5705. || पञ्चम कहानी || राजपुत्र श्रृंगभुज और कपशिक्षा की कथा
5705. || पञ्चम कहानी || राजपुत्र श्रृंगभुज और कपशिक्षा की कथा
पञ्चम तरंग
राजपुत्र श्रृंगभुज और कपशिक्षा की कथा
इस प्रकार, मरुभूति के कथा सुनाने पर सेनापति हरिशिख ने नरवाहह्नदत्त के सन्मुख कहा- ।।१।।
'यह सत्य है, कुलीन स्त्री के लिए पति ही एवामात्र गति है। इस प्रसंग में एक आश्चर्यमयी कथा सुनें-॥२॥
इस भूनल पर वर्धमान नामक जो नगर है, उसमें वीरभुज नाम का राजा था। उसकी रानियों में गुणवरा नाम की महारानी उसे प्राणों से भी अधिक प्यारी थी ॥३-४॥
उस राजा की एक सौ रानियों में एक को भी पुत्र (मन्तान) नहीं था ।॥५
इम कारण राजाने श्रुतवर्धन नामक वैद्य को बुलाकर पूछा कि क्या ऐसी कोई त्रऔषधि है कि जिसने पुत्र की उत्पत्ति हो महे ॥६॥
यह मुनकर वैद्य ने कहा- 'महाराज! में इस कार्य को सिद्ध करता हूँ; किन्तु यदि आप मेरे लिए एक जंगली बकरा मंगा दे ॥आ
वैय की बात सुनकर राजा ने द्वारपाल को आज्ञा देकर जंगली बकरा मंगा दिवा ॥८॥
उम बकरे को राजा के रसोईदारी को देकर वैद्य ने, रानियों के लिए स्वादिष्ठ रस (शोरबा) बनवाया ॥९॥
राजा सब रानियों को एक स्थान पर आने की आज्ञा देकर स्वयं भगवान् की पूजा करने चला गया और सारी रानियां एक स्थान पर एकत्र हो गई ।।१०।।
इनमें केवल एक महारानी गुणपरा अनुपस्थित रही; क्योंकि वह उस समय राजा के साथ देव-पूजन में व्यस्त थी ॥११॥
सब रानियों के एकत्र होने पर वंय ने, उनके पीने के लिए चूर्ण से मिला हुआ संपूर्ण मांस-रस उनमें में बाँट दिया ॥१२॥
तुरन्त ही राजा पूजन करके रानी गुणवरा के साथ वहां आया और सभी मांस-रस को समाप्त देखकर वैद्य में बोला- 'बहुत बुरा हुआ कि तुमने गुणवरा के लिए कुछ भी रस बचाकर नहीं रखा। जिसके लिए यह सब कुछ किया गया, उसे ही तुम भूल गये? - ।।१३-१४।।
ऐसा सुनकर वैद्य को लज्जित और स्तब्ष देखकर राजा ने पाचक से कहा- 'क्या उस बफरे का कुछ भी मांस शेष हैं ? ॥१५॥
'हाँ, केवल दो सींग बचे हैं', पाचकों के ऐसा कहने पर वैद्य बोला- 'ठीक है, सींगों के अन्दर का मांस तो बहुत उत्तम होगा, उसे पकाओ।' ऐसा कहकर और सींगों के मांस से रस
बनवाकर वैद्य ने चूर्ण मिलाकर रानी गुणवरा को दिया ॥१६-१७।।
उस ओषधि के सेवन से राजा की निन्यानब्बे रानियाँ एक साथ ही गर्भवती हुई और साथ ही उन्होंने पुत्रों का प्रसव किया ॥१८॥
सबसे अन्त में रस-पान करने के कारण रानी गुणवरा ने सम्पूर्ण शुभलक्षणों से युक्त पुत्र को सबसे पीछे प्रसव किया ॥१९॥
यह बालक श्रृंग में लगे मांसरम से उत्पन्न हुआ था, इसलिए राजा ने इसका नाम श्रृंगभुज रक्त दिया ॥२०॥
क्रमशः भाइयों के साथ बड़ा होता हुआ शृंगनूज, रूप में अवस्था में छोटा होने पर भी गुणों में उनसे बहुत बड़ा मालूम होता था ।॥२१॥
क्रमशः वह राजकुमार शृंगभुज, रूप में कामदेव के नमान, धनुर्वेद में अर्जुन के समान ओर बल में भीममेन के समान हुआ ॥२२॥
इस प्रकार, गुणवाले तुत्र के माथ उमको माता गुणवरा को मन्तुष्ट देखकर राजा वीरभुज की अन्य रानियाँ उससे डाह करने लगी ।॥ २३।।
इनमें मबसे दुष्ट रानी अवशोलेला ने इस स्थिति को देखकर सभी रानियों से मिलकर एक सम्मति की और राजा के घर आने पर झूठे ही मुँह को मलिन बना लिया और राजा के पूछने पर बड़ी ही कठिनाई ने बोली 'आर्यपुत्र! तुम घर के भीतर का कलंक कैसे सहन करते हो? दूसरों की बुराई की रक्षा करते हो और उस (बुराई) से अपनी रक्षा क्यों नहीं करते हो ? ॥२४-२६।।
यह जो सुरक्षित नाम का रनिवास का जवान रक्षक है. उसपर तुम्हारी रानी गुणवरा आसक्त है।॥ २७७।
कंचुकियों द्वारा सुरक्षित रनिवास में अन्य किसी व्यक्ति के आने की तो सम्भावना नहीं है, इसलिए यह रानी उसी सुरक्षित से फंस गई है ॥२८॥
यह बात सारे अन्तःपुर में प्रसिद्ध हो गई है, यह सुनकर राजा चिन्तित हुआ और विचार करने लगा ॥२९॥
उसके बाद एक-एक रानी के पास गया और क्रमशः उन सब से पूछा। उन सभी रानियों ने कपट करके एक ही बात कही, जो पहले से निश्चित कर चुकी थी ।॥३०॥
तब उस बुद्धिमान् और सहिष्णु राजा ने सोचा- 'उन दोनों के सम्बन्ध में ऐसी बात की सम्भावना तो नहीं है, किन्तु प्रवाद ऐसा हो गया है। इसलिए बिना पूर्ण निश्चय के मुझे यह रहस्य नहीं बोलना चाहिए। इस समय अन्तिम स्थिति देखने के लिए दोनों को रोकना चाहिए ।।३१-३२।।
