5905. || पंचम कहानी || मरुभूति को कथा; राजा चिरदाता और उसके प्रसंग नाज्ञक नृत्य की कथा; राजा कनकवर्ष की कथा;

5905. || पंचम कहानी || मरुभूति को कथा; राजा चिरदाता और उसके प्रसंग नामक नृत्य की कथा; राजा कनकवर्ष की कथा; 

पंचम तरंग

मरुभूति को कथा

किसी एक दिन, अलंकारवती के निवास-भवन में बैठे हुए नरवाहनदत्त के पास सभी मन्त्रियों की उपस्थिति में आकर मरुभूति के सेवक ने निवेदन किया। वह सेवक, राजा के रनिवाम के रक्षक कंबुकी का सहोदर भाई बा ॥१-२॥

उसने कहा- 'महाराज, मैंने दो वर्षों तक मरुभूति की सेवा की और इसने उन दो वर्षों तक सपत्नीक मुझे भोजन-वस्त्र दिया ॥३॥

इसने कहा था कि प्रतिवर्ष तुझे पचास दीनार (सोने की मुहरें) दिया करूंगा, किन्तु इसने वे मुझे नहीं दिये ॥४॥

मेरे माँगने पर इसने मुझे पैरों से ठोकर मारी, इसलिए मैं आपके सिद्धार पर अनशन करने के लिए बैठा हूँ। यदि आप मेरा विचार न करेंगे, तो मैं अग्नि-प्रवेश करूंगा; क्योंकि यह मेरा स्वामी है' ॥५-६॥

इतना कहकर उसके चुप हो जाने पर मरुभूति ने कहा- 'महाराज, मुझे इसे दीनार देने हैं, किन्तु इस समय मेरे पास नहीं हैं। मरुभूति के इस प्रकार कहने पर और अन्य सभी मन्त्रियों के हँसने पर नरवाहनदल ने मरुभूति से कहा-'यह क्या तुम्हारी मूर्खता है? तुम्हारी ऐसी बुद्धि अच्छी नहीं है। जाओ, इसे तुरन्त दीनार दो' ॥७-९॥

स्वामी की यह बात सुनकर मरुभूति लज्जित हुआ और उसने उसी समय लाकर सौ दीनार उसे दिये ॥१०॥

तब गोमुख ने कहा- 'इस सम्बन्ध में मरुभूत्ति निन्दनीय नहीं हो सकताः क्योंकि मह ब्रह्मा की सृष्टि ही विचित्र चित्तवृत्तिवालों की है।॥११॥

आप लोगों ने विलम्ब से वेतन देनेवाले राजा और उसके सेवक के प्रसंग की कथा नहीं सुनी? ॥१२॥

राजा चिरदाता और उसके प्रसंग नानक नृत्य की कथा

पूर्वकाल में चिरपुर नगर का राजा विलम्ब से वेतन देनेवाला था। उसके स्वयं सज्जन होने पर भी उसका परिवार अत्यन्त दुष्ट या ॥१३॥

किसी दूसरे देश में आकर प्रसंग नाम का सेवक, अपने दो मित्रों के साथ, उस राजा के यहाँ आकर सेवा करने लगा ।।१४।।

सेवा करते हुए उसके पाँच वर्ष व्यतीत हो गये, किन्तु राजा ने उत्मव, त्योहार आदि के समय भी उने कुछ नहीं दिया। उस सेवक को, दोनों माथियों के प्रेरित करने पर भी अन्य अधिकारियों को दुष्टता के कारण अपने स्वामी से निवेदन करने का अवसर नहीं मिला ॥१५-१६॥

एक बार उस राजा का छोटा-सा पुत्र मर गया। उस समय दुःखित राजा को सभी नौकरों ने आकर घेर लिया ॥ १७॥

उसी समय वह प्रसंग नामक सेवक, साथियों से रोके जाने पर भी शोक के आवेग में राजा से बोला- ॥१८॥

'स्वामिन् ! हमलोग बहुत समय से सेवक हैं, किन्तु आपने कभी हमें कुछ नहीं दिया। फिर भी, हमलोग आपके इस पुत्र की बाशा से आजतक रुके थे कि यदि आपने हमें कमी कुछ नहीं दिया, तो यह हम लोगों को देगा, पर उसे भी जब दैव ने ले लिया, तब यहाँ अब हमारा क्या रह गया ? ॥१९-२०।।

हम अब जाते हैं।' ऐसा कहकर और राजा के पैरों में पड़कर वह प्रसंग अपने दोनों साथियों के साथ निकलकर चला गया ॥२१॥

ओह! ये मेरे सेवक मेरे पुत्र पर भी आशा बाँबे हुए थे, अतः इन्हें न छोड़ना चाहिए, इस प्रकार राजा उसी समय सोचने लगा ॥२२॥

और, उन प्रसंग जादि सेवकों को बुलाकर उसने धन से इतना भर दिया कि फिर उन्हें दरिद्रता ने कमी जुना तक नहीं ॥२३॥

महाराज ! मनुष्यों के इस प्रकार विचित्र स्वभाव देखे जाते हैं कि राजा ने उत्सव आदि दान के अवसरों पर तो उन सेवकों को कुछ नहीं दिया, किन्तु पुत्र-शोक के समय उन्हें धन से इस प्रकार परिपूर्ण कर दिया ।॥२४॥

ऐसा कहकर, कथा कहने में कुशल गोमुख ने बत्सराज के पुत्र की आजा से दूसरी कया आरम्भ की ॥२५॥

राजा कनकवर्ष की कथा

प्राचीन काल में गंगा के तट पर गंगाजल से पवित्र नागरिकोंवाला कनकपुर नाम का एक उत्तम नगर था ॥२६॥

उस नगर में यदि बन्च बा, तो कवियों की वाणी में, नियम और चरित्र में नहीं। यदि छेदन था. तो नजावट (बन्दनवार आदि) के पत्तों में, शिर और वृत्ति में नहीं, भंग था। तो नारियो के केशों में, वचन या प्रतिज्ञा में नहीं। खल (बलिहान) घानों के संग्रह के लिए थे, जनता में नहीं ॥२७॥

उस नगर का राजा कनकवयं महायशस्वी या, जो नागराज वामु‌कि के पुत्र राजा प्रियदर्शन से यशोधरा नाम की राजकुमारी से उत्पन्न हुआ था और जो समस्त भूमि के भार को वहन करते हुए भी अ-शेव (ममस्त गुणों से भूषित) वा ॥२८-२९॥

