5902. || द्वितीय कहानी || नरवाहनदत्त का अलंकारवती के घर जाना; अशोकमाला की कथा; स्थूलभुज विद्याबर की कथा; अनंगरति की कथा; अनंगप्रभा को कथा; अनंगप्रभा और मवनप्रभ की कथाद्वितीय तरंग

5902. || द्वितीय कहानी || नरवाहनदत्त का अलंकारवती के घर जाना; अशोकमाला की कथा; स्थूलभुज विद्याबर की कथा; अनंगरति की कथा; अनंगप्रभा को कथा; अनंगप्रभा और मवनप्रभ की कथा

द्वितीय तरंग

नरवाहनदत्त का अलंकारवती के घर जाना

तदनन्तर, वह वत्सेश्वर का पुत्र नरवाहनदत्त, कौशाम्बी नगरी में, पिता के घर पर, नई वधू अलंकारवती के साथ रहने लगा ॥१॥

वह वहाँ रहकर दहेज में प्राप्त अलंकारवती की दासियों के साथ नाच-गान आदि से मनोविनोद करता हुआ तया अपने साथी मन्त्रियों के साथ मद्य-सेवन करता हुआ समय व्यतीत करता था ।॥२॥

एक बार, अलंकारवती की माता कांचनप्रभा, नरवाहनदत्त के पास आई और उसके उचित स्वागत कर लेने पर, उससे बोली-॥३॥

'बेटा, तुम हमारे घर सुन्दरपुर आओ और उस नगर के उद्यानों में अलंकारवती के साथ विवरण करो' ॥४॥

यह सुनकर, वहाँ जाना स्वीकार करके और उसी की बात को पिता से निवेदन करके, पिता के नर्म-सचिव वसन्तक तथा अन्य मन्त्रियों एवं वपू अलंकारवती के साथ नरवाहनदत्त, सास द्वारा विया के प्रभाव से निर्मित विमान पर सवार होकर आकाश-मार्ग से सुन्दरपुर को गया ।॥५-६।।

विमान पर चढ़ा हुआ वह नरवाहनदत्त, नीचे की एक पृथ्वी को एक स्थली के समान और समुद्रों को साइयों के समान लघु रूप में देखता हुआ सास और साथियों के साथ क्रमशः हिमालय पर्वत पर पहुंचा ॥७॥

आठवाँ श्लोक मूल पुस्तक में ही त्रुटित है ॥८॥

किन्नरों के गीतों और स्वर्गीय रमणियों के स्वर-संगीतों से मुखरित वह हिमालय पर्वत उसे अत्यन्त सुन्दर लग रहा था ।।९।।

उस पर्वत पर अनेक आश्चर्यों को देखता हुआ वह युवा नरवाहनदत्त अपने श्वशुर की राजधानी सुन्दरपुर पहुंचा ॥१०॥

यह सुन्दरपुर रत्नों से जड़े हुए सोने के महलों से हिमालय में भी सुमेरु पर्वत की भ्रान्ति उत्पन्न कर रहा था ।॥ ११॥

आकावा से उतरकर और विमान से बाहर निकलकर वह उस नगर में प्रविष्ट हुआ, उसके आगमन पर हिलती हुई ध्वजाओं से मानों सुन्दरपुर नगर, अपने स्वामी को प्राप्त कर प्रसन्नता प्रकट कर रहा या ।॥१२॥

तदनन्तर, सास द्वारा मंगलाचार किये जाने पर, नरवाहनदत्त अपने मित्र, वसन्तक और बहू अलंकारवती के साय राजभवन में गया ।॥१३॥

वहाँ पर सास द्वारा विद्या के प्रभाव से प्राप्त किये गये दिव्य भोगों को भोगता हुआ वह म्वर्ग में इन्द्र के समान रहने लगा ॥१४।।

किसी दिन, उसकी साय, कांचनप्रभा ने उससे कहा 'इस नगर में स्वयंभू भगवान् उमापति शिव का मन्दिर है ॥१५॥

उसके दर्शन और पूजन से भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त हो सकते हैं। अलंकारवती के पिता ने वहाँ एक विशाल उद्यान बनाया है।॥१६॥

और, यथार्थ नामवाला गंगासर नाम का तीर्य भी बनाया है। आज वहाँ उनका दर्शन और विहार करने चलो'।॥ १७॥

सास के इस प्रकार कहने पर नरबाहह्नदत्त अपने साथियों और अलंकारवती के साथ वहाँ गया ।॥१८॥

वह स्थान, सोने की प्रधान शाखाओंवाले, रत्नों की छोटी डालियोंवाले और लटकते हुए मोतियों के गुच्छों से सुशोभित वृक्षों से युक्त या ॥१९॥

वहाँ पर गंगासर में स्नान और शिव का पूजन कर लेने के उपरान्त नरवाहनदत्त रत्नों को सीढ़ियोंवाली और सोने के कमलां से शांभित बाबलियों में भ्रमण करने लगा ॥२०॥

उन बावलियों के रमणीय किनारों पर भ्रमण करता हुआ वह, कल्पलता-गृहों में अलंकार-वती और साथियों के साथ विहार करने लगा ॥२१॥

दिग्व मद्यपान, संगीत, गोष्ठी और मरुभूति द्वारा किये जाते हुए सुन्दर हास-विलासों से, वह वहाँ अपना मनोरंजन कर रहा था ॥२२॥

इस प्रकार, सास की विद्या के प्रभाव से आनन्द लेते और उद्यान-भूमि में विहार करते हुए, नरवाहनदत ने, वहाँ एक मास व्यतीत किया ॥२३॥

तदनन्तर, उत्स कांचनप्रभा द्वारा, दिव्य वस्त्रों एवं आभूषणों से सत्कृत नरवाहनदत्त, अपनी वबू, मन्त्री और कांचनप्रभा के साथ उसी विमान द्वारा कौशाम्बी नगरी को लौट आया और उसने अपने माता, पिता की आंखों को आनन्दित किया ।। २४-२५॥

कौशाम्बी पहुंचने पर वासवदत्ता और वत्सराज उदयन के सामने, माता कांचनप्रभा ने, पुत्री अलंकारवती से कहा-॥२६॥

'बेटी, ईर्ष्या और क्रोष से तुम अपने स्वामी को कमी कष्ट न देना। इस पाप से होनेवाला वियोग गम्भीर दुःख और पश्चात्ताप का कारण होता है ॥२७॥

मैंने अपने यौवन-काल में ईर्ष्या के कारण पति को कष्ट दिया था, इसी कारण आज उनके वन में चले जाने पर पश्चात्ताप और वियोग से जल रही हूँ' ॥२८॥

पुत्री को इस प्रकार की शिक्षा देकर आँसुओं से भरी आँलोंवाली कांचनप्रभा अलंकारवती का आलिंगन करके और आकाश में उड़कर अपनी नगरी की चली गई ॥२९॥

तदनन्तर, प्रातःकालोचित क्रिया (स्नानादि) करके नरवाहनदत्त के मन्त्रियों के साथ बैठे रहने पर एक भयभीता और विलासिनी स्त्री, अलंकारवती के पास आकर कहने लगी-'मेरी रक्षा करो, रक्षा करो' ॥३०-३१॥

अशोकमाला की कथा

'यह ब्राह्मण मुझे मारने के लिए बाहर खड़ा है। उसके भय से में शरणार्थिनी होकर आपके पास आई हूँ' ।॥३२॥

'डरो मत' अपना हाल बताबो कि वह कौन है और तुम्हें क्यों मारना बाहता है?' अलंकारवती के इस प्रकार पूछने पर उसने फिर कहना प्रारम्भ किया ॥३३॥

"हे स्वामिन्, मेरा नाम अशोकमाला है। मैं इस नगरी में बलसेन नामक क्षत्रिय से उत्पन्न हुई हूँ ॥३४॥

जब मैं कुमारी थी, तभी मेरे रूप के लोभी ठशर्मा नामक धनी ब्राह्मण ने, मुझे मेरे पिता से माँग लिया था ।।३५।।

'मैं इस बुरी और भीषण आकृतिवाले पुरुष को अपना पति न बनाऊँगी और पिता के दे देने पर भी मैं इसके घर न रहूंगी' ऐसा मैंने अपने पिता से कहा ॥३६॥

यह सुनकर हठवार्मा ने मेरे पिता के घर पर अनशन प्रारम्भ कर दिया। तब ब्रह्महत्या के भय से मेरे पिता ने मुझे उसे दे दिया ॥ ३७॥

तदनन्तर, मुझे विवाहित करके, मेरे न चाहने पर भी हठशर्मा, मुझे बलात् अपने घर ले गया तब मैंने उसे छोड़कर एक क्षत्रियकुमार का आश्रय लिया ॥३८॥

ठार्मा ने अपने धन के मद से उसकी दुर्गति की तो मैं उसे भी छोड़कर दूसरे क्षत्रियकुमार के पास चली गई ॥३९॥

तब हठशर्मा ने, घन के मद में आकर उसके घर में भी एक रात्रि को जाग लगा दी। उसके बाद मैंने दूसरे बनी क्षत्रियकुमार का आश्रय लिया ॥४०॥

तत्पश्चात् हठशर्मा ने आग लगाकर उसका घर भी फूंक डाला। तब उसने भी मुझे छोड़ दिया और मैं मारी-मारी फिरने लगी ॥४१॥

सियार से डरती हुई भेड़ के समान मुझे मारने की इच्छा से मेरा पीछा करते हुए हठशर्मा से मैं दूर-दूर भागती रही ॥४२॥

तब भागते-भागते मैंने इसी राजभवन में शरणागतों की रक्षा करनेवाले आपके बलवान् सेवक बोरवर्मा का आश्रय लिया और उसकी दासी होना स्वीकार किया ।॥४३॥

यह जानकर निराशा से पागल और विरह से व्याकुल हठशर्मा के शरीर में केवल हाड़-मांस ही शेष रह गया ॥४४॥

उसके यहाँ आने पर मेरी रक्षा के लिए हठशर्मा को बाँधने को उद्यत वीरणर्मा को मैंने मना कर दिया ॥४५॥

आज अकस्मात् मुझे बाहर निकली हुई देखकर हठसर्मा कुरा लेकर मुझे मारने के लिए दौड़ा ॥४६॥

इसलिए, भागती हुई मैं यहाँ आई हूँ। दयालु प्रतीहारी ने, मेरे लिए दरवाजा खोल दिया और मैं आपके समीप आई, मैं समझती हूँ, अनी वह बाहर खड़ा है।॥४७॥"

