5906. || षष्ठ कहानी || चन्द्रस्वामी और उसके पुत्र महीपाल की कथा ; चक्र और लङ्कग नामक वैश्यपुत्रों की कथा; नहंकारी मुनि, पतिवता स्त्री और धर्मव्याथ की कथा; नल और दमयन्ती की कथा;
5906. || षष्ठ कहानी || चन्द्रस्वामी और उसके पुत्र महीपाल की कथा ; चक्र और लङ्कग नामक वैश्यपुत्रों की कथा; नहंकारी मुनि, पतिवता स्त्री और धर्मव्याथ की कथा; नल और दमयन्ती की कथा;
षष्ठ तरंग
तदनन्तर, गोमुत्र द्वारा कही गई कथा के सुनने से सन्तुष्ट राजा नरवाहह्मदत्त ने, मरुभूति को गोमुत्र की ईर्ष्या से कुछ क्रुद्र-सा वेलकर उसे प्रसन्न करते हुए कहा है मरुभूति तुम भी एक कवा यों नहीं कहते?' ॥१-२॥
तब मरुभूति ने 'बहुत बच्छा, कहता हूँ' इस प्रकार उत्तर देकर कथा आरम्भ की ॥३॥
चन्द्रस्वामी और उसके पुत्र महीपाल की कथा
रात्रन्, प्राचीन काल में राजा कमलवर्मा के कमलपुर नामक नगर में चन्द्रस्वामो नाम कर एक श्रेठ ब्राह्मग रहता था ।।४।।
उस सद्बुद्धिवाले ब्राह्यम की लक्ष्मी और सरस्वती के समान तीसरी नम्रता की मूत्ति देवमति नाम की पत्नी थी ।।५।।
उस ब्राह्मण को उस पत्नी में शुभ लक्षणोंवाला एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसके उत्पन्न होते ही अकातवाणी हुई कि हे चन्द्रस्वामी, तू इन बालक का नाम महीपाल रखना। क्योंकि, यह राजा होकर चिरकाल तक पृथ्वी का पालन करेगा ॥६-७ ॥
इन प्रकार दिव्य वाणी को सुनकर चन्द्रस्वामी ने पुष-जन्मोत्सव करके उस शिशु का नाम नहीपाल ही रख दिया ॥८॥
कपन, बड़े होते हुए महीपाल को पिता ने, शस्त्र, अस्त्र, वेद तथा अन्यान्य विद्याओं में ममान का में निश्क्षित कर दिया ॥९॥
इनः बीच, चन्द्रस्वामी की पत्नी देवमति ने एक सर्वांगसुन्दरी कन्या को जश्म दिया ॥१००॥
उसका नाम बन्द्रवती रागरा और दोनों भाई-बहन माता-पिता के घर में क्रपशः बढ़ने लगे ॥११॥
कुछ दिनों के अनन्तर उस देश में वर्षा न होने के कारण दुभिन्न पड़ गया। नेतों में पड़ा अग्न मई को किरणों में (गरमी से) जन्न गवा ॥१२॥
दुभिल के कारण उग देश का राजा सन्मार्ग को छोड़कर अधर्म-पब में प्रजा का धन लूटने लगा ॥१३॥
इन अत्याचार और दुभिक्ष के कारण उस देश के अत्यन्त दुःखित हो जाने पर देवमति ने चन्द्रस्वामी से कहा- 'आओ. इस नगर से मेरे पिता के घर चलो। अन्त्रया, इन कष्ट से किसी समर भी इन दोनों बच्चों को हानि पहुँच सकती है ॥१४-१५॥
यह सुनकर चन्द्रस्वामी ने अपनी पत्नी से कहा- 'ऐसा न करो। दुभिक्ष के समय घर से भागना महापाप है।॥१६॥
इसलिए, मैं इन दोनों बच्चों को ले जाकर तुम्हारे पिता के घर रखकर शीघ्र ही लौट आता हूँ ॥ १७आ
ऐसा कहकर और पत्नी को घर सौंपकर चन्द्रस्वामी, अपने दोनों बच्चों पुत्र महीपाल और पुत्री चन्द्रवती को लेकर ससुराल की ओर गया ।॥१८-१९॥
जाते हुए उसे तीन-चार दिनों के अनन्तर क्रमशः मार्ग में एक बड़ा जंगल मिला। उस जंगल की रेत सूर्य की किरणों से जल रहीं थी और उसमें कहीं-कहीं मुझे और इक्के-दुक्के ही वक्ष दीख रहे थे ॥२०॥
चन्द्रस्वामी प्यास से व्याकुल उन दोनों बच्चों को एक छापावाले स्थान पर बैठाकर उनके लिए जल की व्बोज में दूरतक चला गया ॥२१॥
जाते हुए उसे सामने भीलों का राजा मिहदंष्ट्र, अपने मेवकों के साथ, कहीं जाता हुआ, अकस्मात् मिल गया ।॥२२॥
उस भोलराज ने उस ब्राह्मण को देखकर और पूछकर और उसे जलाभिलापी समझकर अपने सेवकों से इशारा करके कहा- 'इसे ले जाकर पानी पिलाओं ॥२३॥
यह सुनकर उसके दो-तीन सेवकों ने, उसके भाव को समझकर उम मीचे-सादे विद्वान ब्राह्मण को, अपने गाँव में ले जाकर और बांधकर रख दिया ॥२८॥
उन सेवकों द्वारा नरवनि के लिए अपने को वाँचा हुआ जानकर चन्द्ररवामी उग जंगल में अकेले छोड़ हुए अपने दोनों बच्चों की चिन्ता करने लगा ॥२५॥
'हाय महोपाल! हाय चन्द्रवती! मैंने तुम्हें महसा जंगल में छोड़कर शेर और बाघों का भोजन बना डाला और चोरों से अपना भी नाश कराया। अब मेरे लिए कहीं शरण नहीं है।' इन प्रकार, रोने-चिल्लाते उस ब्राह्मण ने, आकाण में, पांहो सूर्य को देला ॥२६-२७।।
'हन्न ! अब मैं मोह त्याग कर इसी अपने रभु को शरण में जाता हैं' ऐसा सोचकर यह ब्राह्मण सूर्य को स्तुति करने लगा ॥२८॥
'हे उच्च आकाश में शयन करनेवाले, परम यांति-स्वरूप प्रभो, आन्तरिक और बाह्य अन्धकार को दूर करनेवाले, तुझे नमस्कार है ॥२९॥
तू ही तोनों जगत् में व्याप्त विष्णु है, तू ही कल्याणों का कोप शिव-रूप है। सोये हुए विश्व को कार्य में प्रवृत्त कर। नेवाले परम प्रजापति, तुम्हें प्रणाम है।॥ ३०॥
प्रकाशहीन अग्नि और चन्द्रमा प्रकाश करेंगे, इसलिए तुम इन दोनों में अपना तेज रखकर रात्रि में अन्र्ताहत हो जाते हो ।॥३१॥
हे चमकीले सूर्य, तुम्हारे उदय होने पर राक्षस भाग जाते हैं। दस्तु प्रभाव-हीन हो जाते है और गुणी आमोद-प्रमोद करते हैं ।॥३२॥
हे तीनों लोकों के एकमात्र प्रदीप, शरण में आये हुए मेरी रक्षा करते। मेरे इस दुःस-रूनी अंधेरे को नष्ट करो। दया करो' ।॥३३॥
इत्यादि स्तुति-वाक्यों द्वारा भक्ति-भाव से सूर्य को प्रार्थना करते हुए चन्द्रस्वामी ब्राह्मण को आकाशवाणी सुन पड़ी ।।३४।।
'हे चन्द्रस्वामिन्, मैं तुझसे प्रसत्र हूँ। तू मारा नहीं जायगा और मेरी कृपा से पुत्र आदि के साथ तेरा मिलन भी होगा' ।॥ ३५॥
दिव्य वाणी द्वारा इस प्रकार कहा गया चन्द्रस्वामी, विश्वासपूर्वक जहाँ भीलों द्वारा लाये गये भोजन, जल आदि ग्रहण कर वहीं ठहरा रहा ॥३६॥
उबर वह महीपाल, छोटी बहन के साथ जंगल में बैठा-बैठा पिता के न आने पर किसी सार्धधर¹ ने अशुभ आशंका से रोने लगा ॥३७॥
इतने में हो उस मार्ग से व्यापारियों का एक दल आ निकला। उस दल के प्रधान सार्धधर' ने उस बालक से मारा समाचार पूछा ॥३८॥
वह व्यापारी उम बालक को शुभ लक्षणोंवाला जानकर धीरज बँधा या और उसे बहन के गाय अपने पर ले गया ।॥३९॥
वहीं पर बनिये के घर में पुत्र के समान स्नेह को प्राप्त करना हुआ वह महीपाल, बाल्यावस्था में ही, स्नान, मन्च्या, अग्निहोत्र आदि क्रिया में निरुण होने के कारण वैश्य के घर में नित्य-क्रिया करता हुआ रहने लगा ॥४०॥
एक बार तारापुर के ताराधर्म नामक राजा का मंत्री किसी कार्यवश उसी मार्ग मे वहाँ आया ॥४१॥
वह श्रेष्ठ ब्राह्मण मंत्री अनन्तस्वामी, हाथी, घोड़े, नौकर-बाकर आदि के साथ उसी अपने मित्र व्यापारी के घर विश्राम के लिए ठहर गया ॥४२॥
उस घर में ठहरे हुए उसने सुन्दर आकृतिवाले जप, अग्निहोत्र आदि में लगे हुए महीपाल को देखा और उसका परिचय पूछा ॥४३॥
उस मन्तानहीन मन्त्री ते, व्यापारी से उनका परिचय पाकर और उसे ब्राह्मण जानकर, उसे अपना पोष्य-पुत्र बनाने के लिए उसकी बहन के साथ उसे माँग लिया ॥४४॥
तब वह मन्त्री अनन्तस्वामी, व्यापारी से, उन बालकों को, लेकर, तारापुर चला आया ॥४५।।
वहाँ विविवत् पुत्र बनाया हुआ महीपाल विद्या और बन से भरे हुए उसके घर में मुखपूर्वक रहने लगा ॥४६॥
इसी बीब भीलों का राजा सिंहदंष्ट्र उस ग्राम में आकर और चन्द्रस्वामी के पास जाकर बोला-॥४७॥
हे बहादेव, मुझे स्वप्न में भगवान् भास्कर ने आदेश दिया है कि मैं तुम्हें सत्कृत करके छोड़ दूं। तुम्हारा वध न करूं ।॥४८॥
इसलिए, उठो बऔर जहाँ चाहो, जाओ।' ऐसा कहकर मोल ने, चन्द्रस्वामी को मोती और कस्तूरी देकर जंगल में मार्ग बतानेवाले सेवकों के साथ आदरपूर्वक बिदा कर दिया ॥४९॥
तब वह चन्द्रस्वामी छोटी बहन के साथ, अपने पुत्र महीपाल को ढूंढ़ता हुआ उन्हें अंगल में न पाकर घूमते-घामते समुद्र के किनारे जलपुर नामक नगर में जा पहुंचा। वहाँ जाकर बह किमी ब्राह्मण के घर में अतिथि के रूप में ठहर गया ॥ ५०-५१॥
वहाँ पर भोजन के उपरान्त अपना वृत्तान्त सुनाते हुए चन्द्रस्वामी से गृह के स्वामी ब्राह्मण ने कहा-॥५२॥