राजा कनकवर्ष यश का लोभी था, धन का नहीं; पाप से डरता था, शत्रुओं से नहीं; दूसरों की निन्दा करने में मूर्ख था, शास्त्रों में नहीं ॥३०॥

जिस महात्मा राजा के क्रोष में अल्पता थी, प्रसक्षता में नहीं; और जिसकी मुट्ठी धनुष में बंवी रहती थी, दान में नहीं ॥३१॥

जिस आश्चर्यजनक सौन्दर्यशाली और संसार की रक्षा करनेवाले राजा के देखने मात्र से सुन्दरियाँ काम-वेदना से विह्वल हो जाती थीं ।॥ ३२॥

वह राजा कनकवर्ष, एक समय जब प्रकृति में कुछ ऊष्मा रहती है, हाथी मदोन्मत्त हो जाते हैं, राजहंसों के परिवार, अपनी प्रसन्नता से प्रजाजनों को आनन्दित करते रहते हैं, ऐसे अपने गुणों के समान गुणवाले शरत्काल में विहार करने के लिए चित्र-महल में गया, जो कमल के पराग से मुगन्धित और शीतल वायु से रमणीव हो रहा था ।।३३-३४।।

उस चित्र-भवन में, राजा, जबतक एक चित्र को भली भांति देखकर उसकी प्रशंसा कर रहा था, तबतक द्वारपाल ने आकर निवेदन किया- 'महाराज, विदर्भ देश से एक चित्रकार यहाँ आया है, वह चित्रकला में अपने को अद्वितीय कुशल बताता है ।।३५-३६॥

उस रोलदेव नामक चित्रकार ने राजभवन के द्वार पर चित्रपट में एक चित्र बनाकर लटका रखा है।॥ ३७।।

यह सुनकर राजा ने आदर के साथ उसे बुलाने के लिए आदेश दिया और द्वारपाल भी क्षण-भर में उम चित्रकार को लेकर वहाँ उपस्थित हो गया ।॥३८॥

उस चित्रकार ने, चित्र-भवन में प्रवेश करके, चित्रों को देखने के विनोद में लगे हुए राजा कनकवर्ष को एकान्त में देखा ॥३९॥

तदनन्तर, मुन्दरी स्त्री के कुचों के बीच गरीर का भार दिये हुए, आसन पर बैठे हुए और हाथ में पान का बीड़ा उठाये हुए राजा से उम्र चित्रकार रोलदेव ने नम्रतापूर्वक निवेदन किया।।४०-४१।।

'महाराज, मैंने आपके चरण कमलों के दर्शन के लिए राजद्वार पर एक चित्र लटका रता या, न कि अपने कौशल के घमंड से। आप आज्ञा दें कि चित्र में किसका रूप अंकित करें, जिससे चित्रकला सीलने का मेरा यत्न सफल हो ।॥४२-४३॥

विश्कार के ऐसा कहने पर राजा ने उससे कहा है उपाध्याय, जो तुम्हारी इच्छा हो, लिखो। हमें तो अपनी आँखों को आनन्दित करना है। तुम्हारी कुशलता में सन्देह ही क्या है।' राजा के इस प्रकार कहने पर उसके समीप बैठे (दरबारी) लोग कहने लगे-'तुम राजा का ही चित्र बनाओ। अन्य किसी विरूप का चित्र बनाने से क्या लाभ?' यह सुनकर सन्तुष्ट चित्रकार ने पट पर राजा का चित्र बनाया ॥४४-४६॥

चित्रकार ने राजा के शरीर के अनुसार उसकी उठी हुई नाक बनाई, लम्बी और लाल आंखें, ऊँचा और चौड़ा ललाट तथा पुंघराले केश बनाये। चौड़ी छाली बनाई, जिसमें बाण आदि शस्त्रों के घाव स्पष्ट दील रहे थे। दिग्गजों की सूंड़ों के समान उसने सुन्दर भुजाएँ बनाई ॥४७-४८।।

कमर इस प्रकार पतनी बनाई, मानों सिंह-शावकों ने (राजा के पराक्रम से) पराजित होकर आहार-स्वरूप भेंट कर दी हो। जवान हाथियों के बाँधने के निमित्त बने गाम्भों की तरह दोनों जाये बनाई और अशोक के नये वनों के समान सुन्दर दोनों पैर बनाये ॥४९-५०।।

मामने ही राजा के मईया अन्य चित्र को वने देखकर गभी लोग उम्र चित्रकार को गन्यवाद देने लगे ।॥५१॥

और बोले- हमें अकेले राजा को देखकर मन्तोप नहीं है। इसलिए, दीवार में चित्रित इन गनियों में में किसी एक का चित्र राजा के साथ बनाओ। जिगसे हमारी आंखों को आनन्द मिले ॥५२-५३॥

यह सुनकर और दीवार पर चित्रित रानियों के चित्रों को देकर चित्रकार ने कहा-'देन रानियों में राजा के समान रूपवाली एक भी रानी नहीं है ।॥५४।।

में समझता हूँ कि मारे भ्रमंडल में राजा के समान रूपवाली सुन्दरी स्त्री है ही नहीं। हो. एक राजकुमारी है. मुनिए, मैं बताता हूँ, ।॥५५॥

विदर्भ देश में कुहिनपुर नाम का एक मम्पन्न नगर है, वहां पर देवशक्ति नाम से प्रसिद्ध एक राजा है ।॥५६॥

उसकी प्राणों में भी प्यारी अनंतशक्ति नाम की रानी है। उस रानी में राजा से उत्पन्न मदनसुन्दरी नाम की कन्या है। एक ही जिल्ह्वा से उसके मौन्दर्य का वर्णन करने के लिए मेरे जैसा व्यक्ति समयं नहीं है। फिर भी, मैं इतना ही कहता हूँ कि ब्रह्मा, उसे बनाकर अब पुनः इच्छा होने पर भी, युगों तक ऐसी सुन्दरी को नहीं बना सकता ॥५७--५९॥

गारी पृथ्वी में बही एक इस राजा के सदृश सुन्दरी कन्या है। रूप, लावण्य, अवस्था, कुल आदि सभी ने वह इस राजा के उपयुक्त है॥६०॥

