5606. || षष्ठम कहानी || कलिंगसेना की कथा; विष्णुदत्त और उसके सात साथियों की कथा; ऋषिकन्या कवलीगर्भा की कथा; नाई और राजा की कथा;

5606. || षष्ठम कहानी || कलिंगसेना की कथा; विष्णुदत्त और उसके सात साथियों की कथा; ऋषिकन्या कवलीगर्भा की कथा; नाई और राजा की कथा; 

षष्ठ तरंग

कलिंगसेना की कथा (चालू)

मन्त्री योगन्धरायण का कूटनीति-प्रपंच

तदनन्तर, दूसरे दिन प्रातःकाल प्रतीक्षा करते हुए वत्सराज से धूर्त (चतुर) मन्त्री यौगन्धरायण ने आकर निवेदन किया- 'महाराज, आपके लिए कल्याणदायक कलिगसेना का विवाह-महोत्सव, आज ही क्यों न देख लिया जाय' ।॥१-२॥

यह सुनकर राजा ने कहा- 'मेरे मन में भी यही है। उसके बिना में घड़ी-भर मी नही रह सकता' ।।३।।

ऐसा कहकर उस सरल स्वभाववाले राजा ने सामने खड़े हुए प्रधान द्वारपाल को आज्ञा देकर गणको (ज्योतिषियों) को बुलवाया ॥וו

महामन्त्री द्वारा पहले से ही सिद्ध किये गये उन गणकों ने राजा के पूछने पर कहा कि 'महाराज के लिए आज से छह महीने के बाद (पश्चात्) अनुकूल लग्न आता है ।।५।।

यह सुनकर कृत्रिम श्रोध प्रकट करता हुआ मन्त्री यौगन्धरायण 'ये मूर्ख हैं' ऐसा कहकर राजा से कहने लगा- "जिस गणक को महाराज ने 'ज्ञानी है' ऐसा कहकर सम्मानित किया था; वह आज नहीं आया। महाराज उसे बुलाकर पूछें" ।॥६-७।।

तब मन्त्री की बात सुनकर वत्सराज ने, संशय भरे चित्त से, उस ज्योतिषी को बुलवाया ।।८।।

समय टालने के षड्यन्त्र में, मन्त्री यौगन्धरायण उसे भी पहले ही सम्मिलित कर चुका था, अत. उसने भी राजा के लग्न पूछने पर छह मास के पश्चात् का समय ही बतलाया ॥९॥

तब व्याकुल भाव प्रकट करते हुए यौगन्धरायण ने राजा से कहा- 'महाराज, अव आदेश दीजिए कि क्या किया जाय?' ।।१०।।

उत्कंठित होने पर भी शुभ लग्न को चाहनेवाला राजा कुछ सोचकर कहने लगा- 'कलिग-मेना से भी पूछना चाहिए, वह क्या कहती है, देखो' ।॥११॥

'जो आशा' ऐसा कहकर और गणकों को साथ लेकर मन्त्री यौगन्धरायण कलिंगसेना के पास गया ।।१२।।

उसके द्वारा स्वागत सत्कार किया गया यौगन्धरायण उसके रूप को देखकर सोचने लगा कि इसे प्राप्त कर राजा इसके व्यसन में सब कुछ छोड़ देगा ।।१३।।

और उससे बोला, 'मैं तुम्हारा विवाह-लग्न स्थिर करने के लिए गणकों के साथ आया हूँ। अतः तुम अपना जन्म-नक्षत्र बताओ' ।।१४।॥

कलिंगसेना के सेवकों द्वारा जन्म-नक्षत्र बताने पर पहले ही समझाये हुए गणकों ने झूठा विचार करके कहा कि 'लग्न छह महीने के पश्चात् मिलता है, इसके पूर्व नहीं'। यही बात फिर उससे भी कही ।।१५-१६।।

कलिगसेना के बहुत लम्बे समय आगे का लग्न सुन व्याकुल होने पर उसके प्रतीहार ने कहा- ।।१७।।

'सबसे पहले शुभ लग्न देखना चाहिए, जिससे कि इन दोनों (दम्पति) का कल्याण हो। विलम्ब और शीघ्रता का उतना महत्त्व नहीं' ॥१८॥

वृद्ध प्रतीहार के वचन सुनकर सभी उपस्थित लोगों ने उसकी बात का समर्थन करते हुए कहा कि इन्होंने ठीक ही तो कहा है ।।१९।।

यौगन्धरायण ने भी कहा कि 'यदि अशुभ लग्न मे विवाह हुआ तो हमारे सम्बन्धी कलिंगदत्त को भी खेद होगा' ।॥२०॥

तब कलिगसेना भी विवश होकर बोली- 'जैसा आप सब लोग उचित समझें, करे'-इतना कहकर वह चुप हो गई ॥२१॥

कलिंगसेना की इस बात को लेकर और उससे जाने की आज्ञा प्राप्त कर मन्त्री यौगन्धरायण गणकों के साथ राजा के पास गया ।॥२२॥

वहाँ जाकर वत्सराज से उसी प्रकार सब निवेदन करके और उसे युक्तिपूर्वक समझा-बुनकर वह अपने घर गया ।॥२३॥