'पिछले दिनों में कनकवर्मा नाम का एक व्यापारी बनिया यहाँ आया था। उसने जंगल में छोटी बहन के साथ एक ब्राह्मण बालक को प्राप्त किया। वह उन दोनों अति सुन्दर बच्चों को लेकर यहाँ से नारिकेल द्वीप में गया है, किन्तु उसने उस बालक का नाम नहीं बताया' ।॥५३-५४॥
यह सुनकर और वे अवश्य ही मेरे बालक हैं, ऐमा मोचकर चन्द्रस्वामी ने, नारिकेल-द्वीप जाने का विचार किया ।।५५।।
कियी प्रकार रात्रि व्यतीत कर उसने प्रातःकाल ही नारिकेल द्वीप जाते हुए वणिक् विष्णुवर्मा से अपना ताल-मेल बैठाया ।॥५६॥
और, उमी के साथ नाव में बैठकर चन्द्रस्वामी, बच्चों के प्रेम से, समुद्र-मार्ग द्वारा नारिकेल-द्वीप को गया ।।५७।।
वहाँ पर कनकवर्मा को पूछते हुए उसे वहाँ के व्यापारी बनियों ने बताया कि कनकवर्मा नाम का व्यापारी, जंगल में मिले हुए दो सुन्दर ब्राह्मण-बालकों को लेकर यहाँ आया अवश्य था, किन्तु इस समय वह उन बच्चों के साथ यहाँ से कटाह-द्वीप को चला गया ।॥५८-५९।।
व्यापारियों से इस प्रकार सुनकर चन्द्रस्वामी, जलयान द्वारा कटाह-द्वीप जाते हुए ब्यापारी दानवर्मा के साथ, कटाह-द्वीप को गया ।॥६०॥
वहाँ भी उस ब्राह्मण ने सुना कि कनकवर्मा यहाँ से कर्पूर-द्वीप को चला गया। उसी क्रम से कर्पूर, सुवर्ण और सिहल-द्वीपों में वैश्यों के साथ जाने पर भी वह कनकवर्मा को न पा सका ।।६१-६२॥
सिहल-द्वीपवालों से उसने सुना कि कनकवर्मा अपने देश चित्रकूट को चला गया। तब चन्द्रस्वामी कोटीश्वर नामक वंश्व के साथ सिहल से समुद्र पार करके चित्रकूट को आया ॥६३-६४।
और, वहाँ आकर उसने कनकवर्मा वैश्य को ढूँड़ लिया। उसके पास जाकर बच्चों के लिए उत्सुक उसने अपना सारा वृत्तान्त मुना दिया ।॥६५ ।।
उसकी बेदना का अनुभव करके कनकवर्मा ने उन दोनों बालकों को उसे दिखा दिया, जिन्हें वह जगल से लाया था ॥६६।।
चन्द्रस्वामी ने, उन दोनों बच्चों को देखा, तो वे उसके बच्चे नहीं थे, बल्कि दूसरे ही कोई थे ॥६७।।
तब शोक सन्तप्न और निराश चन्द्रस्वामी रो पड़ा और विलाप करने लगा-हाय ! मैं इतना घूमने पर भी न लड़हा पाया. न लड़की ॥६८॥
दुष्ट स्वामी के समान भाग्य ने आणा दी, किन्तु पूरी न की। इस दुराशा ने व्यर्थ ही दूर से दूर भटकाया ॥६९॥
इस प्रकार सोचते हुए चन्द्रस्वामी को कनकवर्मा ने धीरे-धीरे धीरज बंधाया। तब चन्द्रस्वामी शांक से बोला- ॥७०॥
'सारी पृथ्वी पर घूमते-भटकते हुए मैंने यदि एक वर्ष के भीतर उन दोनों बच्चों को नहीं पाया, तो मैं गंगा-तौर पर तपस्या करके गरीर त्याग दूंगा ॥७१॥
इन प्रकार कहते हुन् चन्द्रस्वामी में वहां बैठे हुए किसी ज्ञानी ने कहा-नारायणी की कृपा से तू बच्चों को प्राप्त करेगा, जा' ।॥७२॥
यह सुनकर प्रसन्नचित्त चन्द्रस्वामी सूर्य भगवान् की कृपा का स्मरण करता हुआ कनकवर्मा द्वारा मत्कार किये जाने पर चित्रकूट नगर से चला ॥७३॥
वह वन्द्रस्वामी, अग्रहारों, ग्रामों और नगरों में भटकता-भटकता सायंकाल बहुत ऊँचे-ऊँचे और घने वृक्षोंवाले एक जंगल में पहुंचा ॥७४॥
वहाँ रात बिताने के लिए, फल और जल से तृप्ति पाकर सिंह, बाघ आदि पशुओं के भा से वह एक वृक्ष पर बढ़कर बैड गया ।॥ ७५।।
उसे नींद नहीं आई और जागते-ही-जागते उसने आधी रात के समय उस वृक्ष के नीचे देखा कि नारायणी की प्रमुखता में एक मातृचक्र वहाँ आया ॥७६॥
वह मातृबक, नाना प्रकार के अपने योग्य आहार लाकर भैरव देव की प्रतीक्षा करने लगा ॥७७॥
'आज भैरव देव क्यों विलम्ब कर रहे हैं.' इस प्रकार माताओं ने नारायणी देवी से पूछा। किन्तु, वह हंसती थी, कुछ बोलती न थी ॥७८॥
उन माताओं द्वारा अत्यन्त आग्रह के साथ पूछे जाने पर नारायणी ने कहा- 'यद्यपि यह लज्जाजनक बात है, फिर भी सहेलियो, मैं तुमसे कहती हूँ' ॥७९॥
सुरपुर नगर में सूरसेन नाम का राजा है। सौन्दर्य में प्रसिद्ध उसकी विद्यावरी नाम की कन्या है॥८०॥
उसे देने की इच्छा करनेवाले राजा सुरसेन ने मुना कि उसके रूप के समान सुन्दर राजा विमल का पुत्र प्रभाकर है ॥८१॥
राजा सुरमेन, प्रभाकर को, कन्या देना चाहता है, यह राजा विमल ने भी सुना। और, उम कन्या को अपने पुत्र के ममान ही मुन्दर जानकर राजा विमल ने राजा सेनमुर से दूत भेजकर, उसकी पुत्री विद्याधरी की अपने पुत्र प्रभाकर केलिए माँग की ॥८२-८३॥
सुग्मेन ने भी, आवश्यक सम्पति के माय दिमल के पुत्र प्रभाकर को विधिपूर्वक अपनी कन्या प्रदान कर दो ॥८४॥
तब वह कन्या विद्यावरी, अपने श्वशुर के नगर विनलपुर में जाकर अपने पति प्रभाकर के माय रात्रि में मिली ॥८५॥
वहीं, उत्कंठिता विद्याघरी ने जब पति प्रभाकर को बिना किसी चेष्टा के सोया देवा, तब उनने आश्चर्य में उनकी परीक्षा की और उसे नपुंमक पाया ॥८६॥
'हाय! हाय! मैं मारी गई, मुझे नपुंसक पति मिला' इस प्रकार सोचती हुई राजकुमारी ने किसी प्रकार रात्रि व्यतीत की ॥८७॥
प्रातःकाल ही उसने पत्र लिखकर अपने पिता के पास भेजा कि तुमने बिना जांच किये ही मुझे नपुंसक को कैसे दे दिया ॥८८॥
उस पत्र को पढ़कर राजा मुरसेन ने मोचा कि राजा विमल ने मुझे ठग लिया है। इसलिए, उसे क्रोष आ गया और उसने विमल के प्रति क्रोध प्रकट करते हुए उसे यह लिखित सन्देश भेजा कि तूने छड़ से अपने ननुंसक लड़के के लिए जो मेरी पुत्री को दिला दिया है, जब उसका फल भोगी। मैं सेना लेकर आता हूँ और तुझे मार डालता हूँ।॥८९-९०।।
बल के मद से उन्मत्त सूरसेन ने, राजा विमल के लिए इस प्रकार सन्देश भेज दिया। राजा विमल भी इस सन्देश को पाकर मन्त्रियों के साथ उसके लेख का तत्त्व विचारने लगा; क्योंकि मुरसेन, बल में विमल से अधिक होने के कारण उसके लिए अजेय था ॥९१-९२॥
जब उसे कोई उपाय नहीं सूझा, तब पिगदत्त नामक मन्त्री ने राजा विमल से कहा-'म्वामिन्, एक ही उपाय कल्याण के लिए है। उसे करो ॥९३॥
स्कूलशिरा नाम का एक यक्ष है। उसका मन्त्र और जाराधना-विषि में जानता हूँ, जिससे वह अभीष्ट बर देता है ॥९४॥
उसके मन्त्र को ग्रहण करके उससे पुत्र के लिए जननेन्द्रिय की याचता करो। इससे विरोष दूर होजायगा' ।॥९५॥
मन्त्री के इस प्रकार कहने पर राजा ने उससे मन्त्र ग्रहण किया और उसमे यक्ष की आराधना करके पुत्र के लिए जननेन्द्रिय की याचना की ॥९६॥
उम यक्ष द्वारा जननेन्द्रिय प्राप्त हो जाने पर, वह नपुंसक पुत्र प्रमाकर पूर्ण पुरुष हो गया, किन्तु वह यक्ष नपुंसक हो गया ।॥९७॥
अब वह विद्याधरी, प्रभाकर को पुरुषत्व से युक्त देखकर और उसके साथ मौन मुख का आनन्द लेकर सोचने लगी-॥९८॥
मैं अपने यौवन-मद से मूल कर गई। मेरा पति नपुंसक नहीं है। यह तो पूर्ण पुरुष है। अतः, इसके सम्बन्ध में विपरीत मति नहीं करनी चाहिए ।॥९९॥
इस प्रकार विचार कर और इसी बात को पुनः पिता को लिखकर, साथ ही लज्जित होकर भी उसने यह मन्देश भेजा, जिसमे उसका पिता शान्त हो गया ॥ १००।।
यह समाचार सुनकर आज क्रुद्ध हुए भैरव ने स्थूलशिरा यक्ष को बुलाकर शाप दिवा--॥१०१॥
कि जननेन्द्रिय का त्याग करने से तूने नपुंसकता घारण की है, अतः अब तू आजीवन नपुसक ही बना रहेगा और वह प्रभाकर सदा के लिए पुरुष हो जायगा ॥१०२॥
इसलिए, नपुंसक बना हुआ वह यक्ष आज बहुत दुःखी है और प्रभाकर भोग-सुख के लिए पुरुष बनकर मुली है।॥१०३।।
इसी काम से आज भैरव को आने में कुछ विलम्ब होगया है। किन्तु, फिर भी उन्हें आया ही समलो ॥१०४।।
नारायणी देवी जबतक उन योगिनी माताओं को यह कह रही थी कि इतने में ही बकेश्वर भैरवदेव, आ ही गये और उन योगिनियों ने, लाये हुए सभी उपहारों से उनका पूजन किया। भैरव ने भी कुछ समय तक उन योगिनियों के साथ तांडव नृत्य किया ॥१०५-१०६।।
चन्द्रस्वामी ने वृक्ष पर बैठे-बैठे यह सब कुछ दृश्य देखते हुए नारायणी की एक दासी को देखा। उसने भी चन्द्रस्वामी को देखा।। १०७।।
