51007 || सप्तम कहानी || नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत); यशोधर और लक्ष्मीघर की कथा; मगर और वानर की कथा; कान और हृदय से हीन गधे की कथा; धनी और गवैये की कथा; मूर्ख शिष्यों की कथा; चावल खाने वाले मूर्ख की कथा; गधे का दूध दुहने की कथा।

51007 || सप्तम कहानी || नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत); यशोधर और लक्ष्मीघर की कथा; मगर और वानर की कथा; कान और हृदय से हीन गधे की कथा; धनी और गवैये की कथा; मूर्ख शिष्यों की कथा; चावल खाने वाले मूर्ख की कथा; गधे का दूध दुहने की कथा।

सप्तम तरंग

रात बीतने और प्रातःकाल होने पर, प्राणप्यारी शक्तियशा के लिए उत्सुक नरवाहनदत्त, उसका ध्यान करता हुआ व्याकुल हो गया ।॥१॥

उसके विवाह की एक मास की अवधि को एक युग के समान मानते हुए नववधू के लिए उत्सुक-हृदय नरवाहनदत्त को, चैन नहीं मिल रहा था। ॥२॥

गोमुख के मुख से यह समाचार जानकर उसके पिता वत्सराज ने स्नेह के कारण वसन्तक के साथ अपने मित्रों को भेजा ॥३॥

उनलोगों के गौरव (आश्वासन) से नरवाहनदत्त के कुछ धीरज घरने पर चतुर मन्त्री गोमुख ने, वसन्तक से कहा- ॥४।।

'आर्य वसन्तक, युवराज के मन को प्रसन्न करनेवाली कोई नई और रोचक कथा सुनाओ' ॥५॥

यशोधर और लक्ष्मीघर की कथा

तब बुद्धिमान् वसन्तक ने कथा प्रारम्भ की। मालव देश में श्रीधर नाम का प्रसिद्ध और श्रेष्ठ ब्राह्मण रहता था। उसके यहाँ एक साथ दो बालक उत्पन्न हुए। बड़े का नाम यशोधर और छोटे का नाम लक्ष्मीघर था ।॥६-७।।

युवावस्या में आये हुए वे दोनों भाई विद्याध्ययन के लिए पिता की आज्ञा से दूर देश को चले गये ॥८॥

क्रमशः मार्ग में चलते हुए उन्हें एक विशाल जंगल मिला। वह पानी और पेड़ों की छाया से हीन था और तपी हुई बालू से भरा था। उसमें जाते हुए वे दोनों घाम से विह्वल और प्यास से व्याकुल होकर सायंकाल फल और छायावाले एक विशाल वृक्ष के समीप पहुँचे ॥९-१०॥

उन्होंने उस वृक्ष के नीचे अलग से बनी हुई, शीतल और निर्मल जल से भरी हुई और कमलों की सुगन्धि से युक्त एक बावली देखी ॥११॥

उसमें नहाकर, भोजन करके और शीतल-मधुर जल पीकर तृप्त हुए वे दोनों एक पत्थर की चट्टान पर बैठकर विश्राम करने लगे ॥१२॥

सूर्य के अस्त हो जाने पर, सन्ध्या वन्दन करके, हिंस्रक जन्तुओं के भय से रात बिताने के लिए वे दोनों पेड़ पर चढ़ गये ।।१३।।

रात्रि होने पर उस बावली के जल के बीच से, उनके देखते-देखते बहुत-से पुरुष निकले ॥ १४॥

उनमें से कोई भूमि को साफ करने लगा, कोई लीपने लगा, और किसी ने वहाँ पाँच रंगों के फूल फैला दिये ॥१५॥

किसी ने वहाँ पर सोने का पलंग लाकर बिछा दिया, किसी ने उस पर लिहाफ के साथ गद्दी बिछाई, किसी ने सुन्दर पुष्प चुनकर सेज पर रख दिये। किसी ने उत्तमोत्तम भोजन-पान लाकर वृक्ष के नीचे एक ओर सजा दिये ॥१६-१७।।

तदनन्तर, उस बावली के तल से कामदेव को जीतनेवाला रूपवान्, दिव्य आभूषणों से विभूषित और तलवार हाथ में लिये हुए एक दिव्य पुरुष बाहर निकला ॥१८॥

वहाँ आकर और उसके आसन पर बैठ जाने पर, उसका सारा सेवक-परिवार उसी बावली में डूब गया ।॥१९॥

तब उसने बावली से दो स्त्रियों को निकाला, उनमें एक सुन्दरी, नम्र वेषधारिणी और मंगलसूचक वस्त्राभरणों से सुशोभित थी और दूसरी अत्यन्त सुन्दरी और भड़कीले वस्त्राभरणों से युक्त थी। वे दोनों उसकी पत्नियाँ थीं, उनमें दूसरी यानी छोटी उसे अधिक प्यारी थी ॥ २०-२१॥

तब पहली पतिव्रता स्त्री ने पति और सपत्नी (सौत) के आगे रत्न की दो थालियों में भोजन परोस दिया ॥२२॥