उसके ऐसा कहने पर नरवाहनदत्त ने उस ब्राह्मण हठशर्मा को अपने सामने बुलवाया ॥४८॥

क्रोव के कारण लाल आँखों से आलोकमाला को देखते हुए, क्रोध से काँपते हुए अंगोंब. ले और हाथ में छुरा लिये हुए उस भीषण आकृतिवाले हठशर्मा से नरवाहनदत्त ने कहा-॥४९॥

'हे दुष्ट ब्राह्मण ! स्त्री को क्यों मारते हो और उसके लिए दूसरों के घरों में आग क्यों लगाते फिरते हो? तुम ऐसा पाप कार्य क्यों कर रहे हो?' ।॥५०॥

यह सुनकर वह ब्राह्मण कहने लगा-'यह मेरी धर्मपत्नी है और मुझे त्याग कर दूसरों के पास चली गई, तो मला मैं कैसे सहन कर सकता'? ॥५१॥

उसके ऐसा कहने पर घबराई हुई अशोकमाला बोली हे लोकपालो, यह तुम्हीं कहो कि क्या तुम्हारी साक्षिता में इस ब्राह्मण ने मुझे हठपूर्वक विवाहित नहीं किया? और, क्या मेरे न चाहते हुए भी यह मुझे बलात् नहीं ले गया? क्या उस समय मैंने यह नहीं कहा था कि मैं तेरे घर न रहूँगी ?' ॥५२-५३।।

अशोकमाला के इस प्रकार कहने पर दिव्यवाणी हुई- 'यह अशोकमाला जो कहती है, बह सच है' ।॥५४।।

यह मानुषी नहीं है। इसका तत्त्व सुनो। अशोककर नाम का विद्यावरों काबीर राजा है ।। ॥५५।।

उस पुत्रहीन राजा के यहाँ दैवयोग से यह एक ही कन्या हुई और अशोकमाला के नाम से पिता के घर पर ही यह बड़ी हुई ।।५६।।

यौवनप्राप्त इस कन्या ने, अपने रूप के घमंड में प्रार्थना करने पर भी किसी को पति नहीं माना ॥५७॥

इसके इस हठ से क्रुद्ध होकर पिता ने इसे शाप दिया कि तू मनुष्य-योनि में जा। उस योनि में भी तेरा यही नाम होगा ॥५८॥

मर्त्यलोक में कुरूप ब्राह्मण तुप्तसे विवाह करेगा। तू उसे छोड़कर उसके भय से अन्यान्य तीन पतियों के पास जायगी ।।५९।।

वहाँ से भी भागकर एक बलवान् राजपूत के पास जायगी। वह तुझे रख लेगा। किन्तु, वहाँ पर तुझे देखकर तेरा पति जब मारने के लिए दौड़ेगा, तब तू राजभवन में घुसकर इस शाप से मुक्त हो जायगी ॥६०-६१॥

इस प्रकार, पूर्वजन्म में जो अशोकमाला नाम की विद्याघरी थी, वही अब पिता के शाप से मानुषी बनी है।॥ ६२॥

अब उसके शाप का अन्त हो गया है और अब वह विद्याषर लोक में जाकर फिर अपना विद्याधर-शरीर प्राप्त करेगी ॥६३॥

तव, वह अभिरुचि नामक विद्याधर-राजा से विवाहित होकर और अपने शाप का स्मरण करके आनन्दोपभोग करेगी' ।॥६४॥

ऐसा कहकर दिव्यवाणी मौन हो गई और वह अशोकमाला भी प्राणहीन होकर भूमि पर गिर पड़ी ॥६५॥

उसे इस प्रकार देखकर अलंकारवती और नरवाहनदत्त दोनों की आंखें भर आई ।।६६।।

बड़ी कठिनाई से अपने क्रोव को शान्त करता हुआ प्रेम से अन्धा और विलाप करता हुआ भी हठशर्मा अकस्मात् हर्ष से खिल उठा ।।६७।।

यह, क्या बात है, इस प्रकार सब से पूछा गया वह ब्राह्मण बोला कि 'मैंने भी अपने पूर्वजन्म का स्मरण कर लिया है। सुनिए- ॥६८॥

स्थूलभुज विद्याबर की कथा

"हिमालय पर्वत पर मदनपुर नाम का उत्तम नगर है। वहाँ प्रलम्बभुज नामक विद्याधरों का राजा है। उससे स्थूलभुज नाम का एक पुत्र उत्पन्न हुआ यौवन अवस्था को प्राप्त वह अति सुन्दर और भब्य आकृतिबाला हुजा ॥६९-७०।।

तदनन्तर, सुरभिवत्स नाम का विद्याधरों का स्वामी अपनी कन्या के साथ प्रलम्वभुज के घर पर जाकर बोला 'यह सुरभिदत्ता नाम की मेरी कन्या है। यह मैंने तुम्हारेपुत्र स्थूलभुज को प्रदान की है। अतः वह इसके साथ विवाह करें' ।।७१-७२॥

यह सुनकर और सम्बन्ध को स्वीकार करके प्रलम्बभुज ने अपने पुत्र स्थूलभुज को बुलाकर उससे यह बात कह दी ॥७३॥

तब वह स्यूलभुज रूप के घमंड में आकर बोला-'पिताजी, मैं इससे विवाह न करूंगा; क्योंकि यह रूप में मध्यम है' ॥७४॥

'बेटा, बहुत अच्छे रूप से क्या करना है? उच्च वंश की यह कन्या मान्य है। पिता ने इसे दिया और मैंने तुम्हारे लिए ले लिया। अब तुम इधर-उधर न करो' ।।७५।।

पित्ता द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर भी स्थूलभुज ने उसकी बात नमानी, तो पिता ने क्रुद्ध होकर उसे शाप दिया-॥७६॥

'अब तू अपने रूप के घमंड के दोष से मवं लोक में उत्पन्न हो। मनुष्य-लोक में तू भयानक रूप और आकृतिवाला होगा ॥७७॥

तू शाप से च्युत अशोकमाला नाम की पत्नी को हठपूर्वक प्राप्त करेगा, वह तुझे न चाह कर छोड़ देगी। इससे तुझे वियोग-दुःख प्राप्त होगा। जब वह दूसरों से प्रेम करेगी, तब तू उसके वियोग-दुःख से अत्यन्त दुर्बल हो जायगा और प्रेम से मोहित होकर अग्निदाह आदि पाप करेगा' ॥७८-७९॥

पुत्र को इस प्रकार शाप देते हुए प्रलम्बभुज के चरणों में गिरकर रोती हुई सुरभिदत्ता कहने लगी- 'मेरे अपराध से एकमात्र मेरे पति को ही शाप का दुःख नहो, अतः मेरे लिए भी बाज्ञा कीजिए' ।।८०-८१॥

ऐसा कहती हुई उस साध्वी सुरभिदत्ता को धैर्य देते हुए प्रसन्न प्रलम्बभुज ने स्थूलभुज के शाप का इस प्रकार बन्त किया-॥८२॥

'जब अशोकमाला का शाप-मोक्ष होगा, तभी यह भी जाति-स्मरण करके शाप से मुक्त हो जायगा ॥८३॥

और पुनः अपने विद्याधर-शरीर को प्राप्त कर शाप का स्मरण करते हुए अभिमान-रहित होकर शीघ्र ही तुझसे विवाह करेगा और तेरे साथ सुलपूर्वक रहेगा' ।॥८४॥

प्रलम्बभुज के इस प्रकार कहने पर उस पतिव्रता ने किसी प्रकार धीरज धारण किया। अतः, आपलोग मुझे वही शापमुक्त स्थूलभुज समझें ।॥८५॥

मैंने अभिमान के कारण यह दुःख प्राप्त किया। सच है, अभिमानी पुरुषों का जाने या अनजाने कल्याण कैसे हो सकता है ? ॥८६॥

आज मेरा वह शाप समाप्त हुआ" ऐसा कहकर स्थूलभुज ने मानव-धारीर का त्याग कर दिव्य विद्याधरकुमार का रूप धारण किया ॥८७॥

और, अपनी विद्या के प्रभाव से अशोकमाला के शव को अदृश्य रूप से ही गंगा में प्रवाहित कर दिया तथा विद्या के प्रभाव से मंगाये गये गंगाजल से अलंकारवती के वास-भवन को थो दिवा ॥८८-८९॥

एवं अपने भावी स्वामी नरवाहनदत्त को प्रणाम करके अपनी कार्य-सिद्धि के लिए आकाश में उड़ गया ।॥९०।।

इस घटना के कारण वहाँ बैठे हुए सभी लोगों के आश्चर्य चकित हो जाने पर गोमुख ने अनंगरति की कथा प्रारम्भ की ॥९१॥

अनंगरति की कथा

इसी पृथ्वी पर यथार्थ नामवाला शूरपुर नगर है। वहाँ महावराह नाम का अत्यन्त बलशाली राजा था ॥९२॥

सन्तानहीन उस राजा को पद्मरति नाम की रानी से अनंगसुन्दरी नाम की कन्या उत्पन्न हुई ।॥९३॥

कालक्रम से युवावस्था में चढ़ी हुई रूपविता अनंगरति ने अनेक राजाओं के माँगने पर भी किसी को पति बनाना स्वीकार नहीं किया ।॥९४।।

और, वृढ-निश्चय के साथ कहा कि जो शूरवीर, रूपवान् तथा किसी विशेष विज्ञान का वेत्ता होगा, उसे ही मैं अपने को दूंगी ॥९५॥

कुछ समय के अनन्तर राजकुमारी का समाचार सुनकर उसकी इच्छा से विवाह करने के लिए दक्षिणापथ से चार बीर, राजा महावराह के पास आये ।॥९६॥

द्वारपालों द्वारा सूचना पाकर अन्दर आये हुए उनसे राजा महावराह ने अनंगरति के सामने ही पूछा- ॥९७৷৷

'तुम्हारा नाम क्या है, जाति क्या है और कौन-सा विशेष विज्ञान तुमलोग जानते हो ? राजा के प्रश्नों की सुनकर उनमें से एक ने कहा-॥९८॥

में पंचपट्टिक नाम का शूद्र (जुलाहा) हूँ। बुनने का विज्ञान जानता हूँ और प्रतिदिन पांच जोड़े कपडे बुनता हूँ ॥९९॥

उन पांच जोड़ों में से एक बाह्मण को देता हूँ, दूसरा जोड़ा, ईश्वर को अर्पण करता हूँ. तीनग स्वयं पहनता हूँ और चौया जोड़ा, यदि मेरी पत्नी हो, तो उसे दूं और पाँचवें जोड़े को बचकर जीवन-निर्वाह करता हूँ ॥१००-१०१॥

