5703. || तृतीय कहानी || निश्चयवल और अनुरागपरा की कथा; बन्दर बने सोमस्वामी की कथा

5703. || तृतीय कहानी || निश्चयवल और अनुरागपरा की कथा; बन्दर बने सोमस्वामी की कथा

तृतीय तरंग

निश्चयवल और अनुरागपरा की कथा

इस प्रकार, रत्नप्रभा से कही गई कथा के क्रम में नरवाहनदत्त का मन्त्री गोमुख उससे कहने लगा- ॥१॥

सच है, सदाचारिणी स्त्रियाँ विरल होती हैं। प्रायः स्त्रियां चंचला (दुराचारिणी) ही होती हैं और विश्वास के योग्य भी नहीं होती। इस प्रसंग में यह भी एक क्या सुनें ॥२॥

संसार में प्रसिद्ध उज्जयिनी नाम की नगरी है। प्राचीन समय में वहाँ निश्चयदत्त नाम का बनिया का बेटा रहता था ॥ ३॥

वह जुआरी था और प्रतिदिन जूए से वन जीतकर, शिप्रा नदी में स्नान और महाकालेश्वर शिव की पूजा करके ब्राह्मणों, दीनों एवं अनायो को दान देकर चन्दन, इत्र, भोजन, ताम्बूल आदि का व्यवहार करता था। (वह बहुत खर्चीला और शौकीन था) ॥४-५॥

वह निश्चयदत्त, प्रतिदिन स्नान, पूजा आदि करके महाकाल-मन्दिर के समीप श्मशान में जाकर शरीर में चन्दन लगाता था ।॥ ६॥

वह युवक वैश्य, उस श्मशान में खड़े एक पत्थर के खम्भे पर, चन्दन लगाकर उस पर अपनी पौठ रगड़ता था ।॥७॥

प्रतिदिन पीठ के रगड़ने में वह माम्भा, अत्यन्त चिकना और सुन्दर हो गया था। एक बार उस मार्ग में एक चित्रकार एक मूत्तिकार (मंगतराण) के माथ उधर से आया ।।८।।

उसने खम्भे को खूब चिकना देखकर उस पर गौरी का चित्र बना दिया। मूत्तिकार ने भी फ्रीड़ान छेनी और यौड़ी में उसे बोदकर मूत्ति का रूप दे दिया ॥९॥

उन दोनों के चले जाने पर महाकाल की पूजा के लिए आई एक विद्याधर-कन्या, उघर आ निकली और उसने खम्भे पर पार्वती की खुदी हुई मूत्ति देखी ॥१०॥

उसे बहुत चिकना देवकर और पार्वती का वाम समझकर वह विद्याधरी महाकाल की पूजा करके उसी खम्भे में अक्षय रूप में प्रवेश कर गई ॥११॥

इतने में ही वैश्य-पुत्र प्रतिदिन के नियमानुसार उन व्वम्भे पर आया और गौरी की खुदी हुई मूत्क्ति उसने देखी ॥१२॥

तब उसने शरीर पर चन्दन का लेप करके खम्भे की दूसरी ओर पीठ रगड़ना प्रारम्भकिया ।।१३।।

उसे पीठ रगड़ते हुए देखकर वह बंवलाक्षी विद्याधरी खम्भे के अन्दर बैठी हुई उस वैश्य की सुन्दरता से मोहित हो गई और सोचने लगी ऐसे सुन्दर युवक की पीठ पर चन्दन लगानेवाला कोई नहीं है। तब मैं ही इसकी पीठ पर चन्दन लगाती हूँ ।।१४-१५॥

ऐसा सोचकर और लम्भे के अन्दर से ही हाथ फैलाकर स्नेह से उसकी पीठ मलने लगी ॥१६॥


सुन्दर कोमल स्पर्श का अनुभव करते हुए और कँगने के शब्द को सुनते हुए निश्चयदत्त ने पीछे हाथ घुमाकर उसके हाथ को पकड़ लिया ॥१७॥

उसके हाथ पकड़ने पर वह अदृश्य विद्यावरी, खम्भे के भीतर से बोली- हे महाभाग ! मैंने तेरा कौन-सा अपराध किया है कि मेरा हाथ पकड़ रखा है। इसे छोड़ो' ॥१८॥

वैश्य पुत्र ने कहा- 'मेरे सामने आकर बताओ कि तुम कौन हो, तब तुम्हारा हाथ छोडूंगा।' विद्याधरी ने शपथ खाकर कहा कि 'मैं प्रत्यक्ष होकर तुम्हें सब कहेंगी।' उसके ऐसा कहने पर उसने हाथ छोड़ दिया ॥१९-२०।।

तदनन्तर वह सर्वांगसुन्दरी विद्यावरी, वैश्य-पुत्र के मुख पर आँखें गड़ाए हुए, बैठकर बोली-॥२१॥

'हिमालय पर्वत के शिखर पर पुष्करावती नाम की नगरी है। वहाँ विन्ध्यपर नाम का विद्याधरों का राजा है ॥ २२॥

उनकी मैं अनुरागपरा नाम की कन्या हूँ। यहां महाकाल भगवान् की पूजा के लिए आई थी। इस खम्भे में कुछ देर के लिए विश्राम कर रही हूँ ॥२३॥

तबतक कामदेव के मोहन-मन्त्र के गमान यहाँ आकर चन्दन को शरीर में घिसते हुए तुम्हें देखा ॥२४॥

तुम्हारी पीठ पर चन्दन का लेप करती हुई मेरा हाथ तुमने प्रथम अनुराग के समान पकड़ा। अब में जानी हूँ।' उस कन्या के इस प्रकार कहने पर वैश्य-पुत्र ने कहा- 'अब मुझे तुम्हारे पित्ता का स्थान मालूम हो गया है। अभी तक तुभ से हरण किये गये अपने हृदय को मैंने वापस नहीं लिया है। लिये हुए हृदय के बिना वापस किये तुम कैसे जाओगी ?' ॥२५-२७७।

