रभ, रम्भ, बीरमट आदि अपने अनुचरों के साथ विमान द्वारा राजा कुम्भीर की सुन्दर गुणों से गुषी तथा अनेक रत्नों से भरी हुई कांची नगरी पहुँच गया ।।१०४-१०५॥

वहाँ पर राजा कुम्भीर ने सूर्यप्रभ को अपनी कन्या तथा उसके साथ बहुत-सा धन दिया ॥१०६॥

विवाहोत्सव सम्पन्न होने पर भोजन आदि से निवृत्त होकर, विश्राम करते हुए पन्द्रप्रभको प्रहस्त ने मभी के सामने कहा- 'महाराज, मैं भ्रमण करता हुबा श्रीकंठ देश की ओर गया था, वहाँ प्रसंगवश मिले हुए राजा कान्तिसेन ने कहा कि सूर्यप्रभ मेरी कन्या कान्तिमती को लेकर मेरे घर पर आवे, मैं उनका विधिपूर्वक सत्कार करूँगा ॥१०७-१०९॥

अन्यथा कन्या के स्नेह से विह्वल होकर मैं शरीर-त्याग कर दूंगा।' इस प्रकार, उसके कहने पर प्रस्ताव-रूप से आपसे मैंने निवेदन कर दिया ॥११०।।

प्रहस्त के ऐसा कहने पर चन्द्रप्रभ ने कहा- 'तो जाओ और उसकी कन्या कान्तिमती को उसके पास पहुँचालो ॥१११॥

इसके पश्चात् हमलोग वहाँ जा रहे हैं।', राजा के ऐसी आज्ञा देने पर प्रहस्त ने कान्तिमती को पिता कान्तिसेन के समीप पहुँचवा दिया ॥११२॥

प्रातःकाल ही वे चन्द्रप्रभ आदि सभी राजा कुम्भीर के सहित आकाशचारी विमान द्वारा श्रीकंठ देश को गये ॥११३॥

वहाँ भी राजा कान्तिसेन ने, सबकी अगवानी करके अपनी कन्या का विवाह मंगल-समारोह के साथ सम्पन्न किया ॥११४॥

तदनन्तर, पुत्री कान्तिमती और जामाता सूर्यप्रभ को, रत्नों का बमूल्य संग्रह प्रदान किया, जिसे देखकर सभी राजा आश्चर्य चकित हो गये ।।११५॥

जब वे सब राजा कान्तिसेन के यहाँ विविध प्रकार के स्वागत-सत्कार का बानन्द ले रहे थे, तभी सबके सामने कौशाम्बी नगरी से आये हुए दूत ने इस प्रकार कहा ॥११६।।

राजा जनमेजय बापसे यह कहते है कि 'कुछ दिन हुए मेरी कन्या परपुष्टा का किसीने अपहरण कर लिया था ।। ११७॥

अब शात हुआ है कि वह सूर्यप्रभ के हाथ लगी है। मतः, वह सूर्यप्रभ उस कन्या (परपुष्टा) के साथ निःशंक होकर हमारे घर मावेव। मैं उन्हें विधिपूर्वक सत्कृत करके पत्नी के साथ उन्हें मेज दूँगा। यदि आपने ऐसा न किया, तो आप मेरे शत्रु हैं और मैं बाप लोगों का शत्रु हैं-॥११८-११९॥

अपने स्वामी के इस सन्देश को कहकर दूत चुप हो गया तब, चन्द्रप्रभ ने अपने सभी सम्बन्धी राजाओं से कहा- ॥१२०॥

'इस प्रकार घमंड की बातें करनेवाले उसके घर में कैसे जाया जाय।' यह सुनकर राजा का सिद्धार्थ नामक मन्त्री बोला, 'महाराज, आपको उसके कहने का बुरा न मानना चाहिए। वह ऐसा कहने के योग्य है। वह राजा जनमेजय महान् दानी, बड़ा बिद्वान् और अच्छे ऊँचे पांडव कुल में उत्पन्न हुजा है। यूर-बीर है और अश्वमेध यश कर चुका है। यह कभी किसी से पराजित नहीं हुआ। इस प्रकार, यथार्थता को देखते हुए उसने जो भी सन्देश दिया है, वह कुछ भी अनुचित नहीं है ॥१२१-१२३॥