और, उन दोनों के भोजन कर लेने पर उस सती स्त्री ने स्वयं भोजन किया। तदनन्तर, उसका पति दूसरी छोटी स्त्री के साथ पलंग पर आनन्द-विलास करके नींद में सो गया। तब उसकी बड़ी (पहली) स्त्री उसके पैर दबाने लगी और दूसरी स्त्री भी पलंग पर पड़ी हुई जाग रही थी। ऊपर से यह सब देखकर उन ब्राह्मण-बालकों ने उसी वृक्ष पर बैठे हुए आपस में कहा- 'यह कौन होगा, यह बात जानने के लिए पैर दबानेवाली इस स्त्री से पूछना चाहिए। ये सभी कोई दैवी व्यक्ति हैं' ।। २३-२६॥

ऐसा सोचकर और वृक्ष से उतरकर जब वे पहली स्त्री की ओर चले, तबतक दूसरी लेटी हुई स्त्री ने यशोधर को देख लिया और इतने में, उग्र चंचलतावाली वह सोये हुए पति के पलंग से उठकर उसके पास आकर कहने लगी 'मेरा उपभोग करो' ।॥ २७-२८॥

यशोधर ने उससे कहा, 'पापिन, तू दूसरे की स्त्री है और में दूसरा पुरुष हूँ। फिर, इस प्रकार क्यों कहती है?' तब वह स्त्री बोली 'मैं तेरे जैसे सौ पुरुषों का संगम कर चुकी हूँ, तो मुझे क्या डर है? यदि विश्वास न हो, तो मेरी इन सौ अंगूठियों को देखो ॥२९-३०॥

एक-एक पुरुष से मैने एक-एक अंगूठी ली हैं', ऐसा कहकर उसने अपने आँचल की गाँठ से खोलकर उसे सौ अंगूठियाँ दिखा दीं ॥३१॥

तब यशोधर ने उससे कहा- 'तू सौ से समागम कर या लाख से, मेरी तो तू माता है। मैं उनके समान पतित नहीं हूं ॥३२॥

इस प्रकार यशोधर से तिरस्कृत स्त्री ने क्रोध से अपने पति को जगाकर और उसे यशोधर को दिखाकर रोते हुए अपने पति से कहा- 'तुम्हारे सोये रहने पर इस पापी ने मुझे बलात्कार करके भ्रष्ट कर दिया है।' उससे यह सुनते ही उसका पति, तलवार खींचकर उठ खड़ा हुआ ॥३३-३४।।

तदनन्तर, दूसरी पतिव्रता स्त्री ने उसके चरणों में गिरकर कहा 'झूठे ही पाप न करो, मेरी बात सुनो ॥३५॥

इस पापिन ने इसे देखकर, तुम्हारी बगल से उठकर इससे आग्रहपूर्वक संगम करने की प्रार्थना की, किन्तु इस सज्जन ने इसे स्वीकार नहीं किया ।॥३६॥

तू मेरी माता है, ऐसा कहकर इसे फटकार दिया। इसी ईर्ष्या से इसने उसका वध कराने के लिए तुम्हें जगाया है।॥ ३७७१

हे स्वामिन्, इसने वृक्ष पर रात को ठहरे हुए एक सौ पथिकों के साथ समागम किया है और उनसे अंगूठियाँ ली हैं। वैर बढ़ने के भय से मैंने इस अकथनीय पाप की कथा तुमसे नहीं कही ॥३८-३९॥

यदि तुम्हें विश्वास न हो, तो इसके आँचल में बँधी हुई अंगूठियां देखो। यह मेरा सती-धर्म नहीं है कि मैं स्वामी से झूठ बोलूं ॥४०॥

हे स्वामिन्, मेरे सतीत्व का विश्वास करने के लिए मेरा प्रभाव देखो।' ऐसा कहकर उसने क्रोध से देखकर एक वृक्ष को भस्म कर डाला और फिर प्रसन्न दृष्टि से देखकर उसे फिर पहले से भो अधिक हरा-भरा बना दिया। यह देखकर उस का सन्तुष्ट पति उसे बड़ी देर तक आलिंगन करता रहा ॥४१-४२॥

और, उस दूसरी स्त्री के आँचल से अंगूठियाँ पाकर उस पति ने, उसकी नाक काटकर उसे दूर कर दिया (निकाल दिया) ॥४३॥

और, पढ़ने के लिए जानेवाले उस यशोवर से क्षमा-प्रार्थना की तथा खेद और वैराग्य के साथ बह उससे बोला-'मैं इन दोनों पत्नियों को हृदय में रखकर ईर्ष्या के कारण इनकी रक्षा करता रहा हूँ, परन्तु आज इस दुष्टा स्त्री की रक्षा में न कर सका ।॥४४-४५।।

बिजली को कौन स्थिर रख सकता है और चंचल (दुराचारिणी) स्त्री की कौन रक्षा कर सकता है? सती स्त्री केवल एक अपने चरित्र से ही रक्षित होती है ॥४६॥

रक्षा की गई पतिव्रता दोनों लोकों में, पति की रक्षा करती है, जैसा कि शाप और वर देने में इस स्त्री ने मेरी रक्षा की है।॥४७॥

इसकी कृपा से मैं इस व्यभिचारिणी स्त्री के सम्पर्क से बचा और उत्तम ब्राह्मण की हत्या के पाप से भी बचा' ।॥४८॥

