5805. || पंचम कहानी || सूर्यप्रभ चरितः रणभूमि में संग्राम; शरभानना योगिनी के पराक्रम की कथा
5805. || पंचम कहानी || सूर्यप्रभ चरितः रणभूमि में संग्राम; शरभानना योगिनी के पराक्रम की कथा
पंचम तरंग
सूर्यप्रभ चरितः रणभूमि में संग्राम
प्रभात-काल होते ही वे सूर्यप्रभ आदि तथा श्रुतशर्मा आदि तैयार होकर अपनी-अपनी सेनाओं के साथ रणभूमि में आकर डट गये ॥१॥
और ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र आदि देवता तथा असुर, यक्ष गन्धर्व एवं राक्षस बादि युद्ध देखने के लिए आकाश के अवकाश में फिर से आकर एकत्र हो गये ॥२॥
श्रुतशर्मा की सेना में सेनापति दामोदर ने चक्रव्यूह बनाया और सूर्यप्रभ की सेना में सेनापति प्रभास ने ववन्नूह की रचता की ॥३॥
व्यूह-रचना के पश्चात् दोनों सेनाओं का युद्ध प्रारम्भ हुआ और रणवाद्यो तथा सैनिकों के शब्दों से सारी दिशाएँ गूंज उठीं ॥४॥
भली-भांति शस्त्रों से मारे गये शूर-वीर मेरे मंडल का भेदन¹ करते हैं, इसलिए भय से मानों सूर्य भगवान् बाणों के जाल के अन्दर ढक गये ॥५।।
दामोदर के बनाये हुए चक्रब्यूह को दूसरे बीर से अभेद्य जानकर सूर्यप्रभ की आज्ञा से प्रभास, उसका भेदन करके ब्यूह में प्रवेश कर गया ॥६॥
प्रभास द्वारा ब्यूह में किये गये छेद के मुँह पर दामोदर स्वयं आकर डट गया और वहाँ एक-मात्र रथ से ही प्रभास उससे युद्ध करने लगा ॥७॥
तब सूर्यप्रभ ने प्रभास को अकेले ब्यूह में घुसा देखकर उसकी सहायता के लिए पन्द्रहु महारथियों को उसके पीछे भेजा ॥८॥
वे पन्द्रह महारथी इस प्रकार थे- प्रकम्पन, घूमकेतु, कालकम्पन, महामाय, मश्रुवेग प्रहस्त, वज्रपंजर, कालचक्र, प्रमथन, सिंहनाद, कम्बल, विकटाक्ष, प्रवहण, कुंजरकुमार और असुरराज प्रहृष्टरोमा। वे सभी महारथी रय दौड़ाकर व्यह के द्वार पर गये ॥९-११॥
वहाँ दामोदर ने अपनी अपूर्व रण-चातुरी का परिचय दिया और अकेला ही उन पन्द्रहों से भिड़ गया ॥१२॥
यह देवकर इन्द्र ने बगल में खड़े नारद मुनि से कहा- ये सूर्वप्रभ आदि सभी असुरों के अवतार हैं। श्रुतशर्मा मेरे अंश से उत्पन्न हुआ है और ये सभी विद्याधर देवताओं के अंश हैं, अतः एक प्रकार से यह देवासुर संग्राम ही है। हे मुने, देवासुर संग्राम में विष्णु सदा देवताओं के ही सहायक रहे हैं। यह दामोदर उन्ही विष्णु का अंग है। इसलिए देखो, किस प्रकार युद्ध कर रहा है।॥१३-१५॥
जब इन्द्र इस प्रकार कह ही रहा था. इतने में ही दामोदर की सहायता के लिए चौदह महारथी आये, जिनके नाम इस प्रकार हैं- ब्रह्मगुप्त, वायुबल, यमदंष्ट्र, सुरोषण, रोषावरोह, अतिबल, तेजःप्रभ, धुरंधर, कुबेरदत्त, वरुणशर्मा, कम्बलिक, वीर दुष्टदमन, दोहन और आरोहण ।। १६-१८।।