उसने जो पत्रुता की बात कही, वह इन्द्र के लिए है। अतः, उसके घर पर चलना बाहिए। वह राजा दृढप्रतिश है ॥ १२४॥

फिर भी, उसका अभिप्राय जाँचने के लिए आप किसी दूत को मेजिए। मन्त्री सिद्धार्य के इस प्रकार के वचनों पर सभी ने श्रद्धा प्रकट की ॥१२५॥

तब जिज्ञासा का समाधान करने के लिए चन्द्रप्रभ ने जनमेजय के समीप मिद्धार्थ नामक दूत को भेजा और जनमेजय के दूत का भी सम्मान किया ।।१२६।।

तदनन्तर प्रहम्त, कौशाम्बी के राजा के पाम गया और उससे विचार-विमर्श करके तथा उनका पत्र लाकर राजा चन्द्रप्रम को प्रसन्न किया ।।१२७।।

राजा चन्द्रप्रभ ने प्रहस्त को शीघ्र अपनी नगरी शाकल में मेजकर परपुष्टा को उसके माथ जनमेजय के पास भेज दिया ॥ १२८॥

तदनन्तर दूसरे दिन, सूर्यप्रभ को लेकर चन्द्रप्रभ आदि सम्बन्धी राजा, कान्तिसेन के साथ विमान द्वारा जनमेजय के यहाँ गये ॥१२९॥

वहाँ विनम्र राजा जनमेजय ने, जामाता के साथ उन सभी समधी राजाजों की अगवानी करके समुचित स्वागत किया और अपनी नगरी में ले गया ॥ १३०॥

तथा कन्या का विवाह-संस्कार करके राजा जनमेजय ने, पांच हचार हाथी, एक लाख श्रेष्ठ घोड़े एवं अच्छे-अच्छे रत्न, सुवर्ण, वस्त्र, कपूर बादि से लदे हुए पाँच हजार ऊँट दहेज में कन्या के साथ दिये ।॥१३१-१३२॥

संगीत, नृत्य और वाद्य के साथ भारी महोत्सब मनाया बौर ब्राह्मणों तथा समागत राजाओं का समुचित सम्मान किया ।॥ १३३।।

इतने में ही सारा आकाश देखते-देखते पीला हो गया, मानों भविष्य में रक्त से लाल होने की सूचना दे रहा हो ॥१३४।।

चारों दिशाओं में भीषण हाहाकार मच गया; मानो शत्रुओं की सेनाओं से डरी हुई दिशाएँ दौड़ी आ रही थीं ।॥ १३५।।

उसी क्षण मानो भू-वरों को से-चरों के साथ लड़ाने के लिए ऊपर की ओर फेंकती हुई महावायु (आँधी) चलने लगी ॥१३६॥

इतने में ही, आकाश में अपनी चमक से दिशाओं को प्रकाशित करती हुई और वेगवती विद्याधरों की सेना दिखाई पड़ी ॥१३७॥

उस सेना के मध्य में चकित सूर्यप्रभ आदि ने अत्यन्त सुन्दर और तेजस्वी एक विद्याबर-कुमार को देखा ॥१३८।।

'आषाडेश्वर के पुत्र युवराज दामोदर की जय हो। बरे, पृथ्वी के रहनेवाले मनुष्य सूर्यप्रभ, इसके चरणों में नत होओ ।॥१३९।।

अरे जनमेजय, तू भी इसके चरणों में पड़कर क्षमा-प्रार्थना कर, तूने अपनी कन्या को अयोग्य स्थान में क्यों दिया। इसलिए इस दामोदर देव को प्रसन्न कर। अन्यथा, यह तुम्हें कदापि क्षमा न करेगा' ।॥१४०।।

इस प्रकार, आकाश से विद्याधर के बन्दी (चरण-भाट) ने, उस दामोदर के आगे चलते हुए ऊँचे स्वर से कहा ।।१४१॥

