5707. || सप्तम कहानी || नरवाहनहत की कथा (क्रमागत); नागार्जुन की कथा
5707. || सप्तम कहानी || नरवाहनहत की कथा (क्रमागत); नागार्जुन की कथा
सप्तम तरंग
नरवाहनहत की कथा (क्रमागत)
तवनन्तर, किसी एक दिन रत्नप्रभा के साथ मन्त्रियों से विविध बातें करते हुए नरवाहन-दत्त ने, बाहर भवन के चौक में अकस्मात् किसी पुरुष का रोना-चिल्लाना सुना ॥१-२॥
यह क्या है' ? - इस प्रकार आकर किसी के सेविकाओं से पूछने पर ये बोलीं-'महाराज ! यह धर्मगिरि नामक कंचुकी चिल्ला रहा है। उसे किसी मूत्रं मित्र ने यहाँ बाकर कह दिया कि तुम्हारा भाई तीर्थयात्रा के लिए गया था। वह किसी देश में मर गया ।।३-४।।
यह सुनते ही 'मैं राजभवन में हूँ' इस बात का ध्यान न रखकर शोक से विह्वल वह चिल्लाने लगा। जब उसे कुछ लोग उसके घर पर ले गये हैं ।॥५॥
यह सुनकर युवराज, उसके दुःख से दुःखी हुए और रानी रत्नप्रभा भी लिन-सी होकर बोली- 'प्रिय भाई के मरने का दुःख मचमुच असह्य होता है। खेद है, विधाता ने उस व्यक्ति को अजर और अमर क्यों नहीं बना दिया? ॥६-७७॥
रानी के इस प्रकार वचन सुनकर मरुभूति बोला- 'महारानी ! मनुष्यों में बजर और अमर होना कैसे सम्भव है। इस प्रसंगमें यह कथा सुनो, - ॥८॥
नागार्जुन की कथा
चिरायु नाम के नगर में चिरायु नाम का राजा था। वह चिरायु समस्त सम्पत्तियों का घर था ।।९।।
उस राजा का मन्त्री नागार्जुन बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन्न, परम दयालु, दानी और विज्ञानवेत्ता था ।॥१०॥
अनेक ओवधियों की युक्तियों को जाननेवाले रमायनों के निर्माण में सिद्धहस्त उस मन्त्री ने, अपने विज्ञान-बल से, अपने को तथा राजा को, वृद्धावस्था-रहित और विरंजीवी बना दिया था ।।११।।
किमी समय मन्त्री नागार्जुन के पुत्रों में सबसे प्यारा पुत्र कालवश होकर मर गया ।।१२।।
नागार्जुन को उसका ऐसा मन्ताप हुआ कि उसने मनुष्यों की मृत्यु को सदा के लिए समाप्त करने के लिए (उन्हें अमर बनाने के लिए। अपने तप और दान के प्रभाव से अमृतमय ओषधियों से अमृत बनाने का प्रयत्न प्रारम्भ किया ।॥१३॥
अन्य सभी ओपत्रियों का उसने संग्रह कर लिया। केवल एक ओषधि मिलाना वाकी बच रहा था। नागार्जुन जब उन ओषधि की प्रतीक्षा कर ही रहा था कि तबतक इन्द्र को इस बात का पता लग गया ।।१४।।
इन्द्र ने देवताओं से सम्मति करके देव-वैद्य अश्विनीकुमार को इस प्रकार आदेश दिया कि तुम पृथ्वी पर जाकर मेरी ओर से नागार्जुन से कहा- ॥१५॥
कि 'तुमने मन्त्री होकर भी यह कौन-सी अनीति अपनाई है कि अब तुम प्रजापति (ब्रह्मा) को भी जीतना चाहते हो ? ॥१६॥
उसने मरण-धर्मवाले मानवों की सृष्टि की थी। अब तुम अमृत बनाकर उन्हें अमर (देवता) बनाना चाहते हो ? ॥१७॥
ऐसा करने पर देवता और मानव में क्या अन्तर रह जायगा। यज्ञ करनेवाले और यज्ञ में भाग लेनेवालों के अभाव में संसार की स्थिति (मर्यादा) भंग हो जायगी ॥१८॥