एक बार वहाँ रहते हुए मैं, दामो द्वारा बुलाये जाने पर उनके रनिवास में गया था ।।६१।।

वहाँ उसे मैंने शरीर में चन्दन का लेप किये हुए, मृणाल का हार पहने हुए, कमल के पत्तों की शय्या पर करवटें बदलते हुए और सलियों द्वारा केले के पत्तों से हवा की जाती हुई, पीली और दुर्बल शरीरवाली तया प्रकट होते हुए कामज्वर के लक्षणोंवाली देखा। वह सखियों से कह रही थी- 'सखियो, 'चन्दन के लेप और कदलीदल की वायु आदि से किये गये सब उपचार ठंडे होने पर भी मुझे जलाते हैं। इन्हें बन्द करो। इन विफल प्रयत्नों से क्या लाभ ?' बीरज देती हुई सलियों को वह इस प्रकार मना कर रही थी।।६२-६५॥

इस अवस्था में पड़ी हुई उसे देखकर ओर उयो से मम्बद्ध विभिन्न तर्कों से व्याकुल मैं उसे प्रणाम कर उसके सामने बैठ गया ।॥६६।।

'उपाध्याय, ऐसा चित्र बनाकर मुझे दी।' इस प्रकार कहकर काँपते हुए हाथ में कूची लिये हुए उसने धीरे-धीरे पृथ्वी पर चित्र लिखकर दिखाते हुए मुझे किमी अनन्त रूपशाली युवा को लिखवाया ॥६७-६८।।

महाराज, उसके निर्देशानुसार चित्र बनाकर मैंने सोचा कि उसने मुझमे साक्षात् कामदेव का ही चित्र लिखवाया है। किन्तु, उसने चित्र के हाथ में काम का बाण नहीं लिखवाया, इससे मैं समझता हूँ, वह कामदेव नहीं, किन्तु उसी के समान रूपवाला कोई युवा मनुष्य है ।।६९-७०۱۱

उसने इस युवक को अवश्य कहीं देखा या सुना है और इसी के सम्बन्ध से उसे वह काम ज्वर की व्यथा भी है ॥७१॥

अतः, मुझे यहाँ से शीघ्र ही बला जाना चाहिए; क्योंकि यह राजा उम्र दंड देनेवाला है। यदि इसके पिता देवशक्ति को पता लगे, तो वह कदापि क्षमा न करेगा ॥७२॥

ऐसा सोचकर और उस मदनसुन्दरी को नमस्कार करके उससे सम्मानित में वहाँ से निकल गया ।॥७३॥

और महाराज, मैंने उसके परिजनों से यह भी सुना कि वह आपको सुनकर आपके लिए प्रेम करती है।॥७४॥

इसीलिए, चित्रपट पर गुप्त रूप से उसे लिखकर और लेकर तुरन्त आपकी सेवा में आया हूँ ॥७५॥

अब आपका स्वरूप देखकर मेरा सन्देह दूर हो गया है। उस राजकुमारी ने मेरे हाथों से आपको ही लिखवाया था ।॥७६॥

उसे मैं बार-बार नहीं लिख सकता; इसलिए आपके तुल्य होने पर भी चित्रपट में आपके साय उसे नहीं किया जा सकता ॥७७॥

इस प्रकार कहते हुए रोलदेव में राजा ने कहा चित्रपट पर लिखी गई उसे तुम मुझे दिवाओ। तब चित्रकार ने चोगे (मंजूया) में उम चित्र को खींचकर निकाला और मदनसुन्दरी का वह रूप राजा को दिखा दिया ॥७८-७९॥

राजा कनकवर्ग, चित्र में लिखी रहने पर भी विचित्र रूपनाली उसे देखकर उसी क्षण काम के वशीभूत हो गया ॥८०॥

तर राजा ने उस चित्रकार को प्रबुर सुवर्ण मुद्राओं से सम्मानित करके, उमसे अपनी प्रियतमा कः चित्र लेकर वह अपने नियामकक्ष में चला गया ॥८१॥

वर्दा एकान्त में उसके रूर और लावण्य को देखते-देखते अतृप्त नेत्रोंवाला यह राजा राज्य के गनी काम-काज छोड़कर निरन्तर उम्रों में तन्मय होकर ध्यान करने लगा ॥८२॥

उनी मनय अवसर पाकर पकी स्पर्धा से ईर्ष्या करनेवाले कामदेव ने भी बाणां को मर में राजाको अधीर बना दिया ॥८३॥

उप राजा ने अपने रूप पर आसक्त स्त्रिया को जैना सन्ताग दिया था, उसका सहस्र-गुणित परिणाम राजा को अब मिल रहा था।॥८१॥

इस प्रकार, कुछ ही दिनों में राजा, विरह में व्यथित होकर पीला पड़ गया और दुर्बल हो गया। तब उसके मन की बात जानने के लिए पूछने हुए हादिक मित्रों और विश्वस्त मन्त्रियों से उसने अपने हृदय को पवा स्पष्ट कह दी ॥८५॥

ओर, उन लोगों से मम्मति करके मदनसुन्दरी कन्या की मॅगनी के लिए राजा देवशक्ति के पास एक दूत भेजने का निश्चय किया गया ।॥८६॥

तदनुसार, कार्य के महत्व को जाननेवाले, परम विश्वस्त, कुलीन, मधुर तथा स्पष्ट भारण करनेवाले संगमस्वामी नामक ब्राह्मण को दूत नियुक्त किया गया ।॥८७॥

वह ब्राह्मण बहुमूल्य साज-सामान के साथ विदर्भ देश को गया और वहाँ से कुंडिनपुर नगर पहुँचा ॥८८॥

वहाँ पहुँबकर वह नियमांनुसार राजा देवक्ति से मिला और उसने अपने स्वामी राजा कनरावर्य के लिए उसकी कन्या की मांग की ॥८९॥

यह कन्या किसी को तो देनी ही है, राजा कनकवर्ष उसके लिए उपयुक्त वर है। फिर, वह हमारे ऐसों से कन्या को मांग करता है। अतः, उसे ही कन्या देता है- इस प्रकार, विचार कर राजा देवशक्ति ने संगमस्वामी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया ॥९०-९१॥

और राजा ने उस कन्या के रूप के समान उस कन्या का नृत्य भी संगमस्वामी को दिलाया ॥९२॥