ऐसा निश्चय करके दूसरे दिन, राजा ने रनिवास के अध्यक्ष सुरक्षित को दरबार में बुलाकर कोष प्रदशिन करते हुए कहा- ॥३३॥
'रे पापी ! मैंने पता लगाया है कि तूने ब्रह्महत्या की है। इसलिए, तीर्थयात्रा किये विना तुझे में देवना नहीं चाहता' ।॥३४॥
यह सुनकर घबराये हुए 'महाराज! मैंने ब्रह्महत्या नही की? ऐसा कहते हुए मुरक्षित से राजा ने फिर कहा- ॥३५॥
'बृष्टता न करो। पापों का नाश करनेवाले कश्मीर देश को जाओ। वहां विजय-क्षेत्र और पवित्र नन्दिक्षेत्र है ॥ ३६।।
और वहाँ वराह-क्षेत्र है। इन क्षेत्रों को भगवान् विष्णु ने पवित्र किया है। जिस देश में बहती हुई जाह्नवी (गंगा) वितस्ता नाम-धारण करती है, जहाँ उत्तर-मानस नामक पवित्र स्यत्र है। इन तीर्थों की यात्रा करके पवित्र होकर मेरे पास आना-ऐसे नहीं ॥३७-३८॥
ऐसा कहकर उस बेचारे सुरक्षित को राजा वीरभुज ने, तीर्थयात्रा के बहाने युक्तिपूर्वक दूर भेज दिया ॥३९॥
तब स्नेह-क्रोथ और चिन्ता में बुक्त राजा गुणवरा रानी के समीप गया। वहाँ उसे विक्षचित्त देखकर व्याकुल रानी ने पूछा कि 'हे आर्यपुत्र ! आज अकस्मात् तुम दुःखी क्यों हो ? ॥४०-४११॥
यह सुनकर राजा बीरभुज रानी से बनावटी बातें बोला- "हे महारानी ! किसी महाज्ञानी विद्वान् (ज्योतिषी ने आकर मुझे कहा--।।४२।।
'हे राजन् ! रानी गुणवरा को तुम कुछ समय के लिए भू-गृह (तहत्वाने) में रख दो और स्वयं ब्रह्मचारी रहो ॥४३॥
यदि ऐसा न करोगे, तो तुम्हारा राज्य नष्ट हो जायगा और रानी की मृत्यु हो जायगी। ऐसा कहकर वह ज्ञानी चला गया। उसीसे मुझे खेद हो गया है" ।॥४४
राजा के इस प्रकार कहने पर पतिवता रानी गुणवरा प्रेम और भय से व्याकुल होकर बोली-॥४५॥
'महाराज! यदि ऐसा है, तो आप मुझे आज ही भू-गृह में क्यों नहीं बन्द कर देते । मैं धन्य हूँगी, यदि मेरे प्राणों से भी तुम्हें सुख प्राप्त हो सके ॥४६॥
भले ही मेरी मृत्यु हो जाय, किन्तु आपको दुःख प्राप्त न हो; क्योंकि स्त्रियों को इस लोक और परलोक में, पति ही परम गति हैं ।॥४॥
उसके इस प्रकार के वचन सुनकर आँसू बहाता हुआ राजा सोचने लगा कि इस रानी में या उस सुरक्षित में मुझे पाप की शंका नहीं है।॥४८॥
उस मुरक्षित को मैंने शंका-रहित और प्रमन देखा। दुःख है। तो भी इस निन्दा के सम्बन्ध में निर्णय करता हूँ ।॥४९॥
ऐसा सोचकर अत्यन्त दुःखी राजा ने रानी से कहा- 'तब मैं यहीं रनिवास में भू-गृह वनवाता हूँ। रानी की स्वीकृति मिलने पर राजा ने वही एक सुगम (आने-जाने में सरल) भू-गृह बनवाया और रानी को उसमें रख दिया ॥५०-५११॥
दुःखी और कारण पूछते हुए पुत्र शृंगभुज को रानी ने राजा से कही गई बात कहकर धीरज बंधाया ॥५२॥
रानी गुणवरा ने राजा का हित समझकर उग भू-गृह को स्वर्ग समान समझा; क्योंकि पतिव्रता स्त्रियों को अपना सुख, सुत्र नहीं है. पति का मुख ही उनका सुख है।॥५३॥
यह सब होने पर दूसरी रानी जयशोलेखा ने अपने निर्वासभुज नामक पुत्र को एकान्त में कहा- 'राजा ने हमारी सौत गुणवरा को तो गड्ढे में डाल दिया। अब इसका लड़का भी निकल कर कहीं चला जाय, तो बहुत आनन्द हो इसलिए, बेटे ! तुम अपने भाइयों से मिलकर ऐसी युक्ति सोचो ।॥५४-५६०
माता से इस प्रकार कहा गया निर्वामभुज, ईर्ष्यापूर्वक अन्य भाइयों के साथ उपाय सोबने लगा ।।५७।।
एकबार वे सभी राजपुत्र, अपने अन्त्र-गस्त्रों की परीक्षा के लिए राजभवन के सामने के मैदानमें एकत्र हुए और उन्होंने भवन पर बैठे हुए एक बगुले को देखा ।।५८।।
उस विकृत पक्षी को देखकर आश्चर्य करते हुए राजकुमारों को देखकर उस मार्ग से जाते हुए किसी ज्ञानी मिलू ने कहा- हे राजकुमारो! यह बगुला नहीं है। बगले के रूप में, नगरों का नाण करता हुआ यह अग्निशिख नामका राक्षस है ॥५९-६०।।
अतः, इसे बाण से बींध दो, जिससे कि यह यहाँ से भाग जाय।' क्षपणक से ऐसा सुनकर उन निन्यानब्बे राजपुत्रों ने उसपर अपने-अपने तीर बलाये, फिर भी बगुला नहीं मरा। तब वह दिगम्बर (नंगा) साधु बोला- 'तुम लोगों का छोटा भाई श्रृंगभुज, बगुले को मार मकता है, इसलिए यह एक अच्छा घनुप ले ॥६१-६३॥
उसी समय वह क्रूर (जालिम) निर्वासभुज माँ की बातों को यादकर और उस बवम्र को उपयुक्त समझकर मोचने लगा--।।६४।।
कि 'यह अवसर है श्रृंगभुज को यहाँ से निकलवाने का। अतः, इसे पिता का धनुष-वाण देते हैं ।॥६५॥