समय व्यतीत करने की उसकी योजना सफल होने पर और अवशिष्ट कार्य की सिद्धि के लिए उसने अपने मित्र योगेश्वर नामक ब्रह्मराक्षस को बुलाया ।।२४।।

वह ब्रह्म राक्षस पहले से ही सिद्ध था, अतः उसके घ्यान करते ही उपस्थित हो गया ।। २५॥

राक्षस ने मन्त्री को प्रणाम करते हुए पूछा कि 'मुझे क्यों स्मरण किया है?' ॥२६॥

तब मन्त्री यौगन्धरायण ने राजा को विपत्ति देनेवाले कलिगसेना के समस्त वृत्तान्त को कहकर फिर कहा- 'मित्र, मैंने समय तो टाल दिया है। अभी छह महीने हैं। इस बीच छिपे-छिपे कलिगसेना का हाल-चाल देखो' ।॥२७॥

विद्याधर, सिद्ध आदि भी उसे निश्चित रूप से चाहते हैं। कारण यह कि तीनों लोको में उसके समान सुन्दरी दूसरी नहीं है ॥२८॥

यदि वह किसी सिद्ध या विद्याधर के साथ संगम करे, तो तुम देखना इससे हमार। शुभ होगा ॥२९॥

रूप परिवर्तित्तत कर आये हुए दिव्य कामियों का भी ध्यान रखना; क्योंकि दिव्य व्यक्ति, रूप परिर्वात्तत करने पर भी, शयन करने के समय अपने वास्तविक रूप में आ जाते हैं ॥३०॥

इस प्रकार तुम्हारी आँखों से हम उसके दोष देख सकेंगे। इससे राजा को उसके प्रति वैराग्य उत्पन्न हो जायगा और हमारा कार्य सिद्ध हो जायगा ।॥३१॥

मन्त्री के इस प्रकार कहने पर, वह ब्रह्मराक्षस बोला- 'मैं किसी उपाय से उसे क्यों न नष्ट कर दूँ या मार डालूं ? ' ।॥३२॥

यह सुनकर महामन्त्री यौगन्धरायण बोला- 'ऐसा न करना चाहिए; क्योंकि इससे महान् अधर्म होगा' ।।३३।।

जहाँ धर्म की रक्षा करते हुए मनुष्य अपने इच्छानुसार चलता है, या कार्य करता है, वहाँ पर धर्म ही उसकी सहायता करता है।॥३४॥

इसलिए मित्र, तुम उसके निजी दोष को न देखो, जिससे कि मैं तुम्हारी मित्रता के कारण राजा का कल्याण-कार्य सिद्ध कर सकूं ।॥ ३५॥

मन्त्री द्वारा इस प्रकार आदेश देने पर ब्रह्मराक्षस कलिगमेना के भवन में जाकर छिपकर बैठ गया ।। ३६।।

इसी बीच कर्कालगमेना की सखी मयामुर की पुत्री सोमप्रभा उसके पास फिर आई ।।३७।।

उसके कलिगमेना से रान की बात पूछने पर ब्रह्मराक्षस के मुनते हुए कलिंगसेना ने सारा वृत्तान्त मयामुर की पुत्री को सुनाया. जिसे ब्रह्मराक्षस मुन रहा था ।॥३८॥

तब मोमप्रभा बोली- 'आज मै दिन के प्रथम प्रहर मे ही तेरे पास आ गई थी, किन्तु तुम्हारे पाम यौगन्धरायण को देखकर छिपी रही ।॥३९॥

तव तुम्हारी बातचीत तथा और सब कुछ मैने जान लिया। मेरे मना करने पर भी तूने कल ही यह कार्य क्यो कर डाला ? ॥४०॥

विना समझे-बुझे और बिना कारण जो कार्य किया जाता है, उससे अनिष्ट ही होता है। उदाहरण के लिए इस प्रसग की एक कथा मुनो' ।॥४१॥

विष्णुदत्त और उसके सात साथियों की कथा

प्राचीन समय मे अन्तर्वेदी देश में वसुदत्त नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसके पुत्र का नाम विष्णुदत्त था ॥४२॥

वह विष्णुदत्त जब पूरे सोलह वर्ष की अवस्था का था, तब विद्या-प्राप्ति के लिए बलभीपुरी में जाने के लिए तैयार हुआ। साथ जाने के लिए उसे और भी सात ब्राह्मण-पुत्र मिले। वे सातों मूर्ख थे। केवल विष्णुदत्त ही उनमें बुद्धिमान् और सत्कुलोत्पन्न बालक था ।।४३-४४।

तब वे आपस में एक-दूसरे का साथ न छोड़ने की प्रतिज्ञा करके माता-पिता से छिपकर रात में एक साथ ही निकले। चलते ही उनके सामने अकस्मात् अपशकुन हुआ। उसे देखकर विष्णुदत्त ने अपने साथी मित्रों से कहा- 'यह अपशकुन है, अतः लौट जाना उचित है। फिर कभी शुभ शकुन मिलने पर कार्यसिद्धि के लिए चलेंगे' ।॥४५-४७।।

यह सुनकर उसके सातों मूर्ख साथी उससे कहने लगे- 'व्यर्थ चिन्ता न करो। हमलोग ऐसे अपशकुनों से नही डरते ॥४८॥