दैवयोग से वे दोनों परस्पर अभिलाष। पूक्त हो गये और नारायणी देवी ने दोनों के भाव को ताड़ लिया ॥१०८॥
तदनन्तर, माताओं के साथ भैरव के चले जाने पर नारायणी कुछ विलम्ब करके वहीं रुक गई और उसने वृक्ष पर बैठे हुए चन्द्रस्वामी को बुलाया ॥१०९॥
नारायणी देवी ने वृक्ष से उतरकर आये हुए चन्द्रस्वामी तथा उस दासी दोनों से पूछा कि 'क्या तुम दोनों को परस्पर मिलने की जमिलापा है?' ।॥११०॥
'हाँ देवि, है।' ऐसा उन दोनों ने सत्य-सत्य कह दिया। तब नारायणी देवी ने क्रोध-रहित होकर चन्द्रस्वामी से कहा-'तुम लोगों ने सत्य कहा, इसलिए शाप नहीं देती हूँ, वरन् तुझे यह दासी देती हूँ। तुम दोनों सुखी रहो ॥१११-११२॥
यह सुनकर वह ब्राह्मण बोला- 'भगवती, यद्यपि मैं चंचल मन को रोकता हूँ। किसी परस्त्री का स्पर्श नहीं करता। यद्यपि वंचनता मन को प्रकृति है, तथापि शारीरिक पाप से उसकी रक्षा करनी चाहिए।' इस प्रकार कहते हुए उस चोर ब्राह्मण से नारायणी देवी ने कहा- 'बेटा, तुझ पर प्रसन्न हूँ और मेरा तो कहना है कि अपने बच्चों को प्राप्त कर और यह कभी न म्लान होनेवाला कमल तुझे देनी हूं, जो विप आदि को दूर करता है। इसे ले ॥११३-११५॥
इस प्रकार कहकर और चन्द्रस्वामी को कमल देकर वह नारायणी देवी दासी के साथ अन्तर्धान हो गई ॥११६।।
वह चन्द्रस्वामी देवी के दिये हुये कमल को पाकर और रात्रि के व्यतीत होने पर वहाँ से चलकर घूमते-फिरते तारापुर नगर पहुंचा ॥११७॥
वहाँ पर उसका पुत्र महीपाल और कन्या राजा के ब्राह्मण-मन्त्री अनन्तस्वामी के यहाँ ठहरे हुए थे ॥११८॥
इस नगर में जाकर वह चन्द्रस्वामी उमी मन्त्री के घर भोजन प्राप्त करने की इच्छा से गया और उसे अतिथि-प्रिय जानकर उसके द्वार पर बैठकर वेदपाठ करने लगा। द्वारपालों द्वारा सूचना देकर अन्दर ले जाये गये चन्द्रस्वामी को मन्त्री अनन्तस्वामी ने, भोजन के लिए आमन्त्रित किया ॥११९-१२०।।
वह निमन्त्रित चन्द्रस्वामी पाप हरण करनेवाले अनन्तलव नामक सरोवर में स्नान करने के लिए गया ।॥१२१॥
जब बह स्नान करके आया, तब इतने में ही उसे 'हाय ! हाय! बहुत दुःख है', सारे नगर में इस प्रकार का कोलाहल सुनाई पड़ा ।॥१२२॥
इसका कारण पूछने पर लोगों ने उसे बताया कि यहाँ महीपाल नाम का एक ब्राह्मण-कुमार रहता है। उसे ब्यापारी सायंवर ने शून्य जंगल में पाया था। उसके अच्छे लक्षणों को देखकर उसकी बहन के साथ उसे मन्त्री अनन्तस्वामी, व्यापारी से माँग लाये थे और पुत्रहीन मन्त्री ने उसे अपना पुत्र बना लिया था। इसलिए, वह उसका बहुत प्रिय हो गया था ।।१२३-१२५।।
वह सद्गुण बालक यहाँ के राजा का बहुत प्रिय था। उसे आज काले साँप ने काट लिया, इसलिए आज सारे नगर में हाहाकार मच रहा है।॥ १२६॥
यह समाचार सुनकर चन्द्रस्वामी ने सोचा कि यह तो मेरा ही पुत्र है। इस प्रकार सोबता हुआ चन्द्रस्वामी शीघ्र ही मन्त्री के घर पर आया ॥ १२७॥
वहाँ सब लोगों से घिरे हुए उसे देखकर और पहचानकर हाथ में देवी के दिये हुए ओधि-रूप कमल को लिवा हुए चन्द्रस्वामी प्रसन्न हुबा ॥१२८॥
उसने उस कमल को महीपाल की नाक में लगा दिया, जिससे बह बालक उसी समय विष-हीन हो गया ।॥१२९॥
और, इस प्रकार उठ बैठा, मानों नींद में सो रहा था। तब उस नगर में उसके जीवित होने का उत्मव राजा-सहित सारी प्रजा ने मनाया ॥ १३०॥
तदनन्तर, चन्द्रस्वामी भी किसी देवता का अवतार है, ऐसा समझा जाकर जनता से और राजा से धन आदि द्वारा सम्मान किया गया ।॥ १३१॥
वह बन्द्रस्वामी मन्त्री के घर पर अपने पुत्र महीपाल और कन्या चन्द्रवती को देखता हुआ सम्मान के साथ रहने लगा ।॥१३२॥
वे तीनों परस्पर एक दूसरे को पहचानते हुए भी मौन रहे। कार्य की अपेक्षा करके बुद्धिमान् व्यक्ति असमय में प्रकट नहीं होते ॥ १३३॥
कुछ दिनों के अनन्तर महीपाल के गुणों से मुग्ध राजा तारावर्मा ने, उसे तारावती नाम की अपनी कन्या दे दी ॥१३४।।
और, साथ ही उस पुत्रहीन राजा ने अपने राज्य का आधा भाग और सारे राज्य का भार भी उसे देकर स्वयं शान्ति प्राप्त की ॥१३५॥
महीपाल भी राज्य प्राप्त करके और चन्द्रस्वामी को अपना वास्तविक पिता घोषित करके तथा अपनी छोटी बहन का योग्य पात्र के साथ विवाह कराके सुखपूर्वक रहने लगा ।। १३६।।
एकबार महीपाल के पिता चन्द्रस्वामी ने उससे कहा-'बलो, अपनी माता को लाने के लिए अपने गाँव को चलें ॥१३७।।
तुमको राजा हुए जानकर, उसने मुझे कैसे भुला दिया, यह सोचकर चिरदुःखिता माता क्रोष करके कभी तुम्हें शाप न दे दे ॥ १३८॥
माता और पिता से शापित व्यक्ति कभी सुख नहीं पाता, इस सम्बन्ध में एक पुरानी कहानी कहता हूँ, सुनों, ॥१३९॥
चक्र और लङ्कग नामक वैश्यपुत्रों की कथा
प्राचीन समय में बवलपुर में चक्र नाम का एक वैश्य-पुत्र था। वह माता-पिता के द्वारा मना किये जाने पर भी, उनकी इच्छा के विरुद्ध व्यापार के लिए सुवर्णद्वीप चला गया ॥ १४०॥
पाँच वर्षों में वहाँ से पर्याप्त द्रव्य उपार्जित करके लौटते हुए वह रत्नों से भरी नाव पर चढ़ा ॥१४१॥
जब स्वदेश का किनारा कुछ ही शेष रह गया, तब आकाश में सहसा आंधी-पानी की चौछार के माय भारी बादल-दल उमड़ पड़ा ॥१४२॥
यह माता-पिता की आशा के विरुद्ध व्यापार करने क्यों बाया, मानों इसी क्रोष से समुद्र की ऊंची-ऊँची तरंगों ने उसकी नाव को तोड़-फोड़ डाला ॥१४३॥
नाव में बैठे हुए अनेक व्यक्ति पानी में बह गये, कितनी को मगर निगल गये और आयु शेष रहने के कारण लहरों ने चक्र को किनारे पर ला पटका ॥१४४
किनारे पर बेहोश और असहाय पड़े हुए स्वप्न में जैसे उसने हाथ में फौस लिये हुए एक भयंकर पुरुष को देखा ॥१४५॥
वह पुरुप चक्र को पाश से बांधकर एक सभा में ले गया, जहाँ दूर पर एक व्यक्ति सिहासन पर बैठा था ॥ १४६।١
उसी सिहासन पर बैठे हुए व्यक्ति की आज्ञा से पाशधारी पुरुष ने, उसे एक लोहे की कोठरी में पटक दिया ॥१४७॥
उस कोठरी के अन्दर चक्र ने, शिर पर घूमते हुए लोहे के गरम चक्र से पीड़ित एक दूसरे पुरुष को देखा ।॥१४८।।
और पूछा-तू कौन है तथा इस कष्ट से किस प्रकार तू जी रहा है?' तब उसने कहा-॥१४९॥
"मैं सड्ग नाम का वैश्यपुत्र हूँ। मैंने माता-पिता की बात नहीं मानी, इससे क्रुद्ध होकर उन्होंने मुझे शाप दिया कि तू शिर पर रले हुए लोहे के चक्र के समान हम लोगों को त्रास देता है, इसलिए हे दुराचारी, तुझे भी ऐसी ही अदृश्य पीड़ा होगी ॥१५०-१५१॥
ऐसा कहकर और रोते हुए मुझे रोककर वे बोले- 'रोबो मत, ऐसी पीड़ा तुझे केवल एक मास तक ही होगी ॥१५२॥
यह सुनकर उस दिन को मैंने बड़े दुःख के साथ बिताया और रात में स्वप्न के समान आये हुए एक भयंकर पुरुष को देखा ॥ १५३।।
उस पुरुष ने मुझे बलपूर्वक उठाया और इस लोहे की कोठरी में लाकर पटक दिया और तब मेरे शिर पर इस घूमते हुए गरम चक्र को लगा दिया ॥१५४॥
इस प्रकार, यह मुझे मेरे माता-पिता का शाप है। मेरे प्राण ही नहीं निकल रहे हैं, यद्यपि भयंकर वेदना हो रही है। शाप की अवधि का एक मास आज पूरा होगया, फिर भी मैं इस कष्ट से नहीं छूट रहा हूँ" ।॥१५५॥
इस प्रकार कहते हुए खड़ग से दयालु चक्र बोला 'धन के लिए द्वीपान्तर जाते हुए मैंने माता-पिता की बात नहीं मानी मी, तो उन्होंने शाप दिया था कि तेरा कमाया हुआ भी धन नष्ट हो जायगा। इसी कारण द्वीपान्तर से कमाया हुआ मेरा सारा धन समुद्र में डूब गया। ।।१५६-१५७।।
यही वृतान्न मेरा है। अब इम जीवन मे क्या लाभ है! इम चक्र को मेरे शिर पर रख दो। तुम्हारा शाप नष्ट हो ॥१५८॥
वह जब इस प्रकार का ही रह था कि इतने में उमने आकाशवाणी सुनी कि है पद्म, तु छूट गया। इस चक्र को चक्र के गिर पर रख दे' ।॥ १५९॥
यह सुनकर अपने शिर के वक को चक्र के शिर पर रखकर, खड्ग किसी अदृश्य शक्ति के द्वारा पिता के पर ले जाया गया ।॥१६०।।