उसके सुनहले वाण से बीधा हुआ बगुला यदि उड़ जायगा, तो यह भी उस बाण को लाने के लिए पीछे-पीछे भागेगा ॥६६॥
और, जब इस राक्षस बगुले को खोजते-खोजते नहीं प्राप्त कर सकेगा, तो लज्जा और संकोच-वग यहाँ न आकर इधर-उधर घूमता रहेगा ॥६७॥
ऐमा सोनकर उस पापी निर्वामभुज ने बगुले को मारने के लिए श्रृंगभुज को पिता के धनुष-बाण लाकर दे दिये ॥६८॥
उमे लेकर बलवान् श्रृंगभुज ने, रत्नों के पंखवाले उस सुनहले वाण से बगुले को बींध दिया ॥६९॥
बाण से विधा हुआ चगुला शरीर में घुसे हुए बाण को लिये और रक्त की धार बहाता हुआ वहां से उड़कर भागा ॥७०।।
तब वह दुष्ट निर्वासभुज और उससे प्रेरित राजकुमार उस वीर श्रृंगभुज से बोले- ॥७१॥
'हमारे उस पिताजी के सुनहले बाण को दो, नहीं तो हम सब तेरे सामने ही शरीरों का त्याग कर देंगे।॥७२॥
क्योंकि, उसके बिना पिता हम सबको देश से निर्वासित कर देंगे। उसी बाण के जैसा दूसरा नया बाण नहीं बनाया जा सकता' ।॥७३।।
उस विकृत पक्षी को देखकर आश्चर्य करते हुए राजकुमारों को देखकर उस मार्ग से जाते हुए किसी ज्ञानी मिलू ने कहा- हे राजकुमारो! यह बगुला नहीं है। बगले के रूप में, नगरों का नाण करता हुआ यह अग्निशिख नामका राक्षस है ॥५९-६०।।
अतः, इसे बाण से बींध दो, जिससे कि यह यहाँ से भाग जाय।' क्षपणक से ऐसा सुनकर उन निन्यानब्बे राजपुत्रों ने उसपर अपने-अपने तीर बलाये, फिर भी बगुला नहीं मरा। तब वह दिगम्बर (नंगा) साधु बोला- 'तुम लोगों का छोटा भाई श्रृंगभुज, बगुले को मार मकता है, इसलिए यह एक अच्छा घनुप ले ॥६१-६३॥
उसी समय वह क्रूर (जालिम) निर्वासभुज माँ की बातों को यादकर और उस बवम्र को उपयुक्त समझकर मोचने लगा--।।६४।।
कि 'यह अवसर है श्रृंगभुज को यहाँ से निकलवाने का। अतः, इसे पिता का धनुष-वाण देते हैं ।॥६५॥
उसके सुनहले वाण से बीधा हुआ बगुला यदि उड़ जायगा, तो यह भी उस बाण को लाने के लिए पीछे-पीछे भागेगा ॥६६॥
और, जब इस राक्षस बगुले को खोजते-खोजते नहीं प्राप्त कर सकेगा, तो लज्जा और संकोच-वग यहाँ न आकर इधर-उधर घूमता रहेगा ॥६७॥
ऐमा सोनकर उस पापी निर्वामभुज ने बगुले को मारने के लिए श्रृंगभुज को पिता के धनुष-बाण लाकर दे दिये ॥६८॥
उमे लेकर बलवान् श्रृंगभुज ने, रत्नों के पंखवाले उस सुनहले वाण से बगुले को बींध दिया ॥६९॥
बाण से विधा हुआ बगुला शरीर में घुसे हुए बाण को लिये और रक्त की धार बहाता हुआ वहां से उड़कर भागा ॥७०।।
तब वह दुष्ट निर्वासभुज और उससे प्रेरित राजकुमार उस वीर श्रृंगभुज से बोले- ॥७१॥
'हमारे उस पिताजी के सुनहले बाण को दो, नहीं तो हम सब तेरे सामने ही शरीरों का त्याग कर देंगे।॥७२॥
क्योंकि, उसके बिना पिता हम सबको देश से निर्वासित कर देंगे। उसी बाण के जैसा दूसरा नया बाण नहीं बनाया जा सकता' ।॥७३।।
यह सुनकर वीर श्रृंगभुज, उन कपटियों से बोला 'धीरज रखो। घबरानो मत। डरो मत। मैं उस नीच राक्षस को मारकर उस बाण को ला दूंगा। ऐसा कहकर श्रृंगभुज अपने धनुष-बाण लेकर जमीन पर गिरती हुई रक्त-धारा का अनुसरण करता हुआ चछा ॥७४-७६।।
इस प्रकार, प्रसन्न होकर अन्य राजपुत्रों के अपनी माताओं के समीप चले जाने पर वह श्रृंगभुज जिस दिशा को बगुला भागा याः उस दिशा की ओर बगुले के पीछे-पीछे जंगल में चला गया ।॥ ७७৷৷
उसने उस घोर जंगल में बगुले को खोजते हुए उसके भीतर एक महान् नगर को ऐसे देला जैसे मानों पुष्य-रूपी वृक्ष का भोग के लिए आया हुआ फल हो ।॥७८॥
उस नगर के उद्यान में एक वृक्ष के नीचे बैठे हुए उसने आश्चर्यमय रूपवाली जाती हुई कन्या को देखा ।।७९।।
विरह में प्राण हरण करनेवाली और मंगम में अमृतमयी वह कन्या विधाता ने विचित्र रूप से, विष और अमृत के सम्मिश्रण में बनाई थी ॥८०॥
धीरे-धीरे ममीप आई हुई और अमृत बरसानेवाली आँखों से देखती हुई उससे राजकुमार ने पूछा ॥८१॥
'हे मृगनयनी ! इस नगर का क्या नाम है? यह नगर किसका है और तू कौन है? और यहाँ कैसे आई है।' यह सब कहो, ।॥८२॥
तब मुख को कुछ टेढ़ी की हुई, भूमि पर आँखें गड़ाई हुई वह सुन्दर दाँतोंवाली कन्या मीठी और स्नेह-भरी भाषा में बोली- ॥८३॥
'यह धूमपुर नामक नगर है। यह समस्त सम्पत्तियों का घर है। इस नगर में राक्षसों में श्रेष्ठ अग्निशिख नामक राक्षस रहता है।॥८४॥
मैं उसी के नाम के अनुसार रूपवाली रूपशिखा नाम को कन्या हूँ। तुम्हारे बसाधारण रूप से आकृष्ट होकर यहाँ आई हूँ ॥८५॥