इस प्रकार कहकर और यशोधर को बैठाकर उसने पूछा 'तुम दोनों कहाँ से आये हो और कहाँ जा रहे हो, यह मुझे बताओ' तब यशोधर ने अपना वृत्तान्त बताकर और उसका विश्वास प्राप्त करके कुतूहलवश उससे भी पूछा- ॥४९-५०॥

'हे महापुरुष, यदि गुप्त रखने की बात न हो, तो यह बताओ कि ऐसे भोग प्राप्त करने पर भो तुम्हें यह जलवास कैसे मिला ? ॥५१॥

यह सुनकर, 'सुनो, कहता हूँ, ऐसा कहकर वह पुरुष उससे बोला- 'हिमालय के दक्षिण की ओर कश्मीर नाम का देश है, जिसे मानों ब्रह्मा ने मनुष्यों के लिए, स्वर्ग का कौतूहल दूर करने के हेतु बनाया है ।।५२-५३॥

जहाँ कैलास और श्वेतद्वीप के सुखद निवास को छोड़कर शिव और विष्णु सैकड़ों स्थलों में स्वयं प्रादुर्भूत होकर निवास करते हैं। जो देश, वितस्ता नदी के जल से पवित्र एवं शूर तथा विद्वान् व्यक्तियों से भरा है, जो छल, कपट आदि दोषों से अजेय है, अर्थात् जहाँ छल, कपट का नाम नहीं है और जिसे बलवान् शत्रु भी विजित नहीं कर सकते ।॥५४-५५॥

मैं उस कश्मीर में, भवशर्मा नाम का सामान्य स्थिति का ग्रामवासी ब्राह्मण-पुत्र था। पूर्वजन्म में मेरी दो पत्नियाँ थी। मैंने किसी समय भिक्षुओं के साथ सम्पर्क हो जाने के कारण शास्त्र में कहे गये उपोषण नाम के नियम-वत को स्वीकार किया ।।५६-५७॥

उस व्रत के प्रायः समाप्त हो जाने पर मेरी सेज पर मेरी पापिनी पत्नी, हठपूर्वक आकर सो गई ॥५८॥

रात के चौथे प्रहर में अपने व्रत का ध्यान न रखते हुए नींद के नशे में मैंने उस स्त्री के साथ समागम कर लिया। बस, उस वत का इतना ही खंडन हो जाने से मैं जल-पुरुष बनकर यहाँ उत्पन्न हो गया। और, वे ही दोनों पत्नियों यहाँ भी मेरी पत्नियाँ हुई ॥५९-६०।।

जिनमें एक वह पापिन और व्यभिचारिणी थी और दूसरी यह पतिव्रता है। संहित व्रत का भी इतना प्रभाव है कि मैं पूर्व जन्म का स्मरण भी करता हूँ। यदि मैं अपना व्रत खंडित न करता, तो यहाँ मेरा जन्म भी न होता ॥६१-६२॥

इस प्रकार, अपना समाचार कहकर उस पुरुष ने, उन दोनों भाइयों, को, दिव्य भोजन और वस्त्रादि वे सम्मानित किया ॥६३॥

तब उस पुरुष की सती पत्नी ने, पहले समाचार को जानकर, भूमि पर घुटने टेककर और चन्द्रमा की ओर देखकर यह कहा- ॥६४॥

हे लोकपालो, यदि मैं सचमुच पतिव्रता हूँ, तो मेरा पति इस जल-वास से मुक्त होकर स्वर्ग को जाय' ।॥६५।।

उसके इस प्रकार कहते ही आकाश से विमान उतरा और उस पर चढ़े हुए वे दम्पती (पति-पत्नी) स्वर्ग को चले गये ।।६६।।

सच है, सच्ची पतिवताओं के लिए तीनों लोकों में असाध्य क्या है? वे दोनों ब्राह्मण-पुत्र यह दृश्य देखकर अत्यन्त आश्चर्य चकित हो गये ॥६७॥

शेष रात्रि को व्यतीत कर प्रातःकाल ही वे दोनों ब्राह्मण-पुत्र वहाँ से आगे चल पड़े ॥६८॥

और सायंकाल, एक निर्जन वन में, जल की इच्छा करते हुए जब वे एक वृक्ष के नीचे खड़े हुए, तब उन्होंने उस वृक्ष से यह वाणी सुनी ॥६९॥

'हे ब्राह्मणो, ठहरो, मैं अभी आप दोनों का स्नान और भोजन आदि से आतिथ्य करता हूँ। क्योकि तुम दोनों मेरे घर पर आये हो।' ।॥७०॥

ऐसा कहकर वह बाणी बन्द हो गई। तदनन्तर, वहीं एक सुन्दर बावली (वापी) बन गई और उसके किनारे विविध प्रकार की भोजन-पान-सामग्री उपस्थित हो गई। 'यह क्या है', इस प्रकार आश्चर्य चकित उन दोनों ब्राह्मण-पुत्रों ने वापी में स्नान करके भोजन किया ।॥७१-७२।।