अब वह अपने घर में माता-पिता की आज्ञा का पालन करता हुआ रहने लगा। उधर चक्र को गिर पर लेकर वक्र ने यह कहा-पृथ्वी पर और जो भी मेरे समान पापी हों, वे पाप में छूट जाँध, जबनक पापों का नाश न हो, तबतक यह चक्र मेरे शिर पर घूमता रहे ॥१६१-१६२॥
इस प्रकार के धैर्यशाली बक पर आकाश में देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की और वे प्रसन्न होकर बोले--।।१६३।।
'हे महापुरुष, ठीक है, ठीक है, तेरी इम अपार करुणा से तेरे पाप नष्ट हो गये। अब जाओ, तुम्हारे पास अक्षय घन होगा ।।१६४।।
देवताओं के इस प्रकार कहने पर चक्र के शिर से वह लोहे का जलता चक अदूश्य हो गया ॥ १६५॥
और, आकाश से उतरकर आये हुए एक विद्यावर ने इन्द्र द्वारा भेजे गये अमूल्य रत्नों का ढेर उसे दिया ॥१६६।।
और, चक्र को गोद में उठाकर, उसे उसके धवलपुर में पहुंचाकर वह विद्याधर जैसे आया था, वैसे ही चला गया ।१६७।।
वह चक्र भी माता-पिता को सब वृत्तान्त सुनाकर और बन्धु-वान्धवों को बानन्दित करके अपने धर्म पर वृढ होकर रहने लगा ।।१६८।।
महीपाल को यह कथा सुनाकर चन्द्रस्वामी ने फिर कहा-'माता-पिता के विरोध करने का तो इतना दुष्परिणाम होता है और इनकी भक्ति भी इसी प्रकार कामधेनु है। इस सम्बन्ध में भी कथा सुनो' ।।१६९-१७०।।
नहंकारी मुनि, पतिवता स्त्री और धर्मव्याथ की कथा
प्राचीन काल में वन में रहनेवाला एक महातपस्वी मुनि था। एकबार वह वृक्ष की छाया में बैठा था कि उसके शिर पर एक बगुली ने बीट कर दी, तो मुनि ने कुद्ध होकर उसे देखा ॥१७०-१७१॥
मुनि के इस प्रकार देखते ही वह बगुली जलकर भस्म हो गई। तब मुनि को अपने तप पर अहंकार उत्पन्न होगया ॥१७२॥
एक बार वह मुनि, भिक्षा के लिए नगर में, एक ब्राह्मण के घर गया। वहाँ जाकर उसने गृहिणी से भिक्षा माँगी ॥१७३॥
पतिव्रता गृहिणी ने कहा-'जरा ठहरो, मैं पति की सेवा समाप्त कर लूं, तो भिक्षा दूं ॥१७४।।
तब क्रोष-भरी दृष्टि से देखते हुए उस मुनि को देखकर वह पतिव्रता हँसकर बोली-'मुनि, मैं बगुली नहीं हूँ। प्रतीक्षा करों' ॥१७५॥
यह सुनकर वह मुनि आश्चर्य के साथ वहाँ बैठकर सोचने लगा कि इस स्त्री ने यह कैसे जान लिया ? ॥१७६॥
तब वह पतिव्रता स्त्री, पति की अग्निहोत्र-सम्बन्धी सेवा समाप्त करके और भिक्षा लेकर मुनि के समीप आई ॥ १७७।।
तब वह मूनि हाथ जोड़कर उस सती स्त्री से बोला 'माता, तुमने अपने परोक्ष के इस बगुली के वृत्तान्त को कैसे जान लिया ? ॥१७८॥
यह प्रारम्भ से कहो, तो मैं भिक्षा ग्रहण करूँगा?' इस प्रकार कहते हुए मुनि से वह पतिव्रता कहने लगी ॥१७९॥
मैं पति-भक्ति के सिवा और दूसरा घर्म नहीं जानती। अतः, उसी की कृपा से मुझे यह विज्ञान-बल मिला है।॥ १८०।।
और यहाँ मांस वेचकर जीवन-निर्वाह करनेवाला एक धर्मव्याध है, उससे जाकर मिलो। इससे तुम्हें अहंकार-रहित कल्याण मिलेगा' ।॥१८१॥
इस प्रकार उस सर्वश पतिव्रता से कहा गया वह मुनि भिक्षा लेकर और प्रणाम करके वहाँ से निकला ॥१८२॥
दूसरे दिन वह मुनि, उस नगर में धर्मव्याच को ढूंढ़कर, दूकान पर बैठे हुए और मांस बेचते हुए उससे मिला ॥१८३॥
धर्मव्याध मुनि को देखते ही बोला 'क्या तुम्हें उस पतिव्रता ने मेजा है?' ॥१८४।।
यह सुनकर आश्चर्य से भरा हुआ ऋषि उस धर्मव्याध से कहने लगा' मांस बेचनेवाला होकर भी तुझे इतना ज्ञान कैसे हुआ ?' ॥१८५।।
इस प्रकार, पूछते हुए ऋषि से उस धर्मव्धाध ने कहा-'मैं एकमात्र माता-पिता का भक्त हूँ। वे ही मेरे देवता हैं ।॥१८६।।
उन्हें स्नान कराकर स्नान करता हूँ, उनके भोजन कर लेने पर भोजन करता हूँ और उनके सो जाने पर सोता हूँ. इसलिए मुझे ऐसा ज्ञान है ॥ १८७॥
दूसरों के द्वारा मारे गये पशुओं का मांस अपनी आजीविका के लिए बेचता हूँ। यह कार्य भी अपना धर्म (कतंच समझकर करता हूँ, धन कमाने के लिए नहीं। मैं और वह पतिव्रता स्त्री, दोनों जान के विश्न अहंकार को पाम नहीं फटकने देते। इसलिए, हम लोगो को आसानी से यह जान होजाता है। ॥ १८८-१८९।।
इसलिए, तुम भी मुनियों का व्रत धारण करके अपनी शुद्धि के लिए अहंकार का परित्याग कर अपने धर्म का पालन करो। इसने तुम्हें वह परम प्रकाश प्राप्त हो जायगा ॥१९०।।
इस प्रकार उम धर्मव्याध से बादिष्ट मुनि उसके साथ उसके घर गया और उसकी दिनचर्या में प्रमन्न होकर (तप के लिए) बन को गया ॥ १९१॥
उनके उपदेश से मुनि ने मिद्धि प्राप्त की और मुनि की धर्मचर्या से वह पतिवता और व्याध भी सिद्धि को प्राप्त हुए ॥ १९२॥
माता और पिता में भक्ति रखनेवालों का ऐसा चमत्कारी प्रभाव होता है, इसलिए चलो और तुम्हें देखने के लिए लालायित अपनी माता को धीरज बंधाओ' ॥१९३३॥
पिता चन्द्रस्वामी से इस प्रकार कहा गया महीपाल, पिता के अनुरोध से अपने देश जाने को तैयार हुआ ।।१९४८॥
महीपाल ने, अपने धर्मपिता से सब बातें करके और राज्य का सारा प्रबन्ध, उसे सौंपकर रात्रि के समय पिता के साथ अपने देश को प्रस्थान किया ।।१९५।।
क्रमशः अपने गाँव में पहुंचकर उस महीपाल ने अपनी माता को उसी प्रकार प्रसन्न किया, जैसे बसन्त कोयल को प्रसन्न करता है ।।१९६।।
वह महीपाल बन्धु-बान्धवों से सत्कृत होकर समस्त वृत्तान्त सुनानेवाले पिता के साथ माता के पास कुछ दिनों तक रहा ॥१९७॥
उघर तारापुर में प्रातःकाल शयनागार में सोई हुई महीपाल की पत्नी बन्धुमती उठी ॥१९८॥
और यह जानकर कि 'उसका पति कहीं चला गया है', विरह से व्याकुल होकर महल में, उद्यान में कहीं भी शान्ति नहीं प्राप्त कर सकी ॥ १९९॥
आँसू की धार से हार को दुद्रा भारवाला बना करके दिनरात रोती हुई और उसी के नाम पर प्रलाप करती हुई वह मृत्यु में ही सुख मानने लगी ॥२००।۱۱۱
'मैं किसी कार्य से जा रहा हूँ, शीघ्र ही जाऊँगा, ऐसा मुझे गुप्त रूप से कहकर वह महोपाल गया है, इसलिए बेटी, सोच मत करो" ॥२०१॥
इम प्रकार धीरज देनेवाले मन्त्री अनन्तस्वामी की बातों से किसी प्रकार समझाने-बुझाने पर वह धैर्य रख मकी ॥२०२॥
तब भी पनि का समाचार जानने के लिए दूसरे देशों से आनेवाले ब्राह्मणों को वह सदा सत्कार आदि से सन्तुष्ट करती थी ॥२०३१०
एक बार दान लेने के लिए आये हुए संगमदत्त नामक निर्धन ब्राह्मण से उसने चिह्न और नाम बताकर पनि का समाचार पूछा ॥२०४।।
तब वह ब्राह्मण उसने बोला कि मैंने ऐसा व्यक्ति कहीं देखा तो नहीं है, तो भी महारानी, तुम्हें अधीर न होना चाहिए ॥२०५॥
प्रिय का समागम शुभ कार्यों के कारण विलम्ब से ही होता है। इस सम्बन्ध में मैंने जो आश्चर्य देला है, वह तुम्हें कहता हूँ, सुनो ॥२०६।।
एक बार तीर्थ-यात्रा करता हुआ मैं हिमालय पर स्थित मानस-सरोवर में पहुंचा। वहाँ पर मैंने मानों कांच से बने हुए मणि से रचित एक भवन को देखा ॥२०७॥
और देखा कि उस भवन से अकस्मात् ही निकलकर तलवार हाथ में लिये हुए एक पुरुष दिव्य नारियों से युक्त होकर मानस-सर के तट पर गया और मद्यपान आदि करके उन स्त्रियों के साथ क्रीड़ा करने लगा। मैं भी बड़े ही कौतुक से छिपकर उसे देख रहा था। इतने में ही वहाँ कहीं से दूसरा सुन्दर पुरुष आ निकला। उसके मिलने पर मैंने जो कुछ देखा, सो सब उसे सुनाया ॥२०८-२१०।।
और, उन स्त्रियों सहित पुरुष को भी उसे दिखाया। यह देखकर उस पुरुष ने अपना वृत्तान्त मुझे इस प्रकार सुनाया- ॥२११॥
त्रिभुवनपुर नामक नगर में मैं त्रिभुवन नाम का राजा था। वहाँ पर एक पाशुपत (शैव) ने बहुत दिनों तक मेरी सेवा की ॥२१२॥
२१३ाँ श्लोक त्रुटित है ॥१३॥
एकबार मैंने एकान्त में उसकी सेवा का कारण पूछा, तो उसने गुफा-स्थित सड्म (तलवार) की सिद्धि के लिए मेरी सहायता मांगी और मैंने उसे स्वीकार भी किया ॥२१४।॥
तब उसने मेरे साथ जंगल में जाकर रात्रि में हवन आदि करके एक गुफा प्रकट की और मुझसे कहा- ।।२१५।।
'हे बीर, पहले इस गुफा में प्रवेश करो। प्रवेश करने पर तुम्हें एक लड्ग मिलेगा। तब तुम बाहर निकलकर मुझे भी अन्दर ले जाना। मेरे साथ प्रतिज्ञा करो ॥ २१६॥