दामोदर-सहित इन पन्द्रह व.रों ने व्यूह के द्वार पर प्रथम युद्ध करते हुए प्रभास बादि पन्द्रह महारथियों को रोका ॥१९॥
तदनन्तर, दामोदर के साथ प्रकम्पन का, तेजःप्रभ के साथ दानव कौलकम्पन का, वायुबल के साथ मरुद्धेग नामक महासुर का, यमदंष्ट्र के साथ वज्रपंजर का, सुरोषण के साथ असुर कालचक्र का, ।॥२०-२३॥
प्रमयन का, कुबेरदत्त के साथ दैत्यराज सिंहनाद का वरुणशर्मा के साथ, प्रवहण का दुष्टदमन के साथ, प्रहृष्टरोमा का रोषावरोह के साथ, घुरन्धर का विकटाक्ष के साथ, कम्बल का कम्बलिक के साथ, कुंजरकुमार का आरोहण के साथ और महोत्पात दोहन का प्रहस्त के साथ परस्पर द्वन्द्व युद्ध प्रारम्भ हुआ। इस प्रकार, ये महारथी जब व्यूह के द्वार पर जूझ रहे थे, तब मय ने सुनीय से कहा कि हमारे योद्धा नाना प्रकार के शस्त्रास्त्रों के ज्ञाता होकर भी विरोधियों द्वारा व्यूह में प्रवेश करने से रोक दिये गये ॥२४-२९॥
एक प्रभास ही विना विचार के आगे घुस गया है। पता नहीं, किसका क्या होगा ॥३०॥
यह सुनकर सुवासकुमार बोला- 'तीनों लोकों में कोई ऐसा नहीं है, जो प्रभास का सामना कर सके। ये बेचारे विद्याधर क्या है? न जाने, यह जानते हुए भी आपलोगों को यह व्यर्थ शंका क्यों हो गई ?' मुनिकुमार यह कह ही रहे थे कि कालकम्पन नामक विद्यावर प्रभास के सामने आ गया ।।३१-३३०।
उसे देखकर प्रभास ने कहा 'अरे रे कालकम्पन! तूने हमारी बहुत हानि की है। अब तेरा पौरुष देखना है' ।॥३४॥
ऐसा कहकर प्रभास ने उसकी ओर बाणों की झड़ी लगा दी और कालकम्पन ने भी अपने तीखे बाणों से उसके बाणों को काट डाला ॥३५॥
अस्त्रों और प्रत्यस्त्रों द्वारा भीषण युद्ध करते हुए उन मनुष्य और विद्यावर दोनों ने सारे संसार को आश्चर्य में डाल दिया ॥३६॥
तब प्रभास ने एक बाण द्वारा कालकम्पन की ध्वजा काट डाली और दूसरे से उसके सारथी को मार गिराया ॥ ३७॥
चार बाणों से उसके चार घोड़ों को मारा और एक बाण से उसका चनुष काट डाला। दो बाणों से उसकी दोनों भुजाएँ काहीं और दो से दोनों नाक एवं एक तीले बाण से उसका शिर काट दिया ॥३८-३९।।
इस प्रकार, प्रभास ने शत्रु को अपने हाथ की आश्चर्यजनक सफाई दिखाई। मानों, प्रभास ने पहले दिन मारे गये अपने पक्ष के अनेक बोरों को मारने का कोष-पूर्ण बदला ले लिया ॥३९-४०।1
इस प्रकार, मनुष्य और असुरों द्वारा विद्याधरराज के मारे जाने से सारे विद्याधर-दल में शोक और हाहाकार मच गया ।॥४१॥
तब कालंजर का राजा विद्युत्प्रभ कोष से प्रभास की ओर झपटा ॥४२॥
प्रभास ने लड़ते हुए विद्युत्प्रभ को महान् ध्वजा को बाण से काटकर और बार-बार नये-नये उठाये धनुष को भी काटना प्रारम्भ किया ॥४३॥