तब दूसरा बोला-'मैं भाषाविज्ञानी वैदय हूँ। सभी मृगों और पक्षियों की बोलियों को जानता हूँ ॥१०२॥

तब तीमरा बोला- मैं सड्गधर नाम का क्षत्रिय हूँ और खड्ग के अतिरिक्त मैं अन्य किमी वृत्ति से जीवन-निर्वाह नहीं करता' ॥१०३॥

तदनन्तर, चौबा बोला- 'मैं जीवदत्त नाम का ब्राह्मण हूँ। पार्वती की कृपा और विद्या के प्रभाव से मरी हुई स्त्री को जिला देता हूँ ॥१०४।।

ऐसा कहते हुए शूद्र, क्षत्रिय और वैश्य तीनों ने अपने रूप, शौर्य और बल की अलग-अलग प्रशंसा की. किन्तु ब्राह्मण ने रूप को छोड़ केवल बल-वार्य की बात कही। यह सुनकर राजा महावराह ने अपने क्षत्ता (प्रतीहार) से कहा कि तुम इन सब को अपने घर ले जाकर विधाम कराओ। यह सुनकर 'जो आज्ञा' कहकर क्षत्ता उन्हें अपने घर ले गया ।।१०५-१०७।।

उनके चले जाने पर राजा ने अपनी कन्या अनंगरति से कहा 'बेटी, इन चारों वीरों में से तुम किये चाहती हो ?' ॥१०८॥

यह सुनकर वह अनंगरति पिता से बोली-'पिता, इन चारों में से एक भी मुझे पसन्द नहीं है ॥१०९॥

इनमें एक शूद्र और जुलाहा है, इस गुण से क्या लाभ ? दूसरा, वैश्य पशुओं की बोलियाँ जानता है, उसके जानने से भी क्या लाभ ? मैं क्षत्रिया होकर अपने को वैश्य और शूद्र को कैसे देहूँ? तीसरा, मेरी समान जाति का क्षत्रिय गुणी तो है, किन्तु वह सेवा से जीवन व्यतीत करनेवाला, दरिद्र और प्राणों को बेचनेवाला है। मैं पृथ्वीपति की कन्या होकर उस सेवक की पत्नी कैसे बनूं ॥११०-११२॥

चौथा, ब्राह्मण जीवदत्त मी मुझे पसन्द नहीं है। वह कुरूप, कर्महीन, वेदरहित और पतित है ॥११३॥

वह तो तुम्हारे लिए दंड देने योग्य है। हे पिता, तुम तो वर्षों और आश्रमों के रक्षक और धर्म के प्रतिप तक हो ॥११४॥

हे राजन्, खड्गशूर से भमंजूर अधिक प्रशंसनीय है। हजारों खड्गशूरों का एक धर्मशूर स्वामी हो सकता है' ।॥११५॥

इस प्रकार कहती हुई बपनी कन्या को निवास स्थान के लिए विदा कर, राजा स्नान आदि के लिए उठ गया ।॥११६॥

दूसरे दिन, वे चारों दक्षिणी वीर, क्षत्ता के घर से निकले और नगर देखने की इच्छा मे भ्रमण करने लगे ॥११७॥

इसी बीच पद्मकवल नाम का मदोन्मत्त दुष्ट हाथी, मीकड़ तोड़कर जनता को रौंदता हुआ गजशाला से बाहर निकल आया ॥११८॥

उग हाथी ने, उन चारों बीरों को देखकर, उन पर आक्रमण कर दिया। वे भी अपने-अपने शस्त्रों को उठाकर हाथी की ओर दौड़ पड़े ॥११९॥

उन में से खड्गघर नामक क्षत्रिय वीर ने, और तीनों को हटाकर अकेले ही हाथी का मामना किया ॥१२०॥

और विग्बाड़ते हुए हाथी की मूंड को उसने एक ही प्रहार से कमलनाल के समान काट दिया ॥१२१॥

और, पैंतरा दिखाकर उसके पैरों के नीचे से निकलकर उसकी पीठ पर दूसरा प्रहार किया ॥ १२२॥

उसने, तीसरे प्रहार में, उसके पैर काट डाले, तो चिल्लाता हुआ हाथी भूमि पर गिर गया और मर गया ॥१२३॥

उसके इस पराक्रम को देखकर सभी लोग चकित रह गये और राजा महावराह भी यह सब सुनकर विस्मित हुआ ॥१२४।॥

दूसरे दिन वह राजा हाथी पर बैठकर शिकार के लिए वन में गया और वे चारों वीर भी उसके पीछे गये ।।१२५।।

शिकार के समय सेना के साथ राजा के अनेक बाघों, मृगों और सूबरों के मार देने पर हाथियों के चिन्धाड़ सुनकर कुद्ध सिंह चारों ओर से राजा की ओर दौड़ पड़े ।।१२६॥

आक्रमण करते हुए एक सिंह को बीर लड्गधर ने तलवार के एक ही प्रहार से दो टुकड़े करके, मार डाला ॥१२७॥

और, दूसरे सिह के हैंरों को बायें हाथ से पकड़कर और घुमाकर पृथ्वी पर पटककर मार डाला ॥ १२८॥

इसी प्रकार भाषा-विज्ञानी वैश्य, ब्राह्मण और पंचपट्टिक शूद्र आदि तीनों वीरों ने पैदल चलते हुए ही राजा के सामने अनेक सिंह, बाप आदि को पृथ्वी पर पटक-पटककार सहज ही में मार डाला ॥१२९--१३०।।

तब आश्चर्य के साथ सन्तुष्ट राजा शिकार खेलकर नगर को लौट आया और वे बारों बोर क्षत्ता के घर पर, अपने निवाम-स्थान को बले गये ।।१३१॥

तब राजा ने थान्त होते हुए भी उसी समय अपने रनिवास में जाकर वहीं अनंगरति को बुलवाया और शिकार के समय उन वीरों का जो पराक्रम और कौतुक देखा था, सब उसे कह मुनाया। यह सब सुनकर और जानकर वह भी अत्यन्त चकित हुई ।।१३२-१३३॥

राजा ने कहा-'बेटी, पंचपट्टिक और भाषाविज्ञानी, ये दोनों यदि समान वर्ण (जाति) के नहीं हैं और यदि ब्राह्मण जीवदत्त कुरूप और कुत्सित कर्म करनेवाला है, तो क्षत्रिय खड्गधर का क्या दोष है? उसका कद और रूप भी मुन्दर है तथा वह बल और पराक्रम वाला है ।।१३४-१३५।।

जिमने ऐसे मदोन्मत्त और पागल हाथी को मार दिया और जो सिहों को पकड़कर भूमि पर पछाड़कर, मसल डालता है और खड्ग से उनके दो टुकड़े कर डालता है।॥१३६॥

यदि तुम उसके ये दो दोष बनाती हो कि वह दरिद्र है और सेवक है, तो मैं उसे क्षण-भर में दूसरों से सेवा किये जाने योग्य, अर्थात् राजा बना दूंगा ॥१३७।।

इसलिए बेटी, यदि तुम्हें वह अच्छा लगे, तो उसे पति बना लो।' पिता द्वारा इस प्रकार कहो गई अनंगरति बोली-॥१३८॥

'ऐमी बात है, तो सब को यहाँ बुलाकर और ज्योतिषियों को भी बुलवाकर पूछे कि वे क्या बतलाते हैं।॥ १३९।।

यह सुनकर राजा, ने उन वीरों को बुलवाकर उनके सामने ही ज्योतिषी से अनुरोध के साथ स्वयं पूछा- ।।१४०।।

'देखो, इन चारो में अनंगरति के साथ किसकी कुंडली मिलती है और उसके विवाह का लग्न कब शुभ है ?' ॥१४१॥


यह सुनकर और गणक ने उन लोगों से नक्षत्र पूछकर और कुछ समय तक विचार कर लेने के उपरान्त राजा से कहा- ॥१४२॥

'महाराज, यदि आप क्रोध न करें, तो स्पष्ट ही कह‌ता हूँ कि इन चारों में एक के साथ भी तुम्हारी कन्या की कुंडली नहीं मिलती। और, इस कन्या का विवाह भी इस लोक में न होगा। क्योंकि, यह शाप के कारण मनुष्य-जन्म में उत्पन्न हुई विद्याघरी है। आगामी तीन महीनों में इसका वह शाप दूर होगा ॥१४३-१४४।।

इसलिए, ये लोग तीन मास तक यहां रहकर प्रतीक्षा करें, तदनन्तर यह कन्या, यदि अपने विद्याधर-लोक में न गई, तो इसका इस लोक में विवाह हो सकेगा' ॥१४५॥

इस प्रकार, वहाँ उपस्थित मभी लोगों ने ज्योतिषी की बातों में विश्वास प्रकट किया और वे चारों वीर तीन मास तक वहीं रहे ॥१४६॥

तीन महीने बीतने पर राजा ने, उन चारों वीरों, ज्योतिपी और अनंगरति को फिर व्लवाया। ज्योतिषी ने उस समय कन्या को अधिक सुन्दर देखकर उसका अन्तिम समय निकट आया, जान लिया ॥ १४७-१४८।।

जब कहो, तीन मास बीत गये। इस प्रकार जैसे ही राजा ने ज्योतिपी से पूछा, तवतक अनंगरति ने अपनी साड़ी के आंचल से अपना मुख ढक लिया और उम मानव-शरीर का परित्याग कर दिया ॥१४९-१५०।।

'यह इस प्रकार मुंह ढककर क्यों बैठी है?' ऐमा सोचकर राजा ने जब उमका मुख स्वयं खोलकर देखा, तब उसे मरी हुई पाया ॥ १५१।।

वह हिम से मारी हुई कमलिनी के समान हो गई थी, उसके नेत्र-रूपी भ्रमर उलटे हुए थे, मुख-कमल तेजोहीन था और अब उसके मुख में हंस के समान मधुर वाणी न थी ॥१५२॥

उने मृत देखकर शोक-रूती वध से मारा हुआ-सा और अपने पक्ष (पंख) के कटने से मूच्छित वह राजा (पर्वत) भूमि पर गिर पड़ा ॥१५३॥

उसकी माता प‌द्मरति भी हाथी से उखाड़ फेंकी गई लता के समान और अपने आभूषण-रूरी पुष्पों के गिर जाने पर शून्य-सी होकर मूच्छित हो गई ।॥१५४।।

अन्य भी परिजन रोने लगे और वे चारों वीर भी अत्यन्त दुःखी हो गये। इतने में ही राजा ने तुरन्त होश में आकर जीवदत्त से कहा ।।१५५॥