तब दर्शन से प्रसन्न मंगमस्वामी को कन्या देने की स्वीकृति प्रदान करके और उसका ययोचित सत्कार करके राजा ने उसे भेज दिया ।। ९३॥

और, संगमस्वामी के साथ ही अपना सन्देश देकर अपने दूत को भी भेजा कि लग्न का निश्चय करके आप बरात के साथ विवाह के लिए आइए ॥९४॥

तब राजा के दूत के साथ आकर संगमस्वामी ने राजा कनकवर्य की कार्य-सिद्धि की बात उसमे निवेदित की ॥९५॥

तदनन्तर, लग्न का निश्चय करके और राजा के दूत का सत्कार करके उस मदनसुन्दरी को अपने प्रति अनुरक्त जानकर वह प्रबंड बलशाली राजा कनकवर्ष विवाह के लिए कुंडिनपुर गया ।॥९६-९७।

राजा कनकवर्ष ने सीमान्त के वनों में रहनेवाले सिह, व्याघ्र आदि हिंस्रक पशुओं और भील आदि दस्युओं को मार्ग में मारते हुए विदर्भ देश में प्रवेश किया ॥९८॥

विदर्भ में जाकर राजा देवशक्ति से अगवानी किये जाते हुए कनकवर्य ने कुंडिनपुर नगर में प्रवेश किया ॥९९॥

उस नगर की नागरिक स्त्रियों के नेत्रों को आनन्द देता हुआ वह विवाह की सजावट मे सुसज्जित राजभवन में गया ।॥१००॥

राजा देवशक्ति द्वारा किये गये उदारतापूर्ण आतिथ्य सत्कार से प्रसन्न राजा कनकवर्ष अपने बरातियों के साथ उस दिन आनन्दपूर्वक वहीं रहा ॥१०१॥

दूसरे दिन, देवशक्ति ने उस मदनसुन्दरी कन्या को, केवल एक राज्य को छोड़कर, सर्वस्व के साथ उसे प्रदान किया ॥१०२

विवाह के उपरान्त राजा कनकवर्ष, एक सप्ताह तक वहाँ ठहरकर नई वधू मदनसुन्दरी के साथ अपने नगर को वापस आवा ॥१०३।।

चन्द्रिका के साथ बन्द्रमा के समान, मदनसुन्दरी के साथ जगत् को आनन्द देनेवाले राजा कनकवर्ष के अपने नगर में पहुँचने पर सारा नगर उत्सवमय हो रहा था ॥ १०४॥

वहाँ वह रानी मदनसुन्दरी, अनेक रानियोंवाले उस राजा के भवन में इस प्रकार प्रधान थी, जैसे कृष्ण भगवान की अनेक रानियों में रुक्मिणी ॥१०५।।

वे दम्पती परस्पर मुखों पर मुन्दर पलकोंवाली आँखें गड़ाये हुए ऐसे लगते थे, मानों कामदेव के बाणों से क.लित कर दिये गये हों ।॥१०६॥

इस प्रकार, परस्पर आनन्द लेते हुए उस दम्पती के जीवन में, मानवती स्त्रियों के मान-रूपी हाथी का मर्दन करता हुआ और केमर-गुष्यों की मटा (गर्दन के केश) वाला वसन्त-केसरी (सिह) आया। अर्थात्, प्रथम वमन्त का आगमन हुआ ॥१०७।।

वनन्त ऋतु ने, कामदेव के, खिली हुई आनमंजरी-रूपी धनुषों को भौरों की पंक्ति-रूपी डोरी से सज्जित कर दिया ॥१०८॥

पथिकों की स्त्रियों के हृदयों के समान काम को उत्तेजित करनेवाले उपवनों को कँपाता हुआ मलयानिल बहने लगा ॥१०९॥

'नदियों की बाढ़, वृक्षों के पुष्प, चन्द्र की चाँदनी, ये सब नष्ट होकर फिर आ जाते हैं। किन्तु प्राणियों का बौवन जाकर फिर नहीं लौटता, इसलिए हे सुन्दरियो, मान-कलह को छोड़कर आने प्रियतम पतियों के साथ रमण करो, कोकिलों की कूकें प्राणियों को मानों, इस प्रकार कह रही थी ॥११०-१११।।

ऐसे समय में राजा कनकवयं अपनी सभी रानियों के साथ वसन्तोद्यान में विहार करने के लिए गया ।॥११२॥

अपने सेवकों के रक्तिम परिचानों से अशोक की शोभा को हरण करता हुआ और सुन्दरियों के गीतों से कोवलों और भ्रमरों की मधुर ध्वनि का अपहरण करता हुआ राजा, सभी रानियों के साथ रहने पर भी मदनसुन्दरी के साथ पुष्प-चवन आदि क्रीड़ाएँ करने लगा ।।११३-११४।।

इस प्रकार, उद्यान में बहुत समय तक विहार करके राजा कनकवर्ष स्नान करने के लिए अपनी सभी रानियों के साथ गोदावरी नदी में प्रविष्ट होकर जलक्रीडा करने लगा ।।११५॥

मुखों से नदी के कमलों को, नेत्रों से कुमुदों को, कुचों से चक्रवाक-युगलों को और अपने-अपने नितम्बों से गोदावरी के पुलिनों या तटों को राजा की रानियों ने जीत लिया था। अतः, गोदावरी नदी कोव से अपनी तरंग-रूपो भौंहें टेड़ी करके मानों उन्हें देख रही थी ॥११६-११७।।

जल-विहार के कारण इधर-उधर अस्त-व्यस्त होते हुए, गीले और सूक्ष्म वस्त्रों से स्पष्ट दीखते हुए रानियों के उन-उन अंगों कीशोभा देखने में राजा का मन अत्यन्त प्रसत्र होता था ॥११८॥

इसी समय वह राजा, एक रानी के दो स्वर्ण-कलशों के समान वस्त्ररहित उत्तुंग कुचों को पानी के छीटों से मारने लगा ॥११९॥

यह देखकर मदनसुन्दरी के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई और वह कहने लगी, तुम नदी को कितना क्षुब्व करोगे' इतना कहकर और जल से बाहर निकलकर, क्रोष के साथ वस्त्र बदलकर अपनी सखियों से राजा की शिकायत करती हुई वह अपने भवन को चली गई।। १२०-१२१॥