उससे इस प्रकार कही गई और स्वल्प प्रेम के वशीभूत वह विद्यावरी बोली- 'यदि तुम मेरी नगरी में आ जाओगे. तो फिर मिलूंगी ॥२८॥

किन्तु हे नाय! वह नगरी अत्यन्त दुर्गम है, इसलिए तुम्हारी अभिलाषा पूरी न हो सकेगी। फिर भी, उद्योगी पुरुषों के लिए दुष्कर क्या है? ऐसा कहकर वह अनुरागयरा आकाश मार्ग से उड़कर चली गई निश्चयदत्त भी उसीमें हृदय को लगाये हुए अपने घर लौट आया ।।३०।।

और पेड़ के समान सम्भे से निकले हुए उसके पाणि-पल्लव का स्मरण करते हुए सोचने लगा 'कि मैंने उसका हाथ पकड़ने पर भी विवाह नहीं किया, यह बहुत बुरा किया' ।॥३१॥

अतः, अब मैं पुष्करावती पुरी में उसी के समीप जाता हूँ। या तो प्राणों का त्याग करूँगा अथवा दैव ही मेरी सहायता करेगा ॥३२॥

ऐसा सोचते हुए उस काम-पीड़ित वैश्य ने उस दिन को किसी प्रकार व्यतीत किया और प्रातःकाल उठते ही उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा ।। ३३।।

उस ओर जाते हुए उसे मार्ग में और भी तीन बनिया सहयात्री मिले, जो उत्तरापय की ओर जा रहे थे ॥ ३४।।

उनके साथ नगरों, ग्रामों जंगलों और नदियों को पार करके वह म्लेच्छों से भरी हुई उत्तर दिशा में पहुंचा ॥३५॥

वहाँ पर वह उन अन्य यात्रियों के साथ ताजिक (म्लेच्छ) लोगों से पकड़ा जाकर दूसरे ताजिक के हाव दामों पर बेच दिया गया ।।३६।।

उनने भी इन नारों को खरीद कर नौकर के हाथों, उपहार स्वरूप मुरवार नामक तुर्क के पास भिजवा दिया ॥ ३७॥

जब उम ताजिक के नौकर, उन तीनों के साथ निश्चयदत्त को लेकर मुरवार के पास रहुँचे, तब वह (मुलार) मर चुका था। अतः उन्हें उसके पुत्र को सौंप दिया गया ।॥ ३८॥

'यह मेरे मित्र ने पिना के लिए उपहार भेजा है, अतः इन्हें कल प्रातः उन्ही के पास कत्र में गाड दिया जायेगा' ऐसा कहकर उस तुर्क के पुत्र ने उन्हें कसकर बाँचा और एक तरफ रख दिया ॥३९-४०١١

तदनन्तर जकड़कर बांचे गये उन जन्य तीन वैश्य-पुत्रों को मृत्यु के भय से व्याकुल देखकर निश्ववदत ने उनसे कहा-- ॥४१॥

'चोक और दुःख मनाने से तुम्हारा क्या बनेगा। धीरज धरकर पड़े रहो। धैर्यशाली लोगों की विपत्तिर्वा, मानों डरकर दूर भागती हैं ।॥४२॥

बस, एकमात्र संकट को दूर करनेवाली जगदम्बा भगवती का स्मरण करो।' इस प्रकार, मावियों को धीरज बंधाकर निश्चयदत्त, भगवती की स्तुति करने लगा ॥४३॥

'हे महादेवि ! तुम्हारे उन चरणों में प्रणाम करता हूँ, जिनमें मारे हुए असुरों का रक्त, अलता (महावर) के समान शोभित होता है ॥४४॥

विश्व का ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली तुमने शिव को भी जीत लिया। में तीनों लोक तुम्हारी ही जीवित या सक्रिय प्रेरणा हैं ।॥४५॥

'हे महिषासुरमविनी ! तुमने सारे संसार की रक्षा की है, इसलिए है भक्तों पर स्नेह करनेवाली! शरण में आये हुए मेरी रक्षा करें' ।॥४६॥

अपने साथियों के साथ इस प्रकार देवी की स्तुति करके वह (वैश्य) भी यकान के कारण सो गया ।॥४७॥

'उठो, उठो, जाओ, तुम्हारे बन्धन कट गये।' इस प्रकार, देवी ने स्वप्न में उन्हें आदेश दिया। जाने पर उठकर उन लोगों ने अपने को बन्धन-मुक्त पाया। वे आपस में स्वप्न की बात करके प्रसन्न हुए ओर वहाँ से चल पड़े। राह में सुबह होने पर अन्य साथियों ने निश्चयदत से कहा कि म्लेच्छों से भरी हुई उत्तर दिशा को छोड़ो, दक्षिणापथ ही अच्छा है। अतः, हमलोग उधर हो जाते है। तुझे जो अच्छा लगे, करो ॥४८-५१॥

उनसे इस प्रकार कहे गये निश्चयदत्त ने उन्हें इच्छानुसार जाने के लिए कहकर स्वयं उसी उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा ।।५२।।

अकेला निश्चयदत्त, विवश होकर मार्ग से जा रहा था; क्योंकि अनुरागपरा नामक विद्याधरी के प्रेम से उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो रही थी ॥५३॥

चलते-चलते मार्ग में उसे चार महाव्रती (कापालिक) मिले। उनके साथ वह वितस्ता (झेलम) नदी को पार कर गया ।॥५४॥

वितस्ता को पारकर और भोजन करके, सूर्यास्त के समय, वे लोग, मार्ग में आये हुए एक वन में घुसे ॥५५॥

उस वन से आये हुए कुछ लकड़हारे उन्हें पहले मिले और बोले- 'आगे कहां जा रहे हो, इबर कोई गाँव नहीं है।॥५६॥

इस सूने जंगल में सिर्फ एक शिवालय है। उस शिवालय के बाहर या भीतर जो ठहरता है, उसे श्रृंगोलादिनी नाम की यक्षिणी पशु बनाकर, सिर में सींग उत्पन्न करके ला जाती है ।।५७-५८।।