अब तुम बताओ कि तुम कौन हो?' और यहां कैसे आये हो ? उसके ऐसा कहने पर श्रृंगभुज ने अपना, अपने पिता का और बगुले पर बाण बलाने आदि का सारा वृतान्त कह सुनाया और बताया कि वह पिता का सुनहला बाण लाने के लिए घूमपुर आया है।॥८६-८७।।
तब उसके विचार को जानकर रूपशिखा उससे बोली कि तुम्हारे समान धनुर्धारी तीनों लोक में नहीं है ।॥८८।।
क्योंकि तुमने बगुला बने मेरे पिता को भीषण बाण से बींध दिया। उस सोने के बाण को मैंने खेलने के लिए पिता से ले लिया है।॥ ८९॥
मेरे पिता को उसके मन्त्री महादंष्ट्र ने विशल्यकरणी आदि ओषधियों से तुरन्त अच्छा कर दिवा है ॥९०।।
तो मैं पिता को सूचित करके तुम्हें शीघ्र अन्दर लिवा ले जाती हूँ। हे आर्यपुत्र ! पैने अपने को तुम्हें दे डाला है।॥९१॥
ऐगा कहकर और श्रृंगभुज को बैठाकर वह रूपशिखा पिता अग्निशिख के पास गई ॥९२॥
'हे पिना ! श्रृंगनुज नाम का एक राजकुमार यहाँ आया है। वह रूप, शील (चरित्र), अस्था और गुणों में अगाधारण व्यक्ति है। मालूम होता है कि वह कोई पृथ्वी पर अवतीर्ण देवता का अंश है. मानन नहीं है। यदि यह मेरा पति न होगा, तो मैं निश्चय ही प्राण त्याग कर दूंगी' ॥९३-९४।।
रूपशिखा से इस प्रकार कहे गये उसके पिता ने कहा- 'बेटी! मनुष्य तो हमारे भक्ष्य हैं। की भी पदि तुम्हारा आग्रह है, तो वहीं ठीक है। तुम उस राजकुमार को यहीं लाकर दिखाबो ।' ऐमा सुनकर रूपशिखा शृंगभुज के समीप गई और जो कुछ किया था, उसे कहकर पिता के समीप ले गई। अग्निशिख ने भी उसे विनवी देखकर सत्कार किया और बोला- ॥९५-९७।।
'हे राजकुमार ! मैं तुम्हें इस रूपशिस्था को देता हूँ, यदि तुम कभी मेरी बात को इधर-उधर न करोगे ॥९८॥
ऐसा कहते हुए अग्निगिव से विनयी श्रृंगभुज बोला- ठीक है, तुम्हारी आज्ञा के यचनों का उल्लंघन कभी न करूंगा ॥९९॥
शृंगभुत्र से इस प्रकार कहा गया प्रसत्र अग्निशिख बोला- 'अब उठो और स्नानगृह से स्नान करके आओं ॥१००॥
उसे ऐसा कहकर रूपशिखा से बोला 'तू भी जा और सब बहनों को लेकर शीघ्र बा' इस प्रकार, अग्निशिख से कहे गये श्रृंगभुज और रूपशिखा दोनों, 'जो आशा' कहकर बाहर निकले ॥१०१-१०२॥
वाहर आकर रूपशिखा ने श्रृंगभुज से कहा- 'आर्यपुत्र ! मेरी एक सौ कुँबारी बहनें हैं। ॥१०३।।
हम सब एक समान रूप और वेश भूषावाली है। हम सब के गले में एक समान हार पड़े हुए हैं।॥१०४।।
इसलिए, मेरा पिता तुमको ठगने के लिए सभी लड़कियों को एकत्र करके ऐसा कहेगा कि इनमें से तुम जिसे चाहते हो, उसे जर लो ॥१०५।।
मैं उसके इस कपट-व्यवहार को जानती हूँ। नहीं तो, यह हम सब को एकत्र क्यों कर रहा है ॥१०६॥
कन्याओं के वरण के समय मैं अपने कण्ठहार को सिरपर रख लूंगी। तब तुम मुझे पहचान-कर मेरे गले में वनमाला डाल देना ॥१०७७॥
मेरा पिता मूर्ख है, उसकी बुद्धि विवेकशालिनी नहीं है। इसीलिए, मुझ पुत्री के साथ भी ऐसा व्यवहार करता है। जातिगत स्वभाव कहाँ जायगा ॥१०८।।
अतः, तुम्हें उगने के लिए यह जो-जो भी कहेगा, उसे स्वीकार कर तुम मुझसे कहना-'आगे जो कर्तव्य है, में कहेंगी ॥१०९॥
ऐमा कहकर रूपशिश्वा आनी बहनों के पास गई। 'ऐसा ही करूँगा' - यह कहकर श्रृंगभुज नहाने चला गया ॥ ११०॥
तदनन्तर रूपशिखा अपनी बहनों के साथ पिना के पास आई। उधर सेविकाओं द्वारा म्नान कराया गया श्रृंगन्ज भी आ गया ॥ १११।।
तब अग्निशिख ने 'इन कन्याओं में जिसे तुग चाहते हो, उसे यह माला दे वो', ऐसा कहकर श्रृंगभुज को एक वनमाला दी ॥११२॥
उस राजकुमार ने भी मालः को लेकर, पहले ही सिर पर हार की लड़ियों को रखी हुई रूप शिखा के गले में डाल दिया ।॥ ११३॥
तब अग्निशिख, शृंगभुज और रूपशिखा से बोला- 'कल प्रातःकाल तुम दोनों का विवाह-मंगल कर दूंगा' ।॥११४।।
ऐसा कहकर उन दोनों को तथा अन्य कन्याओं को उसने अपने-अपने घर जाने की आज्ञा दी और पल-भर में ही श्रृंगभुज को बुलाकर यों बोला- ॥११५॥
'जाओ, इन दो बैलों की जोड़ी लेकर नगर के बाहर ढेर के रूप में रखे हुए तिलों की एक सौ खारी को खेत में बो आगो ॥११६।
यह सुनकर और 'ठीक है' ऐसा कहकर पवराया हुआ श्रृंगभुज रूपशिखा के पास आकर सब वृत्तान्त बोला। तब वह भी उससे बोली ॥११७॥
'आर्यपुत्र ! तुम इस सम्बन्ध में जरा भी सेद न करो। तुम खेत की ओर जाओ। मैं अपनी माया से सब सिद्ध कर देती हूँ ॥११८॥