तब उसके भाव को समझकर राजा भी जलक्रीड़ा छोड़कर उसके (मदनसुन्दरी) निवास-भवन को गया ।॥१२२॥

वहाँ पर पिंजरों में टॅगे हुए शुकों से भी रोके जाते हुए राजा ने, भीतर जाकर क्रोधातुर रानी को देखा ॥ १२३॥

बाई हथेली पर खिन्न और म्लान मुख-कमल को रखी हुई, आंखों में बड़े-बड़े स्वच्छ मोतियों, के समान आंसुओं की बूंदों को गिरानी हुई, रुंचे हुए कंठ से अस्पष्ट उच्चारण करती हुई और दांतों की किरणों से मनोहर लगती हुई वह गनी अपभ्रंश भाषा में सुन्दर द्विपदी के इस टुकड़े को गा रही बी-

'यदि बिरह नहीं सहा जाता, तो तुझे मान छोड़ना चाहिए। हे हृदय ! यदि विरह सहा जाय, तो मान को बढ़ाओ। ऐसा जानकर दोनों में से एक का निश्चय कर लो। अन्यथा, दोनों किनारों पर पैर रखने से बीच में गिरकर अवश्य नष्ट हो जाओगे ॥१२४-१२७७॥

इस प्रकार, कोष में भी मनोहर लगती हुई मदनसुन्दरी के पास, राजा कनकवर्ष डरता और लजाता हुआ गया ॥ १२८॥

मुँह फेरकर बैठी हुई उसे बह राजा अपने आलिगन और मधुर वचनों द्वारा नम्रता के साथ मनाने लगा ॥१२९।।

वक्रोक्तियों से उसके अपराध को बताती हुई सत्रियों के सामने ही मदनसुन्दरी के चरणों पर वह राजा अपने अपराधी आत्मा की निन्दा करता हुआ गिर पड़ा ॥ १३०॥

तब उस कोचाग्नि से ही मानों पिघलकर गिरते हुए आंसुओं से राजा को मिगोती हुई रानी गले से लिपट गई ॥१३१॥

तदनन्तर, राजा क्रूद्ध होकर प्रसन्न हुई रानी के ही पास उस दिन को व्यतीत कर रात्रि में भो उसके साथ आनन्द-विलास करके मो गवा ॥१३२॥

सोये हुए उसने अकस्मात् एक स्वप्न देला कि एक कुरूपा स्त्री ने उसके गले से मोतियों की एक लड़ी माला और मुकुट के रत्न निकाल लिये हैं। उसके पश्चात् विविध प्राणियों के अंग-काले उसने दो वेतालों को देखा। उनके साथ बाहुपुद्ध होने पर राजा ने उन्हें भूमि पर पटक दिया ओर उन की पीठ पर यह बड़ बैठा। वेताल ने पीठ पर बैठे हुए राजा को पक्षी के समान उड़कर समुद्र में लेजाकर फेंक दिया, तदनन्तर किनी प्रकार समुद्र से निकले हुए राजा ने गले में मोनियों को मान्ला और मुकुट में चूडामणि आदि रत्नों को पहले के ही समान देखा ॥१३३-१३६॥

यह स्वप्न देखकर प्रान काल जगे हुए राजा ने, मिलने के लिए आए हुवे बौद्ध भिक्षु को देवकर स्वप्न का फल पूछा ॥१३आ

बौद्ध भिक्षु ने कहा-'महाराज, आपके सामने अप्रिय बात नही कहनी चाहिए; किन्तु आपसे पूछे जाने पर कैसे न कहूं ॥१३८॥

आपने जो मोतियों की माला और चूडामणि का अपहरण देखा, वह आपके पुत्र और महारानी के साथ वियोग का सूचक है। समुद्र से निकलकर जो तुमने उन दोनों वस्तुओं को पा लिया, यह दुःख के अन्त में फिर से उन दोनों के मिलने का सूचक है' ।।१३९-१४०।।

क्षपणक के इस प्रकार कहने पर कुछ सोचकर राजा ने कहा-'मुझे अभी तक पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ, अब पहले यह उत्पन्न तो हो' ।॥१४१॥

इसके उपरान्त, आये किसी हुए रामायण की कथा कहनेवाले से राजा ने सुना कि राजा दशरथ ने पुत्र के लिए बहुत कष्ट उठाया ॥१४२॥

क्षपणक के चले जाने पर, राजा के मन में पुत्रोत्पत्ति को चिन्ता बढ़ गई। ओर, उसने उस दिन को बड़े लिन मन से बिताया ॥१४३॥

एक बार रात्रि में शयनागार में अकेले सोये हुए राजा ने पलंग पर पड़े-पड़े ही द्वार बन्द रहने पर भी सहसा अन्दर आई हुई एक स्त्री को देखा ।।१४४।॥

वह स्त्री, नम्र और शान्त-स्वरूप थी। उसने शस्या से उठे और प्रणाम करते हुए राजा को आशीर्वाद देकर कहा- ।।१४५।।।

'बेटा, मैं तुम्हारे पिता की बड़ी बहन और नागराज वासुकि की कन्या हूँ। मेरा नाम रत्नप्रभा है।॥१४६॥

मैं अदृश्य रूप से तेरी रक्षा के लिए सदा तेरे पास रहती हूँ। आज तुम्हें अधिक चिन्तित देखकर तेरे सामने प्रकट हुई हूँ। मैं तुझे लिश्न नहीं देख सकती। दुःश्री होने का कारण क्या है बताओ। पिता की बहन (बुआ) के इस प्रकार कहने पर राजा ने उनसे कहा-॥१४७-१४८।।

'माना, मैं धन्य है, कि तुम मेरी रक्षा का ध्यान रखती हो। किन्तु, पुत्र ने होने का मुझे दुःख है। जब कि प्राचीन काल के राजवि दशरथ ऐसे महान् व्यक्तियों ने, स्वर्ग के लिए पुत्र की इच्छा की, तो मेरे ऐमे व्यक्ति क्यों न करें' ।॥१४९-१५०।।

राजा कनकवर्ष के यह वचन मुनकर वह रत्नप्रभा नागिन, भाई के पुत्र (राजा) से बोली-॥१५१॥