इसलिए, हमारे कहने से इस अमृत-साधना को बन्द करो। नहीं तो क्रुद्ध देवता तुम्हें अवश्य ही शाप देंगे ॥१९॥
जिस पुत्र के शोक के कारण तुम यह प्रयत्न करते हो, वह तुम्हारा पुत्र तो यहाँ स्वर्ग में है।' इन्द्र के ऐमा कहने पर वे दोनों ही उनके आगमन से प्रसन्न नागार्जुन के पास आये और उसे इन्द्र का सन्देश सुनाया ॥२०-२१॥
और, यह भी कहा कि तुम्हारा पुत्र स्वर्ग में देवताओं के साथ आनन्दपूर्वक रह रहा है। तब नागार्जुन लिन्न होकर मोचने लगा-॥२२॥
यदि में इन्द्र की बात न मानूं, तो देवताओं के शाप की बात तो दूर रहे, क्या ये अश्विनी-कुमार ही अभी शाप नहीं दे सकते हैं? ॥२३॥
इसलिए, अमृत-निर्माण की योजना जाने दी जाय। मेरा पुत्र तो अपने पूर्व पुष्यों के प्रभाव से अशोचनीय गति को प्राप्त हो गया है ॥२४॥
ऐसा सोचकर नागार्जुन अश्विनीकुमारों से बोला- 'मैंने इन्द्रकी आज्ञा शिरोधार्य की। अब अमृत बनाने की क्रिया समाप्त करता हूँ। यदि आप दोनों न आते, तो पाँच दिनों में ही अमृत-निर्माण होने पर सारी पृथ्वी अजर-अमर हो जाती' ।॥२५-२६॥
ऐसा कहकर नागार्जुन ने उनके सामने ही लगभग तैयार हुए अमृत को पृथ्वी में गाड़ दिया ॥२७॥
तब प्रसन्न होकर अश्विनीदेव ने नागार्जुन से पूछकर और स्वर्ग में जाकर इन्द्र को मारा वृनान्त मुनाया और देवराज इन्द्र भी प्रसन्न हुआ ॥२८॥
इधर नागार्जुन के स्वामी राजा चिरायु ने अपने जीवहर नामक पुत्र को युवराज-पद पर अभिषिक्त कर दिया। अभिषेक किये हुए प्रसन्नचिस और प्रणाम करने के लिए आये हुए पुत्र को प्रसन्न देखकर उसकी माता बनपरा बोली ॥२९-३०।।
'बेटा ! इस यौवराज्य को प्राप्तकर क्या झूठे ही प्रसन्न हो रहे हो। यह राज्य का क्रम तो तपस्या से भी नहीं चल सकता ।॥३१॥
बेटा ! तुम्हारे पिता के अनेक पुत्र युवराज होकर चले गये। किसी ने भी राज्य नहीं पाया। सब ने केवल दुर्दशा ही पाई ॥३२॥
नागार्जुन ने इस राजा को ऐसा रसायन दिया है कि उसे अपनी अवस्था का यह आठवाँ सैकड़ा बल रहा है। अभी जाने कितने ही युवराजों को अपने से अल्पायु करते हुए इस राजा की उम्र के कितने संबाड़े व्यतीत होंगे' ।॥३३॥
यह सुन दुःखित पुत्र को देखकर माता फिर बोली- 'यदि तुम्हें राज्य करना है, तो एक उपाय यह करो। यह दाता मन्त्री नागार्जुन, प्रतिदिन प्रातः स्नान, सन्ध्या, पूजन आदि से निवृत्त होकर भोजन के समय यह घोषणा करता है कि कौन पाचक क्या-क्या चाहता है? किसे क्या दिया जाय ? तुम उस समय उसने जाकर कहें। कि 'तुम अपना सिर मुझे दो।' वह सत्यवक्ता के सिर कटकर मर जाने पर उम के शोकने राजा भी मर जागा या जंगल में चला जायगा । तब तुम राज्य प्राप्त कर सकोगे और दूसरा कोई उपाय नहीं है। माता का यह सुझाव सुनकर युवराज मन्तुष्ट हुना ॥३४-३०९।।
'ऐमा ही करूंगा' इस प्रकार कहकर उसने यही निश्चय किया। दुःख है कि राज्य का लोभ अपने आत्मीय बन्धु-बान्धवों के स्नेह का अतिक्रमण कर जाता है ॥४०॥
तदनन्नर दूसरे दिन राजकुमार जीवहर, भोजन के समय नागार्जुन के घर गया ।।४१।।