तब विवश होकर विद्युत्प्रभा, माया से आकाश में उड़कर छिप गया और लज्जित होकर श्राकाश से प्रभास पर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करने लगा ॥४
प्रभास ने भी उसके शस्त्रास्त्रों को दूर करके प्रकाशनास्त्र के प्रभाव से छिपे हुए उसको दृश्य किया और आग्नेयास्त्र के प्रयोग से उसे जलाकर भूमि पर गिरा दिया ॥४५-४६।।
यह देखकर श्रुतशर्मा ने अपने महारथियों से कहा- देखो इस प्रभास ने हमारे दो महारथियों के सरदारों को मार गिराया ॥४७॥
तो तुमलोग कैसे सहन कर रहे हो, सब मिलकर उसे मार डालो।' यह सुनकर विद्याधरों के आठ महारथी उसके सामने आये ॥४८॥
इन आठों में एक कंकटक पर्वत का निवासी विद्याधरराज था, जो ऊध्वंरोमा के नाम से विख्यात था ॥४९॥
दूसरा, महारयो धरणीधर जो पर्वताचिपति विक्रोशन नाम का था। तीसरा लीला-पर्वत पर रहनेवाला, अतिरवियों का नेता इन्दुमाली नामक विद्याधर का राजा था ॥५०-५१॥
चौषा, खेचरों में श्रेष्ठ मलय-पर्वत का निवासी, रथियों का नेता काकांडक था ।।५२।।
पाँचवाँ, निकेत पर्वत का राजा दर्पवाह था। छठा, अंजनगिरि का राजा धूर्त-वहुन था ।।५३॥
अतिरथियों के नेता में दोनों विद्याधरराज और सातवाँ कुमुद-पर्वत का राजा गर्दभरय वराहस्वामी था, जो महारथियों के दल का नेता था और बाठाँ उसी के समान दुन्दुभि-पर्वत का राज मेघावर था ।।५४-५५॥
प्रभास ने इन आठों के चलाये हुए बाणों को अपने बाणों से हटाकर एक साथ ही एक-एक बाण से सबको बींध दिया ॥५६॥
किसी के घोड़े मार दिये, किसी का झंडा काट दिया और किसी का घनुप काट गिराया ॥५७॥
प्रभास ने, चार बाणों से एकाएक हृदय पर प्रहार करके निष्प्राण मेघावर को पृथ्वी पर गिरा दिया ॥५८॥
तदनन्तर, आंजलिक बाण से बंधे हुए केशोंवाले ऊध्वंरोमा के शिर को काट दिया ॥५९॥
शेष छहों के गले उसने एक-एक करके काट दिये और उनके घोड़ों तथा सारथियों को भी मार गिराया ॥६०।।
तब प्रभास के शिर पर आकाश से फूलों की वर्षा हुई, जिससे असुर और मनुष्य उत्साहित हुए और विद्याधर मलिन हो गये ॥६१।।
तदनन्तर, श्रुतशर्मा द्वारा भेजे गये दूसरे चार महारथियों ने प्रभास को बा घेरा ॥६२॥
जिसमें एक कुरंडक पर्वत का स्वामी काचरक नामक विद्यावर था, दूसरा, पंचक पर्वत-निवासी डिडिमाळी नामक विद्याधरराज या ॥६३।।
तीसरा, जयपुर पर्वत का विभावसु नामक विद्याधर अतिरयी था और चौथा भूमितुंडक पर्वत का राजा धवल नामक विद्याधर था ॥६४॥
इन महारथियों के नायक विद्याधर-बोरों ने एक साथ पाँच-पाँच सौ बाण प्रभास को मारे ॥६५।।
प्रभास ने उनकी बाण-वर्षा की उपेक्षा करके एक-एक बाण से ध्वजाओं, एक-एक से सारथियों और चार-चार बाणों से घोड़ों को मारकर एक-एक बाण से उनके शिर काटकर गिरा दिये। इस प्रकार एक-एक को आठ-आठ बाणों से समाप्त करके प्रभास ने गर्जना की ॥६६-६७।।