यह सुनकर भी उसकी परवाह न करनेवाले वे चारों कापालिक साथी, निश्चय दत्त से बोले- 'आओ जी ! वह बेचारी यक्षिणी हम लोगों का क्या कर सकती है? हम लोग रात में बड़े-बड़े श्मशानों में रह चुके हैं ।॥९९-६०।।

ऐसा कहते हुए उन साथियों के साथ निश्चयदत्त, उस सूने शिवालय में रात बिताने के लिए घुसा ॥६१॥

उस मन्दिर के आंगन में भस्म से एक बड़ा-सा मण्डल बना कर और उसके भीतर जाकर लकड़ियों से आग जलाकर वे यक्षिणी के भय से मन्त्र जपते हुए बैठ गये ॥६२-६३॥

कुछ समत्र के अनन्तर दूर से ही नर कंकाल की वीणा बजाती और नाचती हुई यह श्रृंगोत्वादिनी यक्षिणी रात में वहाँ आई ॥६४॥

वह आकर उन चारों में से एक-एक के माथ ऑवं लड़ाकर नाचती हुई मण्डल के बाहर मन्त्र पढ़ने लगी ।।६५।।

उस मन्त्र के प्रमाव से उन बारों में से एक के सिर पर सींग उग आये और वह नाचता हुआ उम जलती हुई आग में जा गिरा ॥६६॥

आग में गिरकर अचजले उगे आग से श्रीचकर यक्षिणी ने प्रसन्नता से खा लिया ॥ ६७।।

तब दूसरे कापालिक के प्रति आंखें गड़ाकर वीणा बजाती हुई यक्षिणी सींग उत्पन्न करने-बाले मन्त्र को पड़कर नाचने लगी ॥६८॥

वह दूसरा वती भी भीग उत्पन्न होने पर उसी प्रकार नाचने लगा और आग में जा गिरा। यक्षिणी दूसरों के देख देखते ही उगे भी मीचकर खा गई ॥६९॥

इस प्रकार, उन चारों तियों को मोहित करके उन वारों सींगवालो को उसने खा लिया ॥७०।।

चौये पुरुष को न्वानो हुई, मांग और रुचिर ग्याने गे उन्मत्त, यक्षिणी ने अपनी बीणा को दैवयोग से भूमि पर रख दिया ॥७१॥

तब निश्चयदत्त ने जल्दी से उठकर उसकी वीणा उठा ली और नाचते, गाते और घूमते हुए, सुनकर याद किये हुए शृंगोत्पादन-मन्त्र को जपने लगा। और, अपनी आँखें यक्षिणी के मुंह पर टिका दी ।।७२-७३।।

उस मन्त्र-प्रयोग के प्रभाव से विवश और मृत्यु-मूल में जाती हुई वह यक्षिणी सीगों को निकलते हुए देखकर नम्न होकर बोली-॥७४।।

हे महाभाग ! तुम मुझ दीन स्त्री को न मारो। इस समय में मैं तुम्हारी शरण में हूँ।' और, मन्त्रपाठ बन्द कर यक्षिणी ने निश्चयदत्त से फिर इस प्रकार कहा- ॥७५॥

'मेरी रक्षा करो। मैं सब जानती हूँ। तुम्हारा अभिप्राय समझती हूँ। अनुरागपरा जहाँ रहती है, वहाँ तुम्हें पहुंचा देती हूँ' ।॥७६॥

इस प्रकार, विश्वास के साथ कहने पर निश्चयदत्त ने मन्त्र-पाठ बन्द कर दिया ॥७७॥

तदनन्तर, उस यक्षिणी के कन्वे पर चढ़कर वह निश्चयदत्त, प्रिया अनुरागपरा की ओर चला ॥७८।।

रात बीतने होने पर सवेरे एक पर्वतीय जंगल में पहुँचकर वह विनम्रा यक्षिणी निश्चयदत्त से बोली- 'हे महाभाग ! अब सूर्योदय होने पर ऊपर जाने के लिए मेरी शक्ति नही है। इसलिए, तुम इसी रमणीव जंगल में दिन बिताओ। मीठे-मीठे फल खाओ। झरनों का सुन्दर-स्वच्छ जल पियो। मैं अपने घर को जाती हूँ। रात होने पर फिर आऊँगी ॥ ७९-८१॥

उसी समय, तुम्हें हि‌मालय के शिखर की माला के समान पुष्करावती नगरी में अनुरागपरा के समीप पहुंचा दूंगी। ऐमा कहकर और निश्चयदत्त को कन्धे से उतारकर उसकी आज्ञा फिर आने के लिए मच्ची प्रतिज्ञा करके वह यक्षिणी चली गई ॥ ८२-८३॥

उसके चले जाने पर निश्चयदत्त ने वहाँ पर एक अथाह और अन्दर से विर्पले एवं बाहर से स्वच्छ तालाब को देखा। 'स्त्रियों का चित्त इसी प्रकार भीतर से वियमय और बाहर ने स्वच्छ दीखता हैं. सूर्य, मानी अपनी करों (किरणों) में निश्चयदत्त को यह कहते हुए तालाब दिखा रहा था ॥८४-८५॥

प्यासा निश्चयदत्त मनुष्य के कृत्य से उस तालाब को जहरीला समझकर पानी के लिए उस दिव्य पर्वत पर इधर-उधर घूमने लगा ॥८६॥

घूमते हुए उसने पहाड़ की ऊंची भूमि में मिट्टी के अन्दर पद्मराग मणि के समान चमकती हुई दो आंखें देखीं। उसके बाद वह उस भूमि को लोदने लगा ॥८७॥

मिट्टी को हटाते ही उसने जीवित बन्दर का सिर देखा। जैसे ही वह उसके लिए सोचने लगा, इतने में ही वह बन्दर मनुष्य की वाणी में बोला- ॥८८-८९।।

हे सज्जन ! में मनुष्य हूँ। बन्दर बनाया गया ब्राह्मण हूँ। मुझे निकालो। तब मैं अपना सारा वृत्तान्त तुमसे कहूंगा' ॥९०॥