'यदि ऐसा है, तो हे पुत्र, मैं तुझसे कहती हूँ कि तू जाकर पुत्र के लिए स्वामी कात्तिक से प्रार्थना कर ॥ १५२।।

उनकी आराधना में विष्न करने के लिए शिर पर कुमार-धारा गिरती है, तू मेरे गरीर में प्रविष्ट हो जाने के कारण उम धारा का सहन कर लेगा ।। १५३।।

और भी अन्यान्य विश्नो को जीतकर तू अपना ईप्सित फल प्राप्त कर लेगा।' इतना कहकर वह नागिन अन्तर्वान हो गई। और, राजा ने वह रात्रि प्रसत्रतापूर्वक व्यतीत की ॥ १५४॥

प्रातःकाल, राजा ने, राज्य का भार मन्त्रियों पर छोडकर पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से स्वामी कालिक के चरणों में प्रस्थान किया ॥१५५॥

वहाँ जाकर उसने कात्तिक की आराधना के लिए कठोर तप प्रारम्भ किया; क्योंकि शरीर में प्रविष्ट नागिन (बुआ) का बल उसे प्राप्त था ॥१५६॥

तब राजा के शिर पर वज्र के समान तीव्र कुमार-धारा निरन्तर गिरने लगी ।। १५७।।

शरीर के अन्दर प्रविष्ट नागिन के बल से राजा ने धारा के वेग का सहन कर लिया। तब उसकी तपस्या में विघ्न करने के लिए कार्तिकेय ने गणेशजी को प्रेरित किया ॥१५८॥

गणेश ने, उस धारा में महाविय मिला दिया और एक भीषण अजगर को उत्पन्न किया। किन्तु, उससे राजा जरा भी विचलित न हुआ ।॥१५९।।

तब विनायक ने स्वयं आकर राजा के पेट में दाँतों से प्रहार किया। जिस प्रहार का देवता भी महन नहीं कर सकते थे, राजा ने उसका भी सहन किया ॥१६०।।

तब राजा कनकवर्ष ने, गणेशजी को दुर्जय जानकर उस दन्त-प्रहार का गहन करने के उपरान्त उनकी स्तुनि प्रारम्भ की ॥१६१॥

'हे मभी इच्छिन अयों की सिद्धि के कोय-स्वरूप कुम्भ के ममान गणपति, तुम्हारे लिए नमस्कार है। हे लम्बोदर, हे विध्धविनायक, हे सर्व का यज्ञोपवीत धारण करनेवाले, तुम्हें प्रणाम करता हूँ ॥१६२॥

लीला (क्रीडा) करते समय अपनी मूंड में बड़ा। के भी आसन कमल को कंपानेवाले गजानन, तुम्हारी जय हो ॥१६३॥

तुम्हारे अप्रसन्न होने पर देवता, वैश्य और मुनिराजों को भी सिद्धियां प्राप्त नहीं हो मकतो। अतः हे मनन्त कांकों के एकमात्र शरण देनेवाले शंकर के दुलारे, तुम्हें प्रणाम है ॥ १६४।।

हे घटोदर, हे पूर्वकर्ण, हे गणाध्यक्ष, हे मदोत्कट, हे पावाहत, हे अम्बरीष, हे जम्बक और हे त्रिशिलायुध, इस प्रकार उन-उन स्थानों में प्रसिद्ध अड़सठ नामों से देवता और दैत्य तुमहाय स्मरण और स्तुति करते हैं। इन नामो से तुम्हारी स्तुति करनेवाले की मवान, राजकुरु, जूजा, चोर, अग्नि ओर हिस्र जन्तुओं का भय नहीं रह‌ता ।।१६५-१६७।।

उन राजा कनकार्य में, इस प्रकार की अन्धान्य स्तुतियों से विब्नेश्वर गणेश की प्रार्थना की ॥१६८॥

'मैं तुझ पर प्रमन हूँ। अब विश्न न करूंगा। तू पुत्र प्राप्त कर।' राजा से इस प्रकार कह‌कर गणेशजी अन्तर्धान हो गये ॥ १६९॥

तब कुमार-धारा का सहन किये हुए उस राजा को दर्शन देकर स्वामी कार्तिकेय ने कहा- हे धीर, मैं तुझसे प्रसन्न हूँ, वर माँग' ।॥१७०।।

यह सुनकर विंत राजा ने उनसे निवेदन किया हे प्रभो, आपकी कृपा से मुझे पुत्र-प्राप्ति हो' ।॥१७१॥

'ऐसा ही हो। तुझे मेरे गण के अंश से पुत्र-प्राप्ति होगी। वह संसार में हिरण्यवर्ष नाम से विश्वात होगा' ।॥ १७२॥

ऐसा कहकर मपूरवाहन कात्तिकेय ने, उस पर विशेष कृपा करने की इच्छा से राजा को मन्दिर के गर्भगृह में बुलाया ॥ १७३॥

यह जानकर वह अदृश्य नागिन उसके शरीर से बाहर निकल गई; क्योंकि शाप के भय से स्त्रियाँ कुमार के गर्भगृह में प्रवेश नहीं करती ॥ १७४।॥

तब वह राजा कनकवर्ष नागिन के तेज से रहित होकर केवल अपने मानव-तेज के साथ हो वह कात्तिकेय देवता के गर्भगृह में प्रविष्ट हुआ ।।१७५।।

कुमार ने नागिन के निकल जाने के कारण तेजोहीन राजा को देखकर सोचा कि यह क्या बात है ॥ १७६।।

और ध्यान लगाकर नागिन के बल से कठोर तपस्या में उत्तीर्ण हुए उसे जानकर क्रोध में शाप दिया- ।। १७७।।

'राजा, तूने मेरे साथ-कपट व्यवहार किया है। इसलिए, तुझे उत्पन्न हुए बालक और महारानी में भीषण वियोग होगा ॥१७८॥

वावरान के ममान भयंकर शाप को सुनकर महाकवि राजा ने, मोह त्याग कर सुन्दर-मुन्दर मुक्तियों में स्वामी कात्तिकेय की स्तुति प्रारम्भ की ॥ १७९॥

उनकी मूस्तियों से सन्तुष्ट होकर षण्मुख ने उससे कहा-'राजन्, तेरी सूक्तियों में में प्रसन्न हुआ। अब तेरे उन शाप का अन्त करता हूँ ॥१८०॥