तदनन्तर, श्रुतशर्मा की आज्ञा से अन्य और चार विद्याधर राजा प्रभास से युद्ध करने लगे ॥६८॥
उनमें से एक विश्वावसु की पत्नी में उत्पन्न नलिन के समान श्याम वर्ण भद्रंकर था। दूसरा, नियन्त्रक था, जो जम्भक की पत्नी में भौम (मंगल) से उत्पन्न रक्तवर्ण का था। तीसरा, कालकोप नामक विद्याधर था, जो दामोदर की पत्नी में यानैश्चर से उत्पन्न हुआ था। वह अत्यन्त काले रंग का और पीले केशोंवाला था। चौथा, चन्द्रमा की पत्नी में इन्द्र से उत्पन्न विक्रमशक्ति था। ये तीन अतिरथियों के दल के नेता थे। चौया, सबसे अधिक बलशाली महावीर नामक विद्याधर या। ये सब पागलों की भाँति उन्मत्त होकर दिव्यास्त्रों से प्रभास को लड़ाने लगे ॥६९-७२।।
प्रभास ने नारायणास्त्र से उनके अस्त्रों के जाल को दूर फेंककर एक-एक के धनुष को आठ-आठ बार सहजही काट डाला ॥७४॥
तब भी शस्त्रास्त्रों की मार करते हुए उन सबके साथी, घोड़ों आदि को मारकर प्रभास ने उन्हें रयहीन कर दिया ॥७५॥
यह देखकर श्रुतशर्मा ने दस और रथियों के नायक विद्याघरों को प्रभास से युद्ध करने के लिए भेजा ॥७६।।
उनके नाम इस प्रकार थे, केतुमालेश्वर के क्षेत्र में अश्विनीकुमार से उत्पन्न और नाम के समान ही आकृतिवाले दम, नियम, विक्रम, संक्रम, पराक्रम, अक्रम, संमदंन, मर्दन, प्रमर्दन, और विमंदन। इनमें अन्तिम आठ मकरन्द के क्षेत्र में आठ वसुओं द्वारा उत्पन्न हुए थे। उनके बाने पर पहले चार भी, जो रथहीन थे, रथों पर बैठ गये ।।७७-७९॥
एक साथ बाण-वर्षा करते हुए उन चौदहों महारथियों के साथ अकेला प्रभास अविचल भाव से युद्ध करता रहा, यह आश्चर्य है । ॥८०॥
तब सूर्यप्रभ के आदेश से कुंजरकुमार और प्रहस्त शस्त्रों को लिये हुए व्यूह के अग्रभाग में युद्ध छोड़कर और आकाश-मार्ग से उड़कर राम और कृष्ण के समान प्रभास की सहायता के लिए जा पहुँचे ।।८१-८२॥
दोनों पैदल वीरों ने रथ में बैठे हुए दम और नियम के सारथी को मारकर और धनुष को काटकर दोनों को व्याकुल कर दिया ॥८३॥
दम और नियम दोनों भय से आकाश में उड़ने लगे। यह देखकर प्रहस्त और कुंजरकुमार भी शस्त्रों को लिये हुए आकाश में उड़े। सूर्वप्रभ ने भी तुरन्त महाबुद्धि और अचलबुद्धि नाम के दो महारथियों को सारथी बनाकर उनके लिए दो रथ भेजे ॥८४-८५॥
प्रहस्त और कुंजरकुमार ने माया से अदृश्य हुए दम और नियम को सिद्धांजन लगाकर देखा और उन्हें बाणों से बीच डाला। यह देखकर वे दोनों विद्यावर भाग गये। उधर, प्रभास, उन बारह महावीरों से लड़ रहा था। उसने बार-बार उनके धनुष काट डाले। उधर से प्रहस्त ने आते ही उन बारहों के सारथियों को और कुंजरकुमार ने उनके घोड़ों को मार डाला ॥८६-८९।।