उसके इस प्रकार कहने पर मैं प्रतिज्ञा करके उसके साथ उस बिल में घुसा और वहाँ जाकर मैंने रत्नों से बना एक भवन देवा ॥२१७।।
तब उम भवन से निकलकर एक अमुर-कन्धा मुझे प्रेम से अन्दर ले गई और वहाँ पर उसने मुझे एक खड्ग प्रदान किया ॥२१८॥
और कहा, यह लड्ग सब सिद्धियों को देनेवाला तथा आकाश में गति प्रदान करनेवाला है। भली भाँति इसकी रक्षा करना। ऐसा कहती हुई उसके साथ मैं वहीं रहा ॥२१९॥
तदनन्तर, पाशुपत के साथ की गई प्रतिज्ञा स्मरण करके खड्ग हाथ में लिये हुए मैं उम बिल से बाहर निकला और मैं अपने साथ उस पाशुपत को भी उस असुर-मन्दिर में ले गया ।॥२२०॥
उस मन्दिर में पहली असुर-कन्या के साथ मैं और दूसरी असुर-कन्या के साथ वह पाशुपत रहने लगे ॥२२१।।
एक बार मद्यपान से मत्त पाशुपत ने मेरी, बगल में रखे हुए खड्ग को अपने हाथ में कर लिया। उस खड्ग के हाथ आते ही उम पाशुपत को महान् सिद्धि प्राप्त हुई और उसने मुझे हाथ से पकड़कर उस बिल से बाहर फेंक दिया ॥२२२-२२३॥
तब मैं बारह वर्षों तक बिल के बाहर उसकी प्रतीक्षा करता हुबा बैठा रहा कि कमी बह बाहर निकले और मैं उसे पकड़ ॥२२४।।
सो वह दुष्ट आज मेरी ही असुर-कन्या के साथ कीड़ा करता हुआ दीख पड़ा है।॥ २२५॥
हे देवि, राज त्रिभुवन, जब मेरे साथ वार्तालाप कर ही रहा था कि इतने में ही मा के नशे में विङ्खल पाशुपत पुरुष सो गया ॥ २२६॥
तब राजा त्रिभुवन ने सोये हुए उसके पास जाकर उस लक्ष्य को उठा लिया और उसके साथ ही उस राजा को दिव्य प्रभाव भी प्राप्त हो गया ॥ २२७॥
तब राजा ने मदोन्मत्त होकर सोये हुए उस पाशुपत को लात मारकर उठाया और खूब डाँटा-फटकारा। किन्तु, वीर होने के कारण राजा ने उसका वध नहीं किया ॥२२८॥
और, सहेलियों के महित अपनी उस असुर-कन्या के साथ वह बिल में चला गया ॥ २२९॥
सिद्धि से भ्रष्ट वह पाशुपत, अत्यन्त दुःखी हुबा। कृतघ्न व्यक्ति चिरकाल में सिद्धि प्राप्त करके भी अवश्य भ्रष्ट हो जाते हैं।॥ २३०।।
इस घटना को अपनी आंखों से देखकर भ्रमण करता हुआ मैं यहाँ आया हूँ। इसलिए, हे देवि, चिरकाल के बाद भी तुझे पति का समागम अवश्य होगा ॥२३१॥
जैसे कि त्रिभुवन राजा को हुआ। क्योंकि, कल्याण करनेवाला व्यक्ति कभी कष्ट नहीं पाता। इस प्रकार ब्राह्मण का उपदेश सुनकर बन्धुमती को कुछ सन्तोष हुआ ॥२३२॥
और उसने बहुत धन देकर उसे कृतार्थ किया। दूसरे दिन वहाँ दूर देश का रहनेवाला एक और ब्राह्मण रानी के पास आया ॥२३३।।
उत्कंठिता बन्धुमती ने, परिचय और नाम बताकर उससे भी पति का समाचार पूछा। तब उस ब्राह्मण ने उनसे कहा- ॥२३४।।
हे देवि, मैंने तेरे पति को तो कहीं नहीं देखा, किन्तु यथार्थ नामवाला मैं सुमन तेरे घर पर आया हूँ, इसलिए शीघ्र ही तेरा मन प्रसन्न होगा। ऐसा मेरा मन कहता है। क्योंकि, चिरकाल के वियोगियों का भी समागम होता ही है ॥२३५-२३६॥
नल और दमयन्ती की कथा
मैं इस सम्बन्ध में तुझे एक कथा सुनाता हूँ, सुनो। प्राचीन काल में नल नाम का एक राजा था ॥२३७।।
वह राजा इतना सुन्दर था कि उसके रूप से अपमानित होकर कामदेव, मानों (उसी दुःस्ल से) क्रूज़ शिवजी के नेत्र की आग में जलकर भस्म हो गया ।॥२३८॥
पत्नी-रहित उस राजा ने, अपने ही समान सुन्दरी पत्नी की खोज करते हुए विदर्भ देश के राजा भीम की कन्या दमयन्ती का नाम सुना ॥२३९॥
सारी पृथ्वी पर ढूंढ़ते हुए राजा भीम को भी राजा नल के सिवा अपनी कन्या के योग्य दूसरा पति नहीं मिला ॥ २४०॥
इसी बीच एक बार राजा भीम की कन्या दमयन्ती जलक्रीडा के लिए एक तालाब में उतरी ॥२४१॥
उस सरोवर में उसने, कमल की नाल को खाते हुए एक राजहंस को युक्ति से अपनी चादर फेंककर पकड़ लिया ॥२४२॥
उससे इस प्रकार पकड़ा गया वह दिव्य राजहंस, मनुष्यों की वाणी में उससे कहने लगा-'हे राजकुमारी, मैं तेरा उपकार करूंगा। मुझे छोड़ दे। निषच देश का राजा नल है। अच्छे गुणों से गूंचे हुए हार के समान जिसे दिव्य रमणियाँ भी हृदय में धारण करती हैं ॥२४३-२४४॥
तू उसके समान पत्नी है और वह तेरे समान पति है। अतः, यह समान पति-पत्नी-संयोग कराने में मैं तेरा प्रणय-दूत बनूंगा' ।॥२४५॥
यह सुनकर और उन दिव्य हंस को सत्य बोलनेवाला समझकर, दमयन्ती ने 'ठीक है, तुम दूत बनों' यह कहते हुए उसे छोड़ दिया ॥२४६।॥
और बोली कि 'मैं नल के सिवा दूसरे को नहीं करूंगी; क्योंकि उसने, कान के मार्ग से प्रविष्ट होकर, मेरा मन हर लिया है' ।॥२४७॥
उस हंस ने वहाँ से चलकर शीघ्र ही जलक्रीडा में लगे हुए नलवाले सरोवर का बघय लिया ॥२४८॥
राजा नल ने भी, उस मनोहर राजहंस को देखकर खिलवाड़ के साथ फेंके हुए अपने दुपट्टे से उसे बाँध लिया ।। २४९॥
तदनन्तर, वह हंस उससे बोला-'राजन्, मुझे छोड़ दो। मैं तो तुम्हारे उपकार के लिए ही यहाँ आया हूँ। सुनौ, तुम्हें कहता हूँ- ॥२५०।।
विदर्भ देश में राजा भीम की पृथ्वी की तिलोत्तमा और देवताओं से भी चाही जानेवाली दमयन्ती नाम की कन्या है।। २५१।।
मेरे द्वारा तेरे गुणों का बखान करने पर तुझमें सुदृढ प्रेम रखनेवाली उस दमयन्ती ने तुझे हो अपने पति के रूप में वरण किया है। यही कहने के लिए मैं आया हूँ' ।॥ २५२॥
इस प्रकार, शुभ फल को प्रकट करनेवाले हंस के वचनों से और कामदेव के पुष्प-वाणों से वह राजा नल एक साथ ही विष गया ।। २५३।।
जौर उस हंस से बोला-हे पक्षिश्रेष्ठ, मैं धन्य हूँ, मूत्तिमती मनोरथ सम्पत्ति के समान जिसने मुझे बरग कर लिया है ॥२५४॥
ऐसा कहकर राजा से छोड़े गये उस हंस ने, उसी समय विदर्भ देश में जाकर दमयन्ती से सच्ची बात बता दी और वह इच्छानुसार चला गया ।।२५५।।
नल के लिए उत्कंठित दमयन्ती ने, माता द्वारा नल की प्राप्ति के लिए पिता से अपना स्वयंवर कराने की प्रार्थना की ॥२५६।।
राजा ने भी, इस बात की स्वीकृति देकर, दमयन्ती के स्वयंवर के लिए, पृथ्वी के सभी राजाओं के पास दूत भेज दिये ॥२५७।।
दूतों के द्वारा स्वयंवर-समाचार प्राप्त होने पर सभी राजा, विदर्भ के प्रति जाने लगे और उत्कंठित नल भी, रथ पर सवार होकर विदर्भ के लिए बला ॥२५८॥
तदनन्तर, नल-दमयन्ती के प्रेम-स्वयंवर का मनाचार इन्द्र आदि सभी लोकपालो ने नारद मुनि से मुना। यह सुनकर इन्द्र, वायु, यम, अग्नि, वरुण पाँचों लोकपाल, आपन में सम्मति करके नल के पास गये ॥२५०-२६०॥
और. विदर्भ को जाने हुए विनम्र नल में मार्ग में ही मिलकर वे बोले- तुम हमारी ओर से हमारे मन्देश दमयन्ती को जाकर मुना दो ॥२६१॥
किनू हम पांचों में में किमी एक लोकपाल की वर ले। मानव नल से तुझे क्या मुख मिलेगा ? क्योंकि, मनुष्य मरणवर्मा होते हैं और देवता अमर हैं।॥२६२॥
और तू हमारे वरदान में अदृश्य होकर उनके पास जा सकेगा। दूसरे व्यक्ति तुझे न देख सकेंगे।' नल ने देवताओं की इस आज्ञा को ठीक हैं' कहकर मान लिया ॥२६३॥
और, दमयन्ती के भवन में अदश्य रूप से जाकर उगे देवताओं का सन्देश उसी प्रकार उसने सुना दिया ॥२६४।।
यह मुनकर वह पतिव्रता बोकी 'बह देवता भले ही अमर हों, मेरा पति तो नल हो होगा। मुझे देवताओं से क्या प्रयोजन ? ॥ २६५॥
दमयन्ती का यह उत्तर सुनकर नल ने उसके सामने अपने को प्रकट कर दिया, फिर जाकर इन्द्र आदि लोकपालों से उसका उत्तर उसी प्रकार कह दिया ।। २६६७।
तब प्रसन्न देवताओं ने नल से कहा है सत्यवादी हमलोग तेरे वश में है। तू जब भी हमें स्मरण करेगा, तभी हम तेरे समीप आयेंगे। इस प्रकार का वर उसे देकर वे देवता चले गये ॥२६७।।
तब नल के प्रमग्र होकर विदर्भ की ओर चले जाने पर दमयन्ती को ठगने की इच्छा से देवताओं ने नल का रूप धारण कर लिया ॥२६८॥
और, राजा भीम की सभा में जाकर मनुष्यों का-सा व्यवहार करनेवाले वे देवता, स्वयंवर प्रारम्भ होने पर, नल के पास ही बैठ गये ॥ २६९॥