यह सुनकर राजकुमार गया और जबतक तिलों के बोने की तैयारी करता है। तबतक देखना है कि उसकी प्रेयसी की माया के बल से सारी भूमि जुत गई और सारे तिल वो दिये गये हैं ।॥११९-१२०।।
राजपुत्र ने जाकर अग्निशिख से खेत जोतने और तिल बोये जाने का समाचार सूना दिया तब वह घत्तं और ठग राक्षम फिर बोला- ॥१२१॥
'मुझे तिलों के बोने से कोई प्रयोजन नहीं है। तुम जाकर उन्हें एकत्र करके फिर मे ढेर लगा दी। यह सुनकर राजकुमार ने फिर मारा हाल रूपशिता से कहा-'रूपशिखा ने उस भूमि में अनगिनत चीटियाँ उत्पन्न करके उनसे उन तिलों को बिनवाकर अपनी माया से ढेर करा दिया ॥१२२-१२३।।
यह देखकर राजपुत्र ने अग्निशिम्व से जाकर कहा कि वे निल फिर ढेर कर दिये गये ॥१२४।।
तब वह मूर्ख ठग फिर बोला- 'यहाँ से दक्षिण की ओर आठ कोस पर शिव का एक मन्दिर है। उसमें मेरा प्यारा भाई धूमशिन्त्र रहता है।॥१२५-१२६॥
तुन अभी वहाँ जाओ और देव-मन्दिर के सामने खड़े होकर मेरी ओर से कहना कि 'हे धूमशिल ! अपने अनुचरों के साथ तुम्हें निमन्त्रण देने के लिए मुझे अग्निशिख ने भेजा है। तुम शीघ्र आओ। कल प्रातःकाल मेरी कन्या रूपशिखा का विवाहोत्सव है।' इतना कहकर तुम आज ही लौटकर यहां आओ, और प्रातःकाल मेरी कन्या रूपशिया से ब्याह करो ।। १२७-१२९।।
उस पानी अग्निगिल में इमप्रकार कहा गया राजकुमार 'ऐसा ही होगा' कहकर रूपशिला के पास आया और ये सारी बातें उससे कहीं ।। १३०।।
उस पतिव्रता ने उसे मिट्टी, पानी, काँटे और आग एवं अपना अच्छा घोडा देकर कहा- ।।१३१।।
'इस अच्छे घोड़े पर चढ़कर, उस देव-मन्दिर को प्रणाम कर तथा घूमशिस को मेरे पिता की ओर से निमंत्रत करके तुम दौड़ते हुए इस घोड़े से शीघ्र आ जाओ। आते हुए गरदन पुमाकर बार-बार पीछे की ओर देखना ॥ १३२-१३३॥
यदि तुम्हें पीछा करता हुआ घूमशिख दीख पड़े, तो तुम अपने पीछे उसके मार्ग में मिट्टी फेंक देना ॥१३४॥
उसके अनन्तर भी यदि वह पीछा करता हुआ दीले, तो तुम अपने पीछे के मार्ग में पानी छोड़ देना। फिर भी आवे, तो उन कांटों को पीछे फेंक देना और फिर भी पीछा करे, तो बाग को पीछे की ओर फेंकना ॥१३५-१३६।।
ऐसा करने से तुम विना क्लेश के यहाँ आ जाओगे। सन्देह न करो, जाओ। तुम आज मेरी विद्या का बल देखोगे ॥१३७।।
रूपशिखा से ऐसा कहा हुआ श्रृंगभुज, मिट्टी, पानी, आग आदि लेकर घोड़े पर सवार होकर जंगल में स्थित मन्दिर में पहुंचा ।॥ १३८०॥
उस मन्दिर में उसने बोई ओर गौरी एवं दाहिनी ओर गणेश से युक्त विश्वेश्वर शिव को देखा और प्रणाम करके अग्निशिव का सन्देश सुनाया ॥१३९॥
और, धूमशिव को निमन्त्रण की बात कहकर राजकुमार, घोड़ा दौड़ाते हुए लौट चला ॥ १४०॥
क्षण-भर में ही जब उसने गरदन घुमाई, तो देखा कि घूमशिस पीछे-पीछे आ रहा है।॥१४११।
तब उसने अपने पीछे उस राक्षस के मार्ग में मिट्टी फेक दी। फेंकी हुई मिट्टी से मार्ग में बड़ा-सा पहाड़ बन गया ॥ १४२॥
उस पहाड़ को लाँचकर आते हुए राक्षस को देखकर राजकुमार ने पीछे पानी फेंक दिया ॥१४३॥
उस पानी के फेंकने में मार्ग में लम्बी-लम्बी लहरों से लहराती हुई एक नदी बहने लगी ॥१४४॥
उस नदी को तैरकर भी उस राक्षम के पुनः आने पर शृंगभुज ने शीघ्र ही काँटों को बिखेर दिया। उन काँटों से मार्ग में काँटों का गहन जंगल बन गया ।॥१४५॥
उस राक्षस के वन से भी निकलकर पीछा करने पर. राजकुमार ने आग फेंकी। उससे गारा मार्ग और जंगल जलने लगे ॥१४६॥
खाण्डव-वन के समान जंगल को जलते हुए देखकर डरा हुआ घूमशिख थककर जहाँ से आया था, वहीं लौट गया ॥ १४७॥
उस समय रूपशिखा की माया से मोहित घूमशिख पैरों से ही दौड़ रहा था, आकाश-मार्ग से आना भूल गया था ।।१४८॥
तदनन्तर अपनी पत्नी रूपशिला के विद्या-वैभव की प्रशंसा करता हुआ राजकुमार निर्भय होकर धूमपुर पहुंच गया ।॥१४९॥
उसके बाद रूप शिखा को घोड़ा वापस करते हुए प्रसन्न हृदया उससे जैसी घटना हुई, कह सुनाई। तदनन्तर वह अग्नि शिव के पास गया ।॥१५०॥
अब उसने अग्निशिख से कहा कि 'मैंने तुम्हारे भाई धूमशिल को निमन्त्रित कर दिया। ऐसा कहते हुए श्रृंगभुज को घबराया हुआ अग्निशिल बोला कि यदि तुम वहाँ गये थे, तो वहाँ का कुछ चिह्न (निशानी) बताओ ऐसा कहते हुए उस कुटिल राक्षस से श्रृंगभुज बोला ।। १५१-१५२॥
'सुनो !' मैं उस मन्दिर का चिह्न बतलाता हूँ। उसमें शिवजी के बायें पार्वती और दाहिने गणेशजी विराजते हैं।॥१५३॥