यदि तू डरता है, तो मत जा, हमलोग अभी जायेंगे। प्रातःकाल हमारा समाचार जान-कर घरवाले हमें नहीं छोड़ेंगे' ।॥४९॥

ऐसा कहते हुए उन मूर्ख मित्रों के साथ प्रतिज्ञाबद्ध वेचारा विष्णुदत्त, पापहारी भगवान् का ध्यान करके उनके साथ चल पड़ा ॥५०॥

रात बीतने पर, प्रातःकाल ही उसने और अपशकुन देखे। फिर उसने उन मित्रों से कहा, किन्तु उन हठीले मित्रो द्वारा वह फिर फटकारा गया ।।५१।।

वे कहने लगे कि सबसे बड़ा अपशकुन तो यही है कि मार्ग के डरपोक कौवे के समान तुझे हमलोग साथ लाये ।।५२।।

ऐसी-ऐसी फटकारों को सुनता हुआ विष्णुदत्त, जाते हुए उनके साथ चलने को विवश हो गया। सच है, मनमानी करनेवाले मूर्ख को उपदेश देना ऐसा ही है, जैसे कूड़ा-करकट साफ करता हुआ व्यक्ति, उसकी धूल-मिट्टी से अपने शरीर को गंदा करके अपना ही तिरस्कार कराता है ।।५३-५४।।

एक बुद्धिमान् व्यक्ति, बहुत-से मूर्खा की सगति में पड़कर उसी प्रकार की स्थिति में आ जाता है; जैसे सरोवर में खड़ा हुआ एक कमल, तरंगों के थपेड़ों से आहत होकर हिलता ही रहता है ।।५५।।

अतः अब मुझे इनसे हित या अहित कुछ न कहकर चुप ही रहना चाहिए। भाग्य भला करेगा ।।५६।।

ऐसा सोचकर उन मूखों के साथ जाते हुए सायंकाल विष्णुदत्त को भीलों का एक गाँव मिला। वहाँ घूम-फिरकर उसे एक युवती स्त्रीवाला घर मिला। तब उसने उस स्त्री से रहने के लिए स्थान माँगा ।।५७-५८।।

उसने एक स्थान उसे दे दिया और उसमें वह अपने सातों मित्रों के साथ ठहर गया। कुछ ही समय में वे सातों मित्र मार्ग की श्रान्ति के कारण सो गये ।।५९।।

एक बही विष्णुदत्त अकेला जागता रहा; क्योंकि जिस घर में वह ठहरा था, उसमें एक उस युवती के अतिरिक्त दूसरा कोई पुरुष न था। मूर्ख जन निश्चेष्ट होकर सो जाते हैं, किन्तु विचारशीलों को नींद कहाँ ? ॥६०॥

इसी बीच कोई एक युवा व्यक्ति, छिपे तौर से उस स्त्री की कोठरी में स्त्री के पास गया ।।६१।।

गुप्त रूप से बातें करती हुई वह स्त्री उस पुरुष के साथ रमण करने लगी। कुछ समय पश्चात् रति की श्रान्ति एव घोर नीद से विवश होकर वे दोनों सो गये ॥६२॥

विष्णुदत्त, दरवाजे की दरार से, दीपक के प्रकाश से प्रकाशित उस कोठरी में यह सब देखता रहा, और दुःखी होकर भोचने लगा- ।।६३।।

खेद है कि हमलोग हम दुराचारिणी स्त्री के घर में आ गये। निश्चय है कि यह इसका विवाहित पनि नही है। यदि विवाहिन पति होता, तो इसकी गति इस प्रकार सशंक और छिपी न होती। मैने पहले ही समझ लिया था कि यह स्त्री चंचला है। इस प्रकार सोचते-सोचते उसने घर के बाहर कुछ मनुष्यों के शब्द सुने ।।६४-६६।।

उमने, अपनी-अपनी जगहों पर तैनात अनुचरों के साथ तलवार लेकर आते हुए भीलो के युवा सरदार को देखा ।।६७।।

'तुम लोग कौन हो'- ऐसा पूछते हुए भीलराज से विष्णुदत्त ने कहा- 'हमलोग पथिक (बटोही) है' ।॥६८॥

तदनन्तर अन्दर जाकर और इस प्रकार प्रेमी (जार) के साथ सोई हुई देखकर भीलराज ने पत्नी के उस प्रेगी का मिर तलवार से काट डाला ।।६९।।

किन्तु स्त्री को न माग और न जगाया। वह तलवार को भूमि पर रखकर पलंग पर सो गया ।॥७०।।

दीप से प्रकाशित घर में इस घटना को देखकर विष्णुदत्त ने सोचा, इसने उचित ही किया कि स्त्री समझकर पत्नी को नहीं मारा और उसका हरण करनेवाले को मार डाला ॥७१॥

किन्तु यह आश्चर्य है कि ऐसा कर्म करके भी यह विश्वासपूर्वक सो रहा है। बढ़े हुए मनवालों का ऐसा पराक्रम अवश्य आश्चर्यजनक होता है ॥७२॥

विष्णुदत्त यह सोच ही रहा था कि उस दुष्टा स्त्री ने जगकर यार को मरा हुआ और पति को सोया हुआ देखा ।।७३।।