इस विषय में तुम्हारे इन साथियों की अब शक्ति नहीं है। यह तुम्हारा अवसर है। तुमने पहले ही प्रतिज्ञा की थी कि मैं मरी हुई को जिला देता हूँ ॥१५६॥

तो, यदि तुममें विद्या का बल है तो इस मरी हुई मेरी कन्या को जिलाओ। जीवित हो जाने पर इस कन्या को तुम्हें दे दूंगा ॥१५७॥

राजा की यह बात सुनकर जीवदत्त ने राजकन्या के मुँह पर जल का छींटा देकर इस आर्या को पड़ा-॥१५८॥

'अ‌ट्टाट्टहासहसित करकुमालाकुले दुरालोके। चामुण्डे विकराले माहाय्यं में कुरु त्वरितम् ॥ १५९।।"

इस प्रकार, विद्या का प्रयोग करने पर भी जब वह कन्या जीवित न हुई, तब जीवदत्त ने दुःखी होकर कहा- ।।१६०।।

विन्ध्यवासिनी द्वारा दी गई भी मेरी विद्या निष्फल हो गई। इमलिए, हंसने के योग्य मेरे इस जीवन से अब क्या लाभ है? ॥१६१।।

ऐमा कहकर जैसे ही जीवदत्त तलवार में अपना शिर काटने को उद्यत हुआ, वैसे ही इस प्रकार की आकाशवाणी हुई ।॥ १६२॥

हे जीवदत्त, साहस मत करो। सुनो, यह अनंगरति विद्याधरकुमारी है ॥ १६३॥

माता-पिता के शाप में यह इतने दिनों तक मनुष्य जीवन में रही। आज वह मनुष्य-देह छोड़कर अपने विद्याधर-देह में चली गई ।॥१६४।।

अतः, तुम जाकर फिर उसी विन्ध्यवासिनी देवी की आराधना करो। उमी की कृपा से तुम इस विद्याधरी को प्राप्त करोगे ।। १६५।।

जब वह दिव्य भोगों को भोग रही है। अतः, राजा और रानी को भी उसके लिए शोक न करना चाहिए।' इतना कहकर दिव्य वाणी शान्त हो गई ॥ १६६॥

तदनन्तर, रानी-सहित राजा ने कन्या का दाह आदि संस्कार करके उसका शोक त्याग दिया और वे तीनों बीर जहां से आये थे, वहीं लौट गये ॥१६७॥

और जीवदत्त, उस विद्याधरी की प्राप्ति में विश्वास करके विन्ध्यवासिनी की शरण में जाकर तपस्या करने लगा। विन्ध्यवासिनी ने स्वप्न में उसे आदेश दिया- ॥१६८॥

अनंगप्रभा को कथा

'मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, उठो और सुनो, मैं तुमसे यह कहती हूँ। हिमालय में वीरपुर नाम का का नगर है। वहाँ समर नाम का विद्याधरों का राजा है। उसकी रानी अनंगवती में अनंगप्रभा नाम की कन्या उत्पन्न हुई । १६९-१७०।।

अपने रूप और यौवन के घमंड से उसने किसी भी पति को पसन्द नहीं किया, तो उसके दुराग्रह से क्रुद्ध होकर उसके माता-पिता ने शाप दिया कि वह मनुष्य-योनि में उत्पन्न होगी और उस योनि में भी उसे पति-सुल न मिलेगा और सोलह वर्ष की अवस्था में ही वह मनुष्य-देह का त्याग कर यहाँ जा जायगी ॥ १७१-१७२॥

मुनि-कन्या की अभिलाषा से शाप के कारण मानव-देह को प्राप्त कुरूप मानव खड्गघर तेरा पति होगा। तेरे न चाहने पर भी तुझे वह मत्र्यलोक में ले जायगा। तब दूसरे के द्वारा तुझे ले जाने पर उसके साथ तेरा वियोग होगा ॥१७३-१७४।।

क्योंकि, उस खड्गघर ने पूर्वजन्म में दूसरों की आठ स्त्रियों का अपहरण किया है, इसलिए वह आठ जन्मों तक भोगने के योग्य दुःखों को प्राप्त करेगा ।।१७५।।

तू भी मानव बन जाने से विद्यात्रों के नष्ट हो जाने के कारण एक ही जन्म में आठ जन्मों का दुःख भोगेगी ॥१७६॥

पापी व्यक्ति का सम्पर्क सभी को उसके पाप का भागी बना देता है। और, स्त्रियों को तां पापी पति के समान हो पाप का भागी होना ही पड़‌ता है ।।१७७७॥

तूने योग्य वर मिलने पर भी उसका दुराग्रहपूर्ण द्वेष किया है। अतः, तू पूर्वजन्मों का ग्मरण न करते हुए अनेक मानव-पतियों को प्राप्त करेगी ॥१७८॥

जिस आकाशचारी और समान कुल के मदनप्रभ ने विवाह के लिए तुझे माँगा था, वह मनुष्य-राजा होकर अन्त में तेरा पति बनेगा ॥ १७९॥

तदनन्तर, शाप से मुक्त होकर फिर अपने लोक में आई हुई और उसी विद्यावर बने हुए मदनप्रम को पति-रूप में प्राप्त करेगी ॥१८०॥

इस प्रकार माता पिता द्वारा शाप दी गई अनंगरति, पृथ्वी में उत्पन्न होकर और अब (मरकर) माता-पिता के पास पहुंचकर पुनः अनंगप्रभा हो गई है ॥१८१॥

अतः, अब तुम वीरपुर जाकर और युद्ध में उसके पिता को जीतकर कुलीनता से रक्षित जानते हुए उसे प्राप्त करो। और, इस तलवार को ले लो, जिसके हाथ में रहने पर तेरी आकाश में गति हो जायगी और तू अजेय हो जायगा' ।॥१८२-१८३॥

ऐसा कहकर और खड्ग देकर वह देवी अन्तर्हित हो गई। तदनन्तर वह जीवदत्त जाग उठा और उसने अपने हाथ में तलवार देखी ॥१८४।॥

तदनन्तर, प्रसन्नचित जीवदत्त ने उठकर माता को प्रणाम किया और माता की कृपा से उसकी तपस्या का सारा क्लेश दूर होगया ।॥१८५।।

वह हाथ में सड्ग लेकर जाकाश में उड़ा और समस्त हिमालय में घूमकर वीरपुर में रहनेवाले विद्यावरों के राजा समर को प्राप्त किया ।।१८६॥

युद्ध में जीते हुए समर द्वारा प्रदत्त अनंगप्रभा को प्राप्त कर जीवदत्त दिव्य सम्पत्ति का उपभोग करने लगा ॥१८७॥

तदनन्तर, कुछ दिनों तक वहीं रहने के पश्चात् उसने एक दिन अपने श्वगुर समर और पत्नी अनंगप्रभा ने कहा- हम दोनों (जीवदत्त और अनगप्रभा) मनुष्य-लोक जाते। वहाँ जाने के लिए मैं उत्सुक हो रहा हूँ। प्राणियों को अपनी जन्म-भूमि निकृष्ट होने पर भी बहुत प्यारी लगती है ॥ १८८-१८९।।

उसकी यह बात श्वशुर ने मान ली, लेकिन भविष्य को समझती हुई अनंगप्रभा ने कठिनाई से इये माना ॥१९०।।

तदनन्तर जीवदत्त अनंगप्रभा को गोद में लिये हुए मत्र्यलोक में उतरा। मार्ग में एक रमणीय पर्वत को देखकर अनंगप्रभा ने उससे कहा- 'मैं श्रान्त हो गई हूँ, अतः इस पर्वत पर विधाम करो' ॥१९१-१९२॥

'ऐना ही हो', इन प्रकार कहकर जीवदत्त उनके साथ उस पर्वत पर उत्तर गया और अनंगप्रभा की विद्याओं के प्रभाव से भोजन-पान आदि किया ॥ १९३॥

तव दैव से प्रेरित जीवदत्त अनंगप्रभा में बोला- 'प्यारी, कुछ मधुर संगीत मुनाओं ॥१९४॥

यह सुनकर अनंगप्रभा भक्ति से शिव की स्तुति गाने लगी। तब उसके गान के मधुर शब्दां से वह जीवदत्त ब्राह्मण, धीरे-धीरे निद्रावण हो गया ।।१९५।।

तबतक हरिवर नाम का राजा शिकार खेलता हुआ और झरने का जल ढूंढ़ता हुआ उस मार्ग से आ निकला ॥१९६॥

वह राजा हिरण के समान अनंगप्रभा के गीत से खिचा हुआ रथ को छोड़कर वहाँ आ गया ।॥१९७।।

अच्छे सगुनों से पहले ही शुभ सूचना प्राप्त राजाने, वहाँ कामदेव की कान्ति के समान सुन्दरी अनंगप्रभा को देखा ॥१९८॥

उसे देखते ही उसके गान और रूप से विवण राजा के हृदय को कामदेव ने, बाणों से बींध दिया ॥ १९९॥

वह अनंगप्रभा मी सुन्दर राजा को देखकर, कामदेव के बाणों का लक्ष्य बन गई और अपने मन में सोचने लगी ॥२००॥

यह कौन है? क्या यह धनुषहीन कामदेव है अथवा मेरे गान या स्तुति से सन्तुष्ट शिव का मुझपर मूर्तिमान् अनुग्रह है ॥२०१॥

ऐसा सोचकर काम-मोहिता अनंगप्रभा ने उससे पूछा- तुम कौन हो और इस वन में कैसे आये हो, बताओ' ॥२०२॥

तब राजा वहाँ जैसे आया था, वह सब उसे उमने बताया और राजा ने भी उससे पूछा- 'सुन्दरि, तू कौन है? मुझे बता ॥ २०३॥

हे कमलनयनी, यहाँ यह जो सो रहा है. यह कौन है।' ऐमा पूछते हुए राजा को अनंग-प्रभा ने संक्षेप में सब वृत्तान्त सुना दिया ॥२०४।॥

'मैं विद्याधरी हूँ और यह खड्गमिद्ध मानव मेरा पति है। किन्तु, मैं तुम्हे देखते ही तुम्हारे प्रति अनुरागिणी हो गई हूँ। तो आओ। शीघ्र ही तुम्हारे नगर को चलें। जबतक यह जनता नहीं, तबतक तुम्हें विस्तार से सब समाचार सुनाती हूँ" ।॥२०५-२०६॥

राजा ने उसका प्रस्ताव सुनकर और उमे स्वीकार करके मानों तीनो लोकों का राज्य पा लिया ॥२०७॥