तदनंतर, सन्ध्या करके जब वे वृक्ष के नीचे बैठे, तभी एक सुन्दर पुरुष उस वृक्ष से उतरा ॥७३॥

उन ब्राह्मणों से प्रणाम किया गया वह पुरुष, उनका स्वागत करके क्रमशः जब बैठ गया, तब उससे उन ब्राह्मण-पुत्रों ने पूछा कि 'तुम कौन हो ?'।॥७४।।

तब वह पुरुष बोला कि मैं पहले जन्म में एक दरिद्र ब्राह्मण था। दैवयोग से कुछ श्रमणों (जैन साधुओं) से मेरी संगति हो गई ।॥७५॥

एकबार मैं उनके द्वारा उपदिष्ट उपोषण (व्रत) करने लगा। उस व्रत के मध्य में ही किसी एक दुष्ट ने मुझे सायंकाल में भोजन करा दिया। इस प्रकार व्रत के खंडित हो जाने पर मैं गुह्यक (यक्ष) योनि में उत्पन्न हो गया। यदि व्रत को पूरा कर लेता, तो स्वर्ग में देवता बन जाता ॥७६-७७।।

यह मैंने अपना समाचार तुम्हें सुनाया। अब तुम अपना परिचय मुझे दो कि तुम लोग इस मरुभूभि में क्यों आ गये हो ? ॥७८॥

यह सुनकर यशोधर ने उसे अपना वृत्तान्त सुनाया। तब वह यक्ष, उन ब्राह्मण-पुत्रों से फिर बोला- ॥७९॥

'यदि ऐसी बात है, तो मैं तुम दोनों को अपने प्रभाव से विद्याएं प्रदान करता हूँ। तुम लोग विद्वान् होकर घर जाओ। व्यर्थ विदेश भ्रमण से क्या लाभ है?' ॥८०॥

यह कह‌कर यक्ष ने उन्हें विद्याएं प्रदान की और उसी यक्ष की कृपा से उन्होंने भी विद्याएँ प्राप्त कीं। तदनन्तर, यक्ष उन दोनों से बोला 'जब में तुम दोनों से गुरु-दक्षिणा मांगता हूँ। इस गुरु-दक्षिणा के रूप में तुम दोनों को मेरे लिए उपोषण (व्रत) करना चाहिए। सच बोलना, ब्रह्मचर्य रहना, देवता की प्रदक्षिणा करना, भिक्षुओं के समय (दिन रहते) भोजन करना, मन का संयम करना और क्षमा ये व्रत के आचरणीय नियम हैं। इसे एक रात करके इसका फल मुझे अर्पण कर देना। जिससे कि मुझे पूरे व्रत का फल (देवत्व) मिल जाय' ।॥८१-८४॥

उन विनम्र दोनों बन्धुओं से इस प्रकार कहकर और उनसे व्रत के लिए स्वीकार-वचन लेकर वह यक्ष उसी वृक्ष में अन्तहित हो गया ॥८५॥

विना परिश्रम और प्रयत्न के अर्थ सिद्ध किये हुए उन दोनों ने, रात बिताकर, और अपने घर वापस आकर तथा माता-पिता को यह सारा वृत्तान्त सुनाकर उन्हें आनन्दित किया। तब उन दोनों ने अपने गुरु यक्ष के पुण्य के लिए उपोषण नामक व्रत किया ॥८६-८७७।

तदनन्तर, उसका गुरु यक्ष विमान में बैठकर उनके पास आया और बोला- मैंने यक्ष योनि से मुक्त होकर तुम लोगों की कृपा से देवत्व प्राप्त कर लिया है, अतः अपने कल्याण के लिए तुम दोनों को भी वह व्रत करना चाहिए। इससे, मृत्यु के पश्चात् तुम लोग भी देवता बनोगे और इस जीवन में मेरे वरदान से अक्षय धनी बनोगे।' इस प्रकार कहकर वह कामचारी स्वर्ग को चला गया ।।८८-९०।।

तब वह यशोधर और लक्ष्मीवर, दोनों भाई व्रत करके यक्ष की कृपा से, अक्षय धन और विद्या प्राप्त कर सुखपूर्वक रहने लगे ॥९१।।

इस प्रकार धर्म की ओर प्रवृत्ति रखनेवाले और दुःख में भी अपने चरित्र को सुरक्षित रखनेवालों की देवता भी रक्षा करते हैं।॥९२॥

इस प्रकार, वसन्तक द्वारा कही गई अद्भुत कथा से विनोदित और अपनी प्यारी शक्तियशा के लिए उत्कंठित वत्सेश्वर का पुत्र वह नरवाहह्नदत्त, भोजन के समय अपने पिता के बुलाने पर अपने मन्त्रियों के साथ वहाँ गया और समुचित भोजन करके सायंकाल गोमुख आदि मन्त्रियों के साथ अपने भवन में आ गया ।॥९३-९५।।

अपने भवन में आने पर पुनः उसका मनोरंजन करने के लिए गोमुख ने कहा- 'सुनिए, में दूसरी कया प्रारम्भ करता हूँ ॥९६॥

मगर और वानर की कथा

समुद्र के किनारे, गूलर के वन में अपने झुंड से छूटा हुआ वलीमुख नाम का एक बन्दर था ।।९७।।