और, पलंग से उठकर अपने यार के शव को कन्धे पर रखकर, एक हाथ से उसके सिर को लेकर वह घर से बाहर निकली ॥७४।।

बाहर निकलकर राख के ढेर में उसके सिर और शरीर को फेंककर चुपचाप वह लौट आई ॥७५।।

विष्णुदत्त भी, उसके पीछे निकलकर और दूर से यह सब देखकर, अपने सोये हुए मित्रों के साथ सो गया ।॥७६।।

उधर, उस दुष्टा स्त्री ने, घर में जाकर उसी तलवार से सोये हुए पति का सिर काट डाला और बाहर निकलकर सेवकों को मुनाकर चिल्लाने लगी- 'हाय ! मैं मारी गई, इन पथिकों ने मेरे पति को मार डाला' ।। ७७-७८।।

यह सुनकर उसके सेवक दौड़कर आये और अपने सरदार को कटा हुआ देखकर, तलवारें खींचकर विष्णुदत्त आदि पथिको पर टूट पड़े ॥७९॥

'ठहरो, तुमलोग ब्रह्महत्या न करो। यह सब काण्ड, यार से फंसी हुई इसी दुष्टा स्त्री ने किया है ॥८०॥

मैंने प्रारम्भ से अबतक द्वार के खुली हुई दरारों से सब अपनी आँखों से देखा है और बाहर निकलकर भी सब स्वयं देखा है। आप लोग क्षमा करें' तो मैं सब कुछ कहता हूँ ।।८१-८२॥

ऐसा कहते हुए विष्णुदत्त ने, सारी बातें बताकर, कूड़े और राख के ढेर में पड़े हुए उस यार के मृत शरीर और शिर को दिखाया ॥८३-८४।।

तब उतरे हुए मुँह से उस स्त्री के यह सब स्वीकार कर लेने पर वे सब, उस दुराचारिणी को डाँटते-फटकारते चले गये ।।८५।।

काम के वशीभूत होकर जो स्त्री निर्भय होकर माहस कर बैठती है, वह दूसरों से स्वीकृत होकर तलबार के समान किसका विनाश नहीं कर डालती ।।८६।।

ऐसा कहते हुए उन भीलों ने विष्णुदत्त आदि सातों ब्राह्मणों को छोड़ दिया और वे सातों साथी विष्णुदत्त की प्रशंसा करने लगे ।॥८७॥

उन्होने कहा- 'सोये हुए हम लोगों की रक्षा के लिए तुम रत्नदीप के समान सिद्ध हुए। आज अपशकुन से होनेवाली मृत्यु को तुम्हारी कृपा से हमलोग पार कर सके' ।॥८८॥

इस प्रकार विष्णुदत्त की प्रशंसा करके और अपने कहे हुए दुर्वचनों के लिए क्षमा-प्रार्थना-पूर्वक उसे प्रणाम करके वे प्रातःकाल अपने काम में लग गये ॥८९॥

सोमप्रभा ने, कौशाम्बी में इस प्रकार कथा सुनाकर कलिंगसेना से पुनः कहा-हे सखि, इस प्रकार काम में लगे हुए लोगों को आनेवाले अपशकुन कार्यों में व्यवधान उत्पन्न कर देते हैं। इस कारण बुद्धिमानों की बातों को न मामनेवाले मन्दबुद्धिवाले व्यक्ति, आवेश में आकर कार्य में प्रवृत्त हो जाते हैं और पीछे पश्चात्ताप करते हैं। इसलिए कल अपशकुन में वत्सराज के प्रति तुमने अपने ग्रहण करने के लिए, जो दूत भेजा, वह अच्छा नहीं किया। तू घर से कुलस्त में आई है; इसलिए तेरा विवाह टल गया है। अब दैव ही उसे निविघ्न पूर्ण करे ॥९०-९४।।

तुझ पर देवता भी रीझते है। इसलिए तुम्हें उसकी रक्षा करनी चाहिए और मन्त्री यौगन्धरायण की भी चिन्ता करनी चाहिए। राज्य पर विपत्ति की आशंका से वह विवाह में विघ्न उपस्थित करेगा। विवाह हो जाने पर भी वह तुझमें दोष उत्पन्न करेगा। धार्मिक होने पर यह संभव है कि वह तुम्हें लांछित न करे, तो भी तुम्हारी सौतें चिन्तनीय हैं। मैं इस प्रसंग में तुम्हें कथा सुनाती हूँ, सुनो' ।॥९५-९७॥

ऋषिकन्या कवलीगर्भा की कथा

इस देश में इक्षुमती नाम की नगरी है। उसके पास ही इक्षुमती नाम की नदी है। ये दोनों नगरी और नदी मुनि विश्वामित्र-निर्मित है ।।९८।।

उसके तट पर एक महान् वन है, जिसमें मंकणक नाम का ऋषि, ऊपर पैर करके तपस्या करता था ।।९९।।

तपस्या करते हुए उसने एक बार आकाश-मार्ग से जाती हुई मेनका नाम की अप्सरा को देखा। आकाश-मार्ग से जाती हुई उस मेनका की साड़ी वायु से उड़ रही थी। मतः, उसे नग्न देखने के कारण काम-वासना से ऋषि का मन क्षुब्ध हो उठा। फलतः, उस ऋषि का वीर्य एक नवीन कदली-वृक्ष के मध्य जा गिरा। और, उस कदली-गर्भ से सर्वांगसुन्दरी एक कन्या उत्पन्न हुई; क्योंकि ऋषियों का अमोघ (सफल) वीर्य, शीघ्र ही फलीभूत होता है ।।१००-१०२॥