'कौन क्या चाहता है ?' मन्त्री के इस प्रकार कहते ही राजकुमार ने उसका सिर मांगा ॥४२॥
'बेटे ! आश्चयं है कि मेरे इस सिर से तुम क्या करोगे? यह तो मांस, हड्डी और बालों का ढेर है। इसका तुम्हारे लिए क्या उपयोग है? तो भी यदि तुम्हें इससे प्रयोजन है. तो इसे ले लो।' ऐसा कहकर मन्त्री ने उसके आगे अपनी गरदन झुका दः ॥४३-४४॥
रसायनों से मुश्क (मजबूत) उसके गले पर प्रहार करते हुए युवराज की कितनी ही तल-बारे टुकड़े-टुकड़े हो गई। तबतक इस सभाचार को सुनकर आते हुए और शिरोदान के लिए रोकते हुए राजा चिरायु से नागार्जुन ने कहा- ।॥४५-४६॥
हे राजन् ! मैं पूर्वजन्म का स्मरण करने वाला हूँ। मैंने निम्यानओ बार प्रत्येक जन्म में अपना सिर दान किया है। यह सौवाँ मेरा जन्म भी सिर देने के लिए ही हुना है। इसलिए, तुम कुछ न बोलो। मेरे याचक को विमुख न होना चाहिए ॥४७-४८॥
तो अब मैं तुम्हारे पुत्र को अपना सिर देता हूँ। केवल तुम्हारा मुँह देखने के लिए ही मैने इतना विलम्ब किया है ।॥४९।।
ऐसा कहकर राजा से आलिंगन कर और औषधालय से एक चूर्ण मंगाकर राजकुमार की तलवार पर उसने लेप कर दिया ।॥५०॥
तब उस तलवार के प्रहार से मन्त्री की गरदन इस प्रकार कट गई, जैसे नाल से कमल कटकर अलग हो जाता है ॥५१॥
तदनन्तर रोने और बिल्लाने का बड़ा कोलाहल उठने पर और राजा के प्राण-त्याग के लिए उद्यत होने पर आकाश से अशरीरी वाणी हुई ।॥५२॥
'राज्न ! आत्महत्या का यह अकार्य न करो। यह तुम्हारा मित्र नागार्जुन शोचनीय नहीं है। उसका जन्म अब न होगा! वह बुद्ध के समान गति को प्राप्त हो गया' ।॥५३॥
यह सुनकर राजा चिरायु मरने से विमुख हुआ और शोक में सब कुछ दान देकर और राज्य का त्याग करके वन में चला गया ।॥५४।।
वन में रहता हुआ वह कुछ समय बाद तप से परमगति को प्राप्त हुआ और उसका पुत्र जीवहर राज्य पर बैठा ।।५५।।
उसके राज्य प्राप्त करने पर पिता के वध से असन्तुष्ट नागार्जुन के पुत्रों ने राष्ट्र-विप्लव कराकर शीघ्र ही उसका नाश करा दिया ॥५६।।
उसके शोक से उसकी माता धनपरा का हृदय फट गया और यह भी मर गई। सच है, अनार्य (अनुचित) पथ से चलनेवालों का कल्याण कैसे हो सकता है? ॥५७।।
तब राजा के मुख्यमन्त्रियों ने दूसरी रानी के गर्भ से उत्पन्न शतायु नामक पुत्र को राजगद्दी पर बैठाकर राज-कार्य का संचालन किया ॥५८॥
इस प्रकार नागार्जुन के द्वारा मनुष्यों की मृत्यु को दूर करनेवाले प्रयत्न का देवताओं ने सहन नहीं किया और वह नागार्जुन भी मर गया ।॥५९॥
इस प्रकार, अनिवार्य दुःखों से भरा हुआ यह संसार अनित्य है। इसमें जो कुछ विधाता को इच्छित नहीं है, उसे सैकड़ों यत्नों से भी नहीं किया जा सकता ।॥६०॥
इस प्रकार, कथा कहकर मरुभूति के मौन हो जाने पर नरवाहनदत्त अपने मन्त्रियों के साथ उठकर दैनिक कार्यों में लग गया ॥६१।।
महाकवि श्रीसोमदेवमट्ट-विरचित कयासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का सप्तम तरंग समाप्त
Comments
Post a Comment