वृक्ष पर बैठकर गूलर खाते हुए उसके हाथ से छूटे हुए एक गूलर को समुद्र के जल में रहनेवाले एक शिशुमार नामक मगर ने खा लिया और उसके स्वाद से प्रसन्न होकर उसने मीठी आवाज दो। उसकी वाणी के रस से सन्तुष्ट बन्दर ने, उसे बहुत-से गूलर के फल और फेंक दिये ॥९८-९९॥

इसी प्रकार, बन्दर, प्रतिदिन ऊपर से फल फेंकता था और शिशुमार, उन्हें लाकर उसी प्रकार मधुर गान किया करता था। कुछ दिनों में उन दोनों की परस्पर मित्रता हो गयी ॥१००॥

इस कारण प्रतिदिन, वह शिशुमार, तट पर रहनेवाले बन्दर के साथ फल खाता हुआ दिन व्यतीत कर सायंकाल अपने पर को जाता था ।।१०१।।

इस प्रकार सारे, दिन का विरह देनेवाली बन्दर की मित्रता को न चाहनेवाली शिशुमार की स्त्री ने बीमारी का बहाना बनाया ॥१०२॥

तब अत्यन्त दुःखी शिशुमार ने पत्नी से पूछा- 'प्रिये, बताओ, तुम्हें क्या रोग है और वह कैसे शान्त होगा?' ॥१०३॥

उसके इस प्रकार आग्रहपूर्वक पूछने पर भी जब उसकी स्त्री ने उत्तर न दिया, तब उसके रहस्य को न जाननेवाली सखी ने उससे कहा- ॥१०४।।

'यद्यपि तू करेगा नहीं और यह भी ऐसा चाहती नहीं, तो भी कह देती हूँ, कोई भी जानकार लोगों के दुःख को कैसे छिपा सकता है ? ॥१०५॥

तुम्हारी पत्नी को ऐसा भीषण रोग उत्पन हो गया है, जो बन्दर के हृदय-कमल के स्वरस के बिना दूर नहीं होगा' ।॥१०६॥

पत्नी की सहेली से इस प्रकार कहा गया शिशुमार सोचने लगा 'दुःख है, बन्दर का हृदय-कमल मुझे कहाँ मिलेगा ? ॥१०७॥

यदि मैं अपने मित्र बन्दर के साथ विश्वासघात करूं, तो क्या यह मेरे लिए उचित है? अयवा मित्र से भी क्या? पत्नी तो मेरी प्राणों से भी प्यारी है ।॥ १०८॥

ऐसा सोचकर शिशुमार ने अपनी भार्या से कहा-'प्रिये, क्यों दुःखी होती है, मैं तेरे लिए समूचा बन्दर ही ले आता हूँ ।॥१०९॥

ऐसा कहकर शिशुमार, अपने मित्र बन्दर के पास गया। बातों के प्रसंग में बन्दर से वह इस प्रकार बोला-'मित्र, अभी तक तुमने मेरा घर और मेरी पत्नी को नहीं देखा। सो चलो, एक ही दिन के विश्राम के लिए सही, जहाँ घर जाकर परस्पर प्रेमपूर्वक भोजन नहीं किया जाता, और अपनी-अपनी स्त्रियाँ नहीं दिखाई जातीं, वहाँ मित्रता नहीं, कपट-मात्र है ॥११०-११२॥

इस प्रकार, बन्दर को धोखे से समुद्र में उतारकर और उसे पकड़कर वह शिशुमार अपने घर के लिए चल पड़ा ॥११३॥

बन्दर ने चकित और व्याकुल होकर उसे जाते हुए देखकर पूछा 'मित्र, इस समय मैं तुम्हें कुछ दूसरे ही रूप में देख रहा हूं।' तब वह मूर्खहृदय शिशुमार बन्दर से इस प्रकार कहने लगा-'मेरी पत्नी अस्वस्थ है' और वह अपने रोग के लिए बन्दर का हृदय मांगती है, इसलिए मैं बेचैन हूँ ।॥११४-११६।।

उसकी यह बात सुनकर बुद्धिमान् बन्दर सोचने लगा 'ओह, इसीलिए यह दुष्ट मुझे यहाँ लाया है ।।११७।।

स्त्री के व्यसन का मारा हुआ यह मित्रद्रोह पर उतर गया है, भूत से आक्रान्त व्यक्ति क्या अपने ही दाँतों से अपना ही मांस नहीं खा लेता ! ॥११८॥

इस प्रकार सोचकर वह बन्दर शिशुमार से कहने लगा-'मित्र, यदि ऐसी बात है, तो तने मुझे पहले ही क्यों नहीं बताया ॥११९॥

यदि तुमने पहले ही कहा होता, तो मैं तुम्हारी प्यारी के लिए अपना हृदय-कमल साथ ले आता। इस समय तो वह हृदय-कमल मेरे निवासस्थान, गूलर के वृक्ष में ही रखा रह गया है' ॥१२०॥

यह सुनकर दीन और मूर्ख शिशुमार उससे बोला-'तव तुम गूलर के वृक्ष से उसे लाकर मुझे देदो' ॥१२१॥