अनंगप्रभा ने राजा को गोद में लेकर, क्या वेग से आकाश में उड़ जाऊँ ऐसा शीघ्र ही मन में सोबा ॥२०८॥

इतने में ही वह पति-विद्रोह के कारण भ्रष्ट विद्यावाली हो गई. अर्थात् अपनी विद्याओं को भूल गई। तब पिता के शाप का स्मरण करती हुई वह अत्यन्त दुःखी हो गई ॥२०९॥

उसे दुःखी देखकर और उसका कारण पूछकर राजा ने उससे कहा 'यह दुःख करने का समय नहीं है, तेरा पति जग जायगा ॥२१०।।

प्रिये, यह बात तो दैवाधीन है। इस पर सोब न करो। अपने सिर की छाया और दैव की गति का कौन उल्लंघन कर सकता है ? ॥२११॥

तो आओ, अब चले ऐसा कहकर उस पर विश्वास करती हुई अनंगप्रभा को राजा ने शीघ्रता से गोद में उठा लिया ॥२१२॥

तब मानों गड़ा हुआ खजाना प्राप्त किया हुआ-सा वह राजा शीघ्र ही जाकर अपने रथ पर चढ़ गया और सेवकों ने उसका अभिनन्दन किया ॥२१३।।

वह राजा मन के समान शीघ्रगामी उस रथ से उस रमणी के साथ प्रजाओं को कौतुक देता हुआ अपनी राजधानी में जा पहुंचा ॥२१४।॥

राजा हरिवर, अपने नाम से ही प्रसिद्ध हरिवर नगर, में उस परम सुन्दरी दिव्य रमणी अनंगप्रभा के साथ दिव्य सुल प्राप्त करता हुआ रहने लगा ॥२१५।।

वह अनंगप्रभा भी, राजा के प्रति अनुराग रखती हुई वहीं रहने लगी; किन्तु वह अपने प्रभाव को भूलकर शाप से मोहित हो गई थी ॥ २१६॥

इसी बीच उस पर्वत पर सोकर उठे हुए जीवदत्त ने, केवल अनंगप्रभा को ही नहीं देला, यह नहीं, प्रत्युत अपनी तलवार को भी उसने नहीं देखा ॥२१७॥

वह अनंगप्रभा कहाँ है, वह तलवार भी कहाँ गई? क्या अनंगप्रभा तलवार लेकर चली गई या उन दोनों को ही कोई तीसरा ले गया ? ॥२१८॥

इस प्रकार, उन्मत्त के समान विविध प्रकार की शंकाएँ करता हुआ वह जीवदत्त कानाग्नि से जलता हुआ तीन दिनों तक सारे पर्वत पर उसे ढूंढता रहा ॥२१९॥

तब पर्वत से उत्तरकर दस दिनों तक उसके नीचे वन में उसे ढूंढते हुए वह घूमता रहा, किन्तु कहीं उसने उसके चरण का चिह्न भी न पाया ॥२२०।।

'हे दुष्ट दैव, अत्यन्त कठिनाई से दी हुई तूने खड्गमिद्धि के माय मेरी प्राणप्यारी अनंगप्रभा को भी हर लिया' ।। २२१॥

इस प्रकार, रोते-कलपते और निराहार भ्रमण करते हुए उमे एक ग्राम मिला, वहाँ वह एक सम्पन्न ब्राह्मण के घर में प्रवेश किया ॥२२२।।

उम्र घर में सुन्दरी और अच्छे वस्त्र पहने हुए गृहिणी प्रियदता ने उसे आसन देकर बैठाया और अपनी दासियों को आज्ञा दी कि शीघ्र ही इस जीवदत्त के चरण घुलाओ। स्त्री के वियोग से निराहार रहते हुए आज इसका तेरहवाँ दिन है।॥२२३-२२४।।

यह सुनकर जीवदत्त मन में सोचने लगा कि क्या अनंगप्रभा यहाँ आई है या यह स्त्री ही कोई योगिनी है ।। २२५।।

ऐसा सोचता हुआ घुले हुए पैरोंवाला और उसके दिये हुए भोजन से तृप्त जीवदत्त ने प्रणाम करते हुए बड़ी ही वीनतापूर्वक प्रियदत्ता से पूछा-॥२२६॥

हे सदाचारिणी, एक तो यह बताओ कि तुम मेरा वृत्तान्त कैसे जानती हो? और, दूसरा यह बताओ कि मेरी प्रियतमा और तलवार कहाँ है?' ॥२२७७॥

यह सुनकर वह पतिव्रतः प्रियदत्ता, उससे बोली- 'पति के सिवा दूसरा पुरुष स्वप्न में भी मेरे चित्त में स्थान नहीं पाता ॥२२८॥

दूसरे पुरुषों को मैं पुत्रों और भाइयों के समान समझती हूँ। मेरे घर से कोई भी अतिथि, विना सत्कार प्राप्त किये हुए बापस नहीं जा सकता ॥२२९॥

इसके प्रभाव से ही भूत, भविष्य और वर्तमान को मैं जानती हूँ। तेरी उस अनंगप्रभा को राजा हरिवर ले गया ॥ २३०॥

तेरे सोये रहने पर वह राजा हरिवर उसके गान से आकृष्ट होकर उसी मार्ग से आ गया था; किन्तु वह दुराचारिणी उसे भी छोड़कर फिर दूसरे के पास चली जायगी ॥२३१-२३२॥

उस खड्ग को देवी ने तुझे उसी की प्राप्ति के लिए दिया था। उसके हरण हो जाने पर वह दिव्य सड्ङ्ग, फिर देवी के पास ही चला गया ॥ २३३॥

और, देवी ने ही अनंगप्रभा के शाप का वर्णन करते हुए स्वप्न में तुझे जो उसका भविष्य बताया था, वह तू क्यों भूल गया ? ॥२३४।॥

तो इस अवश्यंभावी बात में तुझे यह मिथ्यः मोह क्यों हो रहा है? तू बार-बार अति दुःख देनेवाले इस पाप के बन्धन को तोड़ दे।॥ २३५॥

भाई, दूसरे पुरुष से प्रेम करनेवाली और मनुष्य बनी हुई तथा तुम्हारे साथ बोला करने के कारण भ्रष्ट विद्यावाली उस पापिन को पाकर भी तुम क्या करोगे?' ॥ २३६॥

उस पतिव्रता द्वारा इस प्रकार समझाये गये जीवदत्त ने अनंगप्रभा की आशा छोड़ दी और उसकी चंचलता में विरक्त होकर वह प्रियदत्ता से बोला- ॥ २३७॥

'हे माला, तेरे इन सत्य वाक्यों से मेरा मोह शान्त हो गया। पुण्यात्माओं का सम्पर्क किसके कल्याण के लिए नही होता ? ॥२३८॥

मेरे पूर्वजन्म के पापों के कारण मुझे यह दुःख प्राप्त हुआ। अब उन पापों को धोने के लिए राग-द्वेष हीन होकर में तीयों की यात्रा करूंगा ॥२३९।।

अनंगप्रभा के कारण दूसरों से विरोध करने में मुझे क्या लाभ है? जिसने कोथ को जीत लिया, उसने सारे संसार को जीत लिया' ।॥२४०॥

जीवदत्त के इस प्रकार कहते ही प्रियदत्ता का पति वहाँ आ गया, जो परम धार्मिक और अतिथियों का प्रेमी था ॥२४१॥

उसने भी जीवदत्त का आतिथ्य करके उसके दुःख को दूर किया। तब जीवदत्त, उनके घर में विचाम करके और उनसे सम्मति लेकर तीर्थयात्रा को चला गया ॥ २४२॥

तदनन्तर, निर्जन बनों में अनेक कष्टों का सहन करता हुआ और कन्द-मूल फल खाता हुआ वह पृथ्वी के सभी तीर्थों का भ्रमण करने लगा ॥ २४३॥

सभी तीर्थों का पर्यटन करने के उपरान्त, अन्त में, उसी विन्ध्यवासिनी की शरण में आकर निराहार रहकर उसने कुश के आस्तरण पर कठिन तपस्या बारम्भ की ॥२४४।।

उसके तप से सन्तुष्ट अम्बिका ने प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष रूप में उससे कहा- 'उठो बेटा, तुम चार मेरे गण हो। तीन तो पंचमूल, चतुर्वक्त्र और महोदर हैं और चौथा तुम विकटवदन नाम का है।।२४५-२४६।।

किसी समय तुम चारों गण विहार के लिए गंगा-तट पर गये। वहाँ कपिलजट नाम के मुनि की कन्या चापलेखा स्नान करती हुई तुम्हें दीख पड़ी और तुम लोग उसे देलकर काम से व्याकुल हो गये और उसकी इच्छा करने लगे ॥ २४७-२४८।।

'मैं अभी कन्या हूँ, तुम लोग यहाँ से दूर हट्टो', उसके ऐसा कहने पर अन्य तीन गण तो चुप रहे, किन्तु तुमने बलपूर्वक उसके हाथ पकड़ लिये ॥२४९॥

तब 'हे पिता, हे पिता, मुझे बचाओ-इस प्रकार वह चिल्लाने लगी। उसका चिल्लाना सुनकर पास हो म्बिन उसका पिता मुनि वहाँ आया। उसे देखकर तुमने उसे छोड़ दिया। तब मुनि ने तुम चारों को शाप दिया कि 'हे पापियो, तुम मानव-लोक में जाओ' ॥२५०-२५१॥

तब प्रार्थना करने पर मुनि ने इस प्रकार शाप का अन्त किया कि 'जब राजकुमारी अनंग-प्रभा की तुम लोग मांगोगे, तर वह विद्याघर-लोक में चली जायगी। ये तीनों तो उसी समय शाप-मुक्त हो जायेंगे, किन्तु तुम विद्याधरी बनी हुई उसे पाकर भी गंवा दोगे ॥२५२-२५३॥

हे विकटवदन, अब तुम महान् कष्ट प्राप्त करोगे और चिरकाल तक देवी की आराधना करके इस शाप से छूटोगे ॥२५४॥

तुमने इस चापलेखा कन्या के हाथ का स्पर्श किया है। इसलिए, तुम्हें परदारापहरण का भारी पाप लगा है ।।२५५॥

इस प्रकार, उस महर्षि ने मेरे गणों को जो शाप दिया, उसके परिणामस्वरूप तुम चारों दक्षिण दिशा में बीर रूप से उत्पन्न हुए थे। पंचपट्टिक (जुलाहा), भाषाविज्ञानी (वैश्य) और लड्गधर (क्षत्रिय), ये तीनों और चौथा जीवदत्त चारों मित्र हुए ॥२५६-२५७॥