तब रथहीन वे बारहों अतिरथियों के नेता, उन तीन वीरों की मार से व्याकुल होकर और मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए ॥९०॥
तब दुःख, क्रोष और लज्जा से व्याकुल श्रुतशर्मा ने दो अन्य अतिरथियों के नेताओं को युद्ध के लिए भेजा ॥९१॥
उनमें एक चन्द्रकुल गिरि के स्वामी के क्षेत्र में चन्द्रमा से उत्पन्न और चन्द्रमा के ही समान सुन्दर चन्द्रगुप्त नाम का विद्याधर था। और दूसरा, धुरंधराचल के क्षेत्र में उत्त्पन्न अत्यन्त तेजस्वी नगरंगम नाम का विद्यावर था। ये दोनों श्रुतशर्मा के सचिव थे ॥९२-९३।।
वे भी बाणों की वर्षा करके प्रभास आदि से रथहीन किये गये रणभूमि को छोड़कर भाग गये ॥९४॥
तदनन्तर मनुष्यों और असुरों के विजय-गर्जना करने पर श्रुतशर्मा स्वयं चार महारथियों के साथ युद्धभूमि में सामने आया ।।९५।।
वे चारों महारथी त्वष्टा, भर्ग अर्यमा और पूषा देवताओं के अंश से उत्पन्न महौष, आरोहण उत्पात और वेत्रवत् नाम के थे ॥९६॥
ये चारों मलय आदि पर्वतों के राजा चित्रपाद आदि के क्षेत्र में उत्पन्न हुए थे और प्रसिद्ध पराक्रमी थे ।॥९७।।
तदनन्तर, वे प्रभास आदि तीनों वीर, कोष से अन्धे और चार साथियों के साथ आये हुए श्रुतशर्मा से भिड़ गये ।।९८।।
उन लोगों द्वारा छोड़े गये बाण आकाश में इस प्रकार छा गये, मानों, सूर्य के ताप से रण-लक्ष्मी की रक्षा करने के लिए आकाश में चंदवा तान दिया गया हो ॥९९॥
तदनन्तर, वे विद्याधर भी आकर जुट गये, जो पहले रयहीन होने के कारण समर छोड़कर भाग गये थे ।॥१००॥
तव सूर्यप्रभ ने, श्रुतशर्मा आदि अनेक महारथी योद्धाओं को एक साथ सम्मिलित होकर युद्ध करते देखकर प्रभास आदि की सहायता के लिए अन्यान्य प्रज्ञावध आदि महारथी मित्रों को तया वीरसेन, शतानीक आदि राजपूतों को सहायतार्थ भेजा ॥१०१-१०२॥
आकाश-मार्ग से उनके जाने पर सूर्वप्रभ ने, उनके रथों को भूतासन विमान द्वारा भेज दिया ।। १०३॥
उन सभी धनुर्धारी महारथियों के अपने-अपने रथों में बैठ जाने पर, श्रुतगर्मा के सायी, अन्य विद्याघर भी आकर एकत्र हो गये ॥१०४॥
तब उन विद्याधरों के साथ प्रभास आदि का विनाशकारी युद्ध प्रारंभहुआ ॥१०५॥
उस द्वन्द्व-युद्ध में दोनों सेनाओं के वे प्रसिद्ध महारथी मनुष्य, विद्याघर और असुर काम आये ॥१०६।।
राजा वीरसेन ने सेना के साथ धूम्रलोचन विद्याधर को मार डाला और वीरसेन भी रथहीन होकर हरिशर्मा से मारा गया ॥ १०७॥
अभिमन्यू ने विद्याघर-वीर हिरण्याक्ष का वध कर डाला और अभिमन्यु को सुनेत्र ने मार दिया। प्रभास ने सुनेत्र और हरिभट के शिर काटकर गिरा दिये। ज्वालामाली और हतायु दोनों आपस में ही कट मरे ॥१०८-१०९॥