और वह उसे फिर समुद्र के तट पर ले आया और वहां लाकर मृत्यु के प्रतिरूप शिशुमार ने उस बन्दर को छोड़ दिया ॥१२२॥

बन्दर लम्बी छलांग लगाकर वृक्ष की चोटी पर चढ़ गया और उस शिशुमार से बोला-'अरे मूर्ख, भाग जाओ। क्या किसी का हृदय शरीर से अलग भी होता है। मैंने इस प्रकार कहकर अपने प्राण छुड़ाये। अब मैं फिर न आऊंगा। मूर्ख ऐसे प्रसंग में तुमने गधे की कहानी नहीं सुनी। उसे सुनो' ।॥१२३-१२४।।

कान और हृदय से हीन गधे की कथा

एक वन में एक सिह रहता था। उसका मन्त्री एक सियार था। किसी समय शिकार के लिए आये हुए राजा के बाणों से वह सिंह व्याकुल हो गया और किसी तरह जीता ही गुफा में घुस गया ।।१२५-१२६॥

राजा के लौट जाने पर, वह सिह, उपवास से अशक्त होकर गुफा में पड़ा रहा। उसकी इस स्थिति से, सिह के जूठे मांस से जीनेवाला सियार भी भूख से तड़पने लगा और सिह से बोला-'स्वामिन्, आप गुफा से बाहर निकलकर अपनी शक्ति के लिए आहार क्यों नहीं खोजते ? ऐसे तो तुम्हारा शरीर तुम्हारे परिवारवालों के साथ कष्ट पा रहा है' ।। १२७-१२८॥

उस सियार से इस प्रकार कहा गया सिंह, उससे बोला- 'मित्र, धावों से भरा हुआा मैं घूम नहीं सकता। गधे का कान और उसका हृदय खाने के लिए मिले, तो मेरे घाव भर जायें और मैं भी शीघ्र स्वस्थ हो जाऊँ। इसलिए तू जाकर कहीं से भी गधे को शीघ्र ला।' सिह से इस प्रकार कहा गया सियार 'जो आज्ञा', कहकर गया ढूंढ़ने चला गया ।। १२९-१३१॥

इस प्रकार कहते हुए सियार से वह गधा बोला- 'सदा अपने धोबी के बोझ ढोते ढोते दुर्बल हो गया हूं।' इस प्रकार कहते हुए गधे से सियार ने कहा-॥१३३॥

'यहाँ क्यों कष्ट उठा रहे हो, आओ। मैं तुम्हें स्वर्ग के समान सुख पहुंचानेवाले वन में पहुंचा देता हूँ। वहाँ तुम गधियों के साथ हृष्ट-पुष्ट हो जाओगे' ।॥१३४।।

यह सुनकर भोग का लोभी वह गधा, सियार की बात स्वीकार कर उसके साथ सिंह के वन को चला गया ।।१३५।।

गधे को देखकर उसके पीछे से आकर अस्वस्थता से दुर्बल सिह ने, उस पर अपने पंजे से आक्रमण कर दिया ॥१३६।।

इस प्रकार मार खाकर डरा हुआ गधा एकाएक भागकर चला आया और रोग से व्याकुल सिंह भी उसका पीछा न कर सका ।॥ १३७॥

सिंह भी अपने काम में असफल होकर शीघ्र ही अपनी गुफा में घुस गया। तब उस सियार मन्त्री ने उलाहना देते हुए सिह से कहा- ॥१३८॥

'स्वामिन्, यदि तुम एक दुर्बल गधे को न मार सके, तो हरिण आदि के मारने में तुम्हारी क्या दशा होगी' ॥१३९।।

यह सुनकर सिंह ने कहा-'तुम जैसा समझ रहे हो, वैसी ही स्थिति है। अब तुम उस गधे को फिर लाओ और मैं तैयार होकर उसे मारता हूँ' ।॥१४०।।

तब सिह से फिर भेजे गये सियार ने, गदहे के समीप आकर कहा-'तुम वहां से शीघ्र क्यों भाग जाए ? ॥१४१॥

'मुझे किसी प्राणी ने मारा', इस प्रकार कहते हुए गधे से सियार ने हँसकर कहा- ॥१४२॥

'तुम्हें व्यर्थ ही भ्रम हुआ है। वहां कोई ऐसा प्राणी नहीं है। मेरे जैसा ही व्यक्ति वहाँ रहता है ।।१४३॥

अतः, तुम मेरे साथ आओ। उस वन में निष्कंटक सुख है। इस प्रकार, उस सियार की बातों में फंसा हुआ वह मूर्ख गधा फिर वहाँ आया ॥१४४॥

उसे आते हुए देखते ही सिह ने, गुफा के मुंह से निकलकर, उसकी पीठ पर आक्रमण करके नखों से चीरकर उसे मार डाला ॥१४५।।

गधे को फाड़कर और सियार को उसका रक्षक नियुक्त करके थका हुआ सिह नहाने, के लिए चला गया ।॥१४६॥

कपटी, छली उस मूर्ख सियार ने, अपना पेट भरने के लिए उस गधे गदहे के कान और हृदय को खा डाला ॥१४७॥