उस कन्या के पिता ऋषि ने उसका नाम 'कदलीगर्भा¹ रख दिया। वह कन्या, कदली-गर्भा, अपने पिता मंकणक ऋषि के आश्रम में उसी प्रकार पलने और बढ़ने लगी, जैसे रम्भा के दर्शन से वीर्यच्युत होने पर गौतम ऋषि की कन्या और द्रोणाचार्य की पत्नी कृपी पल रही थी ।।१०३-१०४।।

एक बार मध्यदेश² का राजा दृढ़वर्मा शिकार के प्रसंग में घोड़े द्वारा उसी आश्रम में ले जाया गया ।।१०५॥

उस राजा ने वहाँ वल्कल ओढ़े हुए उस कदलीगर्भा को देखा। वह कन्या मुनिजनों के आश्रमोचित वेश में अत्यन्त सुन्दरी लग रही थी ॥१०६॥

उसके देखते ही राजा दृढवर्मा का कण्व के आश्रम में शकुन्तला को देखकर राजा सोचने लगा कि क्या मैं दुष्यन्त की सकूंगा ? ॥१०७-१०८।। हृदय उसी प्रकार आकृष्ट हो गया, जिस प्रकार राजा दुष्यन्त का हृदय आकृष्ट हो गया था। शकुन्तला के समान इस कन्या को प्राप्त कर

इस प्रकार सोचते हुए, राजा ने नित्यकर्म के लिए समिधा और कुशा लेकर आते हुए मकणक ऋषि को देखा ॥१०९।।

उसे देखकर घोड़े से उतरे हुए राजा ने ऋषि के समीप जाकर उसके चरणों में प्रणाम किया और प्रश्न करने पर उसे अपना परिचय दिया ।।११०॥

तब ऋषि ने, कन्या कदलीगर्भा को आज्ञा दी कि बेटी, इस अतिथि राजा के लिए तुम अर्घ्य³ दो ॥१११॥

इस प्रकार उस विनम्र कन्या से सत्कृत राजा ने उस मुनि से पूछा कि यह ऐसी कन्या तुम्हें कहाँ से और कैसे प्राप्त हुई ? ॥११२॥

तब मुनि ने उसकी उत्पत्ति और उसके नाम का अनुकूल अर्थ कदलीगर्भा' बताया ।।११३।। तब राजा ने उस कन्या को मेनका अप्सरा की सन्तान समझकर अत्यन्त उत्कंठा के साथ ऋषि से उस कन्या को माँगा ।। ११४।।

राजा के माँगने पर उस ऋषि ने भी उसे कन्या दे दी; क्योंकि प्राचीन व्यक्तियों के दिव्य और प्रभावशाली चरितों पर विचार न करना चाहिए ॥११५॥

अपने दिव्य प्रभाव से स्वर्ग की अप्सराओं ने यह जानकर और मेनका के प्रेम से वहाँ आकर उस कन्या को विवाह के बेश से अलंकृत किया। और, उसके हाथ में सरसों देते हुए कहा- 'तू पति के घर जाती हुई मार्ग में इसे बोती हुई जाना; जिससे लौटते समय के लिए मार्ग का परिचय बना रहे' ।।११६-११७।।

और बेटी, कभी पति के अपमान करने पर तू यदि पिता के आश्रम को लौटेगी, तो इन्हीं सरसों के क्षुपों से मार्ग का पता लग जायगा' ॥११८॥

उनसे इस प्रकार कही गई कन्या कदलीगर्भा को षोड़े पर बैठाकर राजा दृढ़वर्मा अपने नगर को लौटा ।।११९॥

राजा के पीछे सेना भी आ रही थी। इस प्रकार सरसों बोती हुई उस कन्या को लिये हुए वह राजा अपनी राजधानी में आ गया ।।१२०।।

वहाँ आकर राजा ने मन्त्रियों से अपना सारा विवाह-वृत्तान्त प्रकट कर दिया और अन्य रानियो से विरक्त होकर वह एकमात्र कदलीगर्मा के ही प्रेम में मग्न हो गया ॥ १२१॥

तदनन्तर उसकी महारानी ने राजा के मन्त्री को बुलाकर और अपने किये हुए उपकारों का स्मरण दिलाकर, उससे एकान्त में कहा- 'ऐसा उपाय करो कि जिससे मेरी यह सौत चली जाय; क्योंकि वह (राजा) एकमात्र उसी में आसक्त है' ।।१२२-१२३॥

यह सुनकर मन्त्री कहने लगा- 'महारानी, स्वामी की पत्नी का इस प्रकार विनाश या वियोग मेरे जैसे व्यक्ति नहीं कर सकते' ।॥१२४।।

यह तो साधुनी स्त्रियों या जादू-टोना करनेवाले ऐसे-वैसे व्यक्तियों का काम है ॥१२५॥

वे मायाकुशल नकली साधुनियाँ, अपनी अप्रतिहत गति से घरों में घुसकर यह सब मायाजाल रचा करती हैं। वे क्या-क्या नहीं करतीं ? ॥१२६॥