वे तीनों, अनंगरति के अपने पद को प्राप्त कर लेने पर यहाँ आकर ही मेरी कृपा से शाप-मुक्त हुए ।।२५८॥

आज मेरी आराधना से तुम्हारा भी शाप नष्ट हो गया। इसलिए, अब तुम मुझसे अग्नि-सम्बन्धी धारणा लेकर अपना शरीर त्याग करो ।। २५९।।

और, आठ जन्मों तक भोगने योग्य पाप को एक ही बार में भस्म कर दो।' ऐसा कहकर और अग्नि की धारणा देकर देवी अन्तर्धान हो गई ॥२६०॥

उस जीवदत्त ने, उस अग्नि की धारणा से अपने पापों और मानव-गरीर को दग्ध करके शाप से मुक्ति प्राप्त की और फिर वह गणों में श्रेष्ठ हो गया ॥ २६१॥

परस्त्री के संगम से होनेवाले पाप के कारण जब देवताओं की भी इतनी दुर्दशा होती है, तब दूसरों की बात ही क्या है? ॥२६२॥

उघर, इतने दिनों नक वह अनंगप्रभा, राजा हरिवर के रनिवास में प्रधान रानी बन कर रही ॥२६३।।

वह राजा रात-दिन उसी की ओर आकृष्ट रहता था और उसने अपने राज्य का कार्य भार सुमन्त्र नाम के मन्त्री पर डाल दिया ॥ २६४।।

एक बार उम राजा के पास मध्यप्रदेश में लब्धवर नाम का नया नाट्याचार्य आया ॥२६५।।

राजा ने वाद्य-नाट्य में उसकी अपूर्व कुशलता देवकर उगे सम्मानित किया और रनिवाम का नाट्याचार्य बना दिया ॥२६६॥

उसने अनंगप्रभा को नाट्य-शिक्षा में इतना प्रवीण कर दिया कि वह नाचती हुई भी अपनी मौतों के लिए ईष्र्या का कारण बनती थी ॥२६७॥

उस नाट्‌याचाय के सम्पर्क से और नृत्य की शिक्षा के रस से वह अनंगप्रभा नाट्‌याचार्य के प्रति प्रेम से आसक्त हो गई ॥२६८॥

नाट्‌याचार्य भी उसके सौन्दर्य और नृत्य से आकृष्ट होकर कामदेव द्वारा कुछ और ही प्रकार से नचाया जाने लगा ॥२६९।।

एकबार एकान्त में वह अनंगप्रभा, रति की लालसा से नाट्यणाला में ही नाट्याचार्य द्वारा भ्रष्ट हो गई ।।२७०॥

और, काम-कोडा के अन्त में अत्यन्त अनुरागवती होकर उससे बोली- 'मैं तुम्हारे बिना अब एक क्षण भी नहीं रह सकती। राजा हरिवर यह सब जानकर हमें कदापि क्षमा न करेगा। तो आओ, कहीं दूसरे स्थान पर चले। जहाँ राजा को हमारा पता न चले ॥२७१-२७२॥

तुम्हारे पास राजा द्वारा प्रदत्त सोना, घोड़े, ऊँट आदि धन है। मेरे नाट्य से प्रसन्न होकर राजा के दिये हुए आभरण मेरे पास है ॥२७३॥

तो चलो, वहाँ चलें, जहाँ निर्भय होकर रह सकें। उसकी ये बातें सुनकर प्रसन्न नाट्या-चार्य ने उसे मान लिया ॥२७४।॥

तदनन्तर, अनंगप्रभा, पुरुष का वेष धारण कर एक अत्यन्त अंतरंग दासी के साथ नाट्याचार्य के घर पर गई ॥ २७५॥

तब उसी समय नाट्‌याचार्य ने, सारी धन-सम्पत्ति ऊँट की पीठ पर लाद दी और अनंग-प्रभा, पुरुष के वेष में घोड़े पर सवार होकर नाट्य-शिक्षक के साथ निकल गई ॥२७६।।

उसने पहले विद्याधर की लक्ष्मी का परित्याग करके राजलक्ष्मी को स्वीकार किया; उसके उपरान्त गाने-नाचनेवाले चारण का आश्रय लिया। स्त्रियों के इस प्रकार चंचल मन को धिक्कार है! ॥ २७७।।

अनंगप्रभा, नाट्‌याचार्य के साथ जाकर क्रमशः वियोगपुर नामक नगर में पहुँची और वहाँ नाट्‌याचार्य के माय मुख और स्वतन्त्रतापूर्वक रहने लगी ॥२७८।।

उस नाट्याचार्य ने उस सुन्दरी स्त्री को प्राप्त कर अपने लब्धवर नाम को सार्यक समझा ॥२७९॥

उघर राजा हरिवर अनंगप्रभा को कहीं भागी हुई जानकर उसके शोक से अपना गरीर त्याग करने को तैयार हुआ ॥२८०॥

तव सुमन्त्र नाम के मन्त्री ने राजा को धीरज बंधाते हुए कहा-'महाराज, आप क्या नहीं जानते, स्वयं ही विचार कीजिए ॥२८१॥

जो वङ्गविद्याधर को छोड़कर तुम्हें देखते ही तुम्हारे साथ भाग आई, वह भला आपके सत्य स्थिर होकर कैसे रह सकती है? अच्छी और उत्तम वस्तु से निःस्पृह वह स्त्री, किसी क्षुद्र पुरुप के साथ वैसे ही चली गई, जैसे घाम की सलाई घाम की ओर ही जाती है।।।२८२-२८३॥

उमे अवश्य ही नाट्याचार्य भगा ले गया है; क्योंकि वह यहां नहीं है। वे दोनों नाट्यशाला में प्रातःकाल उपस्थित थे, ऐमा मुना गया है ॥२८॥

अतः, हे स्वामिन्, इस प्रकार उसकी चंचलता को जानते हुए भी तुम्हें उसके प्रति इतना आग्रह क्यों है? क्योंकि, विलासिनी स्त्री सन्ध्या के समान क्षण-भर के लिए ही अनुरागिणी होती है ॥ २८५॥

मन्त्री द्वारा इस प्रकार कहा गया राजा हरिवर, विचार में पड़ गया और सोचने लगा कि इस बुद्धिमान् मन्त्री ने ठीक ही कहा है।॥ २८६।।

विलासिनी स्त्री, संसार की स्थिति के समान अन्त में नीरस, दुःखदायिनी, प्रत्येक क्षण में बदलनेवाली और अनित्य सम्बन्धवाली होती है ॥२८७७॥

गिरे हुए को हुबाती हुई और उत्कंठा को दिखाती हुई अथाह नदियों और स्त्रियों के चक्कर में बुद्धिमान् फंस जाते हैं और उनमें डूब जाते हैं ।॥ २८८॥

जो विपत्ति में व्याकुल नहीं होते, सम्पत्ति में घमंड नहीं करते और कार्य के समय भागते नहीं, वे ही धीर पुरुष है। उन्होंने संसार को जीत लिया है ॥ २८९॥

राजा हरिवर ने, ऐसा सोचकर और मन्त्री के कयन से सोच को त्याग कर अपनी अन्य स्त्रियों से ही सन्तोष किया ॥२९०॥

वह अनंगप्रभा भी उस वियोगपुर नगर में नाट्याचार्य के साथ कुछ समय तक रही।॥ २९१॥

उस नगर में दैवयोग से उस नाट्याचार्य की एक युवा जुआरी सुदर्शन से मित्रता हो गई ॥२९२।।

उस जुआरी सुदर्शन ने, शीघ्र ही नाट्याचार्य का समस्त पन नष्ट कराकर उसे अनंगप्रभा के सामने दरिद्र बना दिया ॥२९३॥

इस क्रोष से अनंगप्रभा ने उस दरिद्र नाट्‌याचार्य को त्याग कर सुदर्शन को ही अपना पति बना लिया ॥२९४।।

स्त्री और घन के नाश में निराश होकर नाट्‌याचार्य, वैराग्य के कारण तपस्या करने के लिए जटा बांधकर गंगा के तट पर जा बैटा ॥२९५॥

नये-नये पुरुयों को चाहनेवाली वह अनंगप्रभा अब उस जुआरी सुदर्शन के साथ रहने लगी ॥२९६॥

एक बार रात्रि के समय चोरों ने उसके घर में घुसकर अनंगप्रभा के नये पति जुआरी सुदर्शन का सर्वस्व चुराकर उसे कंगाल बना दिया ॥२९७॥

तब धन के अपहरण से दुःख में रहती हुई और पश्चात्ताप करती हुई अनंगप्रभा को देखकर सुदर्शन ने उससे कहा-॥२९८॥

'हिरण्यगुप्त नाम का एक धनवान् मेरा मित्र है। आओ, उससे कुछ घन उधार लें ॥२९९॥

भाग्य से नष्टबुद्धि सुदर्शन ऐसा कहकर उसके साथ हिरण्यगुप्त के समीप गया और उससे कुछ ऋण माँगा ॥३००।।

वह बनिया और वह अनंगप्रभा, दोनों परस्पर आँखें मिलने पर एक दूसरे के प्रति आसक्त हो गये ॥३०१॥

तब उस वैश्य ने सुदर्शन से आदर के साथ कहा- 'प्रातःकाल तुम दोनों को घन दूंगा। आज यहीं रहो और यहाँ भोजन करो ॥३०२॥

यह सुनकर और उन दोनों का परस्पर दूसरा ही भाव समझकर सुदर्शन ने कहा- 'बाज मैं भोजन के लिए तैयार नहीं हूँ ॥३०३॥

यह सुनकर बनिये ने कहा- 'मित्र, यदि ऐसा है, तो तुम नहीं तो तुम्हारी स्त्री, बाज मेरे घर पर भोजन करे। क्योंकि, यह पहले-पहल मेरे घर पर आई है।। ३०४।॥

बनिया के ऐसा कहने पर सुदर्शन, धूर्त होते हुए भी, चुप रहा और बनिया उसकी स्त्री को लेकर घर के अन्दर चला गया ॥ ३०५॥

पर में जाकर उगने एकाएक मिली हुई यौवन-मद से मत्त उस अनंगप्रभा के साथ भोजन, मद्यपान आदि का मुख लिया। उधर सुदर्शन, स्त्री की प्रतीक्षा में बाहर बैठा रहा। कुछ समय बाहर प्रतीक्षा में बैठे हुए सुदर्शन से बनिया के भेजें हुए उसके नौकरों ने आकर कहा- 'तुम्हारी स्त्री भोजन करके घर चली गई. तुमने उसे जाते हुए नहीं देखा। इसलिए तुम यहाँ बैठे हुए क्या कर रहे हो, जानो अपने घर ॥३०६-३०८।।