यह मुनकर विस्मित अग्निशिख सोचने लगा कि आदचयं है कि मेरा भाई, इस मनुष्य को क्यों खा न सका। अतः मैं समझता हूँ कि यह मनुष्य नहीं, निश्चय ही कोई देवता है। इसलिए, यह मेरी कन्या के लिए उपयुक्त वर है ।।१५४-१५५।।
ऐसा मोचकर उसने उस सकल राजकुमार को रूपशिखा के पास भेज दिया; किन्तु उसे बाण मारकर अपना अंग-भंग करनेवाला नहीं समझ सका ।। १५६।।
विवाह के लिए उत्सुक श्रृंगभुज ने खा-पीकर रूपशिखा के साथ किसी तरह रात बिताई ।॥१५७॥
प्रातःकाल ही अग्निशिख ने. अपने वैभव के अनुसार दान-दहेज आदि देकर अग्नि के साक्ष्य में रूपशिखा का विवाह कर दिया ॥ १५८॥
कहाँ राजकुमार और कहाँ राक्षस की बेटी-इन दोनों का विवाह, एक विचित्र दैवी घटना ही है ॥ १५९॥
वह राजपुत्र उस प्यारी राक्षस-कन्या को प्राप्त करके इस प्रकार शोभित हुआ, जैसे हंस, कीचड़ से उत्पन कमलिनी को पाकर शोभित होता है ।।१६००।
इस प्रकार राक्षस की सिद्धि द्वारा प्राप्तं भोगों को भोगता हुआ राजपुत्र श्रृंगभुज रूपशिखा के साथ श्वशुर-गृह में रहने लगा ।। १६१।।
कुछ दिनों के व्यतीत होने पर उसने एकबार एकान्तमें रूपशिता से कहा- 'प्रिये ! चलो, वर्धमान नगर को चलें। वह हमारी राजधानी है। उससे इस प्रकार दूर रहना मेरे लिए सहन नहीं किया जा सकता; क्योंकि मेरे ऐसे व्यक्ति का धन मान ही है।। १६२--१६३॥
इसलिए, न त्यागने के योग्य भी इस अपनी जन्मभूमि को मेरे लिए छोड़ दे। अपने पिता से कह दे और उस सुनहले बाण को अपने हाय में कर ले' ।॥१६४।॥
श्रृंगभुज के यह कहने पर रूपशिखा बोली- हे प्राणप्रिय! तुम जो आज्ञा देते हो, उसे मैं अभी करती हूँ ।।१६५।।
जन्मभूमि क्या है? और बन्धु-बान्धव क्या हैं? मेरे तो तुम्ही संब-कुछ हो। सदाचारिणी स्त्रियों के लिए अपने पति के सिवा और क्या गति है ।।१६६।।
यहाँ से प्रस्थान की बात पिता से न कहनी चाहिए। बह हम लोगों को नहीं छोड़ेगा। इसलिए, उस क्रोवी के बिना जाने ही बल देना चाहिए ।॥ १६७॥
यदि सेवकों से समाचार जानकर पीछे आयेगा भी, तो मैं उस मूर्ख पागल को अपनी माया से ठग लूंगी' ।॥१६८॥
रूपशिन्वा की बातें सुनकर दूसरे दिन श्रृंगभुज, पिता का आधा राज्य पाई हुई और रत्नों से भरी हुई पिटारी साथ ली हुई एवं राजकुमार के सोने के बाण को अभिकृत की हुई उस रूपशिखा के साथ, उसीके शरवेग¹ नामक घोड़े पर चढ़कर, बागों में घूमने टहलने के बहाने अपने मेवकों को ठगकर, वर्धमानपुरी की ओर चल पड़ा ।। १६९-१७१।।
उन दोनों के कुछ दूर निकल जाने पर उनके जाने का समाचार जानकर राक्षस अग्निभिन्त्र, कोव से उनके पीछे आकाश मार्ग से दौड़ा ॥ १७२।।
उसके आने के वेग का शब्द दूर ने सुनकर रूपशिखा श्रृंगभुज से बोली- 'त्रिय ! मेरा पिता, हम लोगों को लौटाने के लिए आया है। तुम तो यहाँ निःसंक होकर बैठो। देखो में कैसे इसे ठगती हूँ ।॥ १७३-१७४।।
मैं अपनी विया से तुझे ऐना छिपा दूंगी कि वह थोड़े के साथ तुझे नहीं देल सकेगा ।' ऐसा कहकर रूपशिखा ने घोड़े से उतरकर पुरुष का रूप बना लिया ।।१७५॥
'यहाँ एक बड़ा राक्षस आ रहा है, तू कुछ देर चुप बैठ'- ऐसा कहकर लकड़ी काटने के लिए वन में आये हुए एक लकड़हारे से कुल्हाड़ी लेकर लकड़ी काटने लगी। उसे देखकर मूर्ख राक्षस आकाश से उतरा और पूछने लगा--॥१७६-१७८।।
क्यों भाई ! तुमने इस रास्ते से जाते हुए स्त्री और पुरुष को देखा है? तब पुरुष-वेशधारिणी वह रूपशिला कुछ खिन्नन्सी हो कर बोली- 'परिश्रम के पसीने से आँखें बन्द रहने के कारण हम दोनों ने किसी को नहीं देखा। 'हम बाज राक्षसराज अग्निशिख को जलाने के लिए अधिक लकड़ियाँ काटने में व्यस्त हैं।' यह सुनकर वह परममूर्ख राक्षस सोचने लगा-बओह ! मैं कैसे मर गया, यदि ऐसा है, तो उस कन्या से क्या करूँगा। जाता हूँ, अपने घर पर अपने आदमियों से पूछता हूँ ॥१८९-१८२॥
ऐसा सोचकर वह अग्निशिख तुरन्त घर को लौटा और उसकी लड़की हँसती हुई पहले के समान स्त्री-वेश में आ गई और पति के साथ आगे चली ॥१८३॥
कुछ ही क्षणों में मुस्कराते हुए अपने कुटुम्बियों से मृत्यु का निश्चय करके राक्षस फिर लौटा वह अपने को जीवित समझकर और मुनकर प्रसन्न था ।। १८४॥
भयंकर शब्द के कारण राक्षस-पिता को फिर आते हुए जानकर घोडे से उतरी रूपशिखा, पति को अपनी माया से छिपा दिया और गस्ते में आते हुए किसी पत्रवाहक के हाथ से पत्र लेकर फिर पुरुष बन गई ।।१८५-१८६।।
इतने में ही राक्षस ने आकर उससे पूछा कि क्या तुमने स्त्री के साथ जाते हुए किमी पुरुष को देखा है ? ॥१८७।।