यह सुनकर आश्चर्य चकित निश्चयदत्त ने भली भाँति भूमि लोदकर उसे बाहर निकाला ॥९१॥

भूमि से निकला हुआ बन्दर उसके पैरों पर गिरकर फिर बोला- 'तुमने कष्ट से मुझे बचाते हुए मेरे प्राण दिये। तुम भी मेरे साथ थक गये हो। फल और जल ग्रहण करो। तुम्हारी कृपा से मैं भी चिरकाल के बाद आज पारण करूँगा' ।॥९२-९३॥

ऐसा कहकर बन्दर उसे वहाँ से दूर एक पहाड़ी नदी के किनारे ले गया, जहाँ स्वतन्त्र एवं स्वादिष्ठ फल और छायावाला एक वृक्ष या ॥९४।।

वहाँ स्नान करके मीठे फल खाया हुआ निश्चयदत्त, जलपान किये हुए बन्दर के पास आकर बोला- ।।९५।।

'तू मनुष्य होकर भी बन्दर कैसे बना।' तब बन्दर बोला कि सुनो, अब मैं यह कहता हूँ ।।९६।।

बन्दर बने सोमस्वामी की कथा

मित्र ! वाराणसी नगरी में चन्द्रस्वामी नाम का एक ब्राह्मण था। उसकी पतिवता स्त्री से उत्पन्न यह मैं उसका पुत्र हूँ ॥९७॥

मेरे पिता ने मेरा नाम सोमस्वामी रखा था। क्रमशः बड़ा होते-होते में मदोन्मत्त काम-रूपी जंगली हाथी पर चढ़कर जवान हो गया ।॥९८॥

किसी समय वाराणसी-निवासी श्रीगर्भ नाम के वैश्य की कन्या ने घर की खिड़की से दूर से आते हुए मुझे देखा ॥९९॥

वह युवती, मथुरा के प्रधान वैश्य वराहदत्त की पत्नी थी, जो उस समय अपने पिता के घर में रह रही थी ॥१००॥

मुझे देखने से उत्पन्न काम से विह्वल होकर उस वैश्य-कन्या ने मेरे संगम के लिए अपनी विश्वस्त दूती को भेजा ॥१०१।।

उसकी सहेली, उसे कामान्ध जानकर, एकान्त में उसके मन की बात मुझसे कहकर मुझे अपने घर ले गई ॥१०२॥

मुझे अपने घर में ठहराकर वह सखी, गुप्त रूप से बन्धुदत्त के पास गई और काम की उत्सुकता से लज्जा को छोड़ी हुई उसे वहाँ ले आई ।।१०३।।


वहाँ आते ही वह मेरे गले से चिपट गई। स्त्रियों का उग्र रूप से चढ़ा हुआ काम, एकमात्र वीर होता है ।॥१०४॥

इस प्रकार, वह बन्धुदत्ता, प्रतिदिन पिता के घर से सली के घर आकर मेरे साथ क्रीड़ा करती रही ।।१०५।।

एक बार उसका पति बहुत दिनों से पिता के घर रही हुई उसे अपने साथ ले जाने के लिए मथुरा से आया। तदनन्तर पिता की आज्ञा से ले जाने के लिए उत्सुक पति को जानकर वन्धुदत्ता, अपने रहस्य को जाननेवाली सखी ने बोली--।।१०६-१०७।।

'मेरा पति, मुझे अवश्य ही मथुरा ले जायगा और में सोमस्वामी के विना जी नहीं मकती ॥१०८॥

इस विषय में अब कौन-सा उपाय किया जाय, यह बताओ।' इस प्रकार कही गई बन्धुदत्ता की सुखशया नाम की योगिनी सखी बोली ॥१००॥

'मेरे पास दो मन्त्र हैं। एक मन्त्र से गले में डोरा बाँधने से मनुष्य तुरन्त बन्दर बन जाता है ॥११०॥

और, दूसरे मन्त्र से होरा खोल देने पर फिर वह मनुष्य बन जाता है। बन्दर बन जाने पर या पुनः मनुष्य बन जाने पर उसका ज्ञान नष्ट नहीं होता ॥१११॥

अतः, हे सुन्दरी! यदि तू चाहती है, तो तेरे प्यारे सोमस्वामी को में अभी बन्दर का वच्या बना देती हूँ। तू इमे बिलौना बनाकर साथ लेकर मथुरा चली जा। में दोनों मन्त्र और उमकी युक्ति तुझे बना देती हूँ। इसने तुम एकान्त में इसे प्रिय पुरुष बनाकर इच्छानुसार संगम कर सकोगी ॥११२-११४॥

उस मली से इस प्रकार कही गई बन्धुदत्ता ने मुझे बुलवाकर यह योजना प्रेमपूर्वक ममज्ञाई ॥११५॥

मेरी सम्मति पाने पर उसकी सखी मुखशया ने मुझे मन्त्रित करके, गले में डोरा वाँधकर तुरन्त बन्दर बना दिया ॥११६।॥

मुझे बन्दर के रूप में ले जाकर बन्धुदत्ता अपने पति से बोली कि मेरी सखी ने मुझे मन-बहलाव के लिए यह बन्दर दिया है ॥ ११७।।

उसकी गोद में बैठे हुए उस खिलौने को देखकर उसका पति प्रसन्न हुआ। मैं सब समझता हुआ और स्पष्ट बोलता हुआ भी बन्दर ही रहा ॥११८॥

और, मन में स्त्री-चरित्र को सोचकर हँसता तथा आश्चर्य करता रहा ।।११९॥

दूसरे दिन सहेली से मन्त्र सीलकर बन्धुदत्ता, पति के साथ पिता के घर से मथुरा को चली ॥१२०॥

उसके पति ने बन्धुदत्ता की प्रसन्नता के लिए मुझे भी एक नौकर के कन्धे पर बिठाकर माथ ले लिया ॥१२१॥

इस प्रकार, मार्ग में जाते हुए हम सब लोग दो-तीन दिनों में बहुत-से बन्दरों से भरे हुए जंगल में जा पहुँचे ॥१२२॥