सुदर्शन ने उनसे कहा- 'अभी वह बन्दर है। गई नहीं, इसलिए मैं नहीं जाऊंगा' ऐसा कहता हुआ सुदर्शन, बनिया के नौकरों द्वारा लात-घूसों से मारकर बाहर निकाल दिया गया ।॥३०९॥

लात खाकर सुदर्शन, अपने घर चला गरा और सोचने लगा कि इस बनिये ने, मित्र होकर भी मेरी स्त्री का अपहरण कर लिया ।॥३१०।।

मुझे इसी लोक में अपने किये का फल मिल गया जो दुष्कर्म मैंने दूसरे के लिए किया, वहीं दूसरे ने मेरे साथ किया ॥३११॥

अतः, दूसरे पर मैं क्रोव क्या करूं? मेरा कर्म ही क्रोध करने योग्य है, इसलिए अपने कर्मों का छेदन करता हूँ, जिससे मेरा पुनर्जन्म और पुनः अपमान न हो ।॥ ३१२॥

ऐसा सोचकर और कोष को छोड़कर यह जुआरी बदरिकाश्रम चला गया और वहाँ उसने संसार-बन्धन से मुक्त होने के लिए तपस्या की ॥३१३॥

इवर, वह अनंगप्रभा, अति सुन्दर और प्यारा वैश्य पति प्राप्त कर एक पुष्प से दूसरे पुष्प पर फिरती हुई भ्रमरी के समान आनन्द लेने, लगी ॥३१४।॥

धीरे-धीरे अनंगप्रभा ने, विपुल सम्पत्तिशाली उस प्रणयी वैश्य के प्राणों पर और उसकी सम्पत्ति पर पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लिया ॥३१५।।

उस देश के राजा बीरबाहु ने, एकमात्र सुन्दरी उस अनंगप्रभा को वहाँ रहती हुई जानकर भी धर्म की मर्यादा रखते हुए उसका हरण नहीं किया ॥३१६।।

कुछ दिनों में अनंगप्रभा के व्यय से, बनिए का घन घटने लगा। क्योंकि, दुराचारिणी स्त्री के घर में रहने पर, लक्ष्मी सदाचारिणी स्त्री के समान मुरझाने लगती है ।॥३१७।।

धन का ह्रास देखकर वह वैश्य कुछ सामान एकत्र करके व्यापार के लिए सुवर्ण-द्वीप में जाने के लिए उद्यत हुबा ॥३१८॥

वियोग के भय से वह अनंगप्रभा को भी साथ लेकर चलता हुआ क्रमशः सागरपुर नाम के नगर में पहुंचा ।॥३१९॥

यहाँ समुद्र तट पर बसे हुए उस नगर में रहनेवाला धीवरों का सरदार सागरवीर उस वैश्य से मिला ॥ ३२०।

उस समुद्रजीवी सागरवीर के माथ वह वैश्य, समुद्र तट पर जाकर उससे लाये हुए जहाज पर अपनी पत्नी अनंगप्रभा के साथ सवार हो गया ।॥३२१॥

वह वैश्य जब उस सागरवीर के साथ जहाज से जा रहा था, तब एक दिन जलती हुई बिजली-रूपी आंबोंवाला, प्रचंड त्रास तथा भय देनेवाला काला, मेघ आकाश में दीख पढ़ा ॥३२२-३२३॥

प्रचंड वायु के कारण मूसलाधार वृष्टि प्रारम्भ हुई। समुद्र में भयंकर तूफान उठा और जहाज समुद्र की लहरों में डूबने लगा ॥३२४।।

इस स्थिति में वैश्व हिरण्यगुप्त के सभी सेवक चिल्लाने लगे, मानों उस जहाज के साथ उनका मनोरथ ही डूब रहा हो। तब हिरण्यगुप्त, अपने दुपट्टे को कमर में बाँधकर अनंगप्रभा के मुँह की ओर देखकर 'हा प्रिये, तू कहाँ', ऐसा कहकर डूबते हुए जहाज से समुद्र में कूद ५ड़ा ॥३२५-३२६।।

कूदकर हाथ फेंकते हुए उसे, दैवयोग से, बहती हुई एक लकड़ी की पट्टी हाथ लगी। उसे पकड़कर वह उसपर चढ़ गया ।।३२७।।

इधर अनंगप्रभा को भी उस सागरवीर ने बहुत तस्तों को रस्सी से बाँधकर बनाये हुए एक लम्बे-चौड़े काष्ठ-पट्ट पर शीघ्र ही चढ़ा लिया ॥३२८॥

और, स्वयं भी अनंगप्रभा को'धीरज देता हुआ उसी पर चढ़ गया तथा हाथों से डाँड़ों का काम लेता हुआ वह समुद्र में तैरने लगा ॥३२९॥

जहाज के टूट जाने और डूब जाने पर पल-भर में आकाश मेष-रहित तथा निर्मल हो गया। और, समुद्र, क्रोध के शान्त होने पर सज्जन हृदय के समान निश्चल हो गया ॥ ३३०।।

एक तश्ते पर चढ़ा हुआ हिरण्यगुप्त, अनुकूल वायु के चलने पर बहता हुआ पाँच दिनों में दैवयोग से समुद्र के तट पर आ लगा ॥३३१॥

तट पर तख्ते से उतरा हुआ हिरण्यगुप्त अपनी प्रेयसी अनंगप्रभा के दु.ल से दुःखित होकर इस घटना को अवश्यम्भावी वैवयोग समझने लगा ॥३३२॥

इस प्रकार, धीरे-धीरे चलकर वह धैर्यशाली वैश्य अपने नगर को जाकर धीरज बाँधकर निश्चिन्तता पूर्वक व्यापार से धन कमाने लगा ।।३३३॥

आश्चर्य यह है कि तस्तों पर बैठी हुई उस अनंगप्रभा को सागरवीर ने एक ही दिन में, समुद्र के तट पर पहुँचा दिया ॥३३४।।

तट पर पहुँबकर मागरवीर द्वारा धीरज बंधाई गई अनंगप्रभा को उसने सागरपुर में अपने घर पहुंचा दिया ॥३३५॥

वहाँ पर राजा के समान सम्पत्तिवाले, वीर, प्राण देनेवाले युवक और सुन्दर सागरवीर को अपना आज्ञाकारी समझकर दाशों (धीवरी) के सरदार को ही उस अनंगप्रभा ने अपना पति बना लिया। सच है, चरित्रहीन स्त्री, नीच ऊँच का विचार नहीं करती ॥३३६-३३७।।

तब वह अनंगप्रभा, उसी दायों के राजा के साथ उसके ही घर में उसकी धन-सम्पत्ति का उपभोग करती हुई रहने लगी ॥३३८॥

एक बार उस अनंगप्रभा ने अपने ऊँचे महल की छत में किसी गली से जाते हुए विजयवर्मा नामक सुन्दर राजपूत को देखा ॥३३९।।

उसके सुन्दर रूप के लोभ से वह अनंगप्रभा छत से उतरकर और उसके पास जाकर उससे कहने लगी कि तुम्हारे रूप को देखते ही मेरा चित्त तुम्हारी ओर लिच गया है। इसलिए, तुम मेरा उपभोग करो ॥३४०॥

उसने उसका प्रस्ताव स्वीकार किया और आकाश से गिरी हुई उस त्रैलोक्यसुन्दरी को लेकर वह अपने घर चला गया ॥ ३४१॥

उसके भाग जाने पर वह सागरवीर उसे भागी हुई समझकर और सब कुछ त्याग कर तपस्या द्वारा शरीर छोड़ने के लिए गंगा के तट पर चला गया। भला, यह दुःख उसे क्यों नहीं होता; क्योंकि कहाँ वह बेचारा धीवर और कहाँ दिव्य रूपवाली उस विद्याधरी का समागम ॥३४२-३४३॥

वह अनंगप्रभा भी, उस विजयवर्मा के साथ स्वच्छन्द रूप से उसी नगर में रहने लगते ।।३४४।

किसी समय हस्तिनी पर चढ़ा हुआ उस नगर का राजा सागरवर्मा, नगर में घूमने के लिए निकला ॥३४५।।

अपने नाम से प्रसिद्ध और अपने ही बनाये हुए उस नगर को देखता हुमा वह राजा उसी मार्ग से आ निकला; जिस मार्ग पर विजयवर्मा का घर था ।। ३४६।।

राजा को उस मार्ग से आते हुए जानकर उसे देखने के कौतूहल से अनंगप्रभा अपने भवन के छत पर जा चढ़ी ॥३४७॥

अनंगप्रभा और मवनप्रभ की कथा

राजा को देखकर, उस पर इस प्रकार आकृष्ट हुई कि वह राजा को हस्तिनी पर चड़े हुए महावत से बलपूर्वक कहने लगी ।।३४८॥

'हे हाथीवान, मैं हाथी पर कभी नहीं चढ़ी हूँ। इसलिए, तुम मुझे चढ़ा लो, जिससे मैं भी जानूं कि हाथी पर चढ़ने से क्या सुख होता है।॥३४९।।

यह सुनकर महावत जब राजा का मुंह देखने लगा, तब राजा ने भी पृथ्वी पर स्वर्ग से गिरी हुई चन्द्रमा की कान्ति के समान सुन्दरी अनंगप्रभा की ओर देखा ।॥३५०।।

और, चकोर के समान उसे अतृप्त नेत्रों से पीता हुआ राजा उसके पाने की लालसा से महावत को कहने लगा-'हस्तिनी को पाम लेजाकर इसकी इच्छा पूर्ण करो। इस चन्द्रमुनी को शीघ्र ही हाथी पर बैठाओ' ॥३५१-३५२।।

राजा के इस प्रकार कहने पर महावत द्वारा चलाई गई हस्तिनी उसी समय उस घर के नीचे आ गई ॥३५३॥

हस्तिनी को घर के समीप आई हुई देखकर अनंगप्रभा ने, अपने को (जान-बूझकर) राजा की गोद में गिरा दिया ॥३५४॥

उसे कहाँ तो पह‌ले पति बनाने में ही द्वेष था और कहाँ अब नये-नये पत्तियों से भी तृप्ति नहीं होती ! खेद है कि माता-पिता के शाप से कितना उलट-फेर हो गया ? ॥३५५॥