तब पुरुवरूपा रूपशिखा लम्बी साँस भरती हुई बोली- शीघ्रता के कारण मैंने किसी को नहीं देखा। आज युद्ध में शत्रु से मारे गये और अन्तिम श्वास लेते हुए राक्षसराज अग्निशिख से उच्छृंवत का से रहनेवाले अपने भाई धूमशिल के पास राज्य-ग्रहण करने के लिए पत्र लेकर भेजा गया मैं दूत हूँ ॥१८८-१९०।।
यह सुनकर अग्निशिल घबराया और सोचने लगा कि 'क्या मुझे शत्रुओं ने मार डाला ?' यह जानने के लिए वह फिर अपने घर को लौटा ॥१९१॥
'कहाँ मारा गया ? मैं तो स्वस्थ हूँ ऐसा उसने नहीं सोचा। ब्रह्मा की मूर्ख सृष्टि भौ एक महान् आश्चर्य है ।॥ १९२॥
घर पहुँचकर, लोगों को हँस। नेवाले समाचार को सुनकर मोह से थका हुआ राक्षस फिर कन्या की खोज में नहीं लौटा ॥१९३॥
वह रूपशिखा, इस प्रकार पिता को ठगकर और पति को लेकर चली गई। पतिव्रता स्त्रियाँ, पति के हित को छोड़कर और कुछ नहीं जानतीं ।॥१९४।।
तब श्रृंगभुज भी पत्नी के साथ शीघ्र ही उस आश्चर्यमय घोड़े पर चढ़ा हुआ शीघ्र ही वर्धमानपुर पहुंचा ।।१९५॥
वहाँ रूपशिखा के साथ आते हुए पुत्र शृंगभुज का पता पाकर उसका पिता वीरभुज प्रसन्न होकर उसकी अगवानी करने के लिए नगर से बाहर निकला ॥१९६॥
वहाँ पर सत्यभामा के साथ विष्णु के समान, रूपशिखा के साथ श्रृंगभुज को देखकर राजा ने मानों नई राज्य-सम्पत्ति प्राप्त की ।। १९७।।
घोड़े से उतरकर पत्नी के माय पैरों पर गिरते हुए पुत्र को उठाकर, आलिंगन करके आनन्द के आंसुओं से भरे नेत्रों में शोक-शमन, रूपी मंगल करता हुबा राजा हर्ष के साथ राजधानी में प्रविष्ट हुआबा ॥१९८-१९९॥
'तू कहाँ चला गया था? राजा से इस प्रकार पूछने पर शृंगभुज ने आरम्भ से सारा वृत्तान्त सुनाया। और अपने भाइयों को बुलाकर निर्वासभुज को वह सोने का बाथ लौटा दिया ।। २००-२०१।।
यह सब समाचार जानकर और पूछकर राजा वीरभुज अन्य सभी पुत्रों से विरक्त हो गया और केवल श्रृंगभुज को ही एकमात्र पुत्र मानने लगा ॥ २०२॥
उस बुद्धिमान् राजा ने सोचा कि इसे द्वेष के कारण इन भाइयों ने भगा दिया या ॥ २०३॥
इन भाई कहलाने वाले पापी शत्रुओं ने, जैसे इस निरपराध के साथ किया, वैसे ही इसकी भाता के साथ इनकी माताओं ने द्वेष के कारण पाप किया है।॥२०४।।
इसकी माता गुणवरा निर्दोष है, उसे झूठा कालंकित किया गया है। तो, देर क्यों करू ? आज ही इसका निश्चय करता हूँ ।॥२०५॥
ऐसा सोचकर सारे दिन पूर्व दिनों के समान कार्य करके राजा पता लगाने के लिए अयशोलेवा नाम की रानी के पास गया। २०६।।
राजा के आकस्मिक आगमन से अति प्रसन्न अयशोलेखा को राजा ने अधिक शराब पिला दी। इस कारण रतान्त-काल में सोई हुई वह रानी राजा के जागते रहने पर नशे में प्रलाप करने लगी ॥२०७॥
यदि मैं गुणवरा को झूठा कलंक न लगाती, तो क्या आज राजा इस प्रकार स्वयं मेरे पास आता ॥२०८॥
इस प्रकार, सोई हुई उस बुष्टा के वचन सुनकर और निर्णय पर पहुंचकर राजा क्रोष से उठकर चला गया ।।२०९।।
जाकर अपने भवन में खवासों को बुलाकर बोला- 'अमी गुणवरा को तहखाने से निकाल कर और स्नान करा शीघ्र मेरे पास लिवा लाजो ॥२१०।।
बाज का यही ठीक समय है। शानी विद्वान् ने इसी समय तक की अवधि दी थी' यह सुनकर 'जो आज्ञा' ऐसा कहते हुए वे खवास स्नान और शृंगार की गई रानी गुणवरा को शीघ्र राजा के पास लिवा लाये ॥ २११-२१२॥
तब उन दोनों (राजा-रानी) ने वियोग समुद्र को तैरते हुए पार कर परस्पर आलिंगन में भी तृप्त न होकर रात बिताई ॥२१३।।
तब राजा ने प्रसन्न होकर रानी से अपने पुत्र श्रृंगभुज का वृत्तान्त सुनाया। तदनन्तर जगी हुई अपशोलेवा ने वाक्-काट करते हुए राजा को नया हुआ जानकर अत्यन्त शोक प्राप्त किया ॥२१४-२१५।।
प्रातः काल ही राजा ने रूपशिला के साथ श्रृंगभुज को गुणवरा के पास बुलवाया ॥२१६।।
वह भी अपनी माता को भू-गृह (तहन्नाने) से निकली हुई देखकर प्रसन्न हुजा और अपनी पत्नी के नाथ उसने माता के चरणों में प्रणाम किया ।।२१७॥
दूर भागं को पार करके आये हुए पुत्र को तथा बहू को पाकर गुणवरा एक हर्ष से दूसरे हर्ष (दूने हर्ष) को प्राप्त हुई ॥२१८॥
तब पिता की जाज्ञा से श्रृंगभुज ने रूपशिखा का किया हुआ सारा वृत्तान्त विस्तार के साथ माता को सुनाया ॥२१९॥
तब अतिप्रसन्न रानी गुणवरा ने कहा- 'बेटा! इस तुम्हारी रूपशिखा ने तुम्हारे लिए वा-क्या नहीं किया ? ॥२२०॥