स्नान करके आये हुए सिंह ने बिना कान और हृदय के गधे को देखकर सियार से कहा कि 'इसके कान और हृदय कहाँ है?' ॥१४८॥

यह सुनकर सियार ने कहा- 'स्वामिन्, यह गधा तो पहले से ही बिना कान और हृदय का था अन्यया, वह (तुम्हारा थप्पड़ खाकर भागा हुआ) फिर यहाँ कैसे आ जाता ?' ॥१४९॥

यह सुनकर और ठीक समझकर वह उस गधे को खा गया और उससे बचे हुए मांस को सियार ने चखा ॥१५०।।

यह कथा सुनकर वह बन्दर शिशुमार से बोला-'अब मैं फिर तेरे साथ आकर गधापन न करूंगा ॥१५१॥

बन्दर से इस प्रकार फटकारा हुआ शिशुमार, अपनी स्त्री के कार्य की असफलता और हाथ से निकल गये मित्र के लिए चिन्ता करता हुआ अपने घर चला आया ।।१५२।।

शिशुमार के साथ बन्दर की मित्रता नष्ट समझकर उसकी स्त्री, धीरे-धीरे स्वस्थ हो गई। और वह बन्दर भी समुद्र के तट पर आनन्दपूर्वक विचरण करने लगा ।।१५३।।

'इसलिए' बुद्धिमान् व्यक्ति, दुष्ट मनुष्य पर कभी विश्वास न करे। दुर्जन और काले साँप पर विश्वास करने से भला कहाँ सुख मिल सकता है ? ॥१५४॥

मन्त्री गोमुख इस प्रकार कथा कहकर नरवाहनदत्त का मनोरंजन करता हुआ फिर बोला-अब हँसने योग्य कुछ मूखों की कथाएँ फिर सुनो। उनमें पहले गवैये को सन्तुष्ट करनेवाले मूर्ख की कथा सुनो ॥१५५-१५६॥

धनी और गवैये की कथा

किसी घनी रईस को किसी गवैये ने गा-बजाकर सन्तुष्ट किया। तब उस घनी ने अपने मुनीम को बुलाकर गवैये के सामने कहा- 'इस गवैये को पुरस्कार में दो हजार मुद्रा दे दो।' मुनीम ने उसे स्वीकार किया। जब गवैये ने, जाकर उस मुनीम से रुपये मांगे, तब मुनीम ने उसे जान-बूझकर रुपये नहीं दिये ।।१५७-१५९॥

तदनन्तर, गवैये ने, जब उस रईस से जाकर रुपये के लिए कहा, तब उसने उस गवैये से कहा-'तुमने मुझे क्या दिया है कि जिसके बदले में तुम्हें रुपया हूँ ।।१६०।।

तू ने बीन बजाकर कुछ समय तक मेरे कानों को आनन्दित किया, तो मैंने भी तुम्हें पुरस्कार की राशि सुनाकर तुम्हारे कानों को आनन्दित कर दिया' ।॥१६१॥

यह सुनकर बेचारा निराश गवैया हँसकर चला गया। इस प्रकार के कंजूस की कथा सुन कर पत्यरों को भी हँसी जाती है ॥१६२॥

मूर्ख शिष्यों की कथा

महाराज, अब दो मूर्ख शिष्यों की कथा सुनो। किसी गुरु के दो शिष्य थे, जो आपस में द्वेष रखते थे। उनमें से एक शिष्य प्रतिदिन अपने गुरु के दाहिने पैर को तैल मालिश करके उसे धोता तथा उसकी सेवा करता था, तो दूसरा उसी प्रकार वाँयें पैर की सेवा किया करता था ।।१६३-१६४॥

किसी समय दाहिने पैर की मालिश करनेवाले शिष्य को गुरु के गाँव भेज देने पर, उस शिष्य के बाँयें पैर को धो लेने पर गुरु ने उससे कहा कि आज इसे भी तू ही धो दे। यह सुन कर वह मूर्ख शिष्य गुरु से बोला- 'यह पैर, मेरे विरोधी का है। अतः मैं इसकी मालिश आदि कुछ न करूँगा। उसके इस प्रकार कहने पर भी जब गुरु ने उससे आग्रह किया तब अपने विरोधी साथी के क्रोध से उसने उस दाहिने पैर को पत्थर मारकर तोड़ दिया ।।१६५-१६८॥

गुरु के चिल्लाने पर, दूसरे शिष्यों ने, आकर उस दुष्ट शिष्य को पीटना प्रारम्भ किया, तब गुरु ने दुःख के कारण उसे छुड़वा दिया ॥१६९॥

दूसरे दिन गाँव से लौटकर आये हुए दूसरे शिष्य ने गुरु के पैर में वेदना देखकर उसका वृत्तान्त पूछा और जानकर क्रोध से जल उठा ।।१७०॥

और कुद्ध होकर वह कहने लगा- 'यदि उसने ऐसा किया, तो मैं भी क्यों न दूसरे (बाँयें) पैर को तोड़ डालें।' इस प्रकार सोचकर और उस पैर को खींचकर उसे भी तोड़ दिया ॥१७१।।