तदनन्तर, अपने भाई के द्वारा एक-एक करके परिचित कराये जाते हुए अनेक राजाबों को छोड़ती हुई दमयन्ती, क्रमशः नल के पास पहुंची ॥२७०॥
वहाँ जाकर छाया (परछाई), पलक गिरना आदि मानव गुणों से युक्त छह नलों को देखकर माई के व्याकुल हो जाने पर दमयन्ती सोचने लगी-॥२७१॥
अवश्य ही उन पाँचों लोकपालों ने, यह मावा फैलाई है। इसलिए, इनमें छठे को ही मैं वास्तविक नल समहूँ और कोई दूसरा उपाय नहीं है।॥ २७२॥
ऐसा सोचकर एकमात्र नल में लगे हुए मनवाली दमयन्ती सूर्य की ओर मुँह करके इस प्रकार बोली-॥२७३।।
हे लोकपालो, यदि स्वप्न में भी मेरा मन नल को छोड़कर किसी दूसरे पुरुष में न गया हो, तो इसी सत्य के प्रभाव से मुझे अपना स्वरूप दिलाओ ॥२७४।।
विवाह से पहले ही वर लिये गये पुरुष के अतिरिक्त कन्या के लिए और सभी पर-पुरुष हैं और दूसरों के लिए, वह कन्या परस्त्री के समान है। तब तुम लोगों का यह कैसा अज्ञान है' ।।२७५॥
यह सुनकर इन्द्र आदि पाँचों लोकपाल, अपने वास्तविक रूप में आ गये और छठा राजा नल, अपने यवार्य रूप में स्पष्ट हुआ ॥ २७६॥
तब प्रसन्न दमयन्ती ने, खिले हुए नीलकमलों के समान अपनी दृष्टि और वरमाला, दोनों ही राजा नल को डाल दिये ॥ २७७॥
इतने में आकाश से पुष्यों की वर्षा हुई। तब राजा भीम ने दमयन्ती का नल के साथ विधिपूर्वक विवाह कर दिया ॥२७८॥
इसके बाद भीम के द्वारा उचित शिष्टाचार और सत्कार किये गये अन्यान्य राजा और इन्द्र आदि देवता भी अपने-अपने स्थानों को गये ॥ २७९॥
इन्द्र आदि देवताओं ने जाते हुए मार्ग में द्वापर और कलियुग को देखा। उन दोनों को दमयन्ती के स्वयंवर के निमित्त आये हुए जानकर उनसे वे देवता बोले-॥२८०॥
'अब तुमलोग विदर्भ की ओर न जाओ। हम लोग यहीं से आ रहे हैं। स्वयंवर हो गया और दमयन्ती ने राजा नल को कर लिया ॥ २८१॥
यह सुनते ही वे दोनों पापी क्रोष से बोले-'आप लोगों के समान देवताओं को छोड़कर उसने मनुष्य का वरण किया, इसलिए हम उन दोनों का वियोग अवश्य करायेंगे', इस प्रकार प्रतिज्ञा करके वे दोनों वहीं से लौट गये ॥ २८२-२८३॥
उपर राजा नल, सात दिनों तक ससुराल में रहकर, नई वधू दमयन्ती के साथ निषध देश को आ गया ।॥२८४।।
यहाँ उन दोनों का प्रेम गौरी और शंकर के प्रेम से भी अधिक था; क्योंकि गौरी, शंकर का आधा (बायाँ) भाग थी, किन्तु दमयन्ती तो नल का सर्वस्व ही, अर्थात् पूरी आत्मा थी ॥२८५।।
कुछ समय के अनन्तर दमयन्ती ने, नल से, पहले चन्द्रसेन नामक पुत्र और उसके उपरान्त इन्द्रसेन नाम की कन्या को जन्म दिया ॥२८६॥
इतने दिनों तक कलियुग अपनी पूर्व प्रतिज्ञा पर दृढ रहकर शास्त्र-मर्यादा का पालन करने-वाले नल का छिद्र (दोष) खोजने में लगा रहा ॥ २८७।।
कुछ दिनों के अनन्तर एक बार मद्य के नशे की मस्ती में स्मृतिहीन राजा नल, बिना सन्ध्या किये और बिना पैर घोये ही जाकर सो गया ॥२८८॥
रात-दिन मौका ढूंढ़ते हुए कलि ने यह अच्छा अवसर देखकर नल के शरीर में प्रवेश किया ॥२८९।।
इस प्रकार, कलियुग के अपने शरीर में प्रविष्ट हो जाने से वह नल धार्मिक आचार-विचारों को छोड़कर मनमाना आचरण करने लगा ॥२९०।।
जैसे, जुआ खेलने लगा, दामियों के साथ रमण करने लगा, झूठ बोलने लगा, दिन में सोने और रात्रि में जागने लगा ॥ २९१॥
बिना कारण कोष करने लगा, अन्याय से धन कमाने लगा, सज्जनों का अपमान और दुष्टों का मम्मान करने लगा ॥ २९२॥
ऐगे ही उसके भाई पुष्कर के भी सन्मार्ग का परित्याग करने पर, अवसर पाकर, द्वापर ने उसके भी शरीर में प्रवेश किया ॥२९३।।
एक बार, नल ने अपने छोटे भाई पुष्कर के घर पर दान्त नाम के सुन्दर श्वेत बैल को देखा ॥२९४॥
लोभ के कारण उस बैल को माँगते हुए बड़े भाई नल को, द्वापर से ग्रसे हुए पुष्कर ने बह बैल नहीं दिया ॥२९५।।
और बोला- 'यदि इस बैल पर तुम्हारी इच्छा है, तो तुम जूए में जीतकर मुझसे इसे ले लो। देर न करो। यह सुनकर कलि से बसे हुए नल ने, यह प्रस्ताव स्वीकार किया और उन दोनों भाइयों का परस्पर जूआ आरम्भ हुआ ।॥ २९६-२९७।।
पुष्कर की ओर से बैल दाँव पर था और नल की ओर से हाथी-घोड़े आदि दाँव पर लगाये गये थे। अन्त में, पुष्कर जीत गया और नल हार गया ॥ २९८॥
इस प्रकार दो-तीन दिनों तक निरन्तर चलते हुए जूए में सारी सेना, खजाना आदि हार जाने पर भी, नल ने, कलिग्रस्त होने के कारण मना किये जाने पर भी, किसी की एक न मानी ॥२९९।।
तब, दमयन्ती ने राज्य को चौपट हुआ समझकर दोनों बच्चों को उत्तम रथ में बैठाकर अपने पिता के घर मेज दिया ॥३००।।
धीरे-धीरे, नल सारा राज्य हार गया। तब उससे जितेन्द्रिय पुष्कर ने कहा-'तुम सब कुछ तो हार चुके हो, अब उस बैल के दाँव पर दमयन्ती को लगाओ ।॥३०१-३०२॥
उसकी इन बातों की आँषी से आग की तरह जलता हुआ नल, उस बुरे समय में भी उससे कुछ नहीं बोला और न दमयन्ती को ही दाँव पर लगाया ।।३०३॥
तब उसके भाई पुष्कर ने कहा- 'यदि दाँव पर दमयन्ती को नहीं लगाते हो, तो तुम उसके साथ ही मेरे देश से निकल जाओ' ॥३०४।।
तब राजा नल दमयन्ती के साथ उस देश से निकल गया और राज्य के सिपाही उसे राज्य की सीमा तक छोड़ आये ॥३०५॥
'हाय ! जहाँ कलि ने नल की भी ऐसी दुर्दशा कर डाली, वहाँ अन्यान्य कीड़ों के समान साधारण प्राणियों को कथा ही क्या है ॥ ३०६।।
ऐसे धर्महोन और स्नेह-रहित जूए को बार-बार धिक्कार है, जो नल-जैसे राजषियों को भी विपत्ति में डाल देता है और जो कलि तथा द्वापर का जीवन है ।। ३०७७॥
तदनन्तर, भाई द्वारा विजित विदेश को जाता हुआ. भूख से व्याकुल वह नल, एक बन के मध्य में एक तलाब पर पहुँचा ॥ ३०८॥
वहाँ पर कुद्मों से कटे हुए कोमल पैरोंवाली दमयन्ती के साथ, उस जंगली सरोवर के तट पर उस नल ने दो हंसो को देखा ॥३०९।।
उनको पकड़ने के लिए उसने उन पर अपना दुपट्टा डाला, परन्तु वे हंस उसे भी अपने साथ लेकर उड़ गए ॥३१०।।
तब नल ने आकाश से यह वाणी सुनी कि ये दोनों हंस जूए के दो पासे थे, जो तेरा वस्त्र भी ले गये ॥३११॥
अब केवल एक वस्त्र (घोती) ही पहना हुआ नल दुःखित मन से बैठा हुआ, दमयन्ती को उसके पिता के घर का मार्ग बताने लगा-॥३१२॥
'हे प्रिये, यह मार्ग विदर्भ की ओर तेरे पिता के पर को जाता है और यह कोशल देश की बोर' ॥३१३॥
यह सुनकर दमयन्ती को यह शंका हुई कि क्या आर्यपुत्र ! मुझे मार्ग बताकर छोड़ना चाहते हैं ।॥३१४।।
तब वे दोनों पति-पत्नी, सायंकाल में फल, मूल, जल आदि खा-पीकर कुशा के मास्तरण पर बान्त होकर सो गये ॥३१५॥
मार्ग-श्रम से श्रान्त दमयन्ती, धीरे-धीरे गहरी नींद में सो गई, किन्तु कलियुग से मोहित नल, उसे छोड़कर भागने की चिन्ता में जागता ही रहा ॥३१६॥
तदनन्तर, उसे सोई हुई जानकर, एक वस्त्र पहने हुए दमयन्ती को छोड़कर, उसकी चादर के फटे हुए आधे टुकड़े को ओड़कर वह नाल वहाँ से चला गया ।॥३१७।।
रात बीतने पर जगी हुई दमयन्ती ने, बन में पति को न देखकर और उसे त्याग कर गया हुबा जानकर विलाप करना आरम्भ किया-॥३१८॥
'हाय, आर्यपुत्र ! हाय महासत्त्वशालिन् ! हाय शत्रुओं पर भी कृपा करनेवाले! हाय मेरे प्यारे ! किसने तुझे मेरे प्रति इतना निर्देय बना दिया ? ॥३१९॥
तू अकेला इन घोर जंगलों में कैसे जायगा, तेरी यकावट दूर करने के लिए कौन सेवा करेगा। राजाओं के गिर पर धारण की हुई मालाओं के पराग से जो तेरे चरण रंग जाते थे, उन तेरे चरणों को अब मागं की धूल कलुषित करेगी! ॥३२०-३२१॥
जो तेरा शरीर, चन्दन के लेप का भी सहन नहीं कर सकता था, वह अब दोपहर के सूर्य की प्रचंड गरमी को कैसे सहन करेगा ॥३२२॥
मुझे शिशु बालक से क्या करना है, लड़की से क्या और अपनी आत्मा से भी क्या लाभ है? यदि मैं सती हूँ, तो उसके प्रभाव से देवता तेरा कल्याण करें ॥३२३॥
इस प्रकार, एक-एक बात के लिए नत की चिन्ता करती हुई वह सती दमयन्ती, नल द्वारा पहले दिन दिखाये हुए मार्ग से आगे चल पड़ी ॥ ३२४॥