तुझे रानी और पुत्र का वियोग एक वर्ष के लिए होगा। तू तीन बार अपमृत्यु से व कर उन्हें प्राप्त करेगा' ।॥१८१॥

कात्तिकेय स्वामी के ऐमा कहकर चुप हो जाने पर राजा उन्हें प्रणाम करके उनकी कृपा से सन्तुष्ट होकर अपने नगर को गया ।॥१८२॥

नगर में पहुँचने पर कुछ दिनों के उपरान्त चन्द्रमा की चांदनी से अमृत-वर्षा के समान मदनसुन्दरी से पुत्र उत्पन्न हुआ ।॥१८३॥

राजा और रानी पुत्र के मुख को देखकर अत्यन्त आनन्द से अपने में ही फूले न समध्ये। उम राजा ने, घन बरसाते हुए उसी समय महान् उत्सव किया और स्वर्ण की वर्षा करके अपना कनकवर्ष नाम सार्थक किया ॥१८४-१८५॥

पाँच रात्रियों के बीतने पर छठी रात्रि में प्रसूति-भवन में पर्याप्त रक्षा का प्रबन्ध करने पर भो अकस्मात् विना शंका के ही मेष घिर गये ॥१८६॥

धीरे-धीरे बढ़ते हुए बादल ने आकाश को ऐसे घेर लिया, जैसे प्रमादी राजा के राज्य को अपेक्षित वात्रु घेर लेता है ॥ १८७॥

वायु-रूपी मदोन्मत्त हाथी, मानों मद की धारा के समान मूसलाधार वृष्टि से वृक्षों को उखाड़ता हुआ बहने लगा ॥१८८॥

उस समय साँकलों से बन्द द्वार को भी खोलकर कटार हाथ में लेकर कोई स्त्री उस प्रसूति-भवन में घुसी ॥१८९॥

और, भीतर घुमकर वह स्त्री मदनसुन्दरी के स्तन में मुंह लगाये हुए शिशु को छीनकर और रानी की सेविकाओं को मूच्छित करके बाहर की ओर भाग गई ॥ १९०॥

'हाय, हाय, राक्षमी मेरे बच्चे को ले भागों इस प्रकार चिल्लाती हुई और व्याकुल रानी बच्चे के मोह से अंधेरे में भी उसके पीछे दौड़ गई ॥१९१॥

वह स्त्री आगे-आगे भागती हुई अंधेरे में एक तालाब में गिर पड़ी और उसके पीछे दोड़ती हुई बच्चे के लिए पागल रानी मदनमुन्दरी भी उसी तालाब में जा गिरी ॥ १९२॥

कुछ ही समय में बादल हट गये और रात्रि भी प्रायः समाप्त हो गई और प्रसूति-गृह में मेविकाओं और दाइवी की चिल्लाहट मुन पड़ी ॥ १९३॥

यह सब सुनकर राजा कनकवयं प्रसूति गृह में आया और उसे पत्नी तथा पुत्र के विना, मना देनाकर वह संज्ञाहीन (बेहोग) हो गया ।॥१९४॥

होश में आने के पश्चात् राजा ने 'हाय बेटा! हाय रानी! कहकर चिल्लाने हुए एक वर्ष की अर्थाच के शाप का स्मरण किया ॥ १९५॥

और बोला-'हे भगवान् स्कन्द, मुझ अभागे को तुमने शाप में युक्त वरदान हो क्यो दिया, जो विशस्त अमृत के ममान है ॥१९६॥

हाय, प्राणों से भी प्यारी मदनमुन्दरी के बिना महस्र। युगों के समान एक वर्ष के समय को मैं कैसे बिताऊँगा ? ॥१९७॥

मब समाचार जान लेने के बाद इस प्रकार रोने, विलाप करतेहुए राजा को मन्त्रियां द्वारा मनशाये जाने पर भी. उमका घेवं, जो रानी के साथ ही चला गया था. फिर नहीं लौटा ॥१९८॥

कमनः काम के आवेग में राजा उदाग होकर नगर मे निकलकर विध्याचल के जंगल में चला गया ॥ १९९॥

उप वन को छोटी-छोटी हरिणियों के नेत्रों में वह रानी की नेत्र-शोभा को, बमरी-मुगों के बालों के झुंड में रानी के केश-कलाप के सौन्दयं को और हस्तिनियों की चाल में रानी की गति की मन्थरता को देखते हुए उसकी कामाग्नि अत्यधिक भड़क उठी ॥२००-२०१॥

घूमता हुआ। भूल और प्यास से व्याकुल राजा विन्ध्य की तलहटी में झरने का पानी गीकर एक वृक्ष की जड़ में बैठ गया ॥ २०२॥

इतने में ही एक गुफा के मुंह से विन्ध्य पर्वत के अट्टहास के समान निकला हुआ जटाओं-वाला मिह राजा को मारने के लिए उछला ॥ २०३॥

उसी क्षण, आकास से आते हुए किसी विद्याधर ने वेग से नीचे उतरकर तलवार के एक ही प्रहार से उस सिंह के दो टुकड़े कर दिये ॥२०४॥

और पास में आकर उस बाकाणवारी ने राजा से पूछा है राजा कनकवर्ष, तुम इस स्थिति में क्यों पहुँच गये हो ?' ॥२०५॥

यह सुनकर और अपनी स्थिति का स्मरण करके राजा ने उससे कहा-वियोग की अग्नि से पागल बने हुए मुझे क्या तुम नहीं जानते ? ॥२०६॥

तब विद्याघर ने कहा-'मैं पहले बन्धुमित्र नामक मनुष्य परिव्राजक होकर तुम्हारे नगर में रहता था। सेवा में प्रार्थना करने पर तुम्हारी महायता में बीर वेताल की सिद्धि द्वारा विद्याषर-पद को प्राप्त हुआ हूँ ॥२०७-२०८।।

इनी कारण तुम्हें पह‌चानकर तुम्हारा प्रत्युपकार करने के लिए, तुम्हें मारने के लिए उथन इन सिह को. मैंने मार डाला ॥२०९॥

अब में आज नाम से बन्धुप्रभ हो गया। इस प्रकार कहकर उस पर प्रेम प्रकट करते हुए राजा कनकवर्ष ने कहा हाँ, हो, मुझे स्मरण है। आज तुमने मित्रता निभा दी। अब यह बताओ कि पत्नी और पुत्र से मेरा मिलन कब होगा ? ॥२१०-२११॥