तब अन्यान्य शिष्यों द्वारा मारे जाते हुए उसे भी टूटे पैरवाले गुरु ने छुड़वा दिया ॥१७२॥

इस प्रकार वे दोनों मूर्ख शिष्य, सभी के लिए द्वेष और हास्य के पात्र बन गये। अपनी क्षमा के कारण प्रशंसनीय गुरु धीरे-धीरे स्वस्थ हो गये ।११७३।।

'हे स्वामिन्, इस प्रकार आपस में द्वेष रखनेवाले सेवक अपने और स्वामी दोनों की हानि करते हैं' ॥१७४।।

अब दो मुखों वाले सांप की कथा सुनो। किसी सांप के आगे और पीछे दोनों ओर शिर थे। ॥१७५॥

पूंछ वाला शिर अन्धा था, किन्तु प्राकृतिक शिर आँखों वाला था। फिर भी, उन दोनों शिरों में परस्पर मैं प्रधान हूँ, मैं प्रधान हूँ, यह विवाद हो गया। वह साँप अपने वास्तविक शिर से चलने-फिरने का काम लेता था। एक बार उसके पीछेवाले मुंह को मार्ग में बहुत कष्ट उठाना पड़ा ॥१७६-१७७।।

उसने कहीं (किसी चीज से) लिपट कर साँप की गति को आगे बढ़ने से रोक दिया। तब सर्प ने, पिछले मुख को ही अगले शिर को जीतनेवाला बलवान् मान लिया ॥१७८॥

तब उसी अन्धे शिर से बाहर घूमता हुआ वह सर्प मार्ग न दीखने के कारण किसी गढ़े में जलती हुई अग्नि में गिर गया और जलकर मर गया ।।१७९॥

इस प्रकार जो लोग गुण के थोड़े और बहुत अन्तर को नहीं जानते, वे अल्प गुणवाले का संग करके दुर्दशा को प्राप्त होते हैं।॥१८०॥

चावल खाने वाले मूर्ख की कथा

अब चावल खानेवाले मूर्ख की कथा सुनो। एक मूर्ख पहली बार अपनी ससुराल गया ॥१८१॥

वहाँ सास द्वारा पकाने के लिए रखे गये सफेद चावलों को देखकर उसने एक मुट्ठी चावल खाने के लिए मुँह में डाल लिया ॥१८२॥

उसी समय सास के आ जाने के कारण लज्जित वह मूर्ख, न तो चावलों को चबाकर खा सका और न उगल ही सका ॥१८३॥

उसकी सास ने फूले गालवाले और बोलने में असमर्थ देखकर उसे रोगी समझ अपने पति को बुलवाया ॥१८४॥

उस श्वसुर ने भी उसकी यह दशा देखकर वैद्य को बुलाया। वैद्य ने भी शोथ (सूजन) की आशंका से उसकी ठोड़ी और शिर दोनों पकड़कर उसका मुँह खोल दिया ॥१८५॥

तब लोगों की हँसी के साथ ही उसके मुँह से चावल भी निकल पड़े। इस प्रकार, मूर्ख अकर्म तो कर देते हैं, किन्तु उन्हें छिपाना नहीं जानते ॥१८६।।

गधे का दूध दुहने की कथा 

एक समय कुछ मूर्ख बालकों ने, लोगों को गाय-भैस आदि दुहते देखकर एक गधी को पकड़कर दुहना प्रारम्भ किया। कोई उसे दुहने लगा, किसी ने दुहने का पात्र पकड़ा और उधर कुछ बालक 'हम पहले पियेंगे, हम पहले पियेंगे' इस प्रकार कहकर परस्पर झगड़ने लगे ।।१८७-१८८॥

किन्तु, उनके परिश्रम करने पर भी गधे का दूध न मिल सका। अयोग्य वस्तु में व्यर्थ परिश्रम करनेवाले हँसी के पात्र बनते हैं ।॥ १८९॥

महाराज, कोई एक ब्राह्मण-पुत्र था। उससे सायंकाल में उसके पिता ने कहा- 'बेटा, प्रातःकाल गाँव जाना होगा' ॥१९०॥

पुत्र ने चुपचाप सुन लिया और प्रातःकाल ही उठकर पिता से काम पूछे बिना ही वह गाँव को चला गया और सायंकाल व्यर्थ लौटकर उसने पिता से कहा- 'मैं गाँव जाकर आ गया। उसके पिता ने कहा- 'तुम्हारे जाने पर मेरा कुछ भी काम सिद्ध न हुआ' ॥१९१-१९२॥

इस प्रकार, बिना अर्थ के प्रयत्न करनेवाले मूर्ख संसार में हंसे जाते हैं। वे कष्ट करते हैं, किन्तु काम कुछ नहीं बनता ॥१९३॥

प्रधान मन्त्री गोमुख द्वारा इस प्रकार शिक्षा-पूर्ण कथा को सुनकर और अपने को शक्ति-यशा की आसक्ति में निमग्न बताकर तथा बहुत बीती रात तक जगकर वत्सेश्वर का पुत्र नरवाहन-दत्त, नींद से आँखें मूंदता हुआ मित्रों के साथ सो गया ।॥१९४॥

महाकवि सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियश लम्बक का सप्तम तरंग' समाप्त

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