इस आश्चर्यमय चरित्रवाली रूपशिला ने, अपने जीवन, देश और बन्धुओं को छोड़कर ये तीनों तुम्हारे लिए दे डाले ॥२२१॥
भाग्यवश, यह कोई देवी, तुम्हारे लिए ही अवतीर्ण हुई है, जिसने सभी पतिव्रताओं के मस्तक पर पैर रख दिया' ।॥ २२२॥
रानी के ऐसा कहने पर और राजा के उसकी बातों का समर्थन करने पर रूपशिखा ने विनय से अपना सिर नीचे झुका लिया ।। २२३॥
इतने में ही बयशोलेखा रानी के द्वारा झूठा कलंकित किया गया २निवास का अध्यक्ष सुरक्षित तीर्थयात्रा करके जा पहुंचा ॥२२४॥
प्रतिहार से सूचित और पैरों पर गिरे हुए उस प्रसन्नचित्त सुरक्षित को सच्ची बात जानते हुए राजा वीरभुज ने बहुत सम्मानित किया ॥ २२५॥
सारी दुष्ट रानियों को बुलाकर वहीं पर राजा ने उस सुरक्षित से कहा- 'जाओ, इन सब को भू-गृह में डाल दो।' यह सुनकर उन सब को ले जाकर भू-गृह (तहखाने) में डाल देने पर बया-बती रानी गुणवरा राजा के चरणों में गिरकर प्रार्थना करने लगी- हे आर्यपुत्र ! तुम फिर मुझे ही भू-गृह में डाल दो, प्रसन्न हो जाओ! मैं इन डरी हुई सौतों को नहीं देख सकती' ॥२२६-२२८॥
इस प्रकार, प्रार्थना करके महारानी ने उन्हें बन्धन से छुड़ा लिया। उच्च कोटि के व्यक्तियों की विरोधियों पर कृपा ही बदला लेने के रूप में होती है।॥ २२९॥
रानी गुणवरा का अनिष्ट चाहती हुई भी उसके द्वारा बचाई गई सभी रानियाँ लज्जित होकर अपने-अपने भवन को लौट गई ॥ २३०।।
राजा उदारहृदया उस गुणवरा रानी को भी वहुत मानने लगा और उस पत्नी के कारण अपने-आपको पुष्यवान् समझने लगा ।॥२३१॥
तब युक्तिपूर्वक निर्वासित करने के निमित्त निर्वासनुज आदि दूसरे पुत्रों को बुलाकर उस राजा ने यह बनावटी बात कही-॥२३२॥
'मैंने सुना है कि आप अधम वणिकों ने एक पचिक को मार डाला है। इसलिए, आप सभी तीर्थ में घूमने के लिए चले जायें, यहाँ न रहें ॥२३३॥
यह सुनकर वे राजकुमार गजा को (निदॉप होने का) विश्वास नहीं दिला पाये। क्योंकि, प्रभु के हठ पकड़ लेने पर किसको विश्वास दिलाया जा सकता है ? २३४॥
तत्पश्चात् शूगंभुज ने भाइयों को जाते हुए देखा और उसकी आँखें दया से भर आई। तब उसने अपने पित्ता से प्रार्थना की-॥ २३५॥
'पिता जी, मेरे एक अपराध को आप क्षमा कर दें। इनपर कृपा करें।' यह कहकर वह उस राजा के चरणों पर गिर पड़ा ॥२३६॥
वह राजा भी उस पुत्र को राज्य-भार के उठाने में समर्थ और बचपन में भी यश और दया का आश्रय जानकर समझने लगा कि यह बचपन में गोवर्धन पर्वत के भार को उठानेवाले यशोदा माता से आश्रित भगवान् कृष्ण का अवतार है ॥२३७॥
गंभीर हृदयवाले उस राजा ने बेटे को बचाने के लिए उसकी प्रार्थना मान ली। उन सभी भाइयों ने भी उस भाई को अपना प्राणदाता मान लिया ॥२३८॥
इस स्थिति में सभी प्रजाओं ने भी उस शूगंभुज के ऐसे विशिष्ट गुण को देखा और उसके प्रति उनका अनुराग दृढमूल हो गया ।॥२३९॥
तब दूसरे दिन उस पिता राजा बीरभूज ने उसके दूसरे जेठे भाइयों के रहने पर भी गुणों से ज्येष्ठ उस श्रृंगभुज को ही युवराज-पद पर अभिषिक्त किया ।।२४०।।
और तब, वह श्रृंगराज युवराज-पद पर अभिषिक होकर पिता की आज्ञा लेकर सभी प्रकार की सेना के साथ दिग्विजय के लिए चला गया ॥२४१॥
वह अपने बाहु-बल से समग्र पृथ्वी के राजमण्डल को जीत कर वापस चला आया, साथ ही अपनी कौतिश्री को भी दिग्दिगन्त में बिखेर आया ।।२४२॥
तत्पश्चात् कृतकृत्य वह श्रृंगभुज अपने विनम्र भाइयों के साथ राज्य-भार को संभालता हुआ निश्चिन्त होकर भोग-सुख में लगे हुए माता-पिता को अनुरंजित करता रहा, ब्राह्मणों को दान देता रहा और अर्थसिद्धि के समान रूपवती रूपशिखा के साथ दिन बिताने लगा ॥२४३-२४४॥
इस प्रकार, पतिव्रता स्त्रियाँ सभी अवस्थाओं में अपने पतियों की अनन्य भक्ति से उपासना करती है, जैसे ये दोनों सास-पतोहू गुणवरा और रूपशिखा करती थीं ।॥२४५॥
इस प्रकार, नराहनदत्त हरिमुख के मुख से इस कथा को सुनकर रत्नप्रभा के साथ मिलकर 'साधु-साधु' कहता हुआ अत्यन्त संतुष्ट हुआ ॥२४६॥
तब वह उठकर और शीघ्र दैनिक कृत्य करके अपनी पत्नी के साथ पिता वत्सराज के पास गया। खान्पीकर अपराह्न में संगीत से दिन बिताकर उसने प्रियतमा के साथ अपने अन्तःपुर मे रात बिताई ॥२४७॥
महाकवि श्रोसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का पंचम तरंग समाप्त
1. तीर के समान तेज चलनेवाला।
Comments
Post a Comment