गिरने का भय दिखाकर वह अनंगप्रभा, राजा के गले से चिपक गई। राजा भी उसके शरीर-स्पर्श-रूपी अमृत से सिक्त होकर परम आनन्द को प्रा त किया ।।३५६॥

बड़ी मुक्ति से अपने को राजा की गोद में डालती हुई और गले से चिपककर उसका चुबन करने की इच्छा रखनेवाली उस अनंगप्रभा को लिये हुए राजा शीघ्र अपने महल में आया ।। ३५७।।

महल में आकर अपना वृत्तान्त सुनाती हुई उस विद्याधरी को राजा ने, अपने रनिवास में ले जाकर उसी समय उसे अपनी महारानी बना लिया ॥३५८॥

विजयवर्मा ने, घर पर आकर और राजा द्वारा अनंगप्रभा का अपहरण जानकर अपने क्षत्रियपन की आन में आकर राजभवन के बाहर उसके रक्षकों से युद्ध प्रारम्भ कर दिया ।। ३५९।।

और, युद्ध में पीठ न दिलाकर वहीं उसने अपना शरीर त्याग दिया; क्योंकि शूर लोग, स्त्री के कारण होनेवाले अपमान को सहन नहीं करते ॥३६०।।

'उस दुराचारिणी स्त्री से क्या करोगे? आजो, नन्दन उद्यान में हमारा उपभोग करो।'-मानों यह कहती हुई दिव्यांगनाएँ आकर उसे (विजयवर्मा को) स्वर्ग ले गई ॥३६१॥

वह अनंगप्रभा भी उस राजा के पास वैसे ही स्थिर हो गई, जैसे नदी सागर में जाकर स्थिर हो जाती है।॥ ३६२॥

अनंगप्रभा ने भवितव्य के कारण उस पति (सागरवर्मा) से अपने को कृतार्थ समझा और राजा ने भी, ऐसी सुन्दरी पत्नी पाकर अपना जन्म सफल समझा ।।३६३।।

कुछ दिनों पश्चात् सागरवर्मा की उस रानी ने राजा से गर्भ धारण किया और यथा समय पुत्र को जन्म दिया ॥३६४।।

पिता राजा ने, उस बालक का नाम समुद्रवर्मा रखा और उदारता के साथ पुत्रजन्म का महोत्सव मनाया ॥३६५॥

फमणः बड़े हुए, गुणवान्, युवा और बलगाली समुद्रवर्मा को राजा ने युवराज-पद पर अभिषिक्न कर दिया ॥३६६॥

तदनन्तर, उम समुद्रवर्मा के विवाह के लिए राजा ने समरवर्मा राजा की कमलवती नामक कन्या की मांग की ॥३६७॥

और, विवाहित युवराज को उनके गुणों से आकृष्ट राजा सागरवर्मा ने अपना समन्त राज्य दे हाला ॥३६८॥

ओजस्वी और क्षत्रिय-धर्म को जाननेवाले समुद्रवर्मा ने भी, पिता से राज्य पाकर उसे प्रणाम करते हुए निवेदन किया-॥३६९।।

'हे पिता, मुझे आज्ञा दीजिए। मैं दिशाओं को जीतने के लिए जाता हूँ; क्योंकि पृथ्वी को जीतने की इच्छा न करनेवाला राजा पृथ्वी को वैसे ही प्रिय नहीं होता, जैसे स्त्री को नपुंगक पति ॥३७०।।

राजा की वही राजलक्ष्मी धर्मशीला और कीत्तिदायिनी होती है, जो परराष्ट्रों को जीतकर अपनी भुजाओं के बल से प्राप्त की जाती है।॥ ३७१॥

है पिता, इन क्षुद्र राजाओं का राज्य क्या है, जो लोभी बिलाव के समान अपनी उन्नति के लिए अपनी ही प्रजा को खाते रहते हैं ॥ ३७२।।

ऐसा कहते हुए पुत्र से सागरवर्मा ने कहा-'बेटा, तुम्हारा राज्य अभी नया है। अतः, तुम पहले इसे ही ठीक करो। धर्म से प्रजाओं का पालन करनेवाला राजा पापी या निन्दनीय नहीं होता। अपनी शक्ति और सामर्थ्य को विना देखे-समझे, समस्त राजाओं से विरोष लेना उचित नहीं है ॥३७३-३७४।।

बेटा, यद्यपि तुम शूरवीर हो और तुम्हारे पास सेना भी बहुत है, तो भी विजय पर विश्वास नहीं; क्योंकि युद्ध में विजयलक्ष्मी अस्थिर रहती है, ।॥ ३७५॥

पिता के इस प्रकार कहने पर भी तेजस्वी समुद्रवर्मा पिता से आज्ञा लेकर दिग्विजय के लिए निकल पड़ा ॥३७६।।

तदनन्तर, क्रमशः दिशाओं को जीतकर और राजानों को वश में करके बहुत-से हाथी, घोड़े, सेना, रत्न आदि प्राप्त करके अपने नगर को लौट बाया ॥३७७७।

और, उसने भिन्न-भिन्न देशों में उत्पन्न होनेवाले विविध प्रकार के रत्नों से, प्रसन माता-पिता के चरणों में प्रणाम कर उनकी पूजा की ॥३७८॥

उनकी आज्ञा से उस महायशस्वी समुद्रवर्मा ने ब्राह्मणों को हाथी, घोड़े, सोना, रत्न आदि दान में दिये ॥ ३७९।।

उसने अपने सेवकों और सम्बन्धियों पर अर्थ की ऐसी वर्षा की कि एक केवल 'दरिद्र' शब्द ही अर्थहीन रह गया ।। ३८०।।

इस प्रकार, पुत्र की महिमा देखकर अनंगप्रभा से युक्त राजा सागरवर्मा ने अपने को कृतकृत्य समझा ॥ ३८१॥

इस प्रकार सागरवर्मा ने उन दिनों को उत्सव के साथ व्यतीत करके मंत्रियों के सामने पुनः समुद्रवर्मा से कहा- ॥ ३८२॥

"बेटा, मैंने इस जन्म में जो भी करना था, कर लिया। राज्य का सुख देखा, किन्तु शत्रुओं द्वारा पराजय नहीं देखा ॥ ३८३॥

और साम्राज्य-प्राप्त तुम्हें भी देखा। अब मुझे क्या चाहिए। अतः, जबतक यह शरीर है, तबतक किसी तीर्थ का आश्रय लेता हूँ ॥३८४।।

यह शरीर नष्ट होनेवाला है। अब घर में मेरा क्या घरा है। देखो, वृद्धावस्था मेरे कानों के पास आकर यही कह रही है' ।॥३८५॥

ऐसा कहकर पुत्र के न चाहते हुए भी वह सफल राजा सागरवर्मा, पत्नी अनंगप्रभा के साथ प्रयाग चला गया ॥ ३८६॥

समुद्रवर्मा कुछ दूर तक पिता को छोड़ने जाकर और फिर राजधानी में लौटकर न्यायपूर्वक अपने राज्य का शासन करने लगा ॥ ३८॥

अनंगप्रभा-सहित राजा सागरवर्मा ने भी प्रयाग में जाकर तपस्या करके शिवजी को प्रसन्न किया ॥ ३८८॥

तपस्या से सन्तुष्ट शिवजी ने रात्रि के अन्त में स्वप्न में आकर कहा-'मैं सपत्नीक तेरे तप से प्रसन्न हूँ। अतः यह सुनो ॥ ३८९।।

यह अनंगप्रभा और तुम दोनों विद्याधर हो। अब तुम्हारा शाप क्षय होने से प्रातःकाल ही तुम दोनों विद्याधर-लोक को बले जाओगे ॥३९०॥

यह सुनकर राजा की नींद खुल गई और स्वप्न देखती हुई रानी भी जाग उठी। तब दोनों आश्चर्य चकित होकर परस्पर स्वप्न-समाचार कहने लगे ॥३९१।।

तब प्रसत्र अनंगप्रभा राजा से कहने लगी 'महाराज, मैंने अभी अपनी सम्पूर्ण जाति स्मरण कर ली। मैं विद्याधरों के राजा समर की कन्या हूँ। वीरपुर नाम के नगर में अनंगप्रभा नाम से मैं उत्पन्न हुई। पिता के शाप से मर्त्यलोक में आकर और मानुषी बनकर मैं अपने विद्याधरी-भाव को भूल गई। अब में जान गई हूँ। जबतक वह ऐसा कहही रही थी कि इतने में उसका पिता समर विद्याधर, आकाश से उतरा ॥ ३९२-३९५।।

राजा सागरवर्मा ने उसे नमस्कार किया, तब वह समर, पैरों पर पड़ी हुई पुत्री अनंग-प्रभा से कहने लगा-॥३९६॥

'जाबो बेटी, अपनी इन विद्याओं को ग्रहण करो। तुम्हारा शाप नष्ट हों गया। तूने एक ही जन्म में आठ जन्मों का दुःख भोग लिया ॥३९आ

इस प्रकार कहकर और उसे गोद में उठाकर समर ने, अपनी विद्याएँ प्रदान की। तब समर ने, राजा सामरवर्मा में कहा-'तुम मदनप्रभ नाम के विद्याधर-राजा हो। मैं समर नाम का विद्याधर-राजा हूँ और यह अनंगप्रभा मेरी कन्या है ॥ ३९८-३९९।।

पहने इसे जिन वरों ने विवाह के लिए माँगा था, उनमें से इस रूपविता ने किसी एक को भी नहीं चाहा ॥४००॥

उसी समय इसके समान गुणवाने तू ने भी इसे मांगा था। दैवयोग से उस समय इसने तुझे भी स्वीकार नहीं किया ॥४०१॥

तब मैंने इसे मध्यंलोक में जाने का शाप दिया। मर्त्यलोक में भी इसके प्रेमी तूने 'यह मेरी पत्नी बने' इस प्रकार का संकल्प करके वरदानी शिव की अराधना की और योग द्वारा अपने विद्याधर-शरीर को छोड़ा ॥४०२-४०३।।

तब तू मनुष्य हुआ और यह भी तेरी मानुषी भार्या बनी। अब तुम दोनों परस्पर मिलकर अपने विद्याधर-लोक को जानो' ।॥४०४।।

समर द्वारा इस प्रकार कहे गये सागरवर्मा ने अपने पूर्वजन्म का स्मरण करके प्रयाग-संगम में अपने मानव-शरीर को छोड़ दिया और बह तुरन्त मदनक्रम बन गया ।॥४०५।। 

महाकवि सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के अलंकारवतो लम्बक का तीसरा तरंग समाप्त

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1. बुकेशियो डीके मर की दसवें दिन की कथा इससे मिलती-जुलती है। अनु०







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