मुझे देखकर वे जंगली बन्दर झुण्ड बनाकर बारों ओर से घेरकर मुझ पर टूट पड़े। जिम नौकर के कन्ये पर मैं था, उसे उन्होंने घेर लिया ॥१२३॥

बन्दरों के आक्रमण से व्याकुल वह नौकर भय से मुझे जमीन पर छोड़कर भाग गया। पर, वानरों ने मुझे पकड़ लिया। मेरे प्रेम से बन्धुदत्ता और उसके पति ने लाठियों और हेलों से बन्दरों को भगाने का बहुत प्रयत्न किया, किन्तु वे उनपर विजय न पा सके ।॥१२४-१२६॥

मुझे पकड़कर उन बन्दरों ने मानो मेरे कुकर्मों पर क्रुद्ध होकर मेरे अंग-अंग और रोम-रोम को नोच डाला। गले में पड़े हुए डोरे और शिवजी की कृपा से मैं कुछ बल पाकर उनसे छूटकर भाग गया ।।१२७-१२८।।

उनकी दृष्टि से ओझल होकर मैं घने जंगल में पहुँच गया और जंगल में जंगल होता हुआ क्रमशः इस वन में पहुँच गया ।॥ १२९॥

बन्धुदत्ता में छूटे हुए मुझे इस जन्म में ही परदार-समागम का फल बन्दरपन मिला ॥ १३०॥

इस प्रकार, दुःख के तम से अन्धे हुए और वर्षाकाल में घूमते हुए मुझे असन्तुष्ट देव ने एक दूसरा दुःख भी वे दिया ॥१३१॥

एक बार बैठे हुए मुझे सहसा एक हथिनी ने आकर सूंड़ से लपेट लिया और वर्षा से (भींगी बाँबी जंगल में दीमकों के रहने का स्थान मृत्तिका स्तूप) के अन्दर घुसा दिया ॥१३२॥

मेरे भवितव्य के कारण न जाने वह हथिनी कोई देवता बनकर आई थी कि मेरे लास यत्न करने पर भी मैं उस कीचड़ से जकड़ा हुआ हिल भी नहीं सका ।॥ १३३॥

हृदय को अनेक प्रकार से आश्वासन देने पर और भगवान् का ध्यान करने के कारण मैं मरा नहीं ॥१३४।।

जबतक तुमने मुझे उस मिट्टी के ढेर से नहीं निकाला, तबतक मुझे भूख और व्यास नहीं लगी ।॥१३५॥

ज्ञान प्राप्त कर लेने पर भी मुझ में अभी तक ऐसी शक्ति नहीं आई कि मैं उस वानर-योनि से छुटकारा पाऊँ ॥१३६॥

जब कोई योगिनी उसके मन्त्र द्वारा मेरे गले के डोरे को खोलेगी, तभी मैं मनुष्य बन जाऊँगा ।।१३७।।

यही मेरी कहानी है। मित्र! अब तू बता कि इस अगम्य वन में कैसे आया ? ॥१३८॥

इस प्रकार, वानर-हती सांमस्वामी नामक ब्राह्मण से कहा गया निश्चयदत्त, उसके लिए अपना वृत्तान्त कहने लगा-॥१३९॥

कि कैसे वह विद्याधरी अनुरागपरा के कारण उज्जैन से वहाँ तक चला आया। और पैर्यते जीती हुई- वश की हुई यक्षिणी के द्वारा रात में कैसे यहां पहुंचाया गया-इत्यादि मब वृत्तान्त उमने बन्दर से कहा ॥१४०॥

उसके आश्वयं-भरे समाचार को सुकर अन्दर बना हुआ बुद्धिमान् सोमस्वामी उससे बोला-॥१४१॥

'तुमने भी मेरे ही नमान स्त्री के पीछे कष्ट मांगा है, किन्न याद रखो, किसी की स्त्री और श्री (लक्ष्मी) कभी स्थिर नहीं रही। सन्ध्या के समान क्षाषकः राग (प्रेम) वाली होती है। नदी के समान इक्का हृदय कुटिल (ऊंचा-नीचा) रहता है और नागिन की तरह ये अविश्वसनीय तथा बिजली की तरह चंचल होती है ॥१४२-१४६॥

इसलिए, वह अनुरागपरा विद्याचरी, तुम्हारे ऊपर आसक्त होकर भी किसी विद्याधर-जाति के कामी को पाकर तुभ मनुष्य से विरक्त हो जायगी ॥१४४।।

इसलिए, तुम स्त्री के लिए वह परिणाम-नीरस व्यर्थ प्रयत्न मत करो। हे मित्र ! तुम विवाधरों को पुष्करावती नगरी में न जाओ। यक्षिणी के कन्धे पर चढ़कर अपनी उज्जयिनी नगरी लौट जाओ ।॥ १४५।।४६।।

हे मित्र ! मेरी बात मानो। मैंने भी पहले अपने मित्र की बात नहीं मानी, इसीलिए अब पश्चात्ताप कर रहा हूँ ॥१४७॥

जब मैं बन्धुदत्ता में अनुरक्त था, तब मेरे एक परम स्नेही ब्राह्मण भवशर्मा ने मुझे इसी प्रकार रोका और कहा था-॥१४८॥

मित्र ! स्त्री के वश मत हो। स्त्रियोंका हृदय अत्यन्त दुर्गम होता है। मेरे साथ जो बीती है, उसे कहता हूँ, सुनो' ॥१४९॥

इसी वाराणसी नगरीमें युवती, सुन्दरी, चंचल और गुप्तयोगिनी सोमदा नामकी ब्राह्मणी रहती थी ।॥ १५०॥

वैव-पोग से मेरे साथ उसका एकान्त समागम हो गया। उसी क्रम से मेरा उसका प्रेम बढ़ा ।।१५१।।

एक बार ईर्ष्या से कोष करके मैंने उसे मारा। उस दुष्टा ने क्रोध को छिपाकर उस समय उसे सहन कर लिया ।। १५२॥