कुम्भीरक और नीरसक, दाँतों से प्रहार करते हुए और उम्र पराक्रमी सुशर्मा भुजाओं के कट जाने से मारे गये ॥११०॥
व्याघ्रभट, शत्रुभट और सिद्भट, ये तीनों विद्याधरों के राजा प्रवहण द्वारा मारे गये और उस प्रवहण को सुरोह और विरोह ने मार डाला तथा श्मशानवासी सिहबल से सुरोह और विरोह भी मारे गये ।। १११-११२॥
राजपूत-बीर शतानीक ने, दस विद्याधरों को मार दिया, उनके नाम इस प्रकार हैं-प्रेत-बाहुन, सिहबल, कपिलक, चित्रापीड, जगज्ज्वर, शूर, कान्तापति, महाबल, सुवर्ण, कामधन एवं कोषपति। इनके अतिरिक्त बलदेव और राजा विचित्रापीड ये दो विद्याधर--राजा थे ।।११३-११५॥
इस प्रकार, वीरों के मारे जाने पर और विद्याषरों की सेना का क्षय देखकर श्रुतशर्मा कोच करके शतानीक पर स्वयं दौड़ पड़ा ॥११६॥
तदनन्तर, दोनों दलों में सायंकाल तक प्रलयंकारी भीषण संग्राम हुआ, जिसे देखकर देवता भी चकित रह गये ।।११७७॥
सन्ध्या होने पर सैकड़ों कवन्व (घड़) भूत, प्रेतों से जाविष्ट होकर सन्ध्याकालीन नृत्योत्सव के लिए उठ खड़े हुए ॥११८॥
तदनन्तर, रात्रि के प्रारम्भ होने पर बहुत अधिक सेना के विनाश से व्याकुल और मारे गये बन्धु-बान्धवों के कारण दुःखित विद्याधर तथा हठात् जय प्राप्त किये हुए मनुष्य और असुर युद्ध बन्द करके अपने-अपने शिविरों में गये ॥ ११९॥
उसी समय सुमेरु द्वारा सूचित किये गये विद्याधर-महारथियों के दो नेता, श्रुतशर्मा का पक्ष छोड़कर सूर्वप्रभ के समीप आकर उसे प्रणाम करके बोले-॥१२०॥
"महायान और सुमाय नाम के हम दोनों और तीसरा मिहबल जो (युद्ध में मारा गया) महाश्मशान के अधिपतित्व से सिद्ध हैं। अतः, दूसरे विद्याधर-राजा हमें पराजित नहीं कर सकते ॥१२१।।
किसी समय श्मशान के मध्य बैठे हुए हम लोगों के पास सदा प्रसन्न रहनेवाली और तिव्य प्रभावशालिनी शरभानना नाम की योगिनी आई ॥१२२॥
प्रणाम के साथ 'तुम कहाँ रहती हो? वहाँ का क्या समाचार है? और, तुमने कौन-सी अपूर्व बात देखी?' इस प्रकार, हम लोगों से पूछी गई वह योगिनी कहने लगी ।।१२३।।
शरभानना योगिनी के पराक्रम की कथा
"मैं अपनी साथिन योगिनियों के साथ अपने स्वामी महाकाल का दर्शन करने के लिए गई थी, वहाँ पर मेरे सामने ही एक बेतालपति महाकाल से बोला- ॥१२४।।
'महाराज, विद्याधर-राजाओं द्वारा नियुक्त अग्निक नामक हमारे महासेनापति की अपूर्व रूपशालिनी कन्या को तेजःप्रभ सहसा हण करके ले जा रहा है ।।१२५॥
सिद्धों का यह आदेश है कि वह कन्या भाबी विद्यावर-चक्रवर्ती की पत्नी बनेगी, इसलिए हे स्वामिन्, आप उसे छुड़ावें ॥१२६॥