राजा की यह बात सुनकर और अपनी विद्या के प्रभाव में सब बात जानकर बन्धुप्रभनामक विद्याधर ने राजा से कहा-विन्ध्यवासिनी का दर्शन प्राप्त करने पर पत्नी और पुत्र का मिलन तुम्हें हो सकेगा। अतः, तू अपनी कार्य-सिद्धि के लिए आ। मैं अपने विद्याघर-लोक को जाना हूं ॥२१२-२१३॥

इस प्रकार कहकर उस विद्यावर के आकाश में उड़ जाने पर धीरे-धीरे धैर्य धारण किया हुआ। वह राजा कनकवचं, विन्ध्यवासिनी के दर्शन को गया ।॥२१४।।

बन-मार्ग में जाते हुए राजा पर, मस्तक और सूंद्र को हिलाते हुए एक बड़े जंगली हाथी ने आक्रमण कर दिया ॥२१५॥

उसे देखकर राजा ने एक गड्‌डे के मार्ग से दोड़ना आरम्भ किया, इस प्रकार राजा के पीछे दोड़ता हुआ वह हाथी, उस गड्ढे में गिरकर, मर गया ।॥२१६॥

तब मार्ग को चकावट से व्याकुल और प्यासे राजा को मार्ग में ऊँचे-ऊँचे और खिले कमलों-वाला एक तालाब मिला। उसमें स्नान करके, जल पीकर और कमल-नालों को खाकर तृप्त राजा थकावट के कारण एक वृक्ष के नीचे विश्राम करते-करते सो गया ।॥२१७-२१८॥

इतने में ही शिकार से लौठे हुए भील उस मार्ग से आ निकले और उन्होंने अच्छे लक्षणों से भम्पन्न राजा को वहाँ सोये हुए देखा ॥२१९॥

तब वे उसे बलिदान के योग्य समझकर देवी को भेंट करने के लिए बाँवकर अपने राजा मुक्ताफर के पाम ले गये। वह भील सरदार भी उसे अच्छे लक्षणोंवाला जानकर पशु बनाने के लिए विन्ध्यवामिनी के मन्दिर में ले गया ।॥२२०-२२१॥

देवी का दर्शन करने हो राजा ने उमे प्रणाम किया और देवी की कृपा तथा स्वामी कालिकेय के वरदान के कारण उगी समय वह बन्धन से छूट गया। यह देवकर और उसे देवी की अद्भुत और चाश्वई जनक कृपा ममअकर भील-मरदार ने, राजा का वध न करके उसे मुक्त कर दिवा ॥२२२-२२३॥

इस प्रकार अपमृत्यु के नोमरे दौर में जुटे हुए राजा के शाप का एक वर्ष व्यतीत हो गया ॥२२४॥

तबतक राजा को हुआ वह नागिन हुन-महित रानी मदनसुन्दरी को लेकर उपस्थित हुई ॥२२५॥

और उससे बोली- 'हे राजन्, कुमार के गाव को जानकर मैंने तुम्हारी पत्नी और पुत्र को गुक्ति से अपने पर ले जाकर मुरक्षित रखा था। अब तुम इन दोनों को लोऔर शाप में मुक्त हॉकर अपनी भूमि के राज्ध का उपभोग करो।' इन प्रकार कहकर और प्रणाम करते हुए राजा को आवीर्वाद देसर, वह नागिन अन्नहिंत हो गई। राजा ने भी पत्नी और पुत्र के उस मिलन को एक सपना-मा ममजा ॥२२६-२२८॥

तदनन्तर, विरकाल के वियोग के उपरान्त मिलकर आलिंगन करते हुए राजा और रानी का विद्योग-कष्ट, पमत्रता के आंनुओं के माथ बह निकला ॥२२९॥

तब भीलों का मरदार मुक्ताफल ने उमे गजा कनकवर्ष समझकर पैर पर गिर पड़ा और उसमे क्षमा मांगी। तदनन्तर, पत्नी तथा पुश-सहित उमे अपने ग्राम में ले जाकर ममुचित माधनों में उसकी मेवा करने लगा ॥२३०-२३१॥

वहाँ रहते हुए राजा ने दूतों द्वारा अपने श्वनूर देवशक्ति को तथा अपनी मेना को वहीं बुलवा लिया ॥२३२॥

उन सत्र के आने पर राजा कनकर्ता, म्वामी कात्तिकेय के कहे हुए हिरण्यवर्ष नाम के पुत्र के साथ रानी मदनसुन्दरी को हस्तिनी पर बैठाकर और आगे रमाकर ससुराल जाने के लिए यहाँ से चला ॥२३३।।

कुछ सनर बाद वह राजा विदर्भदेश-स्थित कुंडिनपुर नामक समृद्ध नगर में श्वशुर-गृह को पहुंचा। वहाँ दवशुर द्वारा सत्कार प्राप्त कर स्त्री और पुत्र के साथ कुछ दिनों तक वह वहीं ठहर गया ॥२३४।।

तदनन्तर, वहाँ से बीरे-धीरे चलकर स्त्री मदनसुन्दरी और पुत्र हिरण्धवर्ष के साथ प्रजाओं के लिए मूर्तिनान् उत्सव के समान और प्रनत्रचित्त वह राजा, अपनी राजधानी कनकपुर में पहुँचा ॥२३५-२३६॥

वहाँ पहुंचकर प्रश्न प्रजा का अभिनन्दन स्वीकार कर राजा कनकवर्ष ने, रानी मदन-मुन्दरी का पट्टकरके उने मनी रानिवों में प्रभुव, अर्थात् महारानी बना दिया ॥ २३७॥

तदनन्तरजा कनकवर्ष, महारानी और गुत्र के साथ प्रतिदिन उत्सव मनाता हुआ सदा के लिए विधान में मुक्त होकर आने निष्कंटकस बंभो राय का पालन करने लगा ॥२३८।।

अन्वं ह. रवनी के साथ नरवाहनदत्त, अपने मुह मंत्री गोमुब से इस प्रकार की मनोरंजक कवा को गुन हर अत्यन्त सन्तुष्ट हुआा ॥२३९॥

महाकवि श्रो मोनदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के अलंकारवती लंबक का पंचम तरंग समाप्त



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