दूसरे दिन उसने प्रेम-क्रीडा के बहाने मेरे गले में सूत बाँध दिया और उसी समय में बधिया बैल बन गया ।।१५३।।

बैन्न बने हुए उसने मुझे, बबिया ऊँटों का व्यापार करनेवाले एक व्यापारी के हाथ इच्छित मूल्य लेकर बेच दिया ।॥१५४।।

बोझ लदे हुए और तंग होते हुए मुझे देखकर बन्धमोचनिका नाम की योगिनी को दया आ गई ।।१५५।।

उमने अपनी विद्या के प्रभाव से मुझे सोमदा द्वारा ण्डु बनवाया हुजा समझकर मेरे मालिक की अनुपस्थिति में मेरे गले का डोरा खोल दिया ॥१५६॥

तब मैं मनुष्य हो गया। मेरा मालिक मुझे (बैल को) भागा हुआ जानकर चारों ओर ढूँढता हुआ घूमने लगा ॥१५७।।

मुझे बन्धमोचनिका के साथ घूमते हुए दैवयोग से उस मोमदा ने दूर से देख निया ॥१५८॥

कोष में जलती हुई मोमदा ने मोचनिका योगिनी से कहा कि तूने इस पापी को पशु-योनि से क्यों मुक्त कर दिया? तुझे विक्कार है! इस कुकर्म का फल तुझे कल प्रातःकाल मारकर चखाऊँगी ॥१५९-१६०।।

ऐसा कह‌कर सोमदा के चले जाने पर वह सिद्ध योगिनी बन्धमोचनिका मुझमे बोली-'यह सोमदा काली घोड़ी का रूप धारण करके मुझे मारने के लिए आयेगी और मैं उस समय लाल घोड़ी के रूप में रहूँगी ॥१६१-१६२॥

हम दोनों का युद्ध प्रारम्भ होने पर तुम तलवार लिये हुए पीछे रहकर सावधानी से सोमदा पर प्रहार करना ।।१६३।।।

इस प्रकार, हम दोनों इसे प्रातःकाल यार डालेंगे। तुम सवेरे ही मेरे घर पर आ जाना।' ऐमा कहकर उसने उसे अपना घर दिखा दिया। उसके घर चले जाने पर में अपने घर लौट आया। मैं इसी जन्म में अनेक अद्भुत जन्मों का अनुभव कर चुका था ।।१६४-१६५।।

सवेरे ही तलवार हाथ में लेकर बन्वमोचनिका के घर गया और सोमदा काली घोड़ी के रूप में वहाँ आई ।।१६६।।

उस बग्वमोचनिका ने भी लाल घोड़ी का रूप धारण किया और खुरों एवं दाँतों के प्रहार से उन दोनों का युद्ध प्रारम्भ हुआ। अवसर पाकर मेरे द्वारा प्रहार करने पर वह नीच डाउन (सोमदा) बन्धमोचनिका से मार दी गई ॥१६७-१६८।।

तदनन्तर पशुता की दुर्दशा में छूटे हुए मैंने यह निश्चय किया कि अब मन से भी परस्त्री का मंगम न करूंगा ॥ १६९॥

चंचलता, साहम और डायनपन स्त्रियों के ये तीन दोय, तीनो लोको को भय देनेवाले हैं। इसलिए, डावन की महेली बन्धुदत्ता का पीछा क्यों कर रहे हो, जिसका अपने पति के प्रति प्रेम नहीं है, वह तुमसे क्या स्नेह करेगी ?' ॥१७०-१७१।।

मित्र भवशर्मा ने इस प्रकार कड़े जाने पर भी मैंने उसकी बात नहीं मानी, उसीसे इस गति को पहुंचा हूँ ॥१७२॥

इसीलिए, तुमसे भी कहता हूँ कि तुम भी अनुरागपरा से प्रेम न करो। वह किसी स्वजातीय विद्याधर के मिलने पर तुम्हें छोड़ देगी ॥१७३।

जैसे मधुकरी नये-नये फूलों को चाहती है. उसी प्रकार स्त्री नये-नये यार को चाहती है। अनः, हे मित्र ! तुम्हें भी मेरे ही समान पश्चात्तार करना पड़ेगा ।।१७४।।

सोमस्वामी के प्रेम से भरे ये वचन निश्चयदत्त के हृदय में स्थान न पा सके ।।१७५।।

वह बोला- 'अनुरागपरा मेरे साथ कभी घोला न करेगी, वह विशुद्ध विद्याधरी-वंश में जन्मी है' ।॥ १७६।।

इस प्रकार, उनदोनों के वार्तालाप करते-करते सूर्य मानों निश्चयदत्त का प्रिय कार्य करने के लिए अस्ताचल को चल पड़ा। तदनन्तर रात आने पर अग्रदूती के समान वह श्रृंगोत्पादिनी यक्षिणी उसके समीप आई ॥१७७-१७८॥

मुझे वौद रखना', ऐसा कहते हुए बन्दर से पूछकर निश्चयदत्त, यक्षिणी के कन्ध पर चढ़कर अपनी प्रेयसी के पास चला ॥१७९।।

और, आधी रात के समय, हिमालर पर स्थित, अनुरागारा के पिता की नगरी पुष्करावती में पहुंचा ॥१८०॥

इधर विद्याधरी अनुरागपरा ने भी अपनी विद्या के प्रभाव से निश्चयदत्त का आना जान लिया और उसे लाने के लिए वह अपने पिता की नगरी से बाहर निकल आई ॥ १८१॥

दूसरे चन्द्रमा के समान यह तुम्हारे नेत्रों को आनन्द देनेवाली तुम्हारी सुन्दरी प्यारी आ रही है। तो, अब मैं जाती हूँ, इस प्रकार कहती हुई यक्षिणी निश्चयदत्त को कन्धे से उतारकर और उसे नमस्कार करके चली गई ॥१८२-१८३॥

तब उस विद्याधरी ने भी चिरकालीन उत्कण्ठा से भरकर आलिंगन-चुम्बन आदि से निश्चयदत्त का भलीभाँति अभिनन्दन किया ॥१८४४