दुःखित वेताल के इस प्रकार वीन वचन सुनकर महाकाल स्वामी ने हम योगिनियों को आदेश दिया कि जाकर उसे छुड़ाजो। हम लोगों ने बाकाश से उड़कर उस कन्या को प्राप्त किया ॥१२७७।
उसे हरण करनेवाले तेजः प्रभ ने कहा-'विद्याधर-चक्रवर्ती श्रुतवार्मा के लिए मैं इसे ले जा रहा हूँ। हम लोगों ने आत्मशक्ति से उसका स्तम्भन करके उस कन्या को लाकर प्रभु (महाकाल) को अर्पित किया ।।१२८॥
किन्तु प्रभु ने वह कन्या उसके बन्धुओं को दे दी, यह मैंने बड़ा अपूर्व दृश्य देखा। तदनन्तर, कुछ दिन वहाँ रहकर और भगवान् को प्रणाम कर यहाँ आई हूँ" ।।१२९॥
इस प्रकार कहती हुई योगिनी से हम लोगों ने यह पूछा किं'तुम सब कुछ जानती हो, तो बताओ कि भविष्य में विद्याधर-चक्रवर्ती कौन होगा ? ॥ १३०॥
'सूर्वप्रभ होगा', इस प्रकार योगिनी के उत्तर देने पर सिहबल हम लोगों से कहने लगा- 'यह मिथ्या है; क्योंकि श्रुतशर्मा के पक्ष में इन्द्र आदि देवता कमर कसकर तैयार हैं। यह सुनकर आर्या योगिनी बोली- तुम लोगों को विश्वास न हो, तो सुनो, मैं कहती हूँ-शीघ्र हो श्रुतशर्मा और सूर्वप्रभ का युद्ध होगा। उस समय यदि सिहबल तुम लोगों के सामने मनुष्य से मारा जायगा, तो तुम दोनों मेरे इस सूचता-चिह्न को देखकर मेरी बात को सत्य मानोगे' ॥१३१--१३३॥
ऐसा कहकर वह योगिनी चली गई और वे दिन भी बीत गये। आज हम लोगों ने प्रत्यक्ष देखा कि मनुष्य ने सिहबल को मार दिया ॥१३४।॥
इस विश्वास के कारण आपको ही आकाशचारियों (विद्यावरों) का चक्रवर्ती मानकर हम दोनों आपके चरणों में उपस्थित हुए हैं। और, हम लोग अब आपके आज्ञाकारी है" ।॥१३५॥
ऐसा कहते हुए विद्यावरों के राजा महायान और सुमाय का सूर्यप्रभ ने मय आदि की सम्मति लेकर समुचित सम्मान दिया ॥१३६॥
यह समाचार सुनकर अत्यन्त व्याकुल श्रुतशर्मा को आश्वासन देने के लिए इन्द्र ने विश्वा-वसु (गन्धर्व) को दूत के रूप में उसके पास भेजा और उसके द्वारा स्नेहपूर्वक उसने यह सन्देश मेजा-'तुम धैर्य रखो, मैं प्रातःकाल सब देवताओं के साथ समर-भूमि में तुम्हारी सहायता करूँगा' ।॥१३७।।
शत्रुपक्ष में आपसी फूट देखकर सन्तुष्ट और रणभूमि में शत्रुपक्ष को पराजित किया हुआ सूर्वप्रभ, उस रात को भी अपनी पत्नियों को छोड़ कर मन्त्रियों के साथ अपने शयन-मूह में चला गया ।।१३८॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के सूर्यप्रभ लम्बक का पंचम तरंग समाप्त
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1. रणभूमि में मारे गये शूर-बीर और योगी-परिव्राजक की आत्माएँ सूर्य-मण्डल का भेवन करके उसके ऊपर सत्यलोक में जाती हैं। अनु०
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