मार्ग में जाते हुए उसने, नदियों, पहाड़ों और जंगलों को किसी प्रकार पार किया; किन्तु पति-भक्ति को वह किसी प्रकार पार न कर सकी ॥३२५।।
मागं में उसके सतीत्व के तेज ने उसकी रक्षा की; जिससे वह सर्प से बच गई और उस पर आसक्त व्याष (बहेलिया) भस्म होगया ॥ ३२६॥
तब दैवयोग से मार्ग में मिले हुए व्यापारियों के एक दल के साथ वह सुबाहु नाम के राजा के नगर में जा पहुँची ।॥३२७॥
वहाँ पर राजकुमारी ने, अपने महल से बैठे-बैठे दमयन्ती को दूर से ही देख लिया बौर उसकी सुन्दरता से प्रसन्न होकर उसे बुलवाकर और भेंट-रूप में उसे अपनी माता को सौंप दिया ॥ ३२८॥
तब वह दमयन्ती उस, महारानी से समावृत होकर उसी के पास रहने लगी। समाचार पूछने पर उसने इतना ही कहा कि मेरा पति मुझे छोड़कर चला गया ॥ ३२९॥
उभर दमयन्ती के पिता भीम ने नल का समाचार जानकर, नल और दमयन्ती के कुशल जानने के लिए चारों बोर दूत भेजे ॥३३०॥
उन दूतों में सुषेण नाम का एक मन्त्री, घूमता हुआ ब्राह्मण के वेश में सुबाहु की राजधानी में आ पहुंचा ॥३३१॥
वहाँ मन्त्री ने, आगन्तुकों में अपने परिचितों को ढूंढ़ती हुई दमयन्ती को देखा और उस दुखिया दमयन्ती ने भी पिता के मन्त्री को देखा ॥३३२॥
वे दोनों, परस्पर पहचानकर इस प्रकार रोने लगे कि सुबाडू राजा की रानी ने उन्हें जान लिया ॥३३३।।
जब उसने उन दोनों को अपने पास बुलाकर विस्तृत समाचार पूछा, तब उसे पता चला कि वह उसकी बहन की कन्या दमयन्ती है ॥ ३३४॥
तब महारानी ने, अपने पति में कहकर और दमयन्ती का सम्मान करके उसे रथ पर बैंडाकर मैनिक, सिपाहियों और मुषेण मन्त्री के साथ पिता के घर भेज दिया ।॥३३५।।
पिता के घर पहुँचकर और अपने दोनों बच्चों को पाकर पिता के संरक्षण में पति की प्रतीक्षा करती हुई दमयन्ती वहाँ रहने लगी ।।३३६॥
नल को पाक-विद्या और रथ चलाने की कला में विशेषज्ञ बताते हुए उसका परिचय देकर उसे ढूंढने के लिए दमयन्ती के पिता भीम ने, चारों ओर अपने गुप्तचर भेजे ॥३३७।।
और, गुप्तचरों से राजा भीम ने कहा- "जहाँ तुम्हें नल के होने का सन्देह हो, वहाँ तुम इस आर्या को पढ़ना वन में सोई हुई कुमुदिनी के समान सुन्दरी नवयुवती पत्नी को क्रूरता से छोड़कर बम्बर (वस्त्र और आकाश) का टुकड़ा पाकर हे चन्द्र, तू अदृश्य होकर कहाँ चला गया?"।॥३३८-३३९॥
उघर, राजा नल, उस वन में, रात्रि के समय, दमयन्ती को छोड़कर आघा दुपट्टा बोढ़े हुए दूर चला गया और आगे जाकर उसने वन में लगी हुई आग देखी ॥३४०॥
'हे महापुरुष, विवश मुझे जबतक यह दावाग्नि जला नहीं देती, उसके पहले ही मुझे इससे निकाल लो' ।।।३४१॥
ऐसा बचन सुनकर राजा ने ध्यान से देखा कि दावानल के पास कुंडली मारे हुए एक नाग बैठा है।॥ ३४२॥
वनाग्नि की लपटों से उस नाग के फथ की मणि की किरणें जटिल हो रही हैं, मानों वनाग्नि ने हाथ में प्रबंड शस्त्र लेकर उसकी खोपड़ी पकड़ ली हो ।॥ ३४३॥
राजा नल ने दया करके उसके समीप जाकर और उसे कंधे पर रखकर दूर ले जाकर जैसे ही छोड़ना चाहा, वैसे ही वह नाग बोला-॥३४४।।
'यहाँ से और दस पग आगे ले जाकर मुझे छोड़ो।' तब नल एक, दो, चीन, चार, पाँच, छह सात, इस प्रकार गिनकर दस पग आगे गया। जब राजा ने दस (दश)¹ कहा, तब छल से कंधे पर बैठे हुए उस नाग ने ललाट के पास उसे हैंरु लिया। इस कारण, वह राजा, छोटे हाथोंवाला काला और विरूप हो गया- ॥३४५-३४७।।
तब राजा ने क्रोष से नाग को उतारकर कहा-'तू कौन है और तूने मेरे साथ यह क्या प्रत्युपकार किया है ?'।॥३४८॥
नल के यह वचन सुनकर वह नाग उत्तर देता हुआ बोला- 'राजन्, मुझे नागों का राजा कर्कोटक नाम से जानो। गुप्त निवास करने में रूप का बदल जाना महान् पुरुषों की कार्यसिद्धि के लिए ही होता है। इसलिए, मैंने तुम्हारे ललाट पर हंसा है, जो तेरे लाभ के लिए ही होगा ॥३४९-३५०॥
और, यह अग्निशौच नाम के वस्त्र का जोड़ा लो। इसे ओड़ते ही तुम अपने पूर्वरूप में आ जाओगे ॥३५१॥०
ऐसा कहकर और उसे शौचवस्त्र का जोड़ा देकर, कर्कोटक चला गया। उसके चले जाने पर, तल क्रमशः कोशल देश में जा पहुंचा ।।३५२॥
वहाँ जाकर वह नल, कोगलराज ऋतुपर्ण के घर में ह्रस्वबाहु के नाम से पाचक (रसोइया) बन गया ।॥३५३॥
वह जो दिव्य रसवाले भोजन बनाता था और रथ चलाने की विशेषता रखता था, इससे उसने उस राज्य में पर्याप्त यश प्राप्त कर लिया।। ३५४।।
जब कि नल हुस्वबाहु के नाम से वहाँ नौकरी कर रहा था, इसी बीच विदर्भ-राज्य के गुप्तबरों में से एक वहाँ आवा ॥३५५॥
निदिष्ट चिह्नों से वह नल को जानकर और उसे राजसमा में बैठे हुए देखकर, वह गुप्तचर युक्ति से वहाँ जा पहुंचा। वहाँ जाकर उसने अपने स्वामी भीम द्वारा कही हुई आर्या -पढी।।३५६-३५७।।
'वन में सोई कुमुदिनी के समान सुन्दरी नवयुवती पत्नी को क्रूरता से छोड़कर अम्बर (वस्त्र और आकाश) का टुकड़ा पाकर हे चन्द्र, तू अदृश्य होकर कहाँ चला गला गया ?' ॥३५८॥
उसे सुनकर सभासदों ने उसे पागल का प्रलाप समझा, किन्तु रसोइए के वेश में प्रच्छन्न नल ने उसे उत्तर दिया ॥३५९॥
'क्षीण चन्द्रमा, अम्बर (वस्त्र और आकाश) के एक देश से दूसरे (सूर्य-मंडल) मंडल में जाकर यदि कुमुदिनी के लिए अदृश्य हो जाता है। तो उसमें उसकी क्या क्रूरता है ?' ॥३६०॥
यह उत्तर सुनकर और उसे विपत्ति के कारण विकृत रूपवाला नल समझकर वह गुप्तचर वर्षों से चला गया ॥३६१॥
और, विदर्भ की राजधानी में पहुँचकर उसने महारानी के सहित राजा भीम तथा दमयन्ती से, जो कुछ उसने देखा-सुना था, सब कह मुनाया ।।३६२।।
यह सुनकर दमयन्ती, एकान्त में अपने पिता से बोली-'पाचक के रूप में छिपा हुआ बह अवश्य ही मेरा पति है ॥ ३६३॥
अब उसके यहाँ बुलाने में मेरी युक्ति कीजिए। उस राजा ऋतुपर्ण के पास दूत भेजिए, वह दूत राजा ऋतुपर्ण के पास पहुंचते ही राजा से यह कहे कि राजा नल कही चला गया है। उसका पता अब नहीं लग रहा है।॥ ३६४-३६५॥
अब दमयन्ती प्रातःकाल ही फिर स्वयंवर करेंगी। इसलिए, आप स्वयंवर के लिए आज ही विदर्भ देश में पधारे ॥ ३६६॥
यह सुनकर वह राजा, रथ चलाने में कुशल आर्यपुत्र (नल) के साथ एक दिन में अवश्य ही यहाँ आ जायगा' ।॥३६॥
पिता के साथ उसने इस प्रकार विचार कर और तदनुसार उसने कोसलराज के पास उपयुक्त दूत को भिजवाया ।।। ३६८॥
उस दूत ने, राजा ऋतुपर्ण को उसी प्रकार जाकर सन्देश दे दिया। उत्सुक राजा ऋतुपर्ण ने भी, सूत के रूप में अपने पास में स्थित नल से कहा ॥ ३६९।।
है ह्रस्वबाडू, तुमने मुझसे कहा था कि मुझे रथ चलाने का ज्ञान भी है, तो यदि तुम्हें उत्साह है, तो मुझे बाज ही विदर्भ देश की राजधानी में पहुंचा दो ॥ ३७०।।
यह सुनकर नल ने कहा, 'ठीक है. पहुंचाता हूँ।' इस प्रकार कहकर और अच्छे-अच्छे घोड़ों को जोड़कर उसने एक उत्तम रथ तैयार किया ॥३७१।।
यह स्वयंवर का प्रचार, मेरी प्राप्ति के लिए एक बहाना मात्र है, ऐसा मैं समझता हूँ; क्योंकि दमयन्ती तो स्वप्न में भी ऐसी नहीं है (कि वह पुनः स्वयंबर करे) ॥३७२॥
तो अब वहाँ जाकर देखता हूँ ऐसा सोचकर उसने, राजा ऋतुपर्ण के लिए, सजा-सजाया तैयार रथ ला दिया ॥ ३७३।।
राजा के रथ पर आरूढ़ हो जाने पर नल ने, गरुड को जीतनेवाले वेग से रथ को हाँका ॥३७४।।
रथ के वेग से राजा ऋतुपर्ण का वस्त्र गिर गया। तब रथ को रोकने के लिए कहते हुए राजा ऋतुपर्ण से नल ने कहा कि 'राजन्, तुम्हारा वह वस्त्र कहाँ गिरा, यह पता नहीं लगेगा; क्योंकि यह रथ, अनेक योजन आगे आ चुका है' ।।३७५-३७६।।
यह सुनकर राजा ऋतुपर्ण नल से बोला- 'तू मुझे रथ चलाने की क्रिया बता। मैं तुझे पासा फेंकने का तरीका बताता हूँ और उसका ज्ञान भी अभी कराता हूँ, जिससे पासे अपने वश में हो जाते है और संख्या भी मालूम हो जाती है ।।३७७-३७८॥