अत्यन्त क्लेश के अनन्तर प्राप्त होनेवाले समागम से आनन्दित निश्चयदत्त अनुरागपरा का आलिंगन करते हुए उसके शरीर में प्रवेश करके मानो अपने शरीर में की सुध-बुध खो दी ॥१८५॥

अनुरागपरा, उसके साथ गान्धर्व-विधिसे विवाह करके अपने विद्या-बल से नया नगर बनाकर उसी में उसके साथ रहने लगी ॥१८६॥

उसी की विद्या के प्रभाव में उसके माता-पिता की दृष्टि से छिपाया हुआ निश्चयदत्त, उसके माथ बाहरी नगर में रहने लगा ॥१८७॥

उसके पूछने पर उसने मार्ग में प्राप्त होनेवाले कष्टों का भी वर्णन उससे किया, इन कारण वह उससे अधिक प्यार करने लगी और विविध भोगों से उसे प्रसन्न करने उगी ॥१८८॥

तदनन्तर निश्चयदत्त ने बन्दर बने हुए सोमस्वामी की आश्चर्य जनक कया उसे सुनाई और कहा कि यदि तुम्हारे प्रयत्न से वह पशु-योनि से छूट जाय, तो तुम्हे बहुत पुण्य होगा ॥१८९-१९०।।

ऐसा कहने पर अनुरागपरा उससे बोली- 'यह योगिनियों की मन्त्र-सिद्धियों का काम है। हमारा विषय नही है ॥१९१॥

तो भी मैं तुम्हारे इस प्रिय कार्य को अपनी सखी भद्ररूपा नाम की सिद्ध योगिनी से प्रार्थना करके, सिद्ध करूंगी' ।॥१९२॥

यह सुनकर प्रसन्न वैश्य-पुत्र बोला- 'तुम मेरे उस मित्र को देखो। आओ, उसके पास चले' ॥१९३।।

उसके स्वीकार करने पर दूसरे दिन निश्चयदत्त विद्याघरी की गोद में बैठकर उस बन्दर-वाले वन में गया ।।१९४।।

वन में बन्दर-रूप उस मित्र को प्रिया के साथ प्रणाम करके निश्चयदत्त ने उसका कुशल-मंगल पूछा ॥१९५॥

बन्दर ने कहा-'आज मेरा कुशल हो है कि तू अनुरागपरा के माय मुझसे मिला', ऐसा कहकर बन्दर-रूप सोमस्वामी ने निश्चयदत्त की बधाई दी और उसकी पत्नी को आशीर्वाद दिया। तदनन्तर वे सब एक पत्थर की सुन्दर चट्टान पर बैठ गये ।।१९६-१९७।।

वहाँ बैठकर वे उन बन्दर के लिए चर्चा करने लगे, जैसा कि निश्चयदत्त ने पहले ही अपनी पत्नी से कहा था ॥१९८॥

तदनन्तर अपनी प्रेयसी की गोद में बैठा हुआ निश्वयदत्त बन्दर ने आज्ञा लेकर अपनी पत्नी के नवनिर्मित भवन में लौट गया ।॥ १९९॥

दूसरे दिन, निश्चवदत्त ने फिर कहा- आओ, उस बन्दर-मित्र के पास आज फिर चले।' तव अनुरागपरा बोली- 'आज तुम स्वयं जाओ। मुझ से उड़ने और उतरने की विद्या ले लो ॥२००-२०१।।

उसके ऐसा कहने पर वह निश्चयदत विद्याधरी ने दोनों विद्याएँ प्राप्त करके आकाश में उड़कर उस मित्र बन्दर के पास आया ॥ २०२॥

इधर जब वह अपने भित्र के साथ बैठकर गपशप कर रहा था. उधर अनुरागपरा घर से निकल बाग में आई। जब वह बाग में बैठी थी तब उमरर आकाश से उड़ता हुआ एक विद्याधर-कुमार घूमता हुआ उचर आ निकला। वहीं पर अनुरागपरा को देखकर काम के आवेश में आ गया और उसे मनुष्य-पतिवाली विद्याघरी जानकर उसके समीप आया ।।२०३-२०५।।

उस विद्याधरी ने भी उस सुन्दर विद्याधर-युवक को पास आये देखकर नीचे मुंह किये हुए कौतुक से पूछा- 'तू कौन है और क्यों आया है ॥२०६।।

तब वह बोला- 'है सुन्दरी! मुझे अपनी विद्याओं के ज्ञानवाला राजमंजन नामक विद्याधर समझो ॥२०७॥

मृगनयनी ! वह मैं तुझे देखकर कामदेव द्वारा वश में करके तुझको समर्पित कर दिया गया हूँ' ॥२०८॥

इसलिए, हे देवि ! अब तुम पृथिवी पर रहनेवाले मानव का तबतक परित्याग कर दो, जबतक तुम्हारे पिता को मालूम नहीं होता और अपने समानजातीय मेरा बरण कर लो ॥२०९॥

उसके ऐसा कहने पर कटाक्ष से देखती हुई वह चंचलहृदया विद्याचरी सोचने लगी कि 'यह मेरे लिए उपयुक्त पति है।' ॥२१०॥

तब राजमञ्जन ने उसके हृदय के अभिप्राय को जानकर उसे भार्या बना लिया। एकान्त में दोनों (प्रेमी और प्रेमिका) के एकचित्त होने पर कामदेव किसकी परवाह करता है ? ॥२११॥

तदनन्तर, विद्याधर के चले जाने पर निश्चयदत्त, सोमस्वामी से मिलकर आ गया ॥ २१२॥

उमके लौट आनेपर उस विरक्ता अनुरागपरा ने सिरदर्द का बहाना करके उससे आलियन आदि द्वारा प्रेम-प्रर्दशन नहीं किया ॥२१३॥

उग सरलहृदव प्रेमी निश्चयदत्त ने, उसका बहाना न समझकर वैसे ही वह दिन व्यतीत किया और प्रातःकाल दुःखितचित्त होकर विद्या के बल से पुनः उस बन्दर के समीप गवा ॥२१४-२१५॥