यह सुनकर, विद्याषरों की सेना को देखकर और डाल तलवार लेकर सूर्वप्रभ, अपनी विद्या के प्रभाव से आकाश में उड़ा ॥ १४२॥

उसके पीछे उसके सभी मन्त्री प्रहस्त, प्रभास, सिद्धार्थ, प्रज्ञाय, सर्वदमन, वीतभीति और शुभंकर भी शस्त्रों को लिए हुए आकाश में उड़े और उनके साथ विद्यावरों का महान् मुद्ध छिड़ गया ।॥१४३-१४४॥

सूर्वप्रम, उधर ही झुका, जिबर दामोदर था, वह अपने शस्त्रों से शत्रुओं का संहार कर रहा था और उनके शस्त्रों को अपनी डाल पर रोक रहा था ।॥ १४५।।

इवर कुछ ही इने-गिने मानव और उधर लाखों की संख्या में आकाशबारी विद्याधर ! किन्तु, वे आपस में लड़ते हुए भी अपने को समान संख्या में समझते थे ।॥१४६॥

रक्त से सनी और लाल रंग की चमकती हुई नंगी तलवारें, विकराल काल की क्रूर दृष्टियों के समान शूर-वीरों के शरीर पर पड़ रही थीं ॥ १४७॥

भूमि पर खड़े हुए राजा चन्द्रप्रभ के चरणों के आगे गिरते हुए (मृत) विद्याधर, मानों शिरों और शरीरों से शरण की प्रार्थना कर रहे थे ॥ १४८॥

जनता की दृष्टियों से देखा जाता हुवा सूर्यप्रभ, आकाश में युद्ध करता हुआ अत्यन्त शोभित हो रहा था। रक्त से रंजित आकाश मानों छिड़के हुए सिन्दूर की शोमा धारण कर रहा था ॥ १४९॥

सूर्यप्रभ, ढाल-तलवार लिये हुए, दामोदर के सामने आकर युद्ध करने लगा और युद्ध करते हुए उसने करण-प्रयोग (पैंतरेबाजी) से अन्दर घुसकर दामोदर की ढाल-तलवार को काटकर उसे धराशायी कर दिया ॥१५०-१५१॥

तदनन्तर सूर्यप्रभ, जैसे ही उसका शिर काटने के लिए तैयार हुआ, वैसे ही विष्णु भगवान् ने आकाय में आकर उसे मना करते हुए इङ्कार किया ।॥ १५२॥

हुङ्कार को सुनकर और विष्णु भगवान् को देखकर उनके गौरव से नमा सूर्यप्रभ ने दामोदर को मारने से अपना हाथ रोक लिया ॥१५३॥

विष्णु भगवान् मरने से बचे हुए उस अपने भक्त दामोदर को लेकर अन्तहित हो गये; क्योंकि भगवान् अपने भक्त की इस लोक और परलोक में भी रक्षा करते हैं ।॥१५४।॥

दामोदर के गुप्त होते ही, उसके साथी सभी विद्याधर, इधर-उधर भाग गये और सूर्यप्रभभी आकाश से उतरकर अपने पिता के पास आ गया ।॥ १५५॥

उसके पिता बन्द्रप्रभ ने अपने सभी अनुचरों के साथ अन्क्षतशरीर आये हुए सूर्यप्रभका प्रेमपूर्वक अभिनन्दन किया। और, बन्य राजाओं ने भी उसकी वीरता की प्रशंगा की ।। १५६।।

जबतक सभी लोग प्रसन्न होकर सूर्यप्रम की प्रशंसा और उसकी वीरता की चर्चा कर रहे थे कि इतने ही में राजा सुभट का दूसरा दूत वहाँ आ पहुंचा। उसने आते ही राजा चन्द्रप्रभ को पत्र दिया। सिद्धार्थ ने उस पत्र को खोलकर सभा में इस प्रकार पढ़ा-॥१५७-१५८।।

'कोंकण के राजा सुमट, उच्च वंश के मोती के समान राजा चन्द्रप्रभ से प्रार्थना करते है कि एक दिन रात के समय मेरी कन्या का किसी प्राणी द्वारा अपहरण किया गया था, उसे आपके पुत्र ने प्राप्त किया है। यह जानकर हम अत्यन्त प्रसन हैं ।॥ १५९॥