मन्त्री के इस प्रकार कहने पर रानी अत्यन्त लज्जा से विनम्र होकर कहने लगी- 'तो इस प्रकार के सज्जनों द्वारा निन्दित कार्य से मुझे क्या प्रयोजन' ॥१२७।।

इस प्रकार मन्त्री को विदा कर और उसकी बात को मानकर रानी ने दासी द्वारा किसी साधुनी को बुलवाया ।।१२८॥

रानी ने, उसे अपनी सारी कामना बता दी और कार्य सिद्ध होने पर उसे पर्याप्त बन देने का आश्वासन भी दिया ।।१२९॥

वह दुष्टा परिव्राजिका (साधुनी) भी धन के लोभ से उस व्याकुल रानी से बोली-'महारानी, यह कौन-सी बात है, इसे तुरन्त सिद्ध करती हूँ' ।॥१३०॥

'मैं विविध प्रकार के प्रयोगों को जानती हूँ।' इस प्रकार रानी को धीरज बँधाकर वह परिव्राजिका चली गई और अपनी मठिया में जाकर डरी हुईन्सी इस प्रकार सोचने लगी-मुझे भाग्य से ही यह प्राप्ति का अवसर मिला है। भोगों की अत्यन्त तृष्णा किसकी दुर्दशा। नहीं करती ? आश्चर्य है ! ॥१३१-१३२॥

मैंने महारानी के आगे एकाएक लम्बी-चौड़ी डींग तो हाँक दी, किन्तु ऐसा विज्ञान तो मैं जानती नहीं ।॥ १३३॥

अन्य साधारण स्थानों के समान राजा के घर में ऐसा छल-कपट करना उचित नहीं; क्योंकि रहस्य खुलने पर शक्तिशाली राजा, प्राणदंड दे सकते हैं ।॥१३४।।

हाँ, एक उपाय सूझ रहा है। मेरा मित्र एक नापित (नाई) है, वह ऐसे कामों में चतुर है। वह कुछ उपाय कर सकता है' ।।१३५।।

ऐसा सोचकर वह भिक्षुणी नापित के पास गई और उसे अपना अर्थलाभ करानेवाली सारी योजनाएं बताई ।।१३६।।

तब वह वृद्ध और धूर्त नापित सोवने लगा- 'मेरे भाग्य से ही लाभ का यह अवसर मिला है ।।१३७।।

इसलिए नई राजवधू को मारना न चाहिए; प्रत्युत उसकी रक्षा करनी चाहिए; क्योकि उस रानी का पिता दिव्य दृष्टिवाला है। वह योगबल से सब जानकर प्रकट कर देगा ॥१३८॥

इस समय तो उमे राजा से पृथक् करके महारानी का घन खाते हैं; क्योंकि रहस्य में सहायता करनेवाले सेवक के सामने स्वामी, स्वयं सेवक बन जाता है ॥१३९॥

राजा और नई रानी दोनों को अलग-अलग कराकर यथासमय राजा को ऐसा समझा दूंगा कि जिससे राजा और ऋषिकन्या दोनों ही सदा के लिए मेरी जीविका के स्रोत बन जायेंगे । इस प्रकार, भारी पाप भी न होगा और मेरे लिए स्थायी जीविका भी बन जायगी' ऐसा सोचकर वह धूर्त नापित उस कपटी तपस्विनी से कहने लगा 'माता, मैं यह गब तो कर दूंगा, किन्तु किसी उपाय से यदि राजा की नई रानी को मार दिया जाय, तो यह उचित न होगा ॥१४०-१४२॥

रहस्य फूट पड़ने पर, राजा, हमलोगो को फाँसी दे सकता है। स्त्री-हत्या करना पाप भी होगा और रानी का पिता मुनि भी हमें शाप देगा ॥ १४३॥

इसलिए केवल बुद्धि के बल से ही उसे राजा से पृथक् कर दिया जाय, तो महारानी भी सुख से रहेगी और हमें भी धन मिलेगा ।॥१४४।।

यह बात तो क्या है ? बुद्धि से मैं क्या नही कर सकता। मेरी बुद्धि का वैभव सुनो, मैं कहता हूँ' ।॥१४५॥

नाई और राजा की कथा

इस राजा दृढ़वर्मा का पिता बहुत ही दुश्चरित्र था। मैं उसका दास था और उसका क्षौर कर्म किया करता था ।। १४६।।

किसी समय इस ओर घूमते हुए उसने मेरी स्त्री को देख लिया। उस सुन्दरी युवती की ओर उसका मन खिंच गया ।॥१४७।।

उसने अपने सेवकों से यह जान लिया कि यह नापित की स्त्री है 'नापित मेरा क्या करेगा' यह जानकर वह मेरे घर में घुस आया और स्वतन्त्रतापूर्वक मेरी स्त्री को भ्रष्ट करके वह दुष्ट राजा चला गया। मैं दैवयोग से उस दिन घर से कहीं बाहर गया हुआ था ।।१४८-१४९।।

दूसरे दिन, घर आते ही मैंने उसे (अपनी स्त्री को) दूसरी स्थिति में देखा और पूछने पर उसने अभिमान से सारा वृत्तान्त कह दिया ।।१५०।।