यह सामने जो वृक्ष दीख रहा है, उसके पत्तों और फलों को गिनकर मैं तुम्हें बताता हूँ और फिर तुम भी उसे गिनकर देखो' ।॥ ३७९॥
ऐसा कहकर ऋतुपर्ण ने, उम पेड़ के जितने पत्ते और फल बताये थे, नल के गिनने पर उतने ही निकले ॥३८०॥
तब गजा नन्न ने ऋनुपर्ण को रथ-मंचालन-विद्या बता दी और राजा ऋतुपर्ण ने उसे अक्ष-विद्या (युत-कला) ॥३८१॥
तब नल ने, उम विद्या को परीक्षा, एक दूसरे पेड़ पर की और उसने उमे भली भाँति मही पाया ॥३८२॥
यह जानकर राजा नल, जब प्रसन्न हुआ, तब उसके शरीर से एक काला पुरुष निकला। राजा ने उससे फिर पूछा- 'तू कौन है ।। ३८३॥
वह बोला-'मैं कलियुग हूँ। दमयन्ती के द्वारा तेरा वरण करने पर मैं ईर्ष्या से तेरे शरीर में घुमा। इसी कारण जुआ खेलने में तेरी मम्पत्ति नष्ट हो गई ॥ ३८४
तदनन्तर, वन में तुझे इंसते हुए काकर्कोटक ने तुझे नहीं हंसा, बल्कि मुझे इंसा। देख, यह जला हुआ मैं तेरे सामने बड़ा हूँ ।॥३८५॥
व्यर्थ ही दूसरे का अपमान करना किसके लिए कल्याणकारी होता है। इसलिए, बेटा, अब मैं जाता हूँ। अब दूसरों में मेरे रहने का स्थान नहीं है' ॥३८६॥
ऐसा कहकर वह कलि अदृश्य होगया और नल भी, उसी समय पहले के समान धर्मात्मा और तेजस्वी हो गया ॥ ३८७॥
तब नल ने आकर और रथ पर बैठकर वेग से उसी दिन, उस राजा ऋतुपर्ण को विदर्भ देश में पहुंचा दिया ॥ ३८८॥
वह राजा ऋतुपर्ण वहाँ के लोगों द्वारा हँसी का पात्र बनाया जाता हुजा वहीं राजभवन के पास ठहरा ॥ ३८९॥
आश्चर्यजनक रम की ध्वनि को सुनकर नल के आने की सम्भावना करती हुई दमयन्ती, हृदय से प्रसन्न हुई ।॥३९०।।
तदनन्तर उसने वास्तविक बात जानने के लिए उसके पास एक दासी को भेजा। वह दासी सब जानकर नल के लिए उत्सुक दमयन्ती से बोली-॥३९१॥
'हे देवि, मैंने जाकर पता लगाया कि यह राजा ऋतुपर्ण, तेरे झूठे स्वयंवर का निमन्त्रण पाकर बाया है। उसे ह्रस्वबाहु नाम का सारची एक दिन में ही यहाँ से आया है। क्योंकि, वह रय-संचालन-विज्ञान का विशेपज है ॥ ३९२-३९३।।
तो, मैंने रसोईचर में जाकर उम रसोइए को देखा। वह काले रंग और विकृत रूप का कोई व्यक्ति है।॥३९४॥
उसका च८त्कार मैंने देखा कि उसने चावलों में पानी नहीं डाला था, किन्तु उनमें स्वयं पानी आ गया लकडियों में आग न लगाने पर भी लकड़ियाँ अपने-आप जल उठीं और पलक मारते ही उसने अनेक प्रकार के दिव्य भोजन तैयार कर दिये। यह सब देखकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ और मैं यहाँ आई ॥३९५-३९६॥
दामी के मुंह में यह गब सुनकर दमयन्ती सोचने लगी 'अग्नि और जल जिसके वश में हों और जो ग्य-विया के रहस्य को जानता है, आर्यपुत्र (नक) इतना विरूप कैसे हो गया। मैं नमझती हूँ, मेरे विधोग से पीड़ित होने के कारण ऐसा हुआ होगा। तो मैं अब उसी से पूछती हूँ ॥३९७-३९८॥
ऐमा मोचकर दमवन्नी ने, उम दामी के साथ अपने दोनों बच्वों को नल के पास भेजा ॥३९९।।
उन्हें देखकर और दोनों बच्चों को गोद में लेकर बहुत समय तक धारा-प्रवाह आँसू बहाते हुए नल मौन रोता रहा ॥४००॥
कुछ समय बाद वह बेटी (दासी) से बोला ऐमे ही मेरे दो बच्चे, अपने नाना के घर में हैं। उन्हें स्मरण करके मुझे दुःख हुआ ।॥४०१॥
तब उस दासी ने, उन बच्चों के साथ लौटकर दमयन्ती को सारा समाचार सुनाया। तब दमयन्ती को भी पूर्ण विश्वास होगया ।॥४०२॥
दूसरे दिन, प्रातःकाल उसने दासी को आज्ञा दी कि तू जाकर राजा ऋतुपर्ण के रसोइए से कह दे-॥४०३।१
कि मैंने सुना है, 'तेरे समान दूसरा कोई रसोईदार नहीं है, अतः आज तू मेरे यहाँ आकर व्यंजन बना' ॥४०४
'ठीक है' ऐसा कहकर दासी द्वारा प्रार्थित किया गया पाचक, ऋतुपर्ण से आज्ञा लेकर दमयन्ती के पास आया ॥४०५।।
तब उसे देखकर दमयन्ती बोली-'रसोइए का रूप धारण किये हुए तुम यदि राजा नल हो, तो चिन्ता-समुद्र में डूबी हुई मुझे बाज पार लगाओ' ॥४०६।॥
यह सुनकर स्नेह, दुःख और लज्जा से जाकुल राजा नल नीचे मुँह किये हुए आँसुओं से रुधे गले से अवसर की बात बोला- ॥४०७॥
'हाँ, मैं वही बज-सा कठोर पापी नल हूँ। तुम्हें सन्तप्त करते हुए मैंने नल होकर भी अन्नल (अग्नि) का काम किया है' ।॥४०८॥
इस प्रकार कहते हुए नल से दमयन्ती ने पूछा कि यदि ऐसा है, तो तुम इतने कुरूप कैसे हो गये ? ॥४०९।।
इस प्रकार पूछती हुई दमनन्ती को नल ने अपना पिछला सारा समाचार-काकर्कोटक को आग से निकालने से लेकर कलियुग के शरीर से निकलने तक का मुना डाला ॥४१०॥
और, उसी समय काकर्कोटक के दिये हुए अग्नि से शुद्ध वस्त्रों को पहनकर वह नल, फिर से अपने पुराने और वास्तविक रूप में आ गया ॥ ४११॥
पुनः अपने सच्चे रूर में आये हुये सुन्दर नल को देखकर खिले हुए कमल के समान मुल-वाली दमयन्ती ने आंखों के आंसुओं में दु.ब-दावानल के शान्त हो जाने पर अवर्णनीय आनन्द का अनुभव किया ॥४१२॥
नल के मिल जाने में अत्यन्त प्रसन्न सेवक-सेविकाओं द्वारा नल का सहसा प्रकट हो जाना जानकर, उम विदर्भ राज भीम ने, वहाँ आकर नल का समुचित अभिनन्दन और समुचित आदर-मत्कार करके अपने नगर को महोत्सवमय बना दिया ॥४१३।।
तदनन्तर, मन-ही-मन हँसते हुए राजा भीम के द्वारा समुचित रूप से सत्कृत राजा ऋतुपर्ण भी नल को बधाई देकर कोसल देश को चला गया ।॥४१४।।
इसके पश्चात् नियच देश के राजा नल ने, कलियुग की दुष्टता के कारण होनेवाले उपद्रव को, राजा भीम को मुनाकर, अपनी प्राणप्यारी दमयन्ती के साथ वहीं सुखपूर्वक निवास किया ॥४१५॥
कुछ ही दिनों के अनन्तर धर्मात्मा राजा नल ने अपने श्वशुर की सेनाओं के साथ निषब देश में जाकर और अपने भाई पुष्कर को पासों के विज्ञान से जीतकर उसे बाज्ञाकारी बना लिया। देह से द्वापर के निकल जाने पर, शान्त हुए छोटे भाई पुष्कर को, उसका अपना भाग देकर नल अपनी प्राणप्रिया दमयन्ती के साथ अपने राज्य का पुनः विधिपूर्वक शासन करने लगा ॥४१६।।
तारापुर नगर में, इस प्रकार कथा सुना करब्राह्मण सुमन ने प्रोषितपतिका राजकुमारी बन्बुमती से फिर कहा-॥४१७॥
'हे राजपुत्री, बड़े-बड़े लोग भी, इस प्रकार का बसह्य कष्ट भोगकर पुनः कल्याण प्राप्त करते हैं। सूर्य के समान प्रचंड तेजस्वी भी, अस्त का अनुभव करके फिर उदय लेते हैं।॥४१८॥
इसलिए हे सदाचारिणी, तू भी यात्रा से लौटने पर अपने पति को अवश्य प्राप्त करेगी। धैर्य रख, उद्विग्नता छोड़। और, पति-प्राप्ति की कामना पूर्ण होने से आनन्द प्राप्त कर' ।।४१९॥
इस प्रकार, कहते हुए उस ब्राह्मण को बहुत धन, वस्त्र आदि से सत्कृत कर वह सद्गुणोंवाली बन्धुमती चैर्य-धारण करके अपने पति के अध्गमन की प्रतीक्षा में पिता के घर में निवास करती थी ॥४२०॥
कुछ ही दिनों के पश्चात् उसका पति महीपाल, दूसरे देश में रहनेवाली अपनी माता को साथ लेकर पिता-सहित पुनः अपनी राजधानी (तारापुर) में लौट आया ॥४२१॥
प्रजा के नेत्रों को आनन्द देनेवाले महोपाल ने, अपनी पत्नी बन्धुमती को इस प्रकार आनन्दित किया, जैसे पूर्णिमा का बन्द्र, समुद्र की लक्ष्मी को आनन्दित करता है।॥४२२॥
तदनन्तर महीपाल, बन्धुमती के साथ, उसके पिता द्वारा दिये गये राज्य के भार को वहन करता हुआ और अभीष्ट भोगों को प्राप्त करता हुआ अपनी पृथ्वी का शामन करने लगा ॥४२३॥
वत्सेश्वर उदयन का पुत्र नरवाहनदत्त, अपनी पत्नियों के साथ, मन्त्री मरुभूति के मुँह मे इस विवित्र और राग-मनोहर कथा को सुनकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ। ॥४२४।।
महान कवि श्रीनोमदेव भट्ट द्वारा रचित कथासरित्सागर के अलंकारवती-लम्बक का षष्ठ तरंग समाप्त
नवम अलंकारवती-लम्बक समाप्त
1. सौदागरों का मुलिया, सरकार।
2. सस्कृत में, 'दश्, धातु से लोट्, मध्यम पुरुष एकवचन में निष्पन्न 'दश' का अर्थ होता है-डेंतो। सख्या के अर्थ में दंश बस के लिए प्रसिद्ध है। अनु०
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