इसलिए, उस कन्या और अपने पुत्र राजा सूर्यप्रभ के साथ आपको बे-रोक-टोक हमारे घर आने की कृपा करनी चाहिए। जिससे हम मानों परलोक से आई हुई उस कन्या को देखें और उसका विवाह-कार्य सम्पन करें' ।॥ १६०॥

राजा चन्द्रप्रम पत्र सुनकर प्रसन्न हुए और उन्होंने दूत का सत्कार किया। प्रहस्त द्वारा कोंकणाधीश की कन्या चन्द्रावती को उसके पिता के यहाँ थीघ्र ही पहुँचवा दिया ।। १६१-१६२॥

प्रातःकाल ही वे सब राजा, सूर्यप्रभ को बागे करके, जनमेजय के साथ, विमान द्वारा अपरान्त (कोंकण) देश को गये ॥ १६३॥

कन्या के मिल जाने से आनन्दित राजा सुभट ने, अपने देश में आये हुए उन बराती राजाओं तथा समधियों का खूब सम्मान और सत्कार किया तथा कन्या के विवाह का समारोह भी कर डाला ।॥ १६४॥

राजा सुभट ने, कन्यादान में, चन्द्रिकावती को इतना धन, रत्न आदिक दिया, जिसने अन्य सभी समधी राजा लज्जित हो गये ।।१६५।।

जब कि सूर्यप्रभ श्वगुर मुमट के घर पर ही था, तभी लावाणक नगर से राजा पौरव का दून वहाँ आया ।। १६६०

उसने भी राजा बन्द्रप्रभ से अपनी स्वामी का सन्देश कहा कि 'तुम्हारे पुत्र सूर्यप्रभ ने, मेरी कन्या मुम्लोचना का अपहरण किया है, मुझे इसका सन्ताप नहीं है। किन्तु, तुम उसे मेरे घर पर ले आओ, तो हम विवाह-संस्कार सम्पन्न करें ।॥१६७-१६८॥

ऐमा सुनते ही राजा चन्द्रप्रभ ने, प्रसन्नता से दूत का मत्कार किया और प्रहस्त द्वारा विमान से मुलोचना को उसके पिता के यहाँ पहुँबना दिया ॥ १६९॥

तब वे सभी राजा सुभट के साथ सूर्यप्रभ को लेकर ध्यान करते ही उपस्थित होनेवाले विमान से लावाणक नगर गये ।। १७०।।।

यहाँ पौरव ने सूर्यप्रभ और सुलोचना का विवाह करके सभी राजाओं का समुचित सत्कार किया ॥ १७१।।

सभी बराती राजाओं की जब भली भाँति सेवा-शुश्रूषा की जा रही थी, तभी चीन के राजा मुरोह ने भी राजा चन्द्रप्रभ के समीप दूत भेजा ॥१७२॥

चीन के राजा ने भी दूत द्वारा यही प्रार्थना की कि 'कन्या और उसे अपहरण करनेवाले सूर्यप्रभ के साथ हमारे घर पधारिए' ॥१७३॥

तब प्रसन्नचित्त राजा चन्द्रप्रभ ने, चीन-नरेश की कन्या विद्युन्माला को प्रहस्त के साथ उसके पिता के यहाँ पहुँचवा दिया ।।१७४।।

बौर दूसरे ही दिन वे सभी सूर्यप्रम को लेकर राजा पौरव के साथ विमान से बीन देश को गये ।। १७५।।

वहाँ अगवानी के लिए बाहर आये हुए राजा ने उन्हें अपने किले में ले जाकर अपनी कन्या का विवाह-संस्कार किया तथा सुरोह ने विद्युन्नाला और सूर्यप्रभ को कन्यादान में असंख्य मोना, रत्न एवं चीन के वस्त्र आदि प्रदान किये ॥१७६-१७७।।

विवाह के अनन्तर चन्द्रप्रभ आदि राजा सुरोह से सेवा-सत्कार प्राप्त करते हुए कुछ दिनों तक चीन में रहकर आनन्द लेते रहे ॥१७८॥