तब से मुझे रोकने में असमर्थ जानकर मेरी परवाह न कर, वह राजा नित्य ही मेरी स्त्री का उपभोग करता रहा ।।१५१।।

दुश्चरित्रता के कारण पागल स्वामी (राजा) के लिए गम्य और अगम्य क्या है? वाय से फैलाई गई आग के लिए तिनका और जंगल समान है ॥१५२॥

जब मैंने देखा कि राजा को रोकने के लिए मेरी कोई गति नहीं है, तब स्वल्पाहार से दुर्बल होकर मैंने मौदगी (रोग) का बहाना किया ।॥१५३॥

इस प्रकार दुबला-पतला रोगी का-सा मुँह लिये मैं, दुःख-भरी लम्बी साँस लेता हुआ क्षौर कर्म की सेवा के लिए, राजा के पास गया ।॥१५४।।

मुझे इस प्रकार माँदा (रोगी) देखकर राजा ने अभिप्राय से पूछा- क्यों रे ! बता, तू इतना दुर्बल क्यों हो गया है?' ॥१५५॥

उसके बार-बार आग्रहपूर्वक पूछने पर मैंने अभय याचना करके उससे एकान्त में कहा- 'महाराज, क्या कहूँ, मेरी स्त्री डाकिनी है। वह सोये हुए में मेरी आँतों को मलद्वार से बाहर खींचकर चूस लेती है और फिर उसी प्रकार रख देती है। इसी कारण मैं दुर्बल हो गया हूँ ॥ १५६-१५७।।

शरीर को पुष्ट रखने के लिए मेरे पास पौष्टिक भोजन कहाँ से आवे ?' मेरे ऐसा कहने पर राजा सोचने लगा- 'क्या वह सचमुच डाकिनी है? तभी उसने मुझे आकृष्ट कर रखा है। तो अब उपाय से आज रात को उसका पता लगाऊँगा। क्या आहार से परिपुष्ट मेरी आँतों को भी वह चूसेगी ? तब मैं राजा के द्वारा आहार प्राप्त कर अपने घर आकर आँसू बहाने लगा और अपनी स्त्री द्वारा कारण पूछे जाने पर मैंने कहा- 'प्यारी, किसी से कहना मत। सुनो, तुम्हें बताता हूँ। उस राजा के मलद्वार में वजा के समान दांत निकल आये हैं ।॥१५८-१६२॥

इस कारण क्षौरकर्म करते समय सुदृढ़ और अच्छे लोहे का बना हुआ मेरा उस्तरा भी उन दाँतों से टकराकर टूट गया ।।१६३।।

इस प्रकार यदि मेरा उस्तरा पग-पग पर टूटता रहेगा, तो मैं प्रतिदिन नया उस्तरा कहाँ से लाऊँगा ? इसलिए अब राजा के घर से मेरी जीविका नष्ट हो गई- यही कारण मेरे रोने का है' ।।१६४।।

मेरे इस प्रकार कहने पर मेरी पत्नी ने रात को सोये हुए राजा के मलद्वार में उगे हुए दाँतों के आश्चर्य को देखने का विचार किया ॥१६५।।

किन्तु संसार के प्रारम्भ से ही निश्चित इस असत्य को मेरी पत्नी ने नहीं समझा। घूत्तों की बातों से चतुर स्त्रियाँ भी ठगी जाती हैं ।॥१६६॥

तदनन्तर राजा रात को आकर और मेरी पत्नी का निःशंक उपभोग करके मेरी डाइन-वाली बात का स्मरण करता हुआ झूठे ही सो गया ।॥ १६७॥

तदनन्तर मेरी पत्नी ने उसे सोया हुआ जानकर, दाँतों को देखने के लिए धीरे-धीरे उसके मलद्वार की ओर हाथ बढ़ाया ॥१६८॥

उसका हाथ मलद्वार पर पहुँचते ही सोने का बहाना करनेवाला राजा एकाएक उठकर डाइन ! डाइन ! चिल्लाता हुआ भागा ॥१६९॥

तब से राजा ने डर से मेरी स्त्री को त्याग दिया और मेरी स्त्री एकमात्र मेरे अधीन होकर सुखपूर्वक रहने लगी ॥१७०॥

इस प्रकार, पहले मैंने अपनी बुद्धि के बल पर अपनी स्त्री को राजा से छुड़ाया था। उस कपट-तपस्विनी से ऐसा कहकर वह नापित फिर बोला 'इसलिए' हे आयें, यह तुम्हारा कार्य बुद्धि से किये जाने योग्य है। इसे जिस प्रकार करना है, वह भी सुनो' ।।१७१-१७२॥

रनिवास के किसी वृद्ध नौकर को ठीक करना चाहिए; जो राजा से एकान्त में यह कहे कि तेरी यह पत्नी कदलीगर्भा डाइन है ।।१७३।।

यह जंगली स्त्री है, इसका अपना सगा-सम्बन्धी कोई नहीं है। इसी प्रकार अन्यान्य नौकर, सेवक आदि भी घन आदि के लोभ से फोड़े जा सकते हैं। कौन ऐसा काम है, जो प्रलोभन में फंसकर न किया जा सके ? ॥१७४।।