उसके चले जानेपर, अनुरागपरा के बिना रात-भर का जगा हुआ यह कामी विद्याधर फिर उसके पास आया। रात के जागरण से उत्कण्ठित उसे गले से लगाकर वह विद्याधर काम-कीडा में थककर वहीं सो गया ॥ २१६-२१७

वह अनुरागपरा भी रात-भर जगने के कारण गोद में सोये उस प्यारे को विद्याबल से छिपाकर सो गई ।। २१८॥

इवर निश्चयदत्त भी बन्दर के पास पहुंचा। बन्दर ने भी उसका स्वागत करके समाचार पूछा-॥२१९।।

'आज तुम खिन्नमन मालूम हो रहे हो? क्या कारण है, बताओ।' तब निश्चयदत्त उस बन्दर से बोला- 'मित्र ! अनुरागपरा अस्वस्थ हो गई है। उसी से दुःखी हूँ! वह मेरे प्राणों से भी प्यारी है' ॥२२०-२२१॥

उससे इसप्रकार कहा गया वह ज्ञानी बन्दर बोला- 'जाओ, उसकी दी हुई विद्या के प्रभाव से सोई हुई उसे गोद में उठाकर से बनो। तब मैं तुझे एक महान् आश्चर्य दिखाऊँगा ॥२२२-२२३॥

यह सुनकर निश्चयदत्त, आकाश मार्गसे वहाँ गया और सोती हुई अनुरागपरा को धीरे से गोद में उठाकर सोमस्वामी बन्दर के समीप ले आया। पहले मोये और फिर विद्याधरी के द्वारा विद्या के बल से अदृश्य कर दिये गये उस विद्याधर को, विद्याधरी के शरीर से लगे रहने पर भी, निश्चयदत्त ने नहीं देखा ॥२२४-२२६॥

उसके बाद उस दिव्य दृष्टिवाले बन्दर ने निश्चयदत्त को ऐसा योग बताया, जिससे निश्चयदत्त ने विद्याधरी के गले में चिपके हुए विद्याधर को देख लिया। देखते ही 'ओह ! यह क्या ? ऐमा कहते हुए उसे तत्त्वदर्शी वानर ने सब यथार्थ बात बता दी ।। २२७-२२८॥

यह दृश्य देखकर निश्चयदत्त के क्रुद्ध होने पर वह विवाघर आकाश में उड़ गया। और, वह अनुरागपरा भी निद्रा में जागकर अपने रहस्य का भण्डाफोड़ देखकर लज्जा से नीचा मुँह किये बैठ गई ।।२२९-२३०।।

तब रोते हुए निश्चयदन ने कहा- हे पापिन! तेरे ऊपर विश्वास करनेवाले मुझे तुमने क्यों ठग लिया? ॥२३१॥

अत्यन्त चंचल पारे को वाँगने की युक्ति है। परन्तु, पंचन स्त्री-चित्त को जानने या बाँधने की कोई युक्ति नहीं, ॥२३२॥

उसके ऐसा कहने पर वह अनुरागपरा उत्तर दिये बिना ही धीरे-धीरे रोती हुई आकाश में उड़कर अपने घर चली गई ।॥ २३३॥

तब वह वानर सोमस्वामी निश्चयदत्त से बोला- 'मेरे रोकने पर भी जो तुम इस स्त्री के पीछे दौड़ रहे थे, उसी तीव्र प्रेमाग्नि का यह फल है कि आज जल रहे हो। चंचल धन और स्त्री का क्या विश्वास ? ॥२३४-२३५॥

अब व्यर्थ चिन्ता और शोक मत करो। जो होना है, उसे ब्रह्मा भी नहीं बदल सकते ॥२३६॥

बानर से यह सुनकर और शोक एवं मोह को छोड़कर निश्चयदत्त, विरक्त भाव से पित्र की शरण में चला गया ।॥२३७।।

तदनन्तर, वन में उस बन्दर के साथ रहते हुए निश्चयदत्त के पास एक बार दैव योग से मोक्षदा नाम की तपस्विनी आई। उसने प्रणाम करते हुए निश्चयदल से पूछा कि तुम्हारे मनुष्य होते हुए भी यह नुम्हारा मित्र वानर कैसे हुआ, यह आश्चर्य है ! ॥२३८-२३९।।

तब निश्चयदत्त ने पह‌ले अपना और बाद वानर का ममाचार सुनाकर उस तपस्विनी में दोनतापूर्वक कहा- 'यदि आप कोई प्रयोग या मन्त्र जानती हैं. तो मेरे मित्र को पशुता से बचाइए, ।॥२४०।।

निश्चयदन की प्रार्थना सुनकर मोक्षदा योगिनी ने उसे स्वीकार कर, मन्त्र की युक्ति से बन्दर के गले का डोरा खोल दिया। उसके खोलते ही मोमस्वामी बन्दर रूप छोड़कर उसी क्षण अपने यथार्थ मनुष्य-रूप में आ गया ॥२४१॥

तदनन्तर, वह दिव्य प्रभावताली मोक्षदा के बिजली के समान अन्तर्धान हो जाने पर निश्चयदत्त और गोमस्वामी दोनों उग्र तपस्या करते हुए मोक्ष-धाम को प्राप्त हुए ॥२४२॥

इस प्रकार, स्वभाव में चंचला स्त्रियाँ विवेक और वैराग्य देनेवाले अपने दुराचार। वा त्याग नहीं करतीं। पतिव्रता स्त्री तो इनमें विरल ही होती है, जो अपने कुल को उसी प्रकार आनन्दित करती हैं, जैसे नई चन्द्रकला, आकाश को शोभित करती है ॥ २४३॥

इस प्रकार, गोमुख के मूल से इस विचित्र कथा को सुनकर रत्नप्रभा के साथ नरवाहनदत्त बहुत सन्तुष्ट हुबा ॥२४४।।

महाकवि श्रीसोमदेव भट्ट-विरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का तृतीय तरंग समाप्त

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