घनघोर घटाटोपवाले वर्षाकाल के समान उमड़े हुए घन-यौवन से ममृद्ध मूर्वप्रभ भी, विद्युन्माला [बिजली] के साथ समुराल में विविव प्रकार के भोग-विलामों का आनन्द लेने लगा ।।१७९-१८०॥

कुछ दिनों के अनन्तर सिद्धार्य आदि मन्त्रियों से मम्मति करके अन्धान्य, श्वगुर-राजाओं को पुड़सवारों के साथ अपने-अपने देश को भेजकर, मूर्वप्रभ भी राजा मुरोह से आज्ञा लेकर, उनकी कन्या विद्यन्माला तथा अपने माता-पिता के साथ मफल होकर भूतासन नामक विमान में बैठकर अपनी राजधानी साकल में आ गया ॥ १८१-१८३॥

सूर्यप्रभ के राजवानी में आने पर, सारी नगरी, हर्ष से पागल-सी हो रही थी। वहीं नाच हो रहा था. तो कहीं गाना-बजाना चल रहा था। कहीं मद्यपान-गोष्ठियां हो रही थी, तो कहीं स्त्रियों की सजधज बल रही थी। कहीं प्रचुर पुरस्कार-प्राप्त बन्दी-वारण आदि प्रशंमा के गान गा रहे थे ।। १८गा

सूर्यप्रभ ने, अपनी राजधानी में आकर अपने-अपने पिताओं के घर में छोड़ी गई सभी रानियों को अपने पास बुलवा लिया। वे रानियाँ भी अपने-अपने पिताओं द्वारा दिये गये असंख्य हाथी, पोड़े, ऊँट, दास-दासियों और धन-रत्नों के साथ आई, तो ऐसा प्रतीत होता था कि मानों सूर्यप्रभके दिग्विजय का वैभव आ गया हो। यह सब देखकर नागरिक जनता आश्चर्य चकित हो गई ॥१८५॥

अत्यधिक घन से परिपूर्ण बऔर बहुत-से खजानों से भरा हुआ तथा महाभोगी⁶ सूर्यप्रम से अलंकृत शाकल नगर ऐसा लगता था, मानों स्वर्ग, अलकापुरी और पाताल तीनों लोकों के सम्मिश्रण से इस पुरी की रचना की गई हो ।। १८६।।

तदनन्तर, वह युवराज सूर्वप्रम, पट्टरानी मदनसेना तथा अन्यान्य रानियों के साथ समस्त सम्पत्तियों से भरपूर होकर समस्त उत्तमोत्तम भोगों को भोगता हुजा पिता तथा मन्त्रियों के साथ, आने का वचन दिये हुए मयासुर दानव के आने की दिन-रात प्रतीक्षा करता हुबा राजधानी में मुखपूर्वक रहने लगा ।॥ १८७॥

महाकवि श्रीसोमदेवमट्ट-विरचित कथासरित्सागरके सूर्यप्रभ लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त



1. उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव के दो देव-स्थान। आर्य अर्थशास्त्रों में दक्षिणी ध्रुव के देव-स्थान को पित् याम-शायं और उत्तरी ध्रुव के देव-स्थान को देवयान-मार्ग कहा गया है। इन दोनों स्थानों पर विद्याधरों का निवास और राज्य था। बोनों बेवियों का शासक चक्रवर्ती कहा जाता था। अनु०

2. शाकल । वर्तमान समय का स्यालकोट नगर, जो अब पाकिस्तान में है। -अनु०

3. यह प्रवेश आजकल गोवा में सम्मिलित है।-अनु०

4. कांची, महास के पाप्त प्रसिद्ध पुण्यपुरी है। यहाँ के पल्लव राजा प्रसिद्ध थे। अनु०

5. भार, प्राचीन समय का एक परिमाण, जो दो मन से कुछ अधिक था। अनु० ३१

6. महाभोगी पाताल-रक्ष में महासर्प। सूर्यप्रभ के पक्ष में- महान् भोगी, विलासी या ऐश्वर्य-सम्पन्न । अनु०

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