तदनन्तर जब राजा के मन में शंका उत्पन्न हो जाय, तो रात के समय किसी शव के कटे हाथ-पैर आदि कदलीगर्भा के शयनागार में रखवा दिये जायं प्रातःकाल यह सब देखकर राजा भय से स्वयं उसे छोड़ देगा ॥ १७५-१७६।।

इस प्रकार सौत के न रहने से महारानी सुखी हो जायगी। तुम्हें बहुत मानने लगेगी और हमें भी धन मिलेगा ॥ १७७॥

उस नाई के इस प्रकार कहने पर वह कपट तपस्विनी, उसकी बात को स्वीकार करके चली गई और महारानी को सब ठीक-ठीक बता दिया ॥१७८॥

महारानी ने भी ऐसा ही किया और परिणाम स्वरूप राजा ने भी वह सब कुछ आँखों से देखकर कदलीगर्भा को डाइन समझकर त्याग दिया ।।१७९।।

इससे प्रसन्न होकर महारानी ने उस दुष्ट भिक्षुणी को जो गुप्त धन दिया, उस धन का उपभोग उसने नाई से मिलकर किया ॥१८०॥

वह कदलीगर्भा भी राजा के अभिशाप से सन्तप्त होकर राजमहल से निकल गई। और जिस मार्ग से आई थी, उसी मार्ग से पहले बोई हुई सरसों के क्षुपों की पहचान के सहारे वह अपने पिता के आश्रम में चली गई ।।१८१-१८२।।

ऋषि मंकणक, इस प्रकार आई हुई कन्या को देखकर उसकी दुश्चरित्रता पर सन्देह करता हुआ कुछ समय के लिए घ्यानावस्थित हो गया ।॥१८३॥

तदनन्तर समाधि में योगबल द्वारा समस्त वृत्तान्त जानकर स्नेहपूर्वक कन्या को स्वयं लेकर आश्रम से राजमहल में आ गया। आकर उसने प्रणाम करते हुए राजा से कहा-'राजन्, सौत के दोष से यह सारा कपट-नाटक रचा गया है ।॥१८४-१८५।।

उसी समय उस नापित ने जो कुछ हुआ था; सब स्वयं आकर राजा को बता दिया। और फिर बोला- 'हे स्वामी मैंने इस प्रकार कदलीगर्भा को आपसे पृथक् करके उसकी रक्षा की और महारानी को सन्तुष्ट किया' ।।१८६-१८७।।

इस प्रकार, मुनिवर. बातों की सत्यता से विश्वस्त राजा ने कदलीगर्भा को स्वीकार कर लिया। और ऋषि को कुछ दूर तक पहुंचाकर उन्हें विदा करने के पश्चात् नापित को 'यह मेरा भक्त है', यह सोचकर उसने (राजाने) उसे पर्याप्त धन दिया। खेद है कि राजा भी घूत्तों के भोग-भाजन होते हैं ।।१८८-१८९।।

तब से राजा दृढवर्मा, अपनी महारानी से विमुख हो, उस कदलीगर्भा के साथ ही निश्चिन्त होकर रहने लगा ।।१९०।।

हे सुन्दर अंगोंवाली कलिगसेने, सौतें इस प्रकार के अनेक उपद्रव और दोष उत्पन्न कर देती हैं। तू बालिका है, तेरे विवाह का लग्न अभी दूर है और अचिन्तनीय प्रभाववाले देवता भी तुझे चाहते हैं ।।१९१॥

इसलिए तू समस्त विश्व के रत्न-स्वरूप एकमात्र वत्सराज को सर्पित अपनी आत्मा की रक्षा कर। यह तेरी निजी उन्नति है ॥ १९२॥

हे सखि, अब मैं तेरे पास नही आऊँगी; क्योंकि अब तू पति के घर में आ गई है। अच्छी स्त्रियाँ सहेलियों के पतियों के घरों में नहीं जातीं और मेरे पति ने आज मुझे रोक भी दिया है ।।१९३।।

तेरे अत्यन्त स्नेह के कारण मेरा गुप्त रूप से आना भी सम्भव नही है; क्योंकि मेरा पति दिव्यदृष्टि है, इसलिए वह सब जान जायगा। आज तो मैं किसी प्रकार उसकी आज्ञा लेकर आई हूँ ।।१९४।।

यदि मुझे पति की आज्ञा प्राप्त हुई, तो फिर भी लज्जा को त्यागकर तुम्हारे पास आऊंगी ।। १९५।।

असुरराज की पुत्री सोमप्रभा, आँसुओं से घुलते हुए मुँहवाली राजपुत्री कलिंगसेना को रोती हुई इस प्रकार कहकर सायंकाल होने पर आकाश-मार्ग से अपने घर चली गई ।॥ १९६॥

छठा तरंग समाप्त

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1. अर्थात् केले के वृक्ष के मध्य से उत्पन्न ।
2. उत्तर में हिमालय, वक्षिण में विन्ध्याचल, पूर्व में प्रयाग और पश्चिम में भारवाड़ के मध्य में आया हुआ देश, मध्यदेश कहा जाता है।
3. विशेष अतिथि के स्वागत के लिए उसे अक्षत, खूब और फल डालकर जल वेना अध्यं है, जो सम्मान का